Thursday, September 13, 2007

क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये!

इंसानी रिश्तों की संभावनाएं अनंत हैं और उनमें छिपी आशंकाएं भी। ये कई तरह से और कई रुपों में हमारे आसपास मौजूद रहती हैं। कई बार जानकारी में तो कई बार अनजाने में ही सही। कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो उसे जीने वालों को तो खुशी देते हैं लेकिन उनसे जुड़े दूसरों को तकलीफ। बनते, बिगड़ते, टूटते और फिर बनते रिश्तों के बीच ज़िंदगी जारी रहती है।

इन दो तस्वीरों को मेरे एक दोस्त ने ईमेल के ज़रिए भेजा है। इस प्रतीकात्मक तस्वीरों को आप भी देखिए और बताईये कि इसमें ज़्यादा तकलीफ़देह कौन-सी होगी! या ये भी... कि दोनों ही तस्वीरें स्वाभाविक हैं...तकलीफदेह नहीं!

1 comment:

Arti said...

पत्रकारिता का क्षेत्र मेरे लिए अभी नया है और उससे भी ज्यादा नया है ऐसे लिखना,पर मन बहुत करता है इसलिए लिखने से खुद को रोक नहीं पाती।
तस्वीर तो तस्वीर हैं फिर भला उनको देखकर रिश्तों में क्यों उलझें....हां ये कैमरापर्सन मुझे बड़े तेज लगे जिन्होने सिर्फ तस्वीरों से आपको रिश्तों की बहस में उलझा दिया। खैर बात जब रिश्ते की चली है तो एक बात और ...रिश्ते मुझे हमेशा मैथ्स जैसे कठिन लगते हैं जो समझ में नहीं आते।
जिनको लोग कहते हैं कि ये रिश्ते हैं वो मुझे रिश्ते नहीं लगते और जो कहते है कि इनसे रश्ता नहीं है वो मुझे रिश्तेदार से लगते हैं।
कभी रिश्तेदार अन्जान लगते हैं तो कभी अन्जान रिश्तेदार लगते हैं....उलझ गए ना ..हो सकता है उलझ कर आप सुलझ भी गए हो पर मैं तो अभी उलझी हुई हूं।