Wednesday, October 31, 2007

एक मुल्क की शंका-आशंका

लाहौर की चिकनी सड़कों पर गाडियाँ सरपट दौड़ती जा रही हैं. कोई पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाहता. सभी आगे कि राह ढूंढते लगते हैं. शहर की अपनी रौनक है. लेकिन अजीब खामोशी साथ है. कराची-रावलपिंडी से धमाकों की ख़बर आती है. खामोशी और गहरी हो जाती है. यहाँ के न्यूज़ चैनल्स बताते है. हालत ठीक नहीं हैं. मीडिया मुखर हो रही है. पर उनकी अपनी सीमा है. वकीलों के आन्दोलन से आवाम को जो उम्मीद बंधी वो कायम है. बेनजीर के आने ने भी जोश भर दिया है. नवाज़ शरीफ आ पाएंगे या नहीं इस पर अटकलें चल रहीं हैं. कुछ जानकारों का मानना है कि वो आयेंगे और फौज ही है जो उन्हें आने देगी. नहीं ततो चुनाव में बेनजीर इतनी मज़बूत हो जायेंगी कि अ-राजनैतिक दखल-अंदाजों को बाद में मुश्किल होगी. ऐसी ताकतों को ये मुफीद बैठता है कि वोट पार्टियों में बंटती रहे. कोई एक मुख्तार न हो.

नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में अल-कायेदा आतंकवादियों के साथ छापामार किस्म की लड़ाई चल रही है. WorldPublicOpinion. ओआरजी ने एक सर्वे किया है और उसके मुताबिक ४४ फीसदी पाकिस्तानी चाहते हैं कि वहाँ पाकिस्तानी आर्मी को भेजा जाना चाहिए. हालांकि इस सर्वे का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा मालुम पड़ता है. शहरी इलाकों के सिर्फ़ ९०७ लोगों को इस में शामिल किया गया. खैर, हमारा मकसद सर्वे को सही या ग़लत ठहराना नहीं है. यहाँ के मूड को जानना है. पिछले पांच दिनों में जितने भी लोगों से जिस भी तरह की बात हुई है...उन सभी के मुताबिक यहाँ की आवाम अब पक चुकी है. वो अपनी चुनी हुई सरकार चाहती है.


सुबह यहाँ के एक न्यूज़ चैनल पर तक़रीर चल रही थी. भारतीय लोक-तंत्र की दुहाई दी जा रही थी. वहाँ के मज़बूत इलेक्शन कमीशन जैसी संस्था की यहाँ ज़रूरत महसूस की जा रही है. लेकिन तमाम बहस के बाद भी कोई ये बता सकने की हालत में नही...कि मुल्क किस दिशा में बढ़ रहा है.

(फोटो सौजन्य AFP)

3 comments:

आशीष said...

पाकिस्तान की सडकों पर ले जाने के लिए शुक्रिया

Sanjeet Tripathi said...

अपनी अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के बीच यह देखना सकून दे जाता है कि हमारी इन्ही व्यवस्थाओं की कहीं तारीफ़ हो रही है!!

जारी रखें भाई साहब!!

Udan Tashtari said...

जारी रहें, शुभकामनायें.