Thursday, September 20, 2007

छक्कों के 'युवराज' और 'छक्कों के बादशाह' में फ़र्क है!

जिस समय टीवी पर पूरा क्रिकेट जगत युवराज के छक्कों की बरसात देख रहा था, उसी बीच कुछ दूसरे तरह के 'छक्कों' की ख़बर भी कई चैनलों पर आ रही थी। एक का खेल नशा दे गया तो दूसरे के 'खेल' ने घिन पैदा की है।

पांच गेंद में 5 छक्के खाए तो छ: गेंद में 6 छक्के जड़ दिए! वाकई में युवराज सिंह 20-20 क्रिकेट में छक्कों के युवराज साबित हुए हैं। अपने बूते इंडिया को मैच जिता दिया। इंग्लैंड से लगान वसूल लिया।

दूसरी ख़बर दिल्ली पुलिस से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस में भर्ती होने आए जवानों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के आईपी कॅालेज की लड़कियों को जम कर छेड़ा। वे तो बहाली के लिए आए थे। वर्दी में नहीं थे। पर थे छक्के ही। और जो वर्दी में तैनात थे... वे छक्कों से कम नहीं मालूम पड़ते। रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्होंने लड़कियों की शिकायत सुनने से इंकार कर दिया। टका सा जवाब दिया.. क्या हो रहा है हमें क्या पता। नतीज़तन लड़कियों को अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ी। दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर को घेरना पड़ा। जूं फिर भी कान तक शायद ही रेंगी है। बताया जा रहा है कि तीन पुलिस वाले सस्पेंड किए गए हैं।

शायद किसी लड़की के साथ और बुरा हो जाता तब भी ये वर्दीधारी सस्पेंड ही होते। ड्यूटी पर कोताही मामले में कभी भी किसी को इससे कड़ी सज़ा की कोई फौरी व्यवस्था नहीं है। पब्लिक प्रेशर में बस सस्पेंड कर सकते हैं, सो कर दिया। जिसने भी अपनी कुर्सी पर दबाव महसूस कर सस्पेंसन को 'गो अहेड' कहा होगा... लगता है कि उसने युवराज से भी बड़ा छक्का जड़ मैदान मारने की कोशिश की है। वाकई में वो छक्कों का बादशाह ही होगा। जिनके नीचे काम करने वाले दिल्ली पुलिस के जवान अपनी जवानी ग़लत वजहों से तो दिखा जाते हैं और ज़िम्मेदारी के वक्त चूड़ियां पहने नज़र आते हैं। पर अगर 'छक्कों के इस बादशाह' को दिल्ली की जनता का, ख़ास तौर पर असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं का दिल जीतना है तो पीड़ित लड़कियों की पूरी बात सुननी होगी... इंसाफ करना होगा।

जल्दी ही दिखाउंगा कि किस तरह दिल्ली पुलिस अपने विज्ञापन में आम शहरी की मर्दानगी को ललकारती है... पर जब खुद की बारी आती है तो चूड़ी पहने नज़र आती है।

3 comments:

अनिल रघुराज said...

वैसे भी पुलिस कुछ करने के लिए कहां होती है। वह तो ऐसा कुत्ता है जो कमजोर असहाय लोगों को काटती है और ताकतवर के पीछे दुम हिलाती है।

Sanjeet Tripathi said...

पुलिस्………यह सुनते ही आम आदमी अपना दर्द भी भूलकर अपने काम में लग जाना पसंद करता है क्योंकि वह जानता है कि पुलिस के पास जाने से दर्द कम होने की बजाय और बढ़ जाएगा!!

है किसलिए यह पुलिस आखिर!

deepanjali said...

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.