Sunday, December 30, 2007

फिर से पाकिस्तान में

किस्मत दुबारा पाकिस्तान खींच लाई है. बेनजीर की हत्या के बाद के हालात को अपनी आंख से देख पा रहा हूँ. हालात ठीक नही लगते. किसी तरह ये छोटी सी सूचना आप तक पहुँचा पा रहा हूँ. तफसील से बात होगी, फिलहाल इतना ही.

मेरी तो यहीं बीतेगी पर आप सबों को नए साल की बधाई...

Saturday, December 29, 2007

सॅारी, रोड-रेज में गई बेनज़ीर की जान!

जवाब मिल गया है। अल्टीमेट ख़ुलासा हो गया है। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि बेनज़ीर की हत्या हादसे में हुई... गोली या धमाके से नहीं। लेकिन शायद उन्हें भी ये बात नहीं पता कि बेनज़ीर की हत्या महज़ एक रोज-रेज का मामला है! रोड रेज नहीं समझते? अरे सड़क पर चलते हुए दो वाहन चालकों के बीच जब को पंगा हो जाए। फिर तू तू मैं मैं होते होते नौबत यहां तक पहुंच जाए कि वे एक दूसरे की जान लेने पर उतर आएं। और जो ले सकता है वो सामने वाले की जान ले ले! एक्ज़ाक्टली यही हुआ है रावलपिंडी में! आपको नहीं पता! तो सुन लीजिए।

दरअसल हुआ ये कि जब बेनज़ीर अपना भाषण ख़त्म कर गाड़ी में बैठीं तो पीछे से मोटरसाइकिल सवार दो-तीन नौजवानों ने साइड लेने के लिए उन्हें हार्न दिया। बेनज़ीर उनकी अनदेखी कर अपनी नेतागिरी में जुटी रहीं। उन्होने ने सोचा कि वो प्रेसिडेंट मुशर्रफ को चुनौती दे रही हैं। भला उनसे कौन टकरा सकता है! लेकिन मोटरसाईकिल पर सवाल नौजवान जल्दी में थे। बेनज़ीर के काफ़िले की धीमी रफ्तार उन्हें नहीं भा रही थी। उन्होने बार बार हार्न दिया। पर लोकतंत्र बहाली की मदहोशी में डूबी बेनज़ीर ने उन्हें हर बार अनसुना कर दिया।

फिर विवश होकर उन नौजवानों में से एक ने पिस्तौल निकाल ली। दूसरे ने भी जोश में निकाल ली। और फिर फ़ायर कर दिया! इसमें आश्चर्य की क्या बात है! दिल्ली की सड़कों पर तो ऐसा होता रहता है। तब आपको आश्चर्य नहीं लगता! अब फ़ायर कर दिया तो कर दिया! भई ये पाकिस्तान का गन कल्चर है। हम आप क्या कर सकते हैं! एक ने फ़ायर किया तो दूसरे से रहा नहीं गया। उसने फिदायीन बटन दी दबा दी। पाकिस्तान में आपको बहुत सारे शख़्स आपको ऐसे बटन के साथ घूमते मिलेगें। ये छोटी-मोटी बातों पर भी ख़ुद को उड़ा देने की क़ाबिलियत रखते हैं। ये बात कई साल बाद मुल्क लौटीं बेनज़ीर नहीं समझ पायीं। आने के पहले पाकिस्तान का ट्रैफ़िक रुल बुक तो पढ़ लेना था! साइड दे दिया होता!

पर जब आप सड़क पर चलते हैं तो एक भ्रम भी पाले चलते हैं कि आप ही सही चल रहे हैं। और आपको इसका नुक्सान भी उठाना पड़ता है। तो जब बेनज़ीर ने साइड नहीं दी तो मोटरसाईकिल सवार नौजवानों ने ... जो जल्दी में थे... सोचा बेनज़ीर को भी साथ लिए चलते हैं! सो उन्होने ख़ुद के साथ साथ बेनज़ीर को भी उड़ा लिया! बस इतनी सी बात है और आप मीडिया वाले पता नहीं क्या तिल का ताड़ बना रहे हो! पाकिस्तान की सरकार को भी बताईएगा। कहां वो हादसा या हक़ीकत के चक्कर में पड़ी है। हमारे यहां कि होनी-अनहोनी सीरियल की तर्ज़ पर। इस रोड-रेज मामले की रावलपिंडी के लोकल थाने में प्रोपर एफआईआर करायी जाए।

Friday, December 28, 2007

बेनज़ीर के नहीं रहने से किसे फ़ायदा?

(जनसत्ता के तीन जनवरी के अंक में प्रकाशित)

बेनज़ीर मारी गईं। बड़े दिनों तक सवाल उठेगा कि किसने मारा... या किसने मरवाया? पाकिस्तान की सियासत में भीतरी और बाहरी काफी पेंचदगियां हैं। फिर भी शक का सिरा पकड़ना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि आख़िर बेनज़ीर की मौत से किसे फ़ायदा होगा। एक, या तो उन्हें जो पाकिस्तान में तालिबानी शासन चाहते हैं। या फिर दूसरा, उन्हें जो बेनज़ीर से ख़तरा महसूस करते हों।

बेनज़ीर की पीठ पर अमेरिका का हाथ बताया जाता रहा है। ये अमेरिकी दबाव ही था जिसकी बदौलत उनकी वतन वापसी संभव हो पायी। पाकिस्तान के वे तत्व जो अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर वन मानते हैं... बेनज़ीर के भी खिलाफ रहे। उन्हें लगता रहा कि ये अमेरिकी इशारे पर चल कर पाकिस्तान को उस दिशा में ले जाएगी जो 'इस्लाम के हित' में नहीं होगा। लड़के लड़कियों के लिए अलग स्कूल जैसी ज़िद पाले बैठे ये तत्व दरअसल पाकिस्तान को उस रास्ते ले जाना चाहते हैं जिस पर तालिबानों के समय अफग़ानिस्तान चल पड़ा था। वहां से खदे़ड़ दिए गए तालिबानी भी नार्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ साथ पाकिस्तान के कई इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर चुके हैं। अमेरिकी दबाव में उन पर कार्रवाई हो रही हैं। बेनज़ीर का चुन कर आना उनके लिए और मुसीबत खड़ी कर सकता था। लिहाज़ा बेनज़ीर को रास्ते से हटाना ही उनका मक़सद बन गया था।

लेकिन कुछ और भी है जो क़ाबिले गौर है। बेनज़ीर की 18 अक्टूबर की वतन वापसी से ठीक पहले सूचना आयी कि एक तालिबानी कमांडर बैतुल्लाह मसूद ने आत्मघाती दस्ते तैयार किए हैं बेनज़ीर को मारने के लिए। बेनज़ीर के आते ही उन पर फिदायीन हमला होगा। इस सूचना पर प्रतिक्रिया देते हुए बेनज़ीर ने कहा था कि उन्हें तालिबान से उतना ख़तरा नहीं जितना मिलिटरी स्टैब्लिशमेंट में बैठे जिहादी ताक़तों से है। बेनज़ीर के शब्द थे, "मैं बैतुल्लाह मसूद से चिंतित नहीं हूं। मैं सरकार की तरफ जो ख़तरा है उससे चिंतित हूं। बैतुल्लाह जैसे लोग सिर्फ प्यादे हैं। उसके पीछे वो लोग हैं जिन्होने मेरे मुल्क़ में आतंकवाद को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है।" अब इसे आईएसआई की तरफ इशारा माने या फिर सेना में बैठे कुछ लोगों की तरफ। बेशक बेनज़ीर की हत्या की ज़िम्मेदारी के तौर पर अल-क़ायदा का नाम सामने आ रहा हो। लेकिन अगर अल-क़ायदा और तालिबान को अपनी चिंता है तो पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट में बैठे ऐसे तत्व भी कम नहीं जिनको लगता रहा कि अगर बेनज़ीर प्रधानमंत्री बन गईं तो उनकी कमाई का ज़रिए भी बंद हो जाएगा और शायद वो भी।

18 अक्टूबर की खूनी रैली के बाद बेनज़ीर ने उसकी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की थी क्योंकि उन्हें मुशर्रफ और मौजूदा सरकार पर भरोसा नहीं था। लेकिन उनकी इस मांग पर कान नहीं धरा गया। उल्टे सरकार की तरफ से हमेशा उन्हें एहतियात बरतने की सलाह दी जाती रही। कुछ इस तरह का एहतियात कि वे नेता की तरह कभी निकल ही ना पाए। कभी रैली ना कर पाए। यहां तक कि इमरजेंसी के खिलाफ जब बेनज़ीर ने लाहौर से इस्लामाबाद लॅाग मार्च का ऐलान किया तब भी वहां उनकी सुरक्षा को लेकर सचेत किया जाता रहा। लब्बोलुआब ये कि वे पाकिस्तान में रहें और चुनाव लड़े लेकिन अपने साथ लोगों को जोड़ने की कोशिश ना करें। अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाले काम न करें। उस समय मैं पाकिस्तान में ही था और हरेक फैसलों और बयानों को नज़दीक से देख पा रहा था।

मुशर्रफ पर भी आरोप है कि वे अमेरिका के कठपुतली के तौर पर काम करते हैं। यानि अमेरिकी हित को साध कर ही आगे बढ़ते हैं। दरअसल अमेरिका ने मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच समझौता करा कर ये तय करना चाहा कि मुशर्रफ सिवियन राष्ट्रपति बन कर रहें और बेनज़ीर चुनी हुई सरकार की मुखिया। ऐसे में दुनिया को पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली की तस्वीर भी मिल जाएगी और ‘वार आन टेरर’ का अमेरिकी कार्यक्रम भी चलता रहेगा। ख़ुद को और मज़ूबती देने के लिए अमेरिका ने मुशर्रफ को बेनज़ीर से और बेनज़ीर को मुशर्रफ से काउंटर बैलेंस करने की नीति अपनायी। अब बेनज़ीर के नहीं रहने से अमेरिका के काम आने का सारा दारोमदार अकेले मुशर्रफ़ के कंधे पर ही आ गया है। जब अमेरिका के सामने और कोई विकल्प नहीं तो मुशर्रफ की पीठ पर उसका हाथ तो मज़बूती से टिकेगा ही।

अब मुशर्रफ़ के दोनों हाथों में लड्डू हैं। वे चाहें तो बेनज़ीर की हत्या को बहाना बना कर 8 जनवरी को होने वाले चुनाव को टाल दें। नवंबर को नेशनल एसेंबली और प्रांतीय एसेंबलियों को भी भंग किया जा चुका है। केयर टेकर प्रधानमंत्री के तौर पर मोहम्मद मियां सूमरू को मुशर्रफ का पिछलग्गू बताया जाता है। चुनाव जितने दिन टलेंगे... सूमरू उतने दिन प्रधानमंत्री बने रहेगें। यानि उतने दिनों तक मुशर्रफ की पार्टी पीएमएल क्यू की चुनाव में संभावित हार टलती रहेगी। दूसरे शब्दों में, चुनाव टलने से मुशर्रफ की गद्दी पर पकड़ मज़बूत बनी रहेगी। क्योंकि आशंका इस बात की भी है कि अगर पीपीपी या पीएमएल नवाज़ जैसी पार्टी भारी बहुमत से जीत कर आती है तो मुशर्रफ़ को इमरजेंसी लगाने समेत कई पुराने फ़ैसलों की वजह से मुश्किल आ सकती है। हालांकि इमरजेंसी हटाने के ठीक पहले कई अध्यादेशों के ज़रिए मुशर्रफ ने अपनी स्थिति को बादशाह जैसी बना ली है। जैसे कि उनके लिए गए किसी फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती... और कई फैसलों को नई बनने वाली संसद की मंज़ूरी या तस्दीक करने की ज़रुरत नहीं होगी। लेकिन पाकिस्तान में जब सत्ता बदलती है तो कानून भी बदलते देर नहीं लगती।

दूसरी स्थिति भी मुशर्रफ के मुफ़ीद बैठती है। वे ये कि वे चुनाव न टालें। 8 जनवरी को चुनाव होने दें। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रखने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया है। मुशर्रफ इसे नज़रअंदाज कर अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहेगें। और फिर माहौल ऐसा बन गया है कि चुनाव अपने तौर तरीक़े से कराए जा सकें। इस हत्याकांड के बाद नेता रैलियां निकालने से हिचकेगें। कार्यकर्ता और अवाम भी उसमें शिरकत करने से डरेगीं। आल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेंट के बैनर तले नवाज़ शऱीफ ने नवंबर के अंत में ही चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाहरी दबाव और अपने सांसद-उम्मीदवरों की ज़िद के आगे उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। आपराधिक मुकद्दमों और साजिश के हवाले से नवाज़ और शाहवाज़ शरीफ पर का परचा पहले ही ख़ारिज़ किया जा चुका है। बेनज़ीर रही नहीं। तहरीक़े इंसाफ के नेता इमरान खान 13 और पार्टियों के साथ चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट, फजलुर्रहमान की जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम, असफंदयार वली खान की नेशनल अवामी पार्टी... ये सब लैंड स्लाइड जीत के साथ संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे में चुनाव को दिशा देने वाला कोई बचा नहीं। अब चुनाव हुए तो सत्ता में रही पार्टी पीएमएल क्यू की चलेगी। चुनाव में धाधली की आशंका पहले से ही जतायी जाती रही है।

एक ही दिक्कत है। नवाज़ शरीफ ने अब फिर से चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। ऐसे में इन चुनावों की विश्सनीयता पर और गहरे सवाल उठ खड़े होगें। जानकारी ऐसी भी मिल रही है कि नवाज़ और बेनज़ीर के बीच ये तय हो गया था कि चुनाव के दो-तीन दिन पहले हवा का रुख़ देख कर मैदान से हट लिया जाए। ये स्थिति मुशर्रफ के लिए और बुरी होती।

बेनज़ीर की हत्या की जब जांच होगी तब होगी। नतीज़ा जब आएगा तब आएगा। फिलहाल इसकी वजहों की तरफ इशारा करने के लिए तो कुछ ऐसे ही तथ्य हैं।

बेनज़ीर की हत्या पर...

बेनज़ीर की हत्या को तहसीन मुनव्वर ने चार पंक्तियों में कुछ इस तरह समेटा है...

ख़ैर हो या रब पड़ोसी जान की
अब वहां क़ीमत नहीं इंसान की
साथ अपने ले गईं हैं बेनज़ीर
आख़िरी उम्मीद पाकिस्तान की!

ज़्यादा कुछ कहने की ज़रुरत नहीं।

बेनज़ीर की हत्या से किसको फ़ायदा?

(जनसत्ता के 3 जनवरी के अंक में प्रकाशित)

बेनज़ीर मारी गईं। बड़े दिनों तक सवाल उठेगा कि किसने मारा... या किसने मरवाया? पाकिस्तान की सियासत में भीतरी और बाहरी काफी पेंचदगियां हैं। फिर भी शक का सिरा पकड़ना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि आख़िर बेनज़ीर की मौत से किसे फ़ायदा होगा। एक, या तो उन्हें जो पाकिस्तान में तालिबानी शासन चाहते हैं। या फिर दूसरा, उन्हें जो बेनज़ीर से ख़तरा महसूस करते हों।

बेनज़ीर की पीठ पर अमेरिका का हाथ बताया जाता रहा है। ये अमेरिकी दबाव ही था जिसकी बदौलत उनकी वतन वापसी संभव हो पायी। पाकिस्तान के वे तत्व जो अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर वन मानते हैं... बेनज़ीर के भी खिलाफ रहे। उन्हें लगता रहा कि ये अमेरिकी इशारे पर चल कर पाकिस्तान को उस दिशा में ले जाएगी जो 'इस्लाम के हित' में नहीं होगा। लड़के लड़कियों के लिए अलग स्कूल जैसी ज़िद पाले बैठे ये तत्व दरअसल पाकिस्तान को उस रास्ते ले जाना चाहते हैं जिस पर तालिबानों के समय अफग़ानिस्तान चल पड़ा था। वहां से खदे़ड़ दिए गए तालिबानी भी नार्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ साथ पाकिस्तान के कई इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर चुके हैं। अमेरिकी दबाव में उन पर कार्रवाई हो रही हैं। बेनज़ीर का चुन कर आना उनके लिए और मुसीबत खड़ी कर सकता था। लिहाज़ा बेनज़ीर को रास्ते से हटाना ही उनका मक़सद बन गया था।

लेकिन कुछ और भी है जो क़ाबिले गौर है। बेनज़ीर की 18 अक्टूबर की वतन वापसी से ठीक पहले सूचना आयी कि एक तालिबानी कमांडर बैतुल्लाह मसूद ने आत्मघाती दस्ते तैयार किए हैं बेनज़ीर को मारने के लिए। बेनज़ीर के आते ही उन पर फिदायीन हमला होगा। इस सूचना पर प्रतिक्रिया देते हुए बेनज़ीर ने कहा था कि उन्हें तालिबान से उतना ख़तरा नहीं जितना मिलिटरी स्टैब्लिशमेंट में बैठे जिहादी ताक़तों से है। बेनज़ीर के शब्द थे, "मैं बैतुल्लाह मसूद से चिंतित नहीं हूं। मैं सरकार की तरफ जो ख़तरा है उससे चिंतित हूं। बैतुल्लाह जैसे लोग सिर्फ प्यादे हैं। उसके पीछे वो लोग हैं जिन्होने मेरे मुल्क़ में आतंकवाद को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है।" अब इसे आईएसआई की तरफ इशारा माने या फिर सेना में बैठे कुछ लोगों की तरफ। बेशक बेनज़ीर की हत्या की ज़िम्मेदारी के तौर पर अल-क़ायदा का नाम सामने आ रहा हो। लेकिन अगर अल-क़ायदा और तालिबान को अपनी चिंता है तो पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट में बैठे ऐसे तत्व भी कम नहीं जिनको लगता रहा कि अगर बेनज़ीर प्रधानमंत्री बन गईं तो उनकी कमाई का ज़रिए भी बंद हो जाएगा और शायद वो भी।

18 अक्टूबर की खूनी रैली के बाद बेनज़ीर ने उसकी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की थी क्योंकि उन्हें मुशर्रफ और मौजूदा सरकार पर भरोसा नहीं था। लेकिन उनकी इस मांग पर कान नहीं धरा गया। उल्टे सरकार की तरफ से हमेशा उन्हें एहतियात बरतने की सलाह दी जाती रही। कुछ इस तरह का एहतियात कि वे नेता की तरह कभी निकल ही ना पाए। कभी रैली ना कर पाए। यहां तक कि इमरजेंसी के खिलाफ जब बेनज़ीर ने लाहौर से इस्लामाबाद लॅाग मार्च का ऐलान किया तब भी वहां उनकी सुरक्षा को लेकर सचेत किया जाता रहा। लब्बोलुआब ये कि वे पाकिस्तान में रहें और चुनाव लड़े लेकिन अपने साथ लोगों को जोड़ने की कोशिश ना करें। अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाले काम न करें। उस समय मैं पाकिस्तान में ही था और हरेक फैसलों और बयानों को नज़दीक से देख पा रहा था।


मुशर्रफ पर भी आरोप है कि वे अमेरिका के कठपुतली के तौर पर काम करते हैं। यानि अमेरिकी हित को साध कर ही आगे बढ़ते हैं। दरअसल अमेरिका ने मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच समझौता करा कर ये तय करना चाहा कि मुशर्रफ सिवियन राष्ट्रपति बन कर रहें और बेनज़ीर चुनी हुई सरकार की मुखिया। ऐसे में दुनिया को पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली की तस्वीर भी मिल जाएगी और ‘वार आन टेरर’ का अमेरिकी कार्यक्रम भी चलता रहेगा। ख़ुद को और मज़ूबती देने के लिए अमेरिका ने मुशर्रफ को बेनज़ीर से और बेनज़ीर को मुशर्रफ से काउंटर बैलेंस करने की नीति अपनायी। अब बेनज़ीर के नहीं रहने से अमेरिका के काम आने का सारा दारोमदार अकेले मुशर्रफ़ के कंधे पर ही आ गया है। जब अमेरिका के सामने और कोई विकल्प नहीं तो मुशर्रफ की पीठ पर उसका हाथ तो मज़बूती से टिकेगा ही।

अब मुशर्रफ़ के दोनों हाथों में लड्डू हैं। वे चाहें तो बेनज़ीर की हत्या को बहाना बना कर 8 जनवरी को होने वाले चुनाव को टाल दें। नवंबर को नेशनल एसेंबली और प्रांतीय एसेंबलियों को भी भंग किया जा चुका है। केयर टेकर प्रधानमंत्री के तौर पर मोहम्मद मियां सूमरू को मुशर्रफ का पिछलग्गू बताया जाता है। चुनाव जितने दिन टलेंगे... सूमरू उतने दिन प्रधानमंत्री बने रहेगें। यानि उतने दिनों तक मुशर्रफ की पार्टी पीएमएल क्यू की चुनाव में संभावित हार टलती रहेगी। दूसरे शब्दों में, चुनाव टलने से मुशर्रफ की गद्दी पर पकड़ मज़बूत बनी रहेगी। क्योंकि आशंका इस बात की भी है कि अगर पीपीपी या पीएमएल नवाज़ जैसी पार्टी भारी बहुमत से जीत कर आती है तो मुशर्रफ़ को इमरजेंसी लगाने समेत कई पुराने फ़ैसलों की वजह से मुश्किल आ सकती है। हालांकि इमरजेंसी हटाने के ठीक पहले कई अध्यादेशों के ज़रिए मुशर्रफ ने अपनी स्थिति को बादशाह जैसी बना ली है। जैसे कि उनके लिए गए किसी फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती... और कई फैसलों को नई बनने वाली संसद की मंज़ूरी या तस्दीक करने की ज़रुरत नहीं होगी। लेकिन पाकिस्तान में जब सत्ता बदलती है तो कानून भी बदलते देर नहीं लगती।

दूसरी स्थिति भी मुशर्रफ के मुफ़ीद बैठती है। वे ये कि वे चुनाव न टालें। 8 जनवरी को चुनाव होने दें। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रखने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया है। मुशर्रफ इसे नज़रअंदाज कर अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहेगें। और फिर माहौल ऐसा बन गया है कि चुनाव अपने तौर तरीक़े से कराए जा सकें। इस हत्याकांड के बाद नेता रैलियां निकालने से हिचकेगें। कार्यकर्ता और अवाम भी उसमें शिरकत करने से डरेगीं। आल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेंट के बैनर तले नवाज़ शऱीफ ने नवंबर के अंत में ही चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाहरी दबाव और अपने सांसद-उम्मीदवरों की ज़िद के आगे उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। आपराधिक मुकद्दमों और साजिश के हवाले से नवाज़ और शाहवाज़ शरीफ पर का परचा पहले ही ख़ारिज़ किया जा चुका है। बेनज़ीर रही नहीं। तहरीक़े इंसाफ के नेता इमरान खान 13 और पार्टियों के साथ चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट, फजलुर्रहमान की जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम, असफंदयार वली खान की नेशनल अवामी पार्टी... ये सब लैंड स्लाइड जीत के साथ संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे में चुनाव को दिशा देने वाला कोई बचा नहीं। अब चुनाव हुए तो सत्ता में रही पार्टी पीएमएल क्यू की चलेगी। चुनाव में धाधली की आशंका पहले से ही जतायी जाती रही है।

एक ही दिक्कत है। नवाज़ शरीफ ने अब फिर से चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। ऐसे में इन चुनावों की विश्सनीयता पर और गहरे सवाल उठ खड़े होगें। जानकारी ऐसी भी मिल रही है कि नवाज़ और बेनज़ीर के बीच ये तय हो गया था कि चुनाव के दो-तीन दिन पहले हवा का रुख़ देख कर मैदान से हट लिया जाए। ये स्थिति मुशर्रफ के लिए और बुरी होती।

बेनज़ीर की हत्या की जब जांच होगी तब होगी। नतीज़ा जब आएगा तब आएगा। फिलहाल इसकी वजहों की तरफ इशारा करने के लिए तो कुछ ऐसे ही तथ्य हैं।

Thursday, December 27, 2007

"तुम एक गोरखधंधा हो..."

ख़ुदा के लिए गाए इस सुफ़ीयाना कलाम में उर्दू के कई अल्फाज़ और उनका उच्चारण समझ नहीं पा रहा हूं। दरअसल ये मुझे इस क़दर बेहतरीन लगता है कि सुनते हुए गुनगुनाना भी चाहता हूं। जितना मैं सुन के समझ पाया हूं उसे लिखने कोशिश की है। जहां भी शब्द या पंक्तियां समझ में नहीं आ रहीं उसे मैंने लाल कर दिया है। उम्मीद है कि उर्दू के अच्छे जानकार इसे सही कर समझाने में मेरी मदद करेंगे।

कभी यहां तुम्हें ढूंढा कभी वहां पहुंचा... तुम्हारी दीद की खातिर कहां कहां पहुंचा
ग़रीब मिट गए पामाल हो गए लेकिन... किसी तलक ना तेरा आज तक निशां पहुंचा
हो भी नहीं और हरजा हो... तुम एक गोरखधंधा हो... तुम गोरखधंधा हो...
हर जर्रे में किस शान से तू जलनानुमा है...2 हैरान हैं मगर अक्ल कि कैसा है तू क्या है
तू एक गोरखधंधा हो...2
तुझे दैरोहरम में मैने ढूंढा तू नहीं मिलता... मगर तसरीफरमा तुझको अपने दिल में देखा है
तुम एक गोरखधंधा हो...2
जो उल्फत में तुम्हारी खो गया है... उसी खोए हुए को कुछ मिला है

न बुतखाने ना काबे में मिला है... मगर टूटे हुए दिल में मिला है
अदम बन कर कहीं तू छुप गया है... कही तू हस्त बन कर आ गया है
नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा... नफीदी तेरे होने का पता है
मैं जिसको कह रहा हूं अपनी हस्ती... अगर वो तू नहीं तो और क्या है
नहीं आया ख्यालों में अगर तू... तो फिर मैं कैसे समझूं तू खुदा है...
तुम एक गोरखधंधा हो...
हैरान हूं... मैं हैरान हूं... हैरान हूं... हैरान हूं इस बात पर तुम कौन हो क्या हो
भला तुम कौन हो क्या हो...तुम कौन हो क्या हो क्या हो क्या हो कौन हो क्या हो
मैं हैरान हूं इस बात पर तुम कौन क्या हो
हाथ आओ तो बुत... हाथ ना आओ तो खुदा हो
अक्ल में जो घिर गया लाइनतहा क्योंकर हुआ... जो समझ में आ गया फिर वो खुदा क्योंकर हुआ
फलसफी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं... डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं
छुपते नहीं हो सामने आते नहीं हो तुम... जलवा दिखा के जलवा दिखाते नहीं हो तुम
दैरोहरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम... जो अस्ल बात है वो बताते नहीं हो तुम
हैरान हूं मेरे दिल में समाए हो किस तरह... हालांकि दो जहां में समाते नहीं हो तुम
ये माबदोहरम ये कलीसाओदैर क्यूं...2 हरजाई हो जबी तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो....
दिल पर हैरत ने अजब रंग जमा रखा है... एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता कि ये चक्कर क्या है... खेल क्या तुमने अज़ल से ये रचा रखा है
रुह को जिस्म के पिंजरे का बना कर क़ैदी... उस पर फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदवीर के पंछी को उड़ाने तूने... दामे तकबीर भी हरसंत बिछा रखा है
करके आरायशी को नैनकी बरसों तुमने...ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
लामकानी का भी बहरहाल है दावा भी तुम्हें... नानो अकरब का भी पैग़ाम सुना रखा है
ये बुराई, वो भलाई, ये जहन्नुम, वो बहिश्त... इस उलटफेर में फरमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सज़ा बेटों को... अदलो इंसाफ का मियार भी क्या रखा है
देके इंसान को दुनिया में खलाफत अपनी... इक तमाशा सा जमाने में बना रखा है
अपनी पहचान की ख़ातिर है बनाया सबको... सबकी नज़रो से मगर खुदको छुपा रखा है
तुम एक गोरखधंधा हो...3 अलाप....तुम एक गोरखधंधा हो
नित नए नक्श बनाते हो मिटा देते हो...2 जाने किस जुर्मेतमन्ना की सज़ा देते हो
कभी कंकड़ को बना देते हो हीरे की कणी, कभी हीरों को भी मिट्टी में मिला देते हो
जिंदगी कितने ही मुर्दों को अता की जिसने... वो मसीहा भी सलीबों पे सजा देते हो
ख्वाहिशेदीद जो कर बैठे सरेतूर कोई...तूर ही बरके तजल्ली से जला देते हो
नारेनमरुद में डलवाते हो फिर खुद अपना ही खलील... खुद ही फिर नार को गुलजार बना देते हो
चाहे किन आन में फेंको कभी महिनकेन्हा... नूर याकूब की आंखो का बुझा देते हो
लेके यूसुफ को कभी मिस्त्र के बाज़ारों में... आख़िरेकार शहेमिस्त्र बना देते हो
जज़्बे मस्ती की जो मंज़िल पर पहुंचता है कोई... बैठ कर दिल में अनलहक की सज़ा देते हो
खुद ही लगवाते हो फिर कुफ्र के फतवे उस पर... खुद ही मंसूर को सूली पे चढ़ा देते हो
अपनी हस्ती भी वो एक रोज़ गवां बैठता है... अपने दर्शन की लगन जिसको लगा देते हो
कोई रांझा जो कभी खोज में निकले तेरी... तुम उसे जंग के बेले में रुला देते हो
जूस्तजू लेकर तुम्हारी जो चले कैस कोई... उसको मजनूं किसी लैला का बना देते हो
जोतसस्सी के अगर मन में तुम्हारी जागे... तुम उसे तपते हुए थल में जला देते हो
सोहनी गर तुमको महिवाल तस्सवुर करले.. उसको बिफरी हुई लहरों में बहा देते हो
खुद जो चाहो तो सरेअस्र बुला कर मेहबूब...एक ही रात में मेहराज़ करा देते हो
तुम एक गोरखधंधा हो...4
आप ही अपना पर्दा हो...3
तुम एक गोरखधंधा हो...
जो कहता हूं माना तुम्हें लगता है बुरा सा... फिर है मुझे तुमसे बहरहाल गिला सा
चुपचाप रहे देखते तुम अर्से बरी पर... तपते हुए कर्बल में मोहम्मद का नवासा
किस तरह पिलाता था लहू अपना वफा को... खुद तीन दिनों से अगर वो चे था प्यासा
दुश्मन तो बहुत और थे पर दुश्मन मगर अफ़सोस... तुमने भी फराहम ना किया पानी ज़रा सा
हर जुर्म की तौफीक है जालिम की विरासत... मजलूम के हिस्से में तसल्ली ना दिलासा
कल ताज सजा देखा था जिस शख्स के सर पर... है आज उसी शख्स के हाथों में ही कांसा
ये क्या अगर पूछूं तो कहते हो जवाबन... इस राज़ से हो सकता नहीं कोई सनासा
बस तुम एक गोरखधंधा हो...4
मस्ज़िद मंदिर ये मयख़ाने...2 कोई ये माने कोई वो माने 2
सब तेरे हैं जाना पास आने... कोई ये माने कोई वो माने 2
इक होने का तेरे कायिल है... इंकार पे कोई माईल है
असलियत लेकिन तू जाने... कोई ये माने कोई वो माने
एक खल्क में शामिल रहता है... एक सबसे अकेला रहता है
हैं दोनो तेरे मस्ताने... कोई ये माने कोई माने 2
हे सब हैं जब आशिक तुम्हारे नाम का...2 क्यूं ये झगड़े हैं रहीमोराम के
बस तुम एक गोरखधंधा हो....
मरकजे जूस्तजू आलमे रंगवू तमवदन जलवगर तू ही तू जारसू टूटे बाहाद में कुछ नहीं इल्लाहू
तुम बहुत दिलरुबा तुम बहुत खूबरू.. अर्ज की अस्मतें फर्श की आबरु.. तुम हो नैन का हासने आरजू

आंख ने कर कर दिया आंसुओ से वजू... अब तो कर दो अता दीद का एक सगुन
आओ परदे से तुम आँख के रुबरु... चंद लमहे मिलन दो घड़ी गुफ्तगू
नाज जबता फिरे जादा जातू बकू आहदाहू आहदाहू
हे लासरीकालाहू लासरीकालाहू
... अल्लाहू अल्लाहू अल्लाहू अल्लाहू


(इन्हें ठीक कर मुझे umashankarsing@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। शुक्रिया)

Wednesday, December 26, 2007

बंद करें मोदी को गलियाना!

सुनते सुनते कान पक गए... आंख फूटने को आयी। जिसे देखो वही कलम घसीट दे रहा है। मोदी ये... मोदी वो...। अरे भई लिख देने भर से क्रांति हो जाती तो ऐसे कई हैं जो हर तीन-चार घंटे में एक कम से कम एक क्रांति तो कर ही देते। पर वो कोशिश कर देख चुके। कई एंगल दे कर देख चुके। ऐसा कर अच्छा किया। अपने को अभिव्यक्त कर जनमानस को जगाने की कोशिश करनी चाहिए। पर जब बहुमत नहीं माना तो भाई अब हम और आप भी स्वीकार लें ना कि मोदी जीत गए। क़ूवत है तो हम संविधान बदलने की कोशिश करें। मोदी को कानून के शिकंजे में लाने का अभियान चलाएं। नहीं कर सकते तो अब अपनी कुंठा से पार पा लें। जिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी का विरोध विचारधारा के स्तर पर किया... उन्होने ने भी अब उनकी चुनावी जीत को स्वीकार लिया है। हालांकि वे अपने स्तर पर मोदी-विरोध जारी रखेगें... लेकिन कम से कम उस बचकाने-तुलनात्मक अध्ययन के तौर पर तो नहीं जैसा कि हम में से कई करने में जुटे हैं। तथ्य आधारित विरोध होना चाहिए... सिर्फ शब्दाडंबर भरे विरोध से काम नहीं चला है। नहीं चलेगा।

ऐसे कईयों को देख चुका हूं जो मुसलमान के घर का पानी पीना नहीं पसंद करते लेकिन जब लिखने-बोलने बैठते हैं तो सांप्रदायिक सौहार्द की मोतियां बिछा देते हैं। इनमें कुछ नेता हैं तो कुछ लिखाड़ भी। उनके शब्दों का खोखलापन हम और आप पकड़ सकते हैं। मुझे लगता है कि हाथ में कंप्यूटर या कलम और ठीक-ठाक फुर्सत भर होने से ज़रुरी नहीं कि अच्छा लिख भी लिया जाए। उदाहरणों, प्रतीकों, उपमाओं के ज़रिए बात करने की बजाए हमें सीधी बात करनी चाहिए। मोदी अगर खोटा सिक्का है तो ये सिक्का अगली बार नहीं चलेगा। लेकिन अगर संवैधानिक कसौटी ऐसी हो कि जिसे ऐंड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर 'मौत का सौदागर' साबित करने पर तुला जाए और वो फिर भी मुंह चिढ़ा जाए तो कम से कम अपनी इज्ज़त बचाने के लिए विरोध का दायरा बड़ा कर दिया जाना चाहिए।

सीधा सा मतलब है। अब मोदी के खिलाफ नहीं... देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ लिखिए। अगर आपको लगता है कि तमाम कारगुज़ारियां के बाद भी मोदी कैसे जीत गए तो इसका दोष यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दीजिए। उसमें वोट के साथ भावनाओं को कैसे हिस्सेदारी दी जाए इसका तरीक़ा सुझाइए। मोदी को गलिया देना आसान है। पर ऐसे शख्स को गद्दी पर नहीं देखना चाहते हैं तो हम सबको लेखनी में और क़ूवत पालनी होगी। और ये क़ूवत में नहीं पाल सकते तो छोड़ देना चाहिए।

बोल कि क्यूं लब आज़ाद नहीं हैं मेरे

पाकिस्तान में ब्लॅाग्स को पहले भी ब्लॅाक किया जाता रहा है। इसकी कुछ बानगी यहां क्लिक कर देखी जा सकती है। मेरे ब्लॅाग को रोकना इसी एक कड़ी लगती है। वजह चाहे जो भी रहीं हो... अभिव्यक्ति की आज़ादी तो यहां सवालों के घेरे में हमेशा से रही है। पैमरा और पीपीओ कानून के ज़रिए मीडिया को बांध दिया गया है। जिओ न्यूज़ पर अब तक पाबंदी है। जिओ और एआरवाई समेत कई चैनलों के कई एंकरों को शो नहीं करने दिया जा रहा। लाईव शो नहीं हो सकते। सरकारी फैसलों को लेकर असंवैधानिक जैसे शब्द नहीं लिखे जा सकते।
जिओ के पत्रकार जूझ रहे हैं। वो आंदोलन चला रहे हैं कि 'बोल कि लब आज़ाद हैं मेरे...' लेकिन असल आज़ादी अभी दूर नज़र आती है।

http://greensatya.blogspot.com/2006/03/blogger-blocked-in-pakistan.html

http://www.globalvoicesonline.org/2006/03/02/pakistan-blogspot-blogs-blocked-in-pakistan/

http://spiderisat.blogspot.com/2006/03/blogspot-and-other-sites-blocked.html

http://www.zackvision.com/weblog/2006/03/blogspot-pakistan.html

http://ovaiskhan.blogspot.com/2006/03/blogspot-blocked-in-pakistan-some.html

http://valleyoftruth.blogspot.com/2007/12/my-blog-is-blocked-in-pakistan.html

सीमा के उस पार से अपने वतन को देखें!

वाघा बार्डर पर पाकिस्तान की तरफ से ली गई ये तस्वीरें आपको शायद एक अलग तरह का अनुभव दें। सीमा के उस पार खड़े होने से लगता है कि काश दौड़ कर इस तरफ आ पाते... हमवतनों से मिल कर फिर उधर अपने काम पर चले जाते! लेकिन ये संभव नहीं। बीच में एक लकीर खिंची है...




ये तस्वीरें हमारे नेपाली मित्र और सागरमाथा टेलीविजन के पत्रकार अभिजाल बिष्ट के कैमरे की हैं। अभिजाल भी हमारे साथ पाकिस्तान के दौरे पर थे।

Sunday, December 23, 2007

जीत गए मोदी...कांग्रेस ने खो दी...

यही नारा लग रहा था दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के घर पर। चुनाव नतीजो की तस्वीर जैसे ही साफ हुई...बीजेपी समर्थक टिड्डी दल की तरह निकल आए। उन्हीं के बीच नारा लग रहा था... जीत गए मोदी... कांग्रेस ने खो दी...। इस पर पहले ही कागद कारे कर चुका हूं। कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा। बस इतना कि अब तो मोदी को स्वीकारना ही होगा। सिर्फ गुजरात में ही नहीं...शायद पूरे देश में। हिंदुत्व का भूत बलबती होकर लौट आया है। पार्टी इसे आम सभा चुनाव में भी भुनाने में क़सर नहीं छोड़ेगी। संकेत मिल रहे हैं। आडवाणी ने कह दिया है... ये जीत राष्ट्रीय राजनीति का टर्निग प्वाइंट है।

दूसरे संकेत भी हैं। जब पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी को अपना प्राइममिनिस्टीरियल कैंडिडेट घोषित किया तो वेंकैय्या नायडू ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं। उनके केंद्रीय राजनीति में आने का कोई प्रस्ताव नहीं है। आज जब मैंने राजनाथ सिंह के कैटेगोरिकली पूछा कि क्या मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं...उनकी इस जीत के बाद क्या पार्टी देश भर में उनका इस्तेमाल नहीं करेगी... थोड़ी खीज़ और मजबूरी के साथ राजनाथ बोले...वे पहले से हैं और रहेंगे...

बहुत पेंचदगियां हैं जो आसानी से समझी जा सकती हैं। बीजेपी के भीतर भी और पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भी। लेकिन फिलहाल तो एक ही तथ्य है। वो ये कि मोदी जीत गए हैं। वो सोचें जो मोदी के बिना की सोचने की ज़िद पाले बैठे हैं...कि आखिर क्यों जीत गए मोदी और क्यों कांग्रेस ने खो दी...

Thursday, December 20, 2007

मोदी, सोनिया और मीडिया

बड़ा शोर मचा रहा। मोदी...मोदी...मोदी। अब शांत होने लगा है। मतदान हो चुके हैं। नतीज़े का इंतज़ार है। और छटपटाहट भी। मोदी जीतेंगे या हार जाएंगें। गद्दी रहेगी या जाएगी। जनता ने तय कर दिया है। किसी को पता नहीं। पर अंदाज़ा सभी लगा रहे हैं। आप भी और हम भी।

मोदी हारे तो वो वाह-वाह करेंगे जो चाहते हैं कि मोदी हार जाए। ऐसे भी हैं जो कहेंगे देखो ये मेरा कमाल है। पर अगर मोदी जीते तो शायद वो ये नहीं स्वीकार पाएंगे कि देखो... ये मेरा किया धरा है! और मोदी मायावती से भी ज़्यादा तन कर मीडिया से मुखातिब हों तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। वैसे मोदी मीडिया और सोनिया दोनों के शुक्रगुज़ार होंगे। नहीं होगें तो ये उनकी कृतघ्नता होगी। आखिर इन्हीं दोनों ने आखिरी क्षणों में उनकी डूबती-उतरती सांसों को थामा। एक ने मौत का सौदागर कहा तो दूसरे ने इस सौदागर की दुकान सजाए रखी। वैसे ये मेरा व्यक्तिगत विचार है जिसे सबके सामने रख रहा हूं। ग़लत हूं तो सही बताइए।

बीजेपी के कई आला नेता आॅफ द रिकार्ड बातचीत में स्वीकारते हैं कि सोनिया ने अगर मौत का सौदागर नहीं कहा होता तो गुजरात में कमल मुरछा जाता। दरअसल मुसलमान के संहारक के रुप में मोदी इतनी बार दिखाए-पढ़ाए गए कि बात उन हिंदुओं के मन में भी बैठ गई जिन्हें शायद मोदी का बतौर मुख्यमंत्री काम पसंद नहीं आया। यहीं धर्मांधता ने अपना रंग दिखाया। विकास या विनाश के स्थानीय मुद्दे पीछे छूट गए। हिंदू-मुसलमान के बीच का सनातनी-तनातनी को फोकस कर लिया गया। खाली पेट भी जयश्री राम के नारे से खुश रहने वालों के इस देश में बस और क्या चाहिए। आधार तैयार हो गया वोट के पोलराईजेशन का।

अरे मोदी की सत्ता को अपनी मौत मरने देते। बयान आधारित कहानियों की जगह तथ्य आधारित बात करते। गुजरात में विकास नहीं हुआ है तो क्या यूपी और बिहार में हुआ है? और अगर वाकई नहीं हुआ है तो क्या सड़क पर पड़े गढ्ढे दिखाए आपने? क्या भुखमरी दिखा पाए? या फिर सूखे...अकाल में सरकार का नकारापन? नहीं ना? या दिखाया भी तो उसे मुद्दा बना नहीं परोस सके? परोसा तो वोटर क्यों उस थाल में मुंह मारते नज़र आए? नहीं। बस बहस में पड़े रहे। एजेंडा तय करते रहे। लगा इसी से हार तय कर देंगे। अच्छा होता कि मोदी को मुसलमान-विरोधी की बजाए हिंदू-विरोधी साबित कर पाते। शायद ये बेतुकापन ही असर कर जाता!

मोदी इस देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही मुख्यमंत्री हैं। क्यों हैं? मौत का सौदागर है तो कैसे बैठे हैं गद्दी पर? बताइए सोनिया जी। बदलिए संविधान। भेजिए इनको अंदर। केंद्र में सरकार आपकी है। खाली बयान देकर 10 जनपथ में मत बैठ जाईए। आपके इस एक बयान ने बड़ा खेल कर दिया लगता है। मोदी फिर आ रहे लगते हैं। एग्ज़िट पोल्स बता रहे हैं। बहुत घटा कर भी उनको 90 तो दिया ही जा रहा है। अगर वो वाकई आ गए तो फिर पांच साल वही करेंगे जो वो चाहेंगे। तब क्या आपका ये बयान काम आएगा? उन मुसलमानों के जिनके घर उजड़ गए। जिनके अपने दंगों के शिकार हुए। आपका क्या। आप तो फिर अगली बार के इंतज़ार में बैठ जाएंगे।

आप मुझे मोदी-समर्थक कह सकते हैं। संघी होने का आरोप भी लगा सकते हैं। अगर मोदी के विरोध का मतलब मोदी के जीत की राह को आसान बनना है तो मैं वैसा संघी बनना पसंद करुंगा जो अपनी महत्ता दिखाने को ही सही...सही में मोदी को नीचे उतारना चाहता है।

फिलहाल तो मोदी की तरफ से सोनिया औऱ मीडिया को बधाई!

Sunday, December 9, 2007

जिनकी दिलचस्पी पाकिस्तान में है उनके लिए...

नमस्कार,
आप में से जिनकी भी दिलचस्पी पाकिस्तान में है वो आज शाम साढ़े सात बजे (भारतीय समयनुसार) एनडीटीवी इंडिया पर आधे घंटे का एक प्रोग्राम देख सकते हैं... 'इमरजेंसी में पाकिस्तान'। वहां रहते हुए जो कुछ भी समेट पाया उसे उन्हीं अर्थों में पेश करने की कोशिश की है मैंने।
फिर बात होती है।
शुक्रिया
उमाशंकर सिंह

Sunday, December 2, 2007

My blog is blocked in Pakistan

dear friends,

i couldn't update my blog from pakistan b'coz it was blocked after 14th Nov. i m back in india now...will keep writing abt my days in pakistan..

thank you...

Wednesday, November 14, 2007

महंगाई मार रही पाकिस्तान को

कल अंडा खरीदने निकला. सोचा लाहौर में यहाँ के बाशिंदों की तरह खरीदारी की जाए. दिल्ली में अक्सर अंडा मैं ही खरीदता हूँ. उसी से महंगाई का अंदाजा लगाता हूँ. मसलन २० रूपये दर्जन से जब २४ रुपये दर्जन हो गया तो लगा महंगाई बढ़ गयी है. लेकिन फैजान जनरल स्टोर में तो पैर तले की ज़मीन ही खिसक गयी. अंडा ५० रूपये दर्ज़न! ६ अंडे लिए. वापस गेस्ट हॉउस पहुँचा तो स्टाफ हैरान. आपने अंडे क्यों खरीदे? क्या हम आपको ठीक से खाना नही देते? मैंने समझाया नहीं. ऐसी बात नहीं. कई दिनों से सुन रहा था कि पाकिस्तान में महंगाई बहुत बढ़ गयी है. सो आम ज़रूरत की चीजों का भाव देखना चाहता था.

इतना सुनते ही नवीद बोल पडा... सर.. महंगाई का मैं बताता हूँ. पिछले १८ दिनों से हम आपको बनी बनाई रोटी बाहर से मंगा कर खिला रहे थे. आज आपको पहली दफा गेस्ट हॉउस में ही बनी ताज़ा रोटी खिलाऊंगा. क्या करते. आटा मिल ही नही रहा था. आज मिला है. जो १२ रूपये किलो मिलता था २८ रूपये मिला है. कीमतें और तेज़ी से चढ़ रही है....

आज सुबह जैसे ही उठा.. इक स्टाफ ने बड़ी उत्सुकता से जानकारी दी. सर... आज अंडा ५७ रूपये दर्जन हो गया है!

Monday, November 12, 2007

मुश्किल मुहाने पर पाकिस्तान

अगला एक-दो दिन पाकिस्तान के लिए अहम साबित हो सकते हैं. बेनजीर लाहौर में हैं और १३ नवम्बर यानी कल सुबह वो इस्लामाबाद तक की प्रस्तावित लॉन्ग मार्च शुरू करेगी. हालांकि सरकार रोकने की कोशिश करेगी. देखना यही है की बेनजीर अपने मकसद में कामयाब होती है या सरकार. वैसे सियासी हालात पर नज़र रखने वाले बता रहें हैं की मुशर्रफ अगले एक दो दिनों में अपनी वर्दी छोड़ सकते हैं. कुछ इसे बेहतरी के तौर पर देख रहें हैं तो कुछ मानते है की इससे हालात और ख़राब होंगे.

मुश्किल हालात में सैर-सपाटा!!!

इमरजेंसी लगने के बाद की पहली सुबह की हमारी शुरुआत भारी पलकों से हुई. पूरी रात हम सोये नही थे. बार बार फ़ोन बजते रहे. किसी को हमारी तो किसी को इस मुल्क की चिंता सता रही है. मैंने रात को ही इम्तिआज़ आलम से बात की थी. पाकिस्तान में वो ही हमारे मेजबान हैं. हमारे कई साथी पत्रकार रात को ही लाहौर लौटना चाह रहे थे. कुछ फोलो-अप और इमरजेंसी के बाद पैदा होने वाले हालात को कवर करने लिए... तो कई सुरक्षा और घरवालों की चिंता की वजह से. लेकिन इम्तिआज़ आलम साहेब ने कहा कोई चिंता की बात नही. आप लोग अपना ट्रिप जारी रखें.

४ नवम्बर की सुबह साढ़े सात बजे हम नंदना का किला और प्राचीन विष्णु मन्दिर देखने निकले. पाकिस्तान के चकवाल और झेलम जिले के इस इलाके में हमारा अनुभव अद्वितीय रहा. क़रीब ६ घंटे की ट्रेकिंग के दौरान हम पहाडों में घूमे भी...भटक भी गए...क्योंकि कोई रास्ता नही था जिस ऊंचाई तक हमें जाना था वहाँ के लिए. एक साथी उस्मान पानी की कमी से बेहोश भी हो गया. खैर, अल-बरूनी ने जिस पहाडी पर बैठ कर धरती की परिधि मापी... हम वहाँ भी पहुंचे. ये अनुभव किसी और पोस्ट में. लेकिन हमारा सारा दिन ऐसी हालत में बीता कि सभी सभी एक दूसरे को याद दिलाते रहे कि ये असल में इमरजेंसी के हालात हैं!


शाम को हम लाहौर के लिए वापस चले. रास्ते भर हमारी नज़रें बदलाव तलाशती रही. इमरजेंसी के पहले और बाद के बदलाव. पर वो कहीं नज़र नही आ रहा था. लोग जो पहले बातें करते नज़र आते थे... वो अब फुसफुसाते नज़र आने लगे. लेकिन ये अभी तो नज़रों का धोखा है. इमरजेंसी लगाए जाने के बाद चीजों को देखने के नजरिये में फर्क आ जाना स्वाभाविक हैं. यहीं ज़रूरत बैलेंस मेंटेन करने की होती है... जो आप सोच लेते है और जैसा आपको लगने लगता है उसके, और जो वाकई में हो रहा होता है उसके बीच. कई बार आप सही होते हैं...कई बार आप बह जाते हैं. बहना मुनासिब नही.


रात क़रीब ८ बजे हूँ लाहौर पहुंचे. गाइड को छोड़ने के बाद हमें सीधे जिन्ना हॉस्पिटल जाना पडा. नेपाल से आयी पत्रकार रोजिना का बदन अकड़ने लगा था. उसे भर्ती करना पड़ा. यहाँ से निकल कर हम अपने ठौर पर पहुंचे. अपने उसी पुराने कमरे में मैंने ने नई निगाह मारी. हरेक चीज़ एक नए लुक में नज़र आ रही थी. जानकारी मिली कि पिछली रात ही यहाँ की एन्क्येरी हो चुकी है. उसके बाद इमरजेंसी की दूसरी रात कई तरह के ख्यालों में कटी.

तीन पत्रकार पाकिस्तान से निकाले गए

तीन पत्रकारों को पाकिस्तान से निकाल दिया गया है. ये ब्रिटेन के पत्रकार हैं और द टेलीग्राफ के लिए काम करते हैं. आरोप लगाया गया कि अखबार के सम्पादकीय में इन्होने पाकिस्तान और इसके लीडरशिप के लिए गाली वाली भाषा इस्तेमाल की. Isambard Wilkinson, Colin Freeman and Damien McElroy नाम के ये पत्रकार इस इमरजेंसी के बाद पाकिस्तान से निकाले जाने वाले पहले विदेशी पत्रकार हैं. पाकिस्तान के डेप्युटी इन्फोर्मेशन मिनिस्टर तारिक अजीम ने बीते शुक्रवार को ही इन्हे ७२ घंटों में देश छोड़ने का आदेह सुनाया था.

पाकिस्तान सरकार के इस कदम को पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन वर्ल्ड प्रेस ने 'असहिष्णुता भरा और कानून के बहाली व लोकतंत्र की जल्द वापसी के अंतराष्ट्रीय भरोसे को ख़त्म करने वाला करार दिया है.

Saturday, November 10, 2007

खामोशी... तूफ़ान के पहले या बाद की?

(पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर मेरा ये आलेख कल यानी ९ नवम्बर के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. इसे मैं यहाँ अपने ब्लोगर साथियों के लिए पेश कर रहा हूँ)

ना तो पत्थर चल रहे हैं... ना ही टायर जलाए जा रहे हैं. ना ही पुलिस घेरे को तोड़ने की कोशिश में लाठी खाता... आंसूगैस में आँखें जलाता जनसैलाब ही. सड़कों पर लोग हैं... पर अपने अपने काम से. कुछ इलाके को छोड़ दें तो... सुबह ज़िंदगी की शुरुआत वैसी ही हो रही है जैसे पहले होती थी. शाम को लोग अपने घरों को वैसे ही लौट रहें हैं. लाहौर के फ़ूड स्ट्रीट में खाने के शौकीनों की भीड़ भी कम नही हुई है. मुल्क में इमरजेंसी लगने के बाद आम ज़िंदगी में सतही तौर पर कुछ भी बदलाव नज़र नही आता. लेकिन इस सच को पाकिस्तान का पूरा सच मन लेना यहाँ की समस्या के बहुआयामी चरित्र से मुंह चुराना होगा. ग्वालमनडी स्ट्रीट में अपनी पत्नी और ४ बच्चों के साथ खाना खाने आए ४५ साल के मोहम्मद शफीक साफ करते हैं कि हैं कि हालात कोई नए नहीं बने हैं. सियासी मुश्किलातें पहले भी आती रहीं हैं इसलिए आदत सी पड़ गई है. फिर अपने शौक-मौज को कब तक दफ़न करते रहें!

दुनिया भर के टीवी चैनलों पर आज कल पाकिस्तान की जो तस्वीरें दिखायी जा रही हैं... वो भी पाकिस्तान का सच है. लेकिन वो टुकडों में है. विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं...लेकिन छिटपुट तौर पर. वकीलों- जजों, एनजीओ-मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों पर कार्रवाई हो रही है. किसी की गिरफ्तारी होती है तो सीधी ख़बर आती है. यहाँ दिए जा रहे बयानों में इमरजेंसी से लड़ने की बात की जा रही है. लेकिन फिलहाल वो असर छोड़ पाती नज़र नही आ रहीं.

क्यों है ऐसा? वजह कई हैं. टीवी न्यूज़ चैनल बंद पड़े है. लोगों तक सीधी ख़बर नहीं पहुँच रही. अख़बार अगले दिन सुबह ही मिल पाता है. जानकारियाँ दूसरे देशों से होकर आ रहीं है. इसलिए छोटी-छोटी कोशिशें बड़े आन्दोलन का रूप नही ले पा रही. पंजाब यूनिवर्सिटी के एक छात्र की राय है कि जिया-उल-हक के वक्त से ही छात्र संघों को पनपने नही दिया गया. लिहाज़ा देश की सियासत तय करने में छात्र आन्दोलन की कभी कोई भूमिका बन ही नही पायी. मौजूदा वक्त में नौजवान भी खामोश हैं क्योकि उनका अपना कोई नेतृत्व नही है...और अगर छात्र-नौजवान उदासीन हों तो बड़े आन्दोलन की उम्मीद बेमानी है.

मुखालफत करने वाले वकीलों को बड़ी तादाद में अन्दर कर दिया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एनजीओ से जुडी कई हस्तियों को या तो जेल भेज दिया गया है या फिर उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया गया है. इनमें अस्मा जहाँगीर भी हैं और इस्लामाबाद बार असोसिएशन के प्रेसिडेंट एतेजाज़ अहसन भी. . किसी को लाहौर से अर्रेस्ट किया जाता है तो ३०० किलोमीटर दूर बहावलपुर जेल ले जाया जा रहा है. बहावलपुर से उठा कर फैसलाबाद. ऐसे में नेतृत्व और आक्रोश छितर से गए हैं. राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक शख्स... जो अपना नाम नही देना चाहते...कहते हैं कि जिस तरह से सारी बदोबस्ती की गयी है... तैयारी काफी पुरानी लगती है...हलक से आवाज़ निकालने का किसी को मौक़ा ही नही मिला.

दूसरी तरफ़, राजनीतिक दल अपनी साख खोये नही तो कम तो कर ही चुके हैं. नवाज़ शरीफ देश लौटने की लड़ाई में ही फँसे हैं. आवाम के सामने विकल्प ज़्यादा हैं नहीं. आठ साल बाद मुल्क लौटीं बेनजीर लोगों से लगातार अपील कर रहीं हैं कि सड़क पर उतारें. लेकिन उनकी बात असरदार साबित नही हो रही. उन पर ख़ुद जेन. मुशर्रफ से अंदरूनी तालमेल का आरोप लगा हुआ है. ओल्ड रावियन ऐसोसिअशन के नाविद बलोच का कहते हैं कि ऐसे में उनपर भरोसा करना मुश्किल है. १८ अक्टूबर की खूनी रैली से लोग अब तक उबर नहीं पाये है. नाविद आगे कहते हैं कि जेहन में सवाल है कि जान दे तो किसके लिए? उनके लिए जो सैनिक शासन ख़त्म करने के नाम पर उससे ही समझौता कर बैठे हैं?

हालांकि बेनजीर ने इमरजेंसी को मार्शल ला जैसा करार दिया है. वो मुशर्रफ के इस क़दम के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहीं हैं. लेकिन वो आवाम के कानों में गूँज नही पा रही. लाहौर के एक कारोबारी कहते हैं कि जिनको सत्ता चाहिए वो बैठ कर तक़रीरें करे तो आवाम सड़क पर जान क्यों लड़ाए! बेनजीर को अपनी सुरक्षा का भी खतरा है. इसलिए उन्हें सड़क पर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा. उन्होंने १३ नवम्बर को लाहौर से इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च और करने और रोके जाने पर धरना देने का फ़ैसला किया है. पीपीपी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी तो हो रही है. लेकिन बकौल एक राजनीतिक कार्यकर्ता... उनमें चिंगारी जैसी बात नज़र नहीं आ रही आ रही.

यहाँ के अखबारों में रूलिंग पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट शुजात हुसैन का उम्मीद से भरा बयान है कि इमरजेंसी ३ हफ्ते में हट जायेगी. जेन. मुशर्रफ भी साफ कर रहे हैं कि इमरजेंसी लंबे टाइम के लिए नही है...लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से पहले नहीं हट सकता जो उनके प्रेसिडेंट होने के वैधानिकता पर आनी है. इसमें ६ महीने से साल भर तक का समय लग सकता है. ज़ाहिर है... सभी अपने वक्त के हिसाब से चल रहे हैं.

वैसे ऊम्मीदें टूटी नहीं हैं. छोटी-छोटी मीटिंग्स हो रहीं हैं. बुधवार को लाहौर में एडिटर स्तर के पत्रकारों की मीटिंग हुई. मीडिया पर कई तरह की पाबंदी है. आवाज़ दबाने की कोशिश की कोशिश के खिलाफ वर्किंग जर्नलिस्ट कमर कस रहे है. चैनल बंद रहने की हालत में बड़े-बड़े स्पीकर के ज़रिये ख़बर बांचने की योजना बन रही है. लाहौर प्रेस क्लब पर टीवी स्क्रीन लगाने की भी बात हो रही है. अखबार मालिकों को अपने व्यापारिक हित से ऊपर उठ कर आन्दोलन में साथ देने के लिए मनाया जा रहा है. जेल और पुलिस की मार के लिए कुछ पत्रकार ख़ुद को मानसिक तौर पर तैयार कर रहें हैं. पाकिस्तान के वरिष्ट पत्रकार और साउथ एशिया फ्री मीडिया असोसिएशन के प्रेसिडेंट इम्तिआज़ आलम को इमरजेंसी के पहले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया था. लाहौर के चार थानों में 48 घंटे तक बंद रखने के बाद रिहा कर दिया गया.

इम्तिआज़ आलम, डेली टाइम्स के एडिटर नजम सेठी और कॉलम्युनिस्ट अब्दुल कादिर हसन समेत इस मीटिंग में शामिल सभी जर्नलिस्ट्स को दुनिया के दूसरे देशों की मीडिया से साथ मिलने की उम्मीद है. अलग अलग देशों के पत्रकारों को अपने देशों में जुलूस निकलने के लिए ख़त लिखे जा रहे है. इमरजेंसी की ख़बरों को फोकस कर अभी तक दुनिया की मीडिया ने जो साथ दिया है... उसकी सराहना की जा रही है. अपने मुल्क में अपनी बात नही पहुंचा पाने की इनकी मजबूरी को इससे राहत मिल रही है. पंजाब यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष आरिफ हमीद चौधरी को लगता है कि आखिरकार दुनिया का दबाव काम आयेगा. लेकिन वे यहाँ के पत्रकारों को भी सड़क पर उतरने की ज़रूरत पर ज़ोर डाल रहे हैं.

सबों को पता है कि ये लड़ाई एक या दो हफ्तों कि नहीं है. इमरजेंसी...मार्शल ला से पहले भी जूझना पडा है. इस बार भी लड़ाई लम्बी होने जा रही है. इसलिए आधी-अधूरी तैयारी जम्हूरियत लाने वाली साबित नही होगी.

Friday, November 9, 2007

इमरजेंसी में ब्लोगिंग : मेरी सौवीं पोस्ट

बेनज़ीर को हॉउस अरेस्ट करने की ख़बर है. रावलपिंडी जाने के सारे रास्ते ब्लाक किए जाने की भी ख़बर है जहाँ बेनज़ीर की सभा होने वाली थी. पीपीपी वर्करों को बड़े पैमाने पर पकड़े जाने की सूचना है. अखबारों में जेन मुशर्रफ का बयान प्रमुखता से छपा है कि १५ फरवरी के पहले चुनाव हो जायेंगे. अमेरिकी प्रेसिडेंट बुश का बयान भी है कि उन्होंने पाकिस्तान में चुनाव और वर्दी छोड़ने के मुत्तालिक मुशर्रफ से दो टूक बात की है. ये यहाँ के लिए उम्मीद जगाने वाला बयान है... अगर कुछ और बात सामने नही आई तो...!

यहाँ के पत्रकारों ने बाजू पर काली पट्टी बांधनी शुरू कर दी है. तब तक बंधते रहेंगे जब तक इमरजेंसी नही हटा ली जाती. नामी पेंटर और जर्नलिस्ट सलीमा हाश्मी बाजू पर भी ये नज़र आ रही है. अपने अपने हिसाब से लोग खड़े हो रहे है.

पाकिस्तान में ब्लोग्स अभी उतना लोकप्रिय नही हुआ है. लेकिन मेरे लिए ये यहाँ किसी वरदान से कम नही. जो कुछ भी यहाँ देखता हूँ, वक्त पर पोस्ट कर देता हूँ. और कोई जरिया अभी नही है. यहाँ हिन्दी सॉफ्ट-वेअर नही है. लेकिन उसका रास्ता मैंने कुछ इस तरह निकला. गूगल के ट्रांसलिट्रेशन पर जा कर रोमन में टाइप करता हूँ. वो उसे देवनागरी में बदल देता है. आप में से कई इससे परिचित होंगे. नेपाली, अफगानी, बंगलादेशी, श्रीलंकन... सारे दोस्त समझते हैं कि मैं बहुत टेक्नो-सेवी हूँ. जब बताता हूँ कि मैं कम्प्यूटर अज्ञानी हूँ टू इन्हे भरोसा नही होता.

आज दीवाली है. पाकिस्तान समेत यहाँ जितने भी मुल्क के लोग हैं सबों ने दिवाली विश. इतना सारे विश जितने दिल्ली में रहते हुए कभी नही मिले. दिल्ली में तो ज्यादातर एसऍमएस से ही लोग काम चलाते हैं.

दीवाली पर यहाँ हमें मन्दिर ले जाने का बंदोबस्त किया गया है. हालांकि मैं बहुत ज़्यादा धार्मिक प्रवृति का नही हूँ. लेकिन यहाँ मन्दिर जा रहा हूँ तो यहाँ के अल्पसंख्यकों से शायद मुलाक़ात हो जाए. देखू तो वो किस हाल में है. जैसा प्रपोगेट किया जाता रहा है वैसा या फिर बेहतर. दरअसल पाकिस्तान का ये दौरा कई मायनो में आँखें खोलने वाला साबित हो रहा है. कई सुनी-सुनायी बातें यहाँ बेतुकी साबित हो रहीं है. कई अनजान पहलू सामने आ रहें है. इनमें से ज्यादातर सुखद अनुभूति देने वाले है.

जिस गेस्ट हॉउस में ठहरें है... वहाँ शाम को दीवाली मनायी जायेगी. बंगलादेशी दोस्त फ़रहाना सुबह बहुत खुश थी कि आज दीवाली की छुट्टी होगी. लेकिन नही मिली तो दुखी है. उसे मन्दिर जाने को भी नही मिल रहा है. लिहाज़ा नेपाल के दो और इंडिया के दो, कुल चार जो हिंदू हैं लोग ही मन्दिर जा सकते हैं. खैर... सुरक्षा वजहों से ये यहाँ की स्थानीय व्यवस्था है. हम कुछ नही कह सकते.

Thursday, November 8, 2007

इमरजेंसी की पहली रात

3 नवम्बर 2007

... रात के १० बज चुके हैं. लोगों की आंखों से नींद गायब है. इम्तिआज़ उल हक टीवी सुन कर नोट्स बना रहें हैं. उर्दू के कई मुश्किल अल्फ़ाज़ों का मतलब मैं उनसे पूछते जा रहा हूँ. माहौल बोझिल हो रहा है. मैं बाहर निकलता हूँ. ताज़ा ठंढी हवा के लिए. साथ में अफगानिस्तान के पत्रकार अली अहमद शेरानी हैं.

गेस्ट हॉउस के बाहर कुछ चेहरे हमारे चेहरों को झांकते नज़र आते हैं. शायद इस उत्सुकता में कि हमारे दिमाग में क्या चल रहा है. हम जल्द ही ऊपर गेस्ट हॉउस चले आते है. ११ बजने वाले हैं. जेन. मुशर्रफ का संबोधन होने वाला है. हम रिसेप्शन की जगह एक कमरे में हैं. इस मुल्क के कई लोग हमारे साथ बैठे हैं. जेन. मुशर्रफ का संबोधन थोड़ी देर से शुरू होता है. उन्होंने जो कहा और जिस तरह से कहा उससे पूरी दुनिया ने सुना.

साथ बैठे पाकिस्तानी उदासीन हैं. इस सब से बाहा निकलना चाहते है. शेरो-शायरी का दौर शुरू होता है. सुबह ४ बजे तक चलता है. सुबह ६ बजे फिर निकलना है. आधे घंटे की झपकी के बाद सभी फिर टूथ-ब्रश कर रहे हैं. पाकिस्तान में इमरजेंसी की ये हमारी सिर्फ़ पहली रात है. कई और आनी बाकी है.

Tuesday, November 6, 2007

पाकिस्तान में इमरजेंसी की हमारी पहली रात

तारीख ३ नवम्बर 2007

....पाकिस्तानियों के लिए इमरजेंसी कोई नई बात नहीं है. इसका अनुभव इन्हे कई बार पहले भी हो चुका है. इसलिए जो भी टीवी के सामने बैठे है, उनके चेहरे को पढ़ना मुश्किल नहीं. पर जुबां खामोश हें. बीच से एक आवाज आती है...फिर १७ साल पीछे चला गया मुल्क! फिर लम्बी खामोशी. रायल टीवी अपडेट्स आ रहें हैं. गिरफ्तारियों की ख़बर है. सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन के प्रेसिडेंट ऐह्तेजाज़ हसन को गिरफ्तार किया जा चुका है. कई और न्यायाधीश कार्रवाई की ज़द में हैं.

सबों को इंतज़ार हैं मुशर्रफ के संबोधन का. ख़बर आती है वो रात ११ बजे बोलेंगे.

अब तक तनाव ने अपनी जगह बना ली है. वो चेहरों पर नज़र आने लगा है. एक माँ फ़ोन पर शायद अपने बच्चे के कह रही है..." मोबाइल में बैलेंस बढ़ा लो. आटा ले आना. मैं शायद आज पहुँच न पाऊं. इस्लामाबाद से डेढ़ सौ किलोमीटर पीछे हूँ. वहाँ पहुँचने के रास्ते बंद कर दिए गए है. पर चिंता मत करना. मैं ठीक हूँ. अब्बू भी ठीक हैं..." इन शब्दों का अंतर्विरोध आप भी समझ सकते हैं. माँ को बच्चे की चिंता है. ख़ुद के लिए चिंतित होने को नही कह रही. मतलब साफ है. या तो बच्चे के लिए भी चिंतित होने की ज़रूरत नहीं...या फिर ये माँ भी सुरक्षित नहीं. बेहतर ये ही समझ सकते है.

काफी देर से मेरा मोबाइल नही बजा है. लगा कहीं बंद तो नहीं हो गया. देखा तो चालू था. पाकिस्तानी समय के हिसाब से ६ बज कर ४८ मिनट पर मुनीर जी का मैसेज था. EMERGENCY IN THE COUNTRY. अब तक सभी साथियों के फ़ोन घनघनाने लगे थे. लाहौर से सदफ के घर से फ़ोन था. घर के लोग चाहते थे कि वो आज ही लौट आए. शहराम के घर भी चिंता थी. सभी बोल-भरोस दे रहे थे. लौटने का ये सही वक्त नहीं था.

जारी...

पाक इमरजेंसी के शुरुआती लम्हें

....ये फ़ोन हमारे राजनीतिक सम्पादक मनोरंजन भारती का है. कह रहें हैं की वहाँ इमरजेंसी के हालात हो गए है. साथ में हिदायत कि अपना ख्याल रखना और जो भी करना सोच समझ कर करना.
हम एक ऐसे इलाके मैं हैं मोबाइल सिग्नल भी ठीक से काम नही कर रहा. सूचना का और कोई जरिया नहीं. अमीन ने बताया कि तमाम प्राइवेट चैनल को ऑफ़ एयर कर दिया गया है. जानकारी ये भी आ रही है कि आधिकारिक ऐलान नही हुआ है. राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ़ मुल्क को कभी भी संबोधित कर सकते हैं.

तभी दिल्ली ऑफिस से फ़ोन आया. फोनो के लिए. कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. उनको मेरी चिंता है. जानकारी के लिए ऑफिस की मुझ पर कोई कोई निर्भरता नही. वैसे भी पाकिस्तान से निकलने वाली जानकारी सीधी और ज्यादा तेज़ी से दिल्ली पहुँच रही है. ऐसा होता रहा है.

बातें करते हुए मैं मलोड के मन्दिर की तस्वीरें भी लेता जा रहा हूँ. फीचर स्टोरी के लिए. हार्ड ब्रेकिंग न्यूज़ से अलग जो सामने हैं. ज़रूरत और मौक़ा अति-उत्साह दिखाने का नही है. खैर... शाम घनी हो आयी है. अँधेरा हो चुका है. रात लम्बी होने के आसार हैं. हम वापस कल्लर-कहार की तरफ़ चल पड़े हैं.

क़रीब घंटे भर के इस सफर में मुद्दा मुल्क के सियासी हालात का ही छाया हुआ है. थोड़ी देर पहले तक हालात अलग थे. सुबह क़रीब सात बजे जब से चले थे ततो कोई भी सियासी बात नही कर रहा था. बस में हिन्दी गाने बज रहे थे और सभी नाच रहे थे. लाहौर से इस्लामाबाद को जोड़ने वाले मोटर-वे पर बस १०० किलोमीटर/घंटे से भी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी. पाकिस्तान के मोटर-वे की तुलना भारत के एक्सप्रेस-वे से की जा सकती है. लेकिन उससे ज़्यादा तरतीब. नियम-कायदों की ज़्यादा सख्ती. लेकिन सड़क और सियासत में फर्क होता है.

शाम के सात बज चुके हैं. हम कल्लर-कहार के गेस्ट हॉउस पहुँच चुके हैं. सारी निगाहें टीवी सेट पर जमी हैं. तमाम प्राइवेट चैनल ऑफ़ एयर है. सिर्फ़ रायल चैनल दिख रहा है.

जारी...

Monday, November 5, 2007

पाकिस्तान में जिस शाम इमरजेंसी लगी

तारीख ३ नवम्बर 2007

पाकिस्तान के चकवाल जिले के कल्लर-कहार का इलाका. हम कुछ तारीखी जगहों की सैर पर है. कटास राज मन्दिर देखने के बाद मलोड के शिव मन्दिर की ओर बढ़ रहें हैं. गाडी छोड़ चुके हैऔर पैदल जा रहें है. पथरीला रास्ता है. काँटों वाले पेड़ रास्ता रोक रहे हैं. लेकिन हम इस प्राचीन मन्दिर की तरफ़ बढ़ रहे हैं. शाम का धुंधलका छाने वाला है. हम तेज़ कदमों से आगे जाने की कोशिश कर रहें है.

तभी साथ चल रहे जियो टीवी के पत्रकार अमीन हाफिज़ के पास इक कॉल आती है. वो पूछने के अंदाज़ बोलता है. लग गयी या लगने वाली है? कन्फर्म है? अच्छा मैं पता करता हूँ... अमीन के बात करने के तरीके से मुझे लग गया कि मुल्क में कुछ सियासी हलचल हुई है. मैंने पूछा क्या हुआ. अमीन ने बताया मुल्क मैं इमर्जेंसी लग गयी है.

इससे पहले की अमीन से इस मुताल्लिक़ आगे कुछ बात हो पाती, मेरा मोबाइल भी बज उठा.

जारी....

Wednesday, October 31, 2007

एक मुल्क की शंका-आशंका

लाहौर की चिकनी सड़कों पर गाडियाँ सरपट दौड़ती जा रही हैं. कोई पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाहता. सभी आगे कि राह ढूंढते लगते हैं. शहर की अपनी रौनक है. लेकिन अजीब खामोशी साथ है. कराची-रावलपिंडी से धमाकों की ख़बर आती है. खामोशी और गहरी हो जाती है. यहाँ के न्यूज़ चैनल्स बताते है. हालत ठीक नहीं हैं. मीडिया मुखर हो रही है. पर उनकी अपनी सीमा है. वकीलों के आन्दोलन से आवाम को जो उम्मीद बंधी वो कायम है. बेनजीर के आने ने भी जोश भर दिया है. नवाज़ शरीफ आ पाएंगे या नहीं इस पर अटकलें चल रहीं हैं. कुछ जानकारों का मानना है कि वो आयेंगे और फौज ही है जो उन्हें आने देगी. नहीं ततो चुनाव में बेनजीर इतनी मज़बूत हो जायेंगी कि अ-राजनैतिक दखल-अंदाजों को बाद में मुश्किल होगी. ऐसी ताकतों को ये मुफीद बैठता है कि वोट पार्टियों में बंटती रहे. कोई एक मुख्तार न हो.

नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में अल-कायेदा आतंकवादियों के साथ छापामार किस्म की लड़ाई चल रही है. WorldPublicOpinion. ओआरजी ने एक सर्वे किया है और उसके मुताबिक ४४ फीसदी पाकिस्तानी चाहते हैं कि वहाँ पाकिस्तानी आर्मी को भेजा जाना चाहिए. हालांकि इस सर्वे का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा मालुम पड़ता है. शहरी इलाकों के सिर्फ़ ९०७ लोगों को इस में शामिल किया गया. खैर, हमारा मकसद सर्वे को सही या ग़लत ठहराना नहीं है. यहाँ के मूड को जानना है. पिछले पांच दिनों में जितने भी लोगों से जिस भी तरह की बात हुई है...उन सभी के मुताबिक यहाँ की आवाम अब पक चुकी है. वो अपनी चुनी हुई सरकार चाहती है.


सुबह यहाँ के एक न्यूज़ चैनल पर तक़रीर चल रही थी. भारतीय लोक-तंत्र की दुहाई दी जा रही थी. वहाँ के मज़बूत इलेक्शन कमीशन जैसी संस्था की यहाँ ज़रूरत महसूस की जा रही है. लेकिन तमाम बहस के बाद भी कोई ये बता सकने की हालत में नही...कि मुल्क किस दिशा में बढ़ रहा है.

(फोटो सौजन्य AFP)

Monday, October 29, 2007

लाहौर की गोद में... सभी हैं यहाँ जोश में

प्रिय पाठकों.

लाहौर में आज मेरी तीसरी सुबह है. बंगलादेश से आयी पत्रकार असमा का कल जन्मदिन था सो कल देर रात तक पार्टी चली. सबसे ज़्यादा डांस अजीम ने किया. बेहतरीन नाचता है वो. अमिताभ स्टाइल में. आसिम अफगानिस्तान से है. तीन और पत्रकार अफगानिस्तान से लाहौर आए है. फरीदुल्लाह , अहमद शाह शेरानी और महिला पत्रकार फेरिबा. यहाँ श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के पत्रकारों से भी मिलने का मौक़ा मिल रहा है.

सभी एक गेस्ट हॉउस में ठहरें हैं. सो तकरीबन २४ घंटे साथ रहते हैं. गेस्ट हॉउस का आलम कुछ कुछ बिग बॉस के घर जैसा है. लेकिन यहाँ साजिश नहीं है. ना ही कोई जीतने या हारने का भाव. यहाँ प्यार है. अलग-अलग मुल्कों की आवाम के बीच का प्यार. और इसकी मेजबानी कर रहे है पाकिस्तान के लोग.

अभी ज़्यादा घूमना नही हुआ है. कल गद्दाफी स्टेडियम गया था. पाकिस्तानी टीम प्रैक्टिस कर रही थी. अफ्रीका से आख़िरी मैच के पहले की प्रैक्टिस. शाहिद अफरीदी से बात हुई. शाहिद ने कहा... आ रहा हूँ इंडिया. दरअसल पाकिस्तानी टीम भारत आने की तैयारी में जुटी है. लेकिन अभी कोई भी खिलाडी उसके बारे में आन रिकार्ड बोलना नही चाहता. मैंने क्रिकेट फैंस से भी बातें की. एक क्रिकेट फैन भविष्यवाणी के अंदाज़ में बोला... शोएब ने तेंदुलकर को पहली गेंद पर बोल्ड करना है... शाहिद ने श्रीसंत को छक्के उद्दाने हैं...हमारी टीम जीत कर आयेगी. मैंने उसके कंधे पर हाथ रख विश किया... भारत से क्या होगा पता नही...पर कामना करता हूँ कि पाक टीम साउथ अफ्रीका से मौजूदा सीरीज़ ज़रूर जीत जाए! सभी क्रिकेट प्रेमियों को भारत-पाक सीरीज़ का बेसब्री से इंतज़ार है. लेकिन वे वीजा की समस्या से भी वाकिफ है. सियासतदानों से शिकायत है. पर आवाम के लिए चाहत...

ये रेस्टोरेंट में भी दिखा. गुलबर्ग इलाके के लिबर्टी मार्केट में salt n' pepper में लंच करने गया. साथ में जियो टीवी के पत्रकार शाहबाज़ थे. हिन्दुस्तानी हूँ ये पता चलते ही वेटरों ने ख़ास ख़याल रखना शुरू कर दिया. सबों की निगाह मुझ पर थी...लेकिन इस तरह की मैं असहज ना महसूस करूँ. रेस्टोरेंट से निकलते हुए निगाहें आख़िरी सीधी तक साथ रहीं.

आगे भी लिखता रहूंगा. अभी के लिए खुदा हाफिज़

Saturday, October 27, 2007

अ लेटर फ्रॉम लाहौर

प्रिय ब्लागर बंधुओं,

दिल की तमन्ना थी कि मुल्क के उस आधे हिस्से को देखूं जो १४ अगस्त १९४७ की रात पाकिस्तान बन गया. तमन्ना पूरी हो रही है. कल ही दिल्ली से लाहौर पहुँचा हूँ. अगले एक महीने तक पाकिस्तान में ही रहने का प्रोग्राम है. यहाँ जो कुछ भी देखूंगा... महसूस करूँगा... आप सबों को बताते रहने की कोशिश करूँगा.

कल रात जब लाहौर एअरपोर्ट से बाहर निकला ततो एक शख्स ने बड़े प्यार और जोश से पूछा... आप इंडिया से आए हैं? मैंने कहा... जी. जवाब सुनते ही उनके साथ खड़े दूसरे लोगों की आँखों में चमक सी आ गयी. उनके चेहरे के भाव से लगा कि अपने इंडियन भाइयों को देख यहाँ की आवाम किस तरह खुश होती है...जैसे उनका कोई बिछड़ा भाई उनसे मिला हो!

फिर मिलता हूँ

Wednesday, October 24, 2007

गोवा में समंदर और आसमान के कुछ दिलकश नज़ारे




ये सभी तस्वीरें मोबाईल फोन कैमरे से ली गई हैं। उम्मीद है कि जिन्होने गोवा देखा है उनकी यादें ताज़ा हो गई होगीं और जिन्होने नहीं देखा है उनकी ललक और बढ़ गई होगी।

Tuesday, October 16, 2007

महानता की ओर बढ़ते कदम

नेताओं के महान बनने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। आधुनिक भारतीय नेतृत्व के इतिहास में ये सिर्फ दूसरा मौक़ा है जब कोई नेता अपने कार्मिक वजहों से महानता प्राप्त कर सकता है... और काफी हद तक कर भी रहा है।

ऐसा एक मौक़ा था देश की आज़ादी के पहले, जब देश को आज़ाद कराने का मक़सद हमारे उस समय के अगुवों के सामने था। उन्हें हिंसा-अहिंसा जैसे रास्तों पर चल कर हमारे देश को आज़ाद कराया। इस क्रम में उन्होंने लाठियां खायीं, कई-कई बार जेल गए, प्रताड़ना झेली, फांसी पर चढ़े... और तब जा कर महान कहलाए। कुछ ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महानता पायी।

आज के हालात अलग हैं। स्वतंत्रता आज हमारी चेरी है। हम सभी अपने अपने ढंग से स्वतंत्र हैं। हम उसमें उसी से खेल रहे हैं। सो और स्वतंत्रता प्राप्त करने की ज़रुरत हमारे नेताओं के सामने नहीं है। आने वाले कई सालों तक हमारी ग़ुलामी की कोई उम्मीद भी नहीं है कि हम अभी से किसी नए स्वतंत्रता आंदोलन की तैयारी करें। अगर हम ग़ुलाम हुए भी तो वो ग़ुलामी पिछली ग़ुलामी जैसी नहीं होगी। हमारे पास सुख सुविधा के तमाम साधन होंगे। बस सोच अपनी नहीं होगी। तंत्र भी संभवत: अपना ही होगा लेकिन उसे चलाने वाला तांत्रिक कोई और होगा। 'इह' लोकतंत्र से हम 'पर' लोकतंत्र में होंगे। स्वर्ग सा आनंद लूटेंगे। तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन की बात कैसी और नेताओं के महान बनने का मौक़ा कैसा।

रही सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महान बनने की बात तो उसमें भी अब सीमित स्कोप है। कुरीति समझी जाने वाली कई रीतियों को तो अब सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। ख़ासतौर पर लेनदेन संबंधी रीतियों को। समय-साल के हिसाब से नए-नए कंसेप्ट उभर कर सामने आ रहे हैं। इनमें चीज़ों को नए ढंग से व्याख्यित-परिभाषित किया जा रहा है। कल तक जो अनैतिक था, आज अलग-अलग तर्कों के सहारे नैतिक है। व्यक्तिगत लक्ष्यों के प्रति पूरा समर्पण ही आजकल नैतिकता बन गई है। ऐसे समय में नेता लोग किसे सुरीति माने और किसे कुरीति और किसे मिटा कर अपनी महानता दिखाएं? लेकिन महान तो बनना है चाहे इसके लिए महानता की नई परिभाषा ही क्यों ना गढ़नी पड़े। महानता की ओर ले जाने वाले कदमों को पुनर्निधारण ही क्यों न करना पड़े। सच है कि हर कोई अपने अपने ढंग से महान बनने की सोचता और जुगत भिड़ाता है। इसमें मीडिया उसकी सहायता के लिए बैठा है।

बिना पब्लिक के जे जाने गुप चुप तरीक़े से महान तो बना नहीं जा सकता। इसलिए परंपरागत छुटभैय्येपन से मुक्ति पानी होगी। लीक से हट कर कुछ नया करना होगा। या फिर मर जाना होगा क्योंकि बुरा से बुरा नेता भी मरने के बाद महान हो जाता है।

धोती कुरता पहन कर, किसी विचारधारा का चोगा ओढ़ कर, देश के लिए बिना मांगे जान देने की बात भर करने से अब नोटिस नहीं मिलती। अच्छी योजनाएं भी बनीं, शिलान्यास भी हुआ, काग़ज़ की नाव भी बनी, उसे प्लेन की तरह कुछ देर हवा में उड़ाया भी गया... लेकिन नाम न मिला। पिछले कई साल से बंधुआ मज़दूरी मिटाने, जनसंख्या क़ाबू करने और पर्यावरण बचाने की बात की... जनता ने ध्यान नहीं दिया। वर्षों प्राईम-मिनिस्टर रहे, मंत्रिमंडल में कई फेरबदल किए, देश चलाया, तनावों से जूझते दिखे और किंचित आध्यात्मिकता भी दिखाई... लेकिन इन सबसे महान बनने में कोई सहूलियत नहीं मिली।

अचानक कुछ घोटाले-कारगुज़ारियों के पन्ने फड़फड़ाए... हवाला, चारा, रिश्वत, जालसाज़ी...। श्रृंखला की एक से एक कड़ी। कैमरे की लाईटें चमकीं। कलम उठे। विरोध में ही सही, लिखा-बोला जाने लगा। अदालत आते-जाते समय टीवी पर दिखाए जाने लगे। जेल तक की नौबत आयी। पहले तो ख़राब लगा। फिर याद आया कि जेल यात्रा से ही तो महानता की जड़ को मज़बूती मिलती है।

फिर तो संकट का ये काल वरदान-सा लगने लगा। अपने प्रभाव को दिखा कर अपनी महत्ता बरक़रार रखने का... उसे बताने का सुअवसर है यह। कैसे करोड़पति लखपति बना जाता है इसका नज़ीर पेश कर जनता को प्रेरित किया जा सकता है। चोरी कर सीनाज़ोरी को महिमामंडित कर भी महान बना जा सकता है। नेताओं के वक्तव्यों में, इसकी झलक साफ देखी जा सकती है...अगर आंखे खोल कर देखें तो। सचमुच, भौतिक-उपभोक्तावादी आधुनिक भारत के महान व्यक्तित्व बनने जा रहे हैं वो!

(25दिसंबर1996 की मेरी डायरी का एक पन्ना)

Saturday, October 13, 2007

ईद पर सोनिया गांधी की बधाई सिर्फ मुसलमानों को!

ईद सिर्फ मुसलमानों की है। सभी देशवासियों की नहीं। कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को यही लगता है। तभी कांग्रेस मुख्यालय से उनके नाम से मोबाईल पर जो संदेश आया है वो सिर्फ मुसलमान भाईयों और बहनों के लिए ही है। पूरा टेक्स्ट इस तरह है:
"On the occasion of Eid-ul-Fitr I would like to greet all our muslim brothers and sisters. May this festival bring peace and harmony."
Sender: SoniaGandhi
sent:13-Oct-2007
19:56:57

अब ये सोनिया के ख़ुद के शब्द हैं या फिर उनके क़ाबिल सलाहकारों के, ये तो कांग्रेस ही जाने। लेकिन ये उंचे पदों पर बैठे व्यक्तित्वों की तरफ से जारी होने वाले शुभकामना संदेशों के एकदम अलग है। ईद मेरे घर में भी मनायी जा रही है। लेकिन मुझे शुभकामना क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं हिंदू हूं? तो फिर हिंदुओं के मोबाईल पर संदेश ही क्यों? वाह सोनिया जी! वाह कांग्रेस!
होता ये आया है कि त्यौहारों के मौक़े पर इन लोगों की तरफ से देशवासियों को बधाई दी जाती है। लेकिन लगता है ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोशिश में कांग्रेस ने पर्व त्यौहारों पर मुंह-देखी बात करनी शुरु कर दी है। चुनाव जो आने वाला है। लेकिन उससे पहले दशहरा और दीवाली आने वाले हैं। अब सोनिया से क्या उम्मीद करें कि इन मौक़ों पर उनके संदेश में सिर्फ हिन्दू भाईयों और बहनों को शुभकामनाएं होंगी? अगर नहीं तो क्यों? अगर हां तो क्यों?
कांग्रेस या तो भूल सुधारे या फिर दे कोई जवाब।

Friday, October 12, 2007

कोई बताए ये बच्चा हिंदू है या मुसलमान!

नाम- अज़ीज़ तहसीन, उम्र- 10 साल, कक्षा- 5वीं, दिलचस्पी- संस्कृत। हैरान ना हों। अज़ीज़ तहसीन एक ऐसी मिसाल पेश करता है जिसे देख कर हम और आप सीख सकते हैं। दिल्ली में साकेत के एमेटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले अज़ीज़ की संस्कृत में गहरी दिलचस्पी है। स्कूली क़िताब के साथ साथ गीता के भी कई श्लोक उसे कंठस्थ है। उसे श्लोक पढ़ता देख एक अलग तरह की अनुभूति होती है। शायद ये इसलिए भी क्योंकि अज़ीज़ की मां सैय्यद मुबीन ज़ेहरा और पिता तहसीन मुनव्वर का ख़ुद का भारतीय संस्कृति में भरोसा है... अकेले हिन्दू या मुसलमान जैसे पंथ में नहीं। ज़ाहिर है कि अज़ीज़ की परवरिश एक मुसलमान नहीं भारतीय परिवार में हो रही है। हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद पर अपनी रोटी सेंकने वाले भी अगर इसे देखें तो शायद उनमें भी क़ुरान और मुसलमान को जानने-समझने की इच्छा और ताक़त पैदा हो सके। उनके लिए इस ईद औऱ दीवाली का यही तोहफ़ा है मेरी तरफ से।

अज़ीज़ को सुनने-देखने के लिए नीचे क्लिक करें। ये ईटीवी पर प्रसारित एक स्टोरी है जो मैंने यूट्यूब के सौजन्य से लिया है।

http://www.youtube.com/watch?v=zBLCcyAmSkE

अज़ीज़ से सीधी बात भी की जा सकती है azeeztehseen@gmail.com पर।

शुक्रिया।

Friday, October 5, 2007

छक्कों पर करोड़ों लुटाने वालों, शहीदों को भी देखो!

मेजर दिनेश रघुरमण और मेजर के.पी. विनय ने कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहादत दे दी। शहीद होने के पहले इन्होंने कम से कम नौ आतंकवादियों को मार गिराया। तीन दिन हो गए लेकिन लगता नहीं कि किसी ने भी इनकी शहादत को अभी तक नोटिस किया है। सेना का विभागीय सम्मान और मदद अपनी जगह। लेकिन ना तो खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी बीजेपी, सेकुलर होने का राग अलापने वाली कांग्रेस, अमिताभ के सम्मान की ख़ातिर सोनिया से भिड़ने वाले अमर सिंह, आतंकवाद के खिलाफ भौंहे तान फोटो खिंचवाने वाले नरेन्द्र मोदी या खिलाड़ियों को जर और ज़मीन बांटने वाले हरियाणा या झारखंड जैसे किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री.... किसी की भी तरफ से सम्मान के दो बोल अब तक सामने नहीं आए हैं।

जम्मू औऱ कश्मीर में जवान से लेकर अफ़सर तक जान की बाज़ी लगाते रहते हैं। ये सच है कि कुर्बानी ईनाम के लिए नहीं दी जाती। लेकिन एक तरफ ये नायक अपनी गोलियों से देश के दुश्मनों को मारते हैं तो भी ख़ामोशी पसरी रहती। दूसरी तरफ बैट से निकलने वाले छक्कों पर करोड़ों बरसते हैं। सम्मान में मंच सजते हैं। कारवां निकलता है। पर सोचिए। देश का मान असल में कौन बढ़ा रहे हैं?

देश के इन वीर सपूतों को हमारी श्रद्धांजलि!!!

Wednesday, October 3, 2007

भारतीय शेरों के ढ़ेर होने पर इक शेर!

कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आप शब्दों के ज़रिए बयां ना कर सकें। बस लहज़ा ढ़ूंढने भर की ज़रुरत है। 20-20 जीत कर आए भारतीय शेर 50-50 में ढ़ेर हो गए। हालांकि आस्ट्रेलिया के साथ सीरीज़ का पहला मैच बारिश की भेंट चढ़ गया औऱ ड्रा हो गया। नहीं तो अभी तक 2-0 से पीछ होते। दूसरे मैच में भारतीय टीम के ख़राब प्रदर्शन के बाद तहसीन मुनव्वर ने लिखा है...

"दिन जो निकला हो तो फिर रात नहीं होती है
जो भी हो बात, वो बिन बात नहीं होती है।
टीम इंडिया को हमें खुल के बताना होगा
हर एक मैच में बरसात नहीं होती है!"

सुन रहे हो धोनी और युवराज!

"आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"

लोकसभा चुनाव के पुन: मंडराते सत्य को देखते हुए भारत की जनता ने एक मीटिंग का आयोजन किया। मक़सद ये रहा कि इस बार सरकार बनाने के लिए कैसे लोगों को सांसद चुना जाए। इस मीटिंग में देश के कोने कोने से और हर तबके के लोग शामिल हुए। तमाम प्रकार की मीटिंग्स की 'आम प्रकृति' के विपरीत यह एक अद्वितीय मीटिंग थी जिसमें लिए गए फ़ैसले बिल्कुल समयानुकूल रहे।

दिल्ली चलो के बैनर तले लोग ट्रेन भर भर के दिल्ली आए। फिर भी सबों ने रेल का पूरा-पूरा किराया दिया। ताकि लालू जी के मुनाफ़े में कोई कमी ना आए। वे आरक्षित डिब्बे में भी नहीं घुसे। अनुशासित व्यवहार किया। सभी शांतिपूर्वक सभा-स्थल तक पहुंचे। मीटिंग के दौरान और पश्चात भी जूतमपैज़ार की कोई नौबत नहीं आयी। बिना किसी विशेष बहस या गहन विचार-विमर्श के मीटिंगकर्ता एक नतीज़े पर पहुंच गए। किसी ने भी अलग राग नहीं अलापा। मतभिन्नता प्रकट नहीं की। इस प्रकार ये प्रयास सफल होता प्रतीत हुआ।

पहली बार देश की सम्पूर्ण जनता किसी मुद्दे पर एकमत हुई है। शायद इसलिए भी कि अब कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। देश की व्यवस्था के मूल को तो वो पहले से ही समझ रही थी। इस मीटिंग की उपलब्धि ये रही कि उसे स्वीकार भी लिया गया। तय हुआ कि अब औऱ मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए। समय आ गया है जब 'समय की मांग' को ध्यान में रख कर ही कदम उठाएं जाएं। अभी तक सांसद बनने वाले अधिकतर नेता नक़ाब ओढ़ते रहे हैं। इससे उन्हें समझने में भोली जनता को कठिनाई होती है। जनता को समझाने के लिए नेताओं को भी प्रपंचों का सहारा लेना पड़ता है। अत क्यों ना इस मजबूरी को मिटा दिया जाए। नेताओं को अपने असली रुप में सामने आने का मौक़ा दिया जाए।

तो सर्वसम्मति से यही फ़ैसला लिया गया कि उम्मीदवार चाहे जिस भी किसी पार्टी का हो, या उसे अघोषित अंतरंग संबंध रखता हो, सांसद चुने जाने के योग्य समझे जाएंगे बशर्ते आगे लिखे मापदंडों पर खरे उतरते हों।

इस बार आदर्श-मूल्यों आदि की बात करना ग़लत तरीक़े से सांसद चुने जाने का प्रयास माना जाएगा। इसलिए इस बार वही उम्मीदवार सफल होगें जो आपराधिक कार्यवृति या मनोवृति के हों। हर तरह के अपराध करने में सक्षम हों। उनका पढ़ा-लिखा होना तो अब तक ज़रुरी नहीं ही था... इस बार पुलिस रिकार्ड में फिंगर प्रिंट वाले को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, झूठे गवाह तैयार करने, प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने, पुलिस से मिलीभगत रखने जैसे कामों में दक्ष उम्मीदवार प्रिय पात्र होंगे।

इस विकासशील देश के भावी सांसदों को हर प्रकार के अपराध करने का अनुभव होना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में नई तकनीकी का इस्तेमाल करने, जैसे तंदूरी हत्या, करने वाले केन्द्र बिंदु में रहेंगे। सज़ायाफ्ता या हिस्ट्रीशीटर निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। प्रेरणा के लिए अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन, पप्पू यादव जैसे नेताओं की मोम की प्रतिमा संसद के गलियारे में लगायी जाएंगी। अमिताभ और शाहरुख़ से भी कोमल प्रतिमाएं... ताकि इनके सामने ग़लती से भी कोई आदर्श और मूल्यों की बात करे तो प्रतिमाएं शर्म से गल जाएं। और सच्चे आदर्शवादी नेता मौक़े पर ही पकड़े जाएं।

देश की जनता ने महसूस किया है कि मतदान के दौरान बूथ कैप्चरिंग आदि में सौ झमेले हैं। नाहक निर्दोषों की जान चली जाती है। उम्मीदवारों पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं और चुनाव आयोग का समय ख़राब होता है। इसलिए इस बार प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार की जगह लाउडिस्पीकर से ये बताना होगा कि मतदाताओं को वोट डालने बूथ तक जाना है या नहीं। अगर नहीं जाना तो और अच्छी बात है। वे आराम से घर पर बैठ एमटीवी देखें और लहर नमक़ीन खाकर मतदान तिथि को सेलिब्रेट करें। उधर प्रत्याशीगण यथाशक्ति वोटों का बंटवारा कर लें। इससे गोली बारूद के पैसे बचेंगे। इन पैसों से नेता और उनके प्यादों को दारू की और बोतलें मिल सकेंगी।

इन बातों के अलावा, जिन नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि संतोषप्रद नहीं रही है, लेकिन इस विषय में कुछ कर गुज़रने की जिनकी गहरी महत्वाकांक्षा है, उनके लिए भी जनता ने संसद के दरवाज़े खुले रखने का फ़ैसला किया है। शर्त सिर्फ यही कि चुनाव होने के ऐन पहले तक वे अपनी योग्यता साबित कर दें।

अंत में, भारतीय जनता की सिर्फ एक विनती है। संसद में पहुंचने के बाद एकाध करोड़ जैसी छोटी मोटी रकम के लिए भ्रष्टाचार की गरिमा को क्षति ना पहुंचाएं। सेज़, रिटेल सेक्टर में विदेशी कंपनियां, हवाई अड्डों के निजीकरण जैसे बड़े मौक़े हैं। हमेशा अरबों में खेलने की कोशिश करें। जनता का नारा है, "आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"।

आप भी लगाइए।

Monday, October 1, 2007

हम तो खड़े वहीं रहे, हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

तेज़ी से बदलती दुनिया में अगर आप अपनी ज़िंदगी में ठहराव महसूस करते हैं तो ये कविता... जो कि हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है?... आपके लिए है। जैसे कि आप बेशक अपना हैंडसेट ना बदल पाए हों पर हचुशन-एस्सार से जो हच बना, वो अब वोडाफ़ोन बन गया...कुछ इसी तरह के बदलावों और ठहरावों को दर्शाने की कोशिश की गई है यहां।

कौन छोटा बना रहा
बड़ा कौन हो गया
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

लाटों की फौज भी चाहते
काम के कुछ सिपाही
जिनके बूते दे सकें
वे अपने अस्तित्व की दुहाई
इतने लब बोले
कि मन मौन हो गया।
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

दुनिया ने देखे हैं
बड़े बड़े जलजले
कई हिटलर आए
और मुबारक़ भी पिट गए
लोकतंत्र आया तो
चौधरी कौन-कौन हो गया।
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

हर तरफ आ रहा
कुछ ना कुछ बदलाव
पर हमें चिढ़ा रहा
अपने हिस्से का ठहराव
हैंडसेट भी वही रहा
नेटवर्क भी धोखा दे रहा
उधर, कुत्ते ने भी घर बदला
बदन झिड़क के चल दिया।

जहां पहले बेडरुम था
वहां लॉन हो गया
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।

हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!!


Wednesday, September 26, 2007

जो दिखता है वो बिकता है सरजी

अनिल जी ने जानकारी दी है कि अपमानित हॉकी टीम भूख हड़ताल करेगी। भूखों के इस देश में हड़तालें पहले भी कम नहीं हुईं हैं। अब हॅाकी वाले भी कर लें। क्या फ़र्क पड़ता है। ब्लॅाग पर जानकारी आ गई यही बहुत। कहीं ख़बर ही नहीं आएगी कि ऐसी भी कोई भूख हड़ताल हो रही है। देखा नहीं आपने! ख़बरों में क्या छाया है। खुली बस पर भज्जी का भांगड़ा... युवराज का ठुमका...श्रीसंत की फ्लाईंग किस...छी छी राम राम मत करिए! इतनी बढ़िया ख़बर कि कैसे कोई हट जाए। जश्न से सीधा भूख पर उतर जाए। ' विजुअल जर्क' भी कोई चीज़ है या नहीं।

खैर छोड़िए टांग-खिंचाई। ये बताईये कि ये हॅाकी वाले हैं कौन? कौन जानता है इन्हें? अगर ये शाहरुख़ के चक दे इंडिया वाली लड़कियां हैं तो ले आईए हमारे यहां। अपना पेट काट के भी चाय पिलाएंगे। पर अगर आप वाकई में हॅाकी वाली किसी टीम की बात कर रहे हैं तो संभल जाईए। स्टिक हमारे यहां भी है! चलते देर ना लगेगी। कर्नाटक पुलिस के पास भी होगी। नीचे से मुड़ी ना सही...सीधी ही। पर पड़ती है तो लगती ज़ोर की है। इसलिए चाहे भूख हड़ताल करें पर पुलिस की लाठी-ताल से बचके।

फिर भी उनको भूख-हड़ताल करना ही है तो थोड़ा ठहर के करें। एक एशिया कप जीत लिया तो दिमाग चढ़ गया क्या। इधर क्रिकेट टीम को देखिए। कैसे टुर्नामेंट जीतते जीतते हारे। आख़िरकार एक हारते हारते जीत गए तो आप गए अपनी डफली लेकर विघ्न डालने। एक मूवी देखकर इतना चौड़े ना हों। पहले क्रिकेटरों की तरह दिखना सीखें.... चाहे जीत में हों या हार में... फिर बिकना भी शुरु हो जाएगें। जाईए आराम कीजिए। बढ़िया खेलने की कोशिश कीजिए। फिर जो मिलता है उसमें खुश रहना सीखिए। पड़ोसी की हरी उछाल वाली पिच देख कर अपनी बॅाल चमकाना छोड़िए!

Thursday, September 20, 2007

छक्कों के 'युवराज' और 'छक्कों के बादशाह' में फ़र्क है!

जिस समय टीवी पर पूरा क्रिकेट जगत युवराज के छक्कों की बरसात देख रहा था, उसी बीच कुछ दूसरे तरह के 'छक्कों' की ख़बर भी कई चैनलों पर आ रही थी। एक का खेल नशा दे गया तो दूसरे के 'खेल' ने घिन पैदा की है।

पांच गेंद में 5 छक्के खाए तो छ: गेंद में 6 छक्के जड़ दिए! वाकई में युवराज सिंह 20-20 क्रिकेट में छक्कों के युवराज साबित हुए हैं। अपने बूते इंडिया को मैच जिता दिया। इंग्लैंड से लगान वसूल लिया।

दूसरी ख़बर दिल्ली पुलिस से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस में भर्ती होने आए जवानों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के आईपी कॅालेज की लड़कियों को जम कर छेड़ा। वे तो बहाली के लिए आए थे। वर्दी में नहीं थे। पर थे छक्के ही। और जो वर्दी में तैनात थे... वे छक्कों से कम नहीं मालूम पड़ते। रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्होंने लड़कियों की शिकायत सुनने से इंकार कर दिया। टका सा जवाब दिया.. क्या हो रहा है हमें क्या पता। नतीज़तन लड़कियों को अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ी। दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर को घेरना पड़ा। जूं फिर भी कान तक शायद ही रेंगी है। बताया जा रहा है कि तीन पुलिस वाले सस्पेंड किए गए हैं।

शायद किसी लड़की के साथ और बुरा हो जाता तब भी ये वर्दीधारी सस्पेंड ही होते। ड्यूटी पर कोताही मामले में कभी भी किसी को इससे कड़ी सज़ा की कोई फौरी व्यवस्था नहीं है। पब्लिक प्रेशर में बस सस्पेंड कर सकते हैं, सो कर दिया। जिसने भी अपनी कुर्सी पर दबाव महसूस कर सस्पेंसन को 'गो अहेड' कहा होगा... लगता है कि उसने युवराज से भी बड़ा छक्का जड़ मैदान मारने की कोशिश की है। वाकई में वो छक्कों का बादशाह ही होगा। जिनके नीचे काम करने वाले दिल्ली पुलिस के जवान अपनी जवानी ग़लत वजहों से तो दिखा जाते हैं और ज़िम्मेदारी के वक्त चूड़ियां पहने नज़र आते हैं। पर अगर 'छक्कों के इस बादशाह' को दिल्ली की जनता का, ख़ास तौर पर असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं का दिल जीतना है तो पीड़ित लड़कियों की पूरी बात सुननी होगी... इंसाफ करना होगा।

जल्दी ही दिखाउंगा कि किस तरह दिल्ली पुलिस अपने विज्ञापन में आम शहरी की मर्दानगी को ललकारती है... पर जब खुद की बारी आती है तो चूड़ी पहने नज़र आती है।

Wednesday, September 19, 2007

एक रुम-पार्टनर-दोस्त की तलाश में

कॅालेज के दिनों में राजौरी गार्डेन में रहा करते थे। पहले टू-रुम सेट में चार लोग थे। मतलब एक कमरे में दो-दो रहते थे। दो यूपीएससी एसपिरेंट थे, सो वो दोनों एक में। मैं और सौरभ एक कमरे में। एक गोरखा-भाई भी हमारे साथ था...हमारे खाने-कपड़े के लिए। हम से एकाध साल छोटा। रोटी बनाते हुए ब्रेक डांस करता था या ब्रेक डांस करते हुए रोटी बनाता था अंत तक पता नहीं चला। लेकिन दोनों सीनियर के निकल जाने के बाद मैं औऱ सौरभ एक सिंगल रुम सेट में आ गए। गोरखा-भाई को मां की याद आयी तो घर चला गया। जनपथ से हमने उसे जींस और टीशर्ट्स लेकर दिए। नेपाल से था और इसलिए बहुत ही फैशन परस्त। अच्छा लगता था ज़िंदगी के प्रति उसका जोश देखकर। उसके बारे में कभी अलग से बताउंगा।

सौरभ भी इतिहास आनर्स की कर रहा था। रामजस और फिर माईग्रेशन लेकर हिंदू कॅालेज से। मैंने अपनी पढ़ाई दयाल सिंह कॅालेज से ही जैसे तैसे पूरी की। कॅालेज की पढ़ाई के बाद मैंने जो लाईन चुनी वो आपके सामने है। सौरभ ने भी अपने करियर के लिए काफी मेहनत की। लेकिन समय के फेर में हम दूर हो गए। बीच में वो पटना लौट गया। फिर दिल्ली आया। मिला। फिर ग़ुम गया। उसकी याद आती रहती है। कॅामन जानकारों से पूछता रहता हूं। पर इधर बड़े लंबे समय से उसकी कोई खोज़-ख़बर नहीं है। अभी भी उसके पुराने दिए एक मोबाईल पर फोन किया। घंटी बजती रही कोई रिस्पांस नहीं। मन और जिज्ञासु हो गया उसके बारे में जानने को। ब्लाग के ज़रिए उस तक पहुंचने की सोचना नादानी होगी। व्यक्तिगत संबंधों के किसी और अंतरजाल (ये शब्द ब्लॅाग पर ही सीखा है...उम्मीद करता हूं कि सही इस्तेमाल कर रहा हूं) पर मैं हूं नहीं। बस उस रुम-पार्टनर-दोस्त की याद आपसे शेयर करना चाहता हूं। इसलिए लिख रहा हूं। उसके एक जन्मदिन पर मैं चार पंक्तियां लिख कर दी थी। शायद उसने संभाल के रखा हो। मैंने लिखा था...


मेरा अतीत,
एक उपवन।
कहीं उजड़ा हुआ सा
तो कुछ शेष है जीवन।

असंख्य कांटों के बीच
जैसे पुष्पित एक सुमन।

स्मृति का वो सुमन भी
कागज़ का होता,
उसमें यदि सौरभ
तुम समाया ना होता!

सौरभ पटना से है औऱ तिल-तिकड़म से हमेशा दूर ही रहा है। सपाट और बिना लाग-लपेट वाली ज़िंदगी जीने वाला। उससे भी मैंने बहुत कुछ सीखा। कभी भूले से हिंदी ब्लागिंग की दुनिया में झांक ली तो उसे पता चलेगा कि यहां भी उसका ज़िक्र है। इसी बहाने शायद फोन ही कर ले। मेरा मोबाईल नंबर वही है। दस साल पुराना।

Tuesday, September 18, 2007

कोहराम के बीच... एक मुसलमान का राम

राम और राम सेतु को लेकर कुछ कथित हिंदूवादी संगठनों ने हायतौबा मचा रखी है। कोर्ट में दाख़िल कर फिर वापस ले लिया गया हलफ़नामा अपनी जगह... और उसमें जाने-अनजाने की गई ग़लती अपनी जगह, लेकिन ऐसा नहीं कि भगवान राम सिर्फ हिंदुओं के राम हैं। वो बाक़ी धर्मों के लोगों के लिए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। इसलिए तहसीन मुनव्वर ने चंद पंक्तियों में अपनी बात रखी है।

"हम दिल से करते हुए एहतराम कहते हैं,
उन्हें हम हिन्द का अब भी ईमाम कहते हैं,
दिलों के बीच बना दे जो प्यार का सेतु...
उस आला ज़ात को भगवान राम कहते हैं।"


दरअसल मुनव्वर ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर इक़बाल की कही बात को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इक़बाल की पंक्तियां हैं...

"है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उनको ईमाम-ए-हिन्द"

एक तरफ मुसलमानों की ऐसी भावनाएं और दूसरी तरफ करुणानिधि जैसे हिंदुओं का बयान कि राम ने कहां से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की ताकि ऐसा पुल बना सकें... । भावना का महत्व है या अपना फ़ायदा... आप ही तय कीजिए।

राम राम।

Monday, September 17, 2007

मेरे अपराध-क्षेत्र अब बड़े हो रहे हैं...

कभी भी किताबी पढ़ाई में मन नहीं लगा। पर बचपन से ही कुछ ना कुछ लिखने का दुस्साहस करता रहा हूं। ख़ूब नहीं तो ए-फोर साईज़ के कई कागद कारे किए हैं। चाहे कोई पढ़े ना पढ़े। किसी को समझ में आए ना आए। सब ख़ुद की संतुष्टि के लिए। लेकिन मेरी पहली चंद पंक्तियां जो प्रकाशन योग्य मानी गईं, वो रहीं...

मेरे अपराध क्षेत्र अब बड़े हो रहे हैं
अगले चुनाव में हम भी खड़े हो रहे हैं!

नब्बे में लिखी गई इन पंक्तियों को 1991 में कॅालेज मैगज़ीन में जगह मिली। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कालेज में तब मैं प्रथम वर्ष में था। तब मंडल कमीशन लागू होने के बाद की आग फैल कर कुछ शांत हो चुकी थी। 'न्यू स्टार' नामक इस मैगज़ीन में मेरी कुछ औऱ पंक्तियां जिनको जगह मिली, वो हैं...

जो करते हैं साम्प्रदायिक एकता की बात
वही लगाते हैं जातीयता की आग!

ये दौर मंडल कमीशन के बाद अयोध्या में राममंदिर बनवाने के भाजपाईयों के जुनून और आम चुनाव का भी था। सो मैंने लिखा...

मंडल है गर्दिश में, मंदिर अभी रौशन है
मुद्दा तो ढूंढ़ना है, चुनावों का जो मौसम है!

द्वितीय वर्ष में मुझे कॅालेज मैगजीन का संपादक बना दिया गया। फिर मैंने क्या लिखा... अगली बार। अगर आपको जानने में दिलचस्पी हो तो!

Thursday, September 13, 2007

रिश्ते हैं रिश्तों का क्या...!

रिश्तों को लेकर हम सभी सचेत रहते हैं। गंभीर औऱ अगंभीर चेतना के साथ और कभी इन दोनों के बीच के मानसिक द्वंद्व में फंस कर भी। दूसरों के हालात पर कई बार हम अपना बड़प्पन वाला चोगा ओढ़ लेते हैं... और जब यही हमारी निजी ज़िंदगी में होता नज़र आता है तो उससे निकलने के रास्ते ढूंढ़ते हैं। ज़रुरत बारीक विश्लेषण की है। खैर... गपशप वाली शैली को आप भी जानते होंगे। क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये! पर शैली ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह भेजी है।

मुझे ये कहना है कि आज रिलेशन के मायने बदल गए/रहे हैं। शायद ये बात आपके और मेरे लिए अजीब लगे लेकिन दूसरों के लिए नहीं। इसलिए ये ग़लत है कि हम रिलेशन पर क्या सही है और क्या ग़लत है उसका फैसला करें। क्योंकि ये हर व्यक्ति का निजी मामला या सोच है। अगर कोई 'गे' है तो आप उसे कैसे गलत/सही ठहरा सकते है। जबकि 'गे' होना उसका निजी कारण है। आपने जो पिक्चर लगाई है उसी का एक्जामपल देके मै अपना प्वाइंट रखना चाहती हूं।

रिश्तों के बारे में मैं कोई ज्ञानी नहीं। लेकिन इतना तो जानती हूं कि रिश्ता शब्द ही बेहद निजी है।
इन तस्वीरों को देखकर आपको ज़रूर कुछ अलग लगा तभी आपने इन्हें यहां जगह दी। मुझे भी ये दोनों तस्वीरें चौंकाती हैं। क्योंकि ये दोनों ही भाव मेरे लिए सही नहीं। ये मेरे निजी ख्याल हैं ।
लेकिन क्या सही है और क्या गलत इसका फैसला हम और आप नहीं कर सकते क्योंकि ये रिश्तों की बात है।
रिश्ते यानी दृश्टिकोण, जो हर इंसान के लिए अलग अलग है। ये तस्वीरे आपको या मुझे तकलीफ दे सकती हैं। लेकिन क्या वाकयी ये तकलीफदेह हैं? मुझे आपत्ति तब लगी जब मैने तकलीफदेह शब्द पढ़ा। इससे लगता है कि आप लोगों से पूछ रहे हैं कि आपको कौन सा रिश्ता ज्यादा तकलीफदेह लगता है। पहला या दूसरा। क्योंकि ज़रूरी नहीं ये तस्वीरें सभी लोगों को तकलीफ देने वाली ही लगे।

मेरी प्रति-प्रतिक्रिया

शैली जी, यहां रिश्तों की निजता पर कोई शक या सवाल नहीं है। मुद्दा है कि निजी रिश्तों का एक आयाम दूसरे पहलू में तकलीफदेह साबित हो सकता है। ऐसे रिश्तों से जिनको तकलीफ़ पहुंचती या पहुंच सकती है वो भी निजी रिश्ते या रिश्तेदार ही होते हैं। प्वाईंट टू। जब निजी रिश्ता निजी ना रह कर सार्वजनिक तौर पर सामने आ जाए तो कई और सवाल उठ खड़े होते हैं। हम मोरल पुलिसिंग नहीं कर सकते। लेकिन आवाज़ें तो उठती हैं... 'धर्मयुद्ध छेड़ शुचिता' कायम करने के लिए नही तो कम से कम ऐसे रिश्तों को समझने की कोशिश में ही सही।

मेरे ख्याल से रिश्तों का सही और ग़लत होना कथित सिद्धांतों औरआदर्शों से नहीं... बल्कि इससे तय होनी चाहिए कि इसका व्यवहारिकता पर क्या असर पड़ता है। किसी को तकलीफ होती है या नहीं। जिनको तकलीफ नहीं होती वो चाहे बेशक जितने और जैसे भी रिश्ते जीएं किसी को एतराज़ नहीं होगा। लेकिन जिनको तकलीफ होती है वो तो भेद करेंगे ही। विचारेंगे ही। हम तो यहां बस नज़रियों का आदान प्रदान कर रहे हैं। वैसे आपने ठीक कहा कि संस्कार और पलाव-बढ़ाव के माहौल के हिसाब से रिश्तों के आयाम तय होते हैं। रिश्तों के बीच में हम टांग अड़ाने वाले कौन।

शुक्रिया
उमाशंकर सिंह

क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये!

इंसानी रिश्तों की संभावनाएं अनंत हैं और उनमें छिपी आशंकाएं भी। ये कई तरह से और कई रुपों में हमारे आसपास मौजूद रहती हैं। कई बार जानकारी में तो कई बार अनजाने में ही सही। कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो उसे जीने वालों को तो खुशी देते हैं लेकिन उनसे जुड़े दूसरों को तकलीफ। बनते, बिगड़ते, टूटते और फिर बनते रिश्तों के बीच ज़िंदगी जारी रहती है।

इन दो तस्वीरों को मेरे एक दोस्त ने ईमेल के ज़रिए भेजा है। इस प्रतीकात्मक तस्वीरों को आप भी देखिए और बताईये कि इसमें ज़्यादा तकलीफ़देह कौन-सी होगी! या ये भी... कि दोनों ही तस्वीरें स्वाभाविक हैं...तकलीफदेह नहीं!

Wednesday, September 12, 2007

एक तस्वीर... और सब कुछ साफ साफ!

जितना 'इनडीसीप्लीन वे' में सोचोगे... उतनी ही क्रिएटीविटी आएगी। विज्ञापन के विशेषज्ञ अक्सर ऐसा सिद्धांत बताते हैं। उनका मतलब होता है लीक से हट कर... एक रास्ते पर सरपट भागते हुए नहीं... दिमाग के बंद कोनों का इस्तेमाल कर... लेकिन बेतरतीबी से नहीं...तरतीब से...एक संदेश के साथ! बेहतरीन माने जाने वाले इन विज्ञापनों को शायद इसी तरह बनाया गया है!


































यहां किसी ब्रांड का प्रचार नहीं किया गया है। बल्कि इस विधा को देखने-समझने की कोशिश की गई है। उम्मीद है आपको भी अच्छा लगा होगा। शुक्रिया

हल्की होती राजनीतिक रिपोर्टिंग...

अमर सिंह को कई लोग हल्के व्यक्तित्व का मालिक मानते हैं। मैं भी उसी इंप्रेशन में रहता रहा हूं। उनकी कई बातें ऐसा करने को पत्रकारों को बाध्य करती हैं। लेकिन कुछ दिनों पहले उनसे पार्लियामेंट में कुछ पत्रकारों ने उनसे एक सवाल किया। संदर्भ था न्यूक्लियर डील को लेकर लेफ्ट फ्रंट का बयान कि यूपीए सरकार के साथ उनका हनीमून खत्म हो गया है और किसी भी वक्त तलाक हो सकता है। पूछा गया कि 'ऐसी बातें कही जा रहीं हैं...क्या मतलब निकाला जाए।' अमर सिंह ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया... 'ये गंभीर राजनीतिक मामला है। इसे लेकर शादी...तलाक...हनीमून जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।' फिर उन्होने अपना जवाब दिया। बेशक अपनी राजनीतिक हित-साधना के हिसाब से ही दिया हो।

ऐसा नहीं है इस वाकये के बाद अमर सिंह मेरे लिए महापुरुष हो गए हों। पर कई बार आप अपने छोटे से भी सीखते हो। पर हज़ारों ऐसे होते हैं जो पूर्वजों से भी नहीं सीखते। रातों रात ना सही... अनुभवों से सीखना तो सीख ही लेनी चाहिए।

इतनी बड़ी भूमिका मैंने इसलिए बांधी क्योंकि 11 सितंबर 2007 को भी कुछ ऐसा ही हुआ। जवाब देने वालों की तरफ से नहीं। सवाल पूछने वालों की तरफ से। शेरों वाली कुर्सी पर बैठने वाले बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे कीचड़ में कमल तलाशते दिल्ली में थे। बीजेपी नेताओं को मनाने। क्यों? क्योंकि प्रतिभा पाटिल यानि एक मराठी के राष्ट्रपति बनाने को लेकर शिवसेना ने बीजेपी-एनडीए की उल्टी लाईन ले ली थी। पाटिल यूपीए की उम्मीदवार थीं... फिर भी शिवसेना ने उनको सपोर्ट किया। वो जीत गईं...बिना शिवसैनिकों के भी जीत जातीं। लेकिन प्रतिभा पाटिल की जीत ने लगता है शिवसैनिकों का गर्व से सिर उतना उंचा नहीं किया। इसलिए वो मराठा-प्रतिष्ठा का प्रश्न भुला कर फिर हिन्दी-भाषी-प्रमुख-हिन्दुओं की पार्टी बीजेपी की गोद में आ बैठे हैं। बिना लाज शरम के दिल्ली तक आए। जिस आडवाणी को अनसुना कर गए थे उनकी चौखट तक गए। सब कुछ गुडी-गुडी नोट पर हुआ।

फिर प्रेस कांफ्रेंस की बारी। पूरी दिल्ली की मीडिया। एक से एक धुरंधर पत्रकार। टीवी और प्रिंट के भी। सवाल जवाब का दौर। कई अच्छे सवाल भी। पर जिस एक तरह के सवाल ने डाॅमिनेट किया वो रहा... 'आपका और बीजेपी का तो तलाक होने वाला था, फिर अचानक आप लोग हनीमून पर कैसे जा रहे हैं?' जवाब गोपीनाथ मुंडे ने दिया... 'बच्चों ने मना किया इस उम्र में तलाक लेने को...शादी को बीस साल हो गए हैं सो साथ ही रहना है...।' ऐसे ही कई और सवाल पूछे गए। उद्धव औऱ गोपीनाथ हंस कर टालते-जवाब देते गए। कोई गहराई हो सवाल में तभी तो सोच कर बोलें। रटते रहे कि गिल-शिकवे दूर हो गए हैं। अब शिवसेना बीजेपी के साथ रहेगी। एनडीए के नेता को अपना नेता मानेगी।

बयान आधारित इस बात स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है। पर दिक्कत ये है कि राजनीतिक अवसरवाद का नमूना पेश करने वाली शिवसेना से ऐसा सवाल पूछने वाले कम ही थे...जिससे उद्धव या मुंडे को जवाब देने में परेशानी हो। पेशानी पर बल पड़े। हल्के सवालों को वे और भी हल्के में टालते गए। सामने बैठी पत्रकारों की टोली को लाफ्टर चैलेंज का आडियेंस मान हंसाते गए। जिनके भी सवाल पर वे हंसे और हंसाए वे अपने को धन्य समझते रहे। राजनीतिक रिपोर्टिंग तलाक और हनीमून जैसे शब्दों के सहारे ख़बर ढूंढती रही। कुछ सवाल और भी रहे। सीटों का बंटवारा क्या होगा। सीएम कौन बनेगा। अरे जैसा मुफीद लगेगा कर लेंगे। पूछना क्या। आख़िर साथ साथ रहना है।

पर कुछेक पत्रकारों ने जता दिया कि वे इन नेताओं के साथ मसखराबाज़ी करने नहीं आए हैं। एक ने पूछा... 'क्या आपलोग इस डर से साथ आए हैं क्योंकि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने श्रीकृष्ण कमीशन की रिपोर्ट पर अमल का संकेत दिया है?' जवाब गोलमोल रहा। एक औऱ सवाल... 'राष्ट्रपति चुनाव के समय आपने मराठी प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए बीजेपी से किनारा कर लिया...अब चुनावों की बारी आयी तो आपको लग रहा है बीजेपी के बिना आपकी कुर्सी नहीं बन सकती...तो आप फिर साथ आ गए हैं...क्या भविष्य में मराठी प्रतिष्ठा के किसी और सवाल पर आप बीजेपी से दुबारा तो नहीं कट लेंगे।' जवाब... 'जो हो गया हो गया... हम साथ साथ... 20 साल से...और अब और मज़बूती से रहेंगे।'

कहते हैं कि ख़बर मौन से निकाली जाती है। जो बोल कर बतायी जाए और जो सुनी-सुनाई जाए वो ज़्यादातर प्रपोगैंडा होती हैं। लेकिन मौजूदा माहौल में मौन को तोड़ ख़बर निकालने वाले सवाल कम ही सुनाई पड़ते हैं। पूछे भी जाते हैं तो जवाब मौन में दबा दिए जाते हैं। ज़्यादातर तो प्रपोगैंडा के आजू-बाजू ही घूमते दिखते हैं। वही संदेश जाता है जो राजनीतिक पार्टियां कहना और फैलाना चाहती हैं। न्यूज़ रूम और एडिटर की भूमिका अगर बहुत इंवोल्वमेंट वाला ना हो तो ज़्यादातर राजनीतिक ख़बरों में चकल्लस ही नज़र आता है। दरअसल हर तरफ हल्कापन आ रहा है। हम सभी शिकार हो रहे हैं। इसलिए कई बार अमर सिंह, अपने नाटकीय अंदाज़ में भी, कथनी में सही नज़र आने लगे हैं। सवाल पूछने वालों से ज़्यादा भारी नज़र आने लगे हैं।

(मैंने अपने इस अनुभव में उन राजनीतिक संवाददाताओं-संपादकों पर टिप्पणी नहीं की है जिन्होंने समय समय पर शासन-सत्ता को चुनौती दी है... और राजनीतिक अवसरवादिता को आईना दिखाया है और आज भी दिखा रहे हैं। शुक्रिया)

Tuesday, September 11, 2007

विज्ञापन की दुनिया के कुछ बेहतरीन नमूने!

विज्ञापन की दुनिया काफी दिलचस्प है। कम शब्दों में बहुत कुछ कहना होता या फिर सिर्फ एक तस्वीर के ज़रिए। पेश है विज्ञापन की दुनिया के कुछ ऐसे नमूने जो मेल के ज़रिए एक-दूसरे तक पहुंच रहे हैं।











हो सकता है कि आपमें से कईयों की निगाह इन पर पड़ी हो। लेकिन बाकी भी देखें कि किस तरह के विज्ञापनों को बेहतरीन माना जाता है। कुछ और ऐसे ही विज्ञापन अगली बार...


Wednesday, September 5, 2007

कृष्ण ने किया तो रासलीला, बाक़ी का कैरेक्टर ढ़ीला!

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समय में बेहतरीन काम किए। मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाई। कई और राक्षसों का खात्मा किया। प्रजा को संरक्षण दिया। हाई स्टैंडर सेट किए। इसलिए श्रीकृष्ण को भगवान मानने वालों को मेरा सलाम है। आख़िर उन्होने ने ही कर्ण की रथ के फंसे पहिए के वक्त मौक़ा निकलवाया। अर्जुन से तीर चलवाया। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घेर कर मारने की रणनीति समझायी। अश्वत्थामा के मरने की अफवाह फैला द्रोणाचार्य को निस्तेज किया। शिखंडी को आगे कर पितामह को ढ़ेर करवाया। पांडवों को जिताया। कौरवों को हराया। अगर वो अपना पाॅलिटिकली करेक्ट रोल न निभाते तो हो सकता है कि युद्ध की शक्ल कुछ और होती और महाभारत के बाद का भारत कुछ और। ये अलग बात है कि हज़ारों साल पहले पांडवों की जीत के बाद भी आज कौरवों का ही राज है। नुक्कड़ों...मोहल्लों में द्रौपदी का चीरहरण आज भी बदस्तूर जारी है। पर आज पांडव कहीं नज़र नहीं आते। या अगर वो हैं तो उनको आज के हालात नज़र नहीं आते।

हज़ारों साल पहले पांडव पांच थे। आबादी तेज़ी से बढ़ी है...ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में। पांडवों बाद की उनकी पुश्तों ने एहतियात बरती हो तो भी चलिए... कम से कम उनके पुश्तों की संख्या 50 हज़ार तो होती...पांच करोड़ ना सही। पर आज तो 50 पांडव भी नज़र नहीं आते। फिर कृष्ण जी ने कैसे लोगों को शिक्षा दी? किन लोगों को घर्म के लिए लड़ना सिखाया? किनको जिताया? कहां गए धर्म की हानि के समय उसकी रक्षा के लिए पैदा होने का वादा करने वाले धर्मराज? ऐसा नहीं है कि मैं श्रीकृष्ण के अस्तित्व और उनके किए पर सवाल उठा रहा हूं। ऐसा करुं तो उनको मानने वाले मुझे पूतना के पास भेज देंगे। मैं तो सिर्फ आज की तारीख में उनको देखने की कोशिश कर रहा हूं। भगवान को याद कर रहा हूं। अपने आसपास उनको ढूंढ रहा हूं।

निराश होने की ज़रुरत नहीं। अधर्म पर धर्म की विजय के कर्ताधर्ता के रुप में ना सही, पर व्यक्तित्व के कई पहलुओं में वो आज भी नज़र आते हैं। जैसे कि चुरा कर मलाई खाने वाले आज भी हैं। औऱ वे अकेले नहीं हैं। करोड़ों की तादाद में हैं। प्राईवेट फार्म से लेकर सरकारी दफ्तर तक में हैं। टेबल के नीचे से मलाई खाते हैं। जब मिल जाता है तो अपने बाल-गोपाल में बांटना नहीं भूलते। ऊपर से नीचे तक 'कट' देते हैं। क्या मजाल कि आप उन पर सवाल उठा दें। अशोक मल्होत्रा जैसे जो पकड़े जाने के बाद कहते हैं...मैं नहीं माखन खायो... । कृष्ण दफ्तरों में भी होते हैं। किसको कैसे लंगड़ी लगानी है...किसको कैसे आगे बढ़ाना है...किसको प्रमोशन देना है किसको डिमोट करना है इस रोल को निभाने वाले कृष्ण। अपने अपने धर्मयुद्ध में लिप्त।

आज की चीरहरित होती स्त्रियों की साड़ी में बेशक श्रीकृष्ण ना समाएं। ना ही उसकी साड़ी को हज़ारों मीटर लंबी कर दें। पर गोपियों के साथ रासलीला की उनकी तरह मंशा पालने वालों की तादाद आज लाखों में है। करोड़ों में हैं। आज के कृष्ण नदी किनारे नहीं... स्वीमिंग पूल के आसपास होने की कोशिश करते हैं। या कॅालेज गेट और गर्ल्स स्कूल के आसपास की चाय की दुकानों पर होते हैं। या फिर बड़े बड़े मॅाल में खरीददारी में जुटी लड़कियों के पास मंडराते। बसों में महिलाओं की मज़बूरी की भीड़ के बीच भी उन्हें रासलीला करने की कोशिश करते हैं। ओछी हरकत करना नहीं भूलते। जिनको वे गोपियां मान लेते हैं वे अगर सचेत ना रहें तो उनके कपड़े उतार वो वृक्ष की डाल पर नहीं... अपने घर ही ले जाएं।

ग़रीब दोस्त सुदामा की झेंप मिटाने वाला कृष्ण भी आज कहीं नज़र नहीं आता। सुदामा कांख में चावल दबाए खड़ा रह जाता हो... कृष्ण को आॅफर नहीं कर पाता हो... पर उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। वैसे आज के कई सुदामा स्मार्ट हो गए हैं। कृष्ण बेशक मक्खन के दीवाने रहें हों... पर उन्होंने खुद कभी भैंस को दूहा हो ऐसी जानकारी नहीं मिलती। पर आज तो कृष्ण वही बनते हैं तो देश को दूह सकें। व्यवस्था को निचोड़ सकें।

आज पुराने कृष्ण की पूजा होती है। होनी चाहिए। मलाई खाने और गोपियों के साथ उनकी क्रीड़ा रासलीला है। लेकिन बाकी वही करते हैं तो कहते हैं कि कैरेक्टर ढीला है। ये क्या बात हुई! ज़माना बदल गया है। और बदले हुए ज़माने के ये भी तो पूजनीय हैं।