Saturday, November 10, 2007

खामोशी... तूफ़ान के पहले या बाद की?

(पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर मेरा ये आलेख कल यानी ९ नवम्बर के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. इसे मैं यहाँ अपने ब्लोगर साथियों के लिए पेश कर रहा हूँ)

ना तो पत्थर चल रहे हैं... ना ही टायर जलाए जा रहे हैं. ना ही पुलिस घेरे को तोड़ने की कोशिश में लाठी खाता... आंसूगैस में आँखें जलाता जनसैलाब ही. सड़कों पर लोग हैं... पर अपने अपने काम से. कुछ इलाके को छोड़ दें तो... सुबह ज़िंदगी की शुरुआत वैसी ही हो रही है जैसे पहले होती थी. शाम को लोग अपने घरों को वैसे ही लौट रहें हैं. लाहौर के फ़ूड स्ट्रीट में खाने के शौकीनों की भीड़ भी कम नही हुई है. मुल्क में इमरजेंसी लगने के बाद आम ज़िंदगी में सतही तौर पर कुछ भी बदलाव नज़र नही आता. लेकिन इस सच को पाकिस्तान का पूरा सच मन लेना यहाँ की समस्या के बहुआयामी चरित्र से मुंह चुराना होगा. ग्वालमनडी स्ट्रीट में अपनी पत्नी और ४ बच्चों के साथ खाना खाने आए ४५ साल के मोहम्मद शफीक साफ करते हैं कि हैं कि हालात कोई नए नहीं बने हैं. सियासी मुश्किलातें पहले भी आती रहीं हैं इसलिए आदत सी पड़ गई है. फिर अपने शौक-मौज को कब तक दफ़न करते रहें!

दुनिया भर के टीवी चैनलों पर आज कल पाकिस्तान की जो तस्वीरें दिखायी जा रही हैं... वो भी पाकिस्तान का सच है. लेकिन वो टुकडों में है. विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं...लेकिन छिटपुट तौर पर. वकीलों- जजों, एनजीओ-मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों पर कार्रवाई हो रही है. किसी की गिरफ्तारी होती है तो सीधी ख़बर आती है. यहाँ दिए जा रहे बयानों में इमरजेंसी से लड़ने की बात की जा रही है. लेकिन फिलहाल वो असर छोड़ पाती नज़र नही आ रहीं.

क्यों है ऐसा? वजह कई हैं. टीवी न्यूज़ चैनल बंद पड़े है. लोगों तक सीधी ख़बर नहीं पहुँच रही. अख़बार अगले दिन सुबह ही मिल पाता है. जानकारियाँ दूसरे देशों से होकर आ रहीं है. इसलिए छोटी-छोटी कोशिशें बड़े आन्दोलन का रूप नही ले पा रही. पंजाब यूनिवर्सिटी के एक छात्र की राय है कि जिया-उल-हक के वक्त से ही छात्र संघों को पनपने नही दिया गया. लिहाज़ा देश की सियासत तय करने में छात्र आन्दोलन की कभी कोई भूमिका बन ही नही पायी. मौजूदा वक्त में नौजवान भी खामोश हैं क्योकि उनका अपना कोई नेतृत्व नही है...और अगर छात्र-नौजवान उदासीन हों तो बड़े आन्दोलन की उम्मीद बेमानी है.

मुखालफत करने वाले वकीलों को बड़ी तादाद में अन्दर कर दिया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एनजीओ से जुडी कई हस्तियों को या तो जेल भेज दिया गया है या फिर उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया गया है. इनमें अस्मा जहाँगीर भी हैं और इस्लामाबाद बार असोसिएशन के प्रेसिडेंट एतेजाज़ अहसन भी. . किसी को लाहौर से अर्रेस्ट किया जाता है तो ३०० किलोमीटर दूर बहावलपुर जेल ले जाया जा रहा है. बहावलपुर से उठा कर फैसलाबाद. ऐसे में नेतृत्व और आक्रोश छितर से गए हैं. राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक शख्स... जो अपना नाम नही देना चाहते...कहते हैं कि जिस तरह से सारी बदोबस्ती की गयी है... तैयारी काफी पुरानी लगती है...हलक से आवाज़ निकालने का किसी को मौक़ा ही नही मिला.

दूसरी तरफ़, राजनीतिक दल अपनी साख खोये नही तो कम तो कर ही चुके हैं. नवाज़ शरीफ देश लौटने की लड़ाई में ही फँसे हैं. आवाम के सामने विकल्प ज़्यादा हैं नहीं. आठ साल बाद मुल्क लौटीं बेनजीर लोगों से लगातार अपील कर रहीं हैं कि सड़क पर उतारें. लेकिन उनकी बात असरदार साबित नही हो रही. उन पर ख़ुद जेन. मुशर्रफ से अंदरूनी तालमेल का आरोप लगा हुआ है. ओल्ड रावियन ऐसोसिअशन के नाविद बलोच का कहते हैं कि ऐसे में उनपर भरोसा करना मुश्किल है. १८ अक्टूबर की खूनी रैली से लोग अब तक उबर नहीं पाये है. नाविद आगे कहते हैं कि जेहन में सवाल है कि जान दे तो किसके लिए? उनके लिए जो सैनिक शासन ख़त्म करने के नाम पर उससे ही समझौता कर बैठे हैं?

हालांकि बेनजीर ने इमरजेंसी को मार्शल ला जैसा करार दिया है. वो मुशर्रफ के इस क़दम के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहीं हैं. लेकिन वो आवाम के कानों में गूँज नही पा रही. लाहौर के एक कारोबारी कहते हैं कि जिनको सत्ता चाहिए वो बैठ कर तक़रीरें करे तो आवाम सड़क पर जान क्यों लड़ाए! बेनजीर को अपनी सुरक्षा का भी खतरा है. इसलिए उन्हें सड़क पर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा. उन्होंने १३ नवम्बर को लाहौर से इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च और करने और रोके जाने पर धरना देने का फ़ैसला किया है. पीपीपी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी तो हो रही है. लेकिन बकौल एक राजनीतिक कार्यकर्ता... उनमें चिंगारी जैसी बात नज़र नहीं आ रही आ रही.

यहाँ के अखबारों में रूलिंग पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट शुजात हुसैन का उम्मीद से भरा बयान है कि इमरजेंसी ३ हफ्ते में हट जायेगी. जेन. मुशर्रफ भी साफ कर रहे हैं कि इमरजेंसी लंबे टाइम के लिए नही है...लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से पहले नहीं हट सकता जो उनके प्रेसिडेंट होने के वैधानिकता पर आनी है. इसमें ६ महीने से साल भर तक का समय लग सकता है. ज़ाहिर है... सभी अपने वक्त के हिसाब से चल रहे हैं.

वैसे ऊम्मीदें टूटी नहीं हैं. छोटी-छोटी मीटिंग्स हो रहीं हैं. बुधवार को लाहौर में एडिटर स्तर के पत्रकारों की मीटिंग हुई. मीडिया पर कई तरह की पाबंदी है. आवाज़ दबाने की कोशिश की कोशिश के खिलाफ वर्किंग जर्नलिस्ट कमर कस रहे है. चैनल बंद रहने की हालत में बड़े-बड़े स्पीकर के ज़रिये ख़बर बांचने की योजना बन रही है. लाहौर प्रेस क्लब पर टीवी स्क्रीन लगाने की भी बात हो रही है. अखबार मालिकों को अपने व्यापारिक हित से ऊपर उठ कर आन्दोलन में साथ देने के लिए मनाया जा रहा है. जेल और पुलिस की मार के लिए कुछ पत्रकार ख़ुद को मानसिक तौर पर तैयार कर रहें हैं. पाकिस्तान के वरिष्ट पत्रकार और साउथ एशिया फ्री मीडिया असोसिएशन के प्रेसिडेंट इम्तिआज़ आलम को इमरजेंसी के पहले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया था. लाहौर के चार थानों में 48 घंटे तक बंद रखने के बाद रिहा कर दिया गया.

इम्तिआज़ आलम, डेली टाइम्स के एडिटर नजम सेठी और कॉलम्युनिस्ट अब्दुल कादिर हसन समेत इस मीटिंग में शामिल सभी जर्नलिस्ट्स को दुनिया के दूसरे देशों की मीडिया से साथ मिलने की उम्मीद है. अलग अलग देशों के पत्रकारों को अपने देशों में जुलूस निकलने के लिए ख़त लिखे जा रहे है. इमरजेंसी की ख़बरों को फोकस कर अभी तक दुनिया की मीडिया ने जो साथ दिया है... उसकी सराहना की जा रही है. अपने मुल्क में अपनी बात नही पहुंचा पाने की इनकी मजबूरी को इससे राहत मिल रही है. पंजाब यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष आरिफ हमीद चौधरी को लगता है कि आखिरकार दुनिया का दबाव काम आयेगा. लेकिन वे यहाँ के पत्रकारों को भी सड़क पर उतरने की ज़रूरत पर ज़ोर डाल रहे हैं.

सबों को पता है कि ये लड़ाई एक या दो हफ्तों कि नहीं है. इमरजेंसी...मार्शल ला से पहले भी जूझना पडा है. इस बार भी लड़ाई लम्बी होने जा रही है. इसलिए आधी-अधूरी तैयारी जम्हूरियत लाने वाली साबित नही होगी.

2 comments:

आशीष said...

वाकई मैं आप एक सच्चे पत्रकार का फर्ज निभा रहे हैं...

Sanjeet Tripathi said...

हालात को बयां करती एक बढ़िया रपट!!

साधुवाद!!