Wednesday, July 11, 2007

आओ 'लाईन' मारते हैं...रंगत बदल बदल कर

ब्लू लाईन बसें इन दिनों सुर्खियों में हैं। दरअसल 1995 में दिल्ली की सड़कों पर रेड लाईन बसों का आतंक रहा। फिर दिल्ली सरकार ने एक अजीबोगरीब फैसले के तहत इन बसों की रंगत लाल से ब्लू करने का फ़रमान जारी कर दिया। बसों का रंग बदल देने मात्र से क्या बस आॅपरेटर-ड्राईवर अपनी रंगत बदल लेगें...ये सवाल मेरे दिमाग में उठे क़रीब एक युग होने को आया। इस पर जो कुछ लिखा वो 27 जनवरी 1996 को नवभारत टाईम्स में 'कांटे की बात' कालम में प्रकाशित हुआ। आपके सामने फिर पेश कर रहा हूं।

दो बसों में होड़ लगी थी। एक दूसरी को पछाड़ने की कोशिश में संकरी सड़क पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'

दूसरी ने पलट कर कहा, 'त्वचा का रंग नीला पड़ गया तो क्या हुआ। मन थोड़े ही नीला पड़ा है। बल्कि ये नीलापन तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमुच बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सीटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।'

लेकिन सुना है अब तुममें स्पीड कंट्रोलर नामक कोई यंत्र लगाया जा रहा है। अब तुम पहले की तरह अपना तेवर नहीं दिखा पाओगी।' 'अरे छोड़ो ये सब कहने की बातें हैं। मन को कौन बांध पाया है भला। मेरा ड्राईवर बड़ा होशियार है। दिपु (दिल्ली पुलिस) को देखते ही यंत्र का कनेक्शन कर देता है। और उसके गुज़रते ही हटा देता है। हमारे आपरेटर कुछ दिनों में कुछ ऐसा आविष्कार कर ही लेगें जिससे ये आटोमैटिक हो जाए। अर्थात जिप्सी को देखते ही 40 की स्पी़ड नहीं तो इस्केप वेलोसिटी! और फिर हमारे सभी आपरेटर प्रत्येक रेड लाईट एवं गोलचक्कर पर हर महीने 100 रुपये दक्षिणा क्यों देते हैं। सिर्फ इसलिए न कि मैं बेधड़ रेड लाईट जंप कर सकूं। अपने पायदानों पर भी सवारियों को यात्रा सुख दे सकूं। नियत गति से तेज़ चल सकूं। कहने का मतलब की राजधानी की सड़कों पर मनमानी कर सकूं।'

'लेकिन फिर से ऐसा करने से तो तुम ब्लू लाईन वालों को भी बदनाम कर दोगी।'...'तो ब्लू लाईन वाले भी कौन से दूध के धुले हैं। वे तो और भी ब्लू हैं। फ़र्क सिर्फ इतना है कि अख़बार वाले नाहक ही हमारे पीछे पड़ गए। शायद हमारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से जल गए और हमें बदनाम कर दिया। जबकि अन्य 'लाईनवाले' भी हम से किसी भी माने में कम नहीं हैं। अब देखो न, हम रेड लाईन वालों पर ही आरोप लगा कि हम लोगों की जान से खेलते हैं। बात थोड़ी बहुत सच भी हुई तो क्या। दूसरी प्राईवेट बसवालों ने तो महिलाओं की इज्ज़त से खेलना शुरु कर दिया... और तीन लगातार दिनों में तीन बलात्कार कर डाले (ये वारदात उन दिनों व्हाईट लाईन और चार्टर्ड बसों में हुईं थीं)हम लोगों को कम से कम इज्ज़त की मौत तो देते हैं। और फिर बिजनेस में रिस्क कवर तो करना ही पड़ता है। हमने भी किया। इसी रिस्क कवर करने के क्रम में कुछ मानव रक्त बह गया जिसके कारण हमारी 'रेडनेस' को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। असल में हमारी तरफ से भी कुछ ग़लतियां हुईं। 'दिपु' की तरह इन अख़बार वालों को 'कुछ' देते रहते तो शायद इस बात को वे आगे तक नहीं बढ़ाते।'

'लेकिन हमने सुन रखा है कि इन्होने हर प्रकार की विसंगतियों को जनता के सामने लाने का ठेका लिया हुआ है। इसलिए कुछ भी आफर करते हुए डर लगता है। हालांकि मुलायम सिंह वाले प्रकरण से कुछ आस बंधी थी। लेकिन इन 'काम के लोगों' को पत्रकारिता जगत से परे मान लिया गया। उनकी जगह 'टुटपुंजिया लेखक' अपने को अधिक आदर्शवादी साबित करने में लग गया। हो सकता है कि इन लोगों को आपस में ना बनती हो। फिर दिल्ली पुलिस को उसके सजीले परिधानों से पहचान भी लें। लेकिन इन पत्रकारों को पहचानना आजकल ज़रा मुश्किल काम है। कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। जिसे देखो वही अपने को पत्रकार कहता फिर रहा है। ऐसे में सबों को खुश रखना अपने बूते की बात नहीं है। वो तो भला हो सरकार का जिसने हमें विकल्प सुझा दिया है। अब ब्लू रंग की आड़ में हम अपने 'लाल अस्तित्व' को क़ायम रख सकेंगे।'

मतलब वही हुआ जिसका डर था। अब ब्लू लाईन वालों पर भी पाबंदी की बात हो रही है। रेड लाईन ख़त्म कर ब्लू लाईन बनी। देखते हैं अब इन बसों को दिल्ली सरकार अब क्या रंगत देती है। किसी ना किसी रंग में ये 'लाईनें' चलती रहेंगी...मरेंगी नहीं... दिल्ली की जनता बेशक सड़कों पर मरती रहेंगी।

6 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

असल में बात केवल ड्राइवर-कंडक्टर तक सीमित नहीं है मित्र. अगर जांच कराई जाए तो आधी से अधिक बसें स्थानीय नेताओं की हैं और बाक़ी बची पुलिस वालों की. यह अलग बात है कि उनका रजिस्ट्रेशन किसी और के नाम से हो. जब तक यह फर्जी बैनामागिरी और उसका आतंक नहीं जाएगा तब तक कुछ होने वाला नहीं है.

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही उमा भाई!!

इष्ट देव जी आपका कथन सत्य है, करीब-करीब हर राज्य में यही आलम है। किस चीज और किस धंधे में दखल नही है इन नेताओं का सब जगह, बस-ट्रक, खान-खदान, ठेकेदारी-निर्माण कार्य!
एक कफ़न बेचना छोड़कर बाकी सब धंधे करते है यह छुटभैय्ये नेता!!

Neelima said...

लोकतंत्र ऎसे ही चलता है जी जहां जनता गलत को पहचान ले वहां रंग बदल दो जनता भुलावे में आ ही जाएगी कुछ समय के लिए तो बाकी का बाद में देखा जाएगा ! क्या करें हम लोकतंत्र के निवासी हैं ही इतने भले और भोले रंगो के बहकावे में आऎगे नहीं तो जाऎगे कहां

ravish said...

दीपु बूला क्या बात है। लाईन मारों भई। रंग बदला न रंगत। अच्छा लेख।

mamta said...

किसी ना किसी रंग में ये 'लाईनें' चलती रहेंगी...मरेंगी नहीं... दिल्ली की जनता बेशक सड़कों पर मरती रहेंगी।

सही और सटीक वर्णन ।

Pushpa Tripathi said...

Uma shankar ji,



sab rang badal badal kar apni apni dukaan chalane mein lage hue hain,janta ki parwaah kise hai?