Wednesday, December 26, 2007

बंद करें मोदी को गलियाना!

सुनते सुनते कान पक गए... आंख फूटने को आयी। जिसे देखो वही कलम घसीट दे रहा है। मोदी ये... मोदी वो...। अरे भई लिख देने भर से क्रांति हो जाती तो ऐसे कई हैं जो हर तीन-चार घंटे में एक कम से कम एक क्रांति तो कर ही देते। पर वो कोशिश कर देख चुके। कई एंगल दे कर देख चुके। ऐसा कर अच्छा किया। अपने को अभिव्यक्त कर जनमानस को जगाने की कोशिश करनी चाहिए। पर जब बहुमत नहीं माना तो भाई अब हम और आप भी स्वीकार लें ना कि मोदी जीत गए। क़ूवत है तो हम संविधान बदलने की कोशिश करें। मोदी को कानून के शिकंजे में लाने का अभियान चलाएं। नहीं कर सकते तो अब अपनी कुंठा से पार पा लें। जिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी का विरोध विचारधारा के स्तर पर किया... उन्होने ने भी अब उनकी चुनावी जीत को स्वीकार लिया है। हालांकि वे अपने स्तर पर मोदी-विरोध जारी रखेगें... लेकिन कम से कम उस बचकाने-तुलनात्मक अध्ययन के तौर पर तो नहीं जैसा कि हम में से कई करने में जुटे हैं। तथ्य आधारित विरोध होना चाहिए... सिर्फ शब्दाडंबर भरे विरोध से काम नहीं चला है। नहीं चलेगा।

ऐसे कईयों को देख चुका हूं जो मुसलमान के घर का पानी पीना नहीं पसंद करते लेकिन जब लिखने-बोलने बैठते हैं तो सांप्रदायिक सौहार्द की मोतियां बिछा देते हैं। इनमें कुछ नेता हैं तो कुछ लिखाड़ भी। उनके शब्दों का खोखलापन हम और आप पकड़ सकते हैं। मुझे लगता है कि हाथ में कंप्यूटर या कलम और ठीक-ठाक फुर्सत भर होने से ज़रुरी नहीं कि अच्छा लिख भी लिया जाए। उदाहरणों, प्रतीकों, उपमाओं के ज़रिए बात करने की बजाए हमें सीधी बात करनी चाहिए। मोदी अगर खोटा सिक्का है तो ये सिक्का अगली बार नहीं चलेगा। लेकिन अगर संवैधानिक कसौटी ऐसी हो कि जिसे ऐंड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर 'मौत का सौदागर' साबित करने पर तुला जाए और वो फिर भी मुंह चिढ़ा जाए तो कम से कम अपनी इज्ज़त बचाने के लिए विरोध का दायरा बड़ा कर दिया जाना चाहिए।

सीधा सा मतलब है। अब मोदी के खिलाफ नहीं... देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ लिखिए। अगर आपको लगता है कि तमाम कारगुज़ारियां के बाद भी मोदी कैसे जीत गए तो इसका दोष यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दीजिए। उसमें वोट के साथ भावनाओं को कैसे हिस्सेदारी दी जाए इसका तरीक़ा सुझाइए। मोदी को गलिया देना आसान है। पर ऐसे शख्स को गद्दी पर नहीं देखना चाहते हैं तो हम सबको लेखनी में और क़ूवत पालनी होगी। और ये क़ूवत में नहीं पाल सकते तो छोड़ देना चाहिए।

6 comments:

परमजीत बाली said...

विचारणीय लेख लिखा है।

Madhukar said...

main aap se poori tarah se sahmat hoon Uma Shankar Ji. Aajkal ek faishion sa ban gaya hai ki yen ken prakaren Modi ko gariyao aur tathakathit secular shreni mein khade ho jaaye. Dar Asal Aise log ek Aadambari secular haote hain taaki sanatan sankriti ki dhur virodhi english journalism ke talk shows mein, yaa kisi nautanki chhaap bahason par aadharit karykramo mein shirkat karte nazar aayen. Teesta Shitalvaad Aur un jaisi anya sama sudhrkon ka dil kashmiri panditon ki durdasha par nahi pighalta, unhe keval aur keval sote jaagte Guarat Aur Modi ka hI Bhoot nazar Aata hai. Desh ke kisi anya kaone mein kisi anya jaati yaa samoradaay par haone vaale atyaachaaron par unka dil nahi pighalta. Media ka ek varga to haath dho kar hI Modi ke pIchhe pad gaya hai. Udhar Modi abhi shapth bhi nahi le paaye the ki Breaking News aa rashi thi ki Modi ke rajya mein Paadri ki ungliyaaM kaat li gayeen. Dar Asal Ab aisi ptrakarita par krodh nahin aata balki inki maansik daridrata par daya aati hai. Inka dil har roz J&K mein marne vaale javano aur officers ke liye nahi rota lekin Gujarat mein agar ek mazahab vishesh ko funsi bhi nikal aaye to hungama machate hain. Kabhi ye log kya Sabarmati Express ke S-6 ke un shahid yaatriyon ke ghar walon ka haal jaanane ko gaye ki unke bachche kin haalato mein ji rahe hain....shaayad nahim kyaoki shayad bahusankhyak ka dard dikha kar in logaom par kahin saapradayikta ka daag na laga jaaye......taazzub hai 1984 hazaaron sikhon ko marvaa dene vaale aaj secular hone ka daava karte hain.....desh ko sampraday ke naam par vibhaajan ke liye taiyar hone wale aaj secular hone ka daava karte hain.......

अजय रोहिला said...

ये हुई ना बात। लेकिन... लेखनी छोड़ने की बात कितने अपनाऐगें... इस पर मुझे घोर आशंका है।

संजय बेंगाणी said...

कोशिश करें, शायद मोदी को हरा पाएं.

sumansourabh said...

umashankar ji aap sach kahate hia log kud ke life me kitne neeche hai aur samaj ko aavsarwadi kalam se thik karne ka theka le lete hai.

संजय तिवारी said...

संवैधानिक व्यवस्था वाली बात अच्छी है.