Wednesday, July 18, 2007

क्या वाकई सारे मर्द एक जैसे होते हैं?

'मर्द पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आप तो जानते हैं। वो किस काम से कब कहां होते हैं। किनसे संबंध बनाते है। बीमारी लगाते हैं। फिर आप में फैलाते हैं। ख़ास तौर पर जब दारू पीकर आते हैं तो कंडोम लगाने का ख़्याल नहीं रहता है। आप कंडोम लगाने के लिए कहने से झिझकें नहीं। वो ना लाए तो आप ख़ुद कंडोम ख़रीदें।' - ये रेणुका चौधरी के बयान हैं। वो केन्द्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। उन्होने ये बातें बीते सोमवार को एड्स जागरुकता से जुड़े एक कार्यक्रम में कहीं।

रेणुका के इस बयान के कई पहलू हैं। ये अलग बात है कि मंगलवार को जब इस मसले पर मैंने उनसे बात की तो वो थोड़ी सी पलटती नज़र आयीं। कहा कि मैंने ऐसा देश के सारे मर्दों के लिए नहीं कहा है। ये नहीं कहा कि सारे मर्द भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं। मैंने ये सलाह सिर्फ उन महिलाओं को दी है जो अपने पति की ग़लत हरकतों की वजह से एड्स की शिकार हो गई हैं। रेणुका ने साथ में ये भी जोड़ा कि उनके ऐसा कहने से 'अगर किसी मर्द का दिल घबरा रहा है तो उसे अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए।'

मैंने उनके सोमवार के बयान के टुकड़े को पूरा सुना। एक परिदृश्य में वो घर से...पत्नी से...दूर जाकर काम करने वाले मर्दों की बात कर रही थीं। उनके 'दायें-बाएं' चले जाने की बात कर रही थीं जो एक हद तक सच है। पर व्यापक परिदृश्य में उनका इशारा उन सभी मर्दों की तरफ था तो पत्नी के साथ रहते हुए भी भरोसे के लायक काम नहीं करते। चाहे वो शहरी हो ग्रामीण। पढ़े लिखे हों या अनपढ़। वेलआफ हों या आर्थिक रुप से कमज़ोर।

उनके इस बयान के और भी कई आयाम हैं। इन पर विवाद भी है। पहला कि क्या रेणुका को इस तरह से पूरी मर्द प्रजाति पर सवाल उठाने का अधिकार है। नहीं कहने वालों का तर्क है कि सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। बहुत भरोसेवाले भी होते हैं जो अपनी पत्नी के साथ भरोसे का रिश्ता जीते हैं। इसलिए ये बयान 'राम' जैसे मर्दों को भी धिक्कारने जैसा है। सबको एक हल में जोतने जैसा है।

लेकिन रेणुका की बातों में सच्चाई देखने वालों की भी अपन दलीलें हैं। वे कहते हैं कि मर्दों ने अपनी प्राक़तिक रचना का इतना फ़ायदा उठाया है कि उसे जब भी जहां भी मौक़ा लगा है मुंह मारने से नहीं चूका है। कौमार्य रक्षा का बंधन मर्दों पर नहीं। पैर उनके भारी होते नहीं। सारे क़ायदे महिलाओं के लिए बने हैं। पुरुष तो कुलटा भी नहीं होते। शरीर या समाज के प्रति किसी जवाबदेही के आभाव ने पुरुषों को स्वच्छंदचारी बना दिया है। ऐसे में कुछ 'राम' भी होगे तो गिनते में नहीं आते।

एक और विचार है। वो ये कि रेणुका ने बात तो सही कही लेकिन ऐसा कहना नहीं चाहिए। वो इसलिए कि अगर एड्स पर काबू पाना है तो मर्दों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। उन्हें ग़ैरज़िम्मेदार कह ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं करा सकते। वो छिटक जाएगें। ऐसे में एड्स को लेकर सरकारी जागरुकता प्रोग्राम या नीति पर अमल मुश्किल होगा।

मैं यहां कोई ब्लागमत सर्वेक्षण नहीं करवा रहा। पर चाहता हूं कि आप भी सोचें और बताएं। कि क्या रेणुका ने जो कहा सही कहा। या ग़लत कहा। या उन्होंने सही बात कह कर ग़लती की है।

शुक्रिया

12 comments:

Neelima said...

रेणुका जी का उक्त बयान एक हद तक अतिव्यापकता के दोष से युक्त है! किंतु उनकी यह बात उस तबके पर बहुत हद तक लागू होती है जहां अशिक्षा और स्त्री की सम्मति का सम्मान नहीं होता है !ऎसे में स्त्री को अपने लिऎ" निर्णय लेने " की ऎवज में भयानक परिणाम भी भुगतने पडते हैं !मैं एक ऎसी सभ्य आधुनिका एवं अत्यंत सुशिक्षओइत महिला को जानती हूं जिनके पति पहले पति ऎयरफोर्स के बडे आफ्सर थे और जिनहोंने विवाह की पहली ही रात्रि को गर्भ-निरोधक का प्रयोग करने के अपनी पत्नी के आग्रह को बडी निर्ममता से टाल दिया था और विवाह के 14 साल बाद अपनी 13 साल की बच्ची को साथ लेकर वे तलाक के रास्ते को अपनाने का निर्णय ले सकी वही निर्णय जो वे विवाह की पहली ही रात को ही ले लेना चाहती थीं....

Neelima said...

रेणुका जी का उक्त बयान एक हद तक अतिव्यापकता के दोष से युक्त है! किंतु उनकी यह बात उस तबके पर बहुत हद तक लागू होती है जहां अशिक्षा और स्त्री की सम्मति का सम्मान नहीं होता है !ऎसे में स्त्री को अपने लिऎ" निर्णय लेने " की ऎवज में भयानक परिणाम भी भुगतने पडते हैं !मैं एक ऎसी सभ्य आधुनिका एवं अत्यंत सुशिक्षित महिला को जानती हूं जिनके पति पहले पति ऎयरफोर्स के बडे अफ्सर थे और जिनहोंने विवाह की पहली ही रात्रि को गर्भ-निरोधक का प्रयोग करने के अपनी पत्नी के आग्रह को बडी निर्ममता से टाल दिया था और विवाह के 14 साल बाद अपनी 13 साल की बच्ची को साथ लेकर वे तलाक के रास्ते को अपनाने का निर्णय ले सकी वही निर्णय जो वे विवाह की पहली ही रात को ही ले लेना चाहती थीं....

Sanjay Tiwari said...

मानों हमने ठान लिया है कि सड़क पर बेड बिछायेंगे और बिना चादर ओढें वहीं से बच्चे पैदा करेंगे. रेणुका चौधरी, सुजाता राव जैसी महिलाएं किसके इशारे पर क्या बोलती हैं, आप टीवी पत्रकार हैं ज्यादा बेहतर समझ सकते हैं.
एक खोजबीन इसी पर हो जाए कि क्या सचमुच एड्स उतना बड़ा खतरा है जितना बताया जा रहा है या खेल कुछ और है.

Isht Deo Sankrityaayan said...

वाह गुरू! राजेश जैन अपनी 'बर्ड हिट' के जरिये पुरुष विमर्श की शुरुआत भले न कर सके, पर आपने अपने ब्लोग से यह शुरुआत जरुर कर दी. ठीक बात है. इसकी जरुरत भी थी.

rachna said...

what she has said is 100 % correct
and what she meant was that for the health the woman should not depend on man because women suffers more than man
giving political colour to every thing will never let anyone make a move to uplift the society
for few people no problem is a problem because as long as they dont suffer from it they feel its all crap but yes we need to educate woman more so that they dont physically suffer and that is what renuka means

Anonymous said...

nahi. Lekin Renuka na to itni badi kad ki neta hain, na unki baat sansad ka banaya act, na hi supreme court ki sanvidhan peeth ka faisla aur na hi devtaon ki aakashwani. Phir itni pareshani kyun? Jis rishte ki woh baat kar rahi hain uski gehrai ya halkapan sirf dono - jo involved hain- wahi bata sakte hain aur uske mutabik bharosa ya shak kar sakte hain.

kads

mamta said...

रेणुका के बयान को गलत नही लेना चाहिऐ और किसी को आहत होने की भी जरूरत नही है।

pawan lalchand said...

renukaji ne bat sahi kahi hai lekin atisakiryta dikhakar kahi hai.. jiasa ki unka andaaz hai. lekin ADIS pahle to itna bhayanak nahi huva hai jitna ki renukaji or baki desh ke rene-renukayein pracharit kar rahi..
are yaaar inko har gali-mohalle me kough fanktein TB ke mariz nazar nahi aatein ki jab dekho jise dekho ADIS ke bhane apni dukan chamkane aa jatein ..desh mein salana 500 aadmi bhi ADIS se nahi marte TB se lankhon dum thod dete hai. sabko AIDS mein hi glamour nazar aata hai..

pawan lalchand said...

renukaji ne bat sahi kahi hai lekin atisakiryta dikhakar kahi hai.. jiasa ki unka andaaz hai. lekin ADIS pahle to itna bhayanak nahi huva hai jitna ki renukaji or baki desh ke rene-renukayein pracharit kar rahi..
are yaaar inko har gali-mohalle me kough fanktein TB ke mariz nazar nahi aatein ki jab dekho jise dekho ADIS ke bhane apni dukan chamkane aa jatein ..desh mein salana 500 aadmi bhi ADIS se nahi marte TB se lankhon dum thod dete hai. sabko AIDS mein hi glamour nazar aata hai..

Pushpa Tripathi said...

Uma shankar ji,

sabse pehle to main aapko dhanyawaad dena chahungi ki aapne is vishay ko apne blog par sthan diya nahi to kaun is tarah ke TABOO ISSUES ke baare mein bolna aur likhna chahta hai ,is tathakathit sabhya aur susanskrit samaj mein,ya alag baat hai ki social workers kuch zyada hi badnaam hain,unme bhi professional social workers jo har wakt HIV /AIDS ki hi baatein karte hain.ek din ek mahashay se prashansa mili thi--aap logon (social workers )ko to sapne mein bhi HIV /AIDS hi nazar aata hoga.

main kshma chahungi agar meri tippani aap logon ko aahat kare,choti umra ka khayal karke maaf kar dijiyega.

Neelima ji ,sabse pehle to aap is poore vishay ko ek tabke jahan ashiksha hai ,usse jodkar dekhti hain.aksar hum aisa isliye kah dete hain jisse hamare jaise so called educated log ek protection zone mein aa jayen.Mumbai mein AIDS patients ke saath kaam karne ke anubhav ke aadhar par ye kah rahi hoon.ek taraf aap ashikshit tabke ki baat kar rahi hain ,aur doosri taraf udaharan ek tathakathit abhijaat varg ka de rahi hain,ye apne aap mein ek virodhabhaas hai.

Sanjay Tiwari ji,JAISI MAHILAYEN ,likhkar aap kya kahna chahte hain?hum har wakt LABEL kyun dete rahte hain,shayad isse hamare EGO ko santushti milti hai.bahut saare researches ho chuke hain HIV /AIDS par wakt mile to padhen ya phir NACO ki website par jayen ,aur bhi kai sansthayen hain jinki website par pata chal jayega ki AIDS kitna kharnaak roop le chuka hai.aapko AIDS jaise gambhir vishay mein bhi khel dikhta hai,shayad hamare desh mein khelon ki kami ho gayi hai.

Rachna ji,I do agree to what you have said to a large extent.we need to educate a woman not only to save her from physical torture but also emotional torture,which generally no body cares.

Pawan lalchand ji, ho sakta hai
aap jahan rahte hon wahan AIDS utna faila hua nahi ho,par iska ye matlab nahi ki poore bharat mein hi AIDS nahi hai,thoda aankre dekhiye,ye 5OO se to zyada hi hai.TB se log marte hain,ye baat bhi jaan lijiye ki AIDS ke adhiktar patients mein TB ke lakshan sabse zyada dikhte hai,isiliye logon ko TB ki bhayawahta zyada dikhayi deti hai.
ye baat kuch had tak sahi hai ki AIDS ke naam par bahut saari dukanen khul gayi hain.

Pushpa Tripathi said...

Uma shankar ji,

communities mein to maine bahut survey kiye hain HIV/AIDS ko lekar ,yahan bhi (blog )karna chahti hoon,mujhe nahi pata yahan par logon ka response kya hoga.agar aap aisa koi survey kar saken to bahut khushi hogi kyunki aap kaafi samay se likh rahe hain aur aap ke readers ki sankhya bhi kaafi hai.

jahan tak RENUKA JI ke vaktavye ki baat hai to mujhe ye lagta hai ki unka apna koi stand hi nahi hai,pehle kuch kahna phir kuch aur kahna ,kal ho sakta hai ki wo kuch aur kahen,aap patrakaar hain ,ye sab bakhoobi samajhte honge.

meri tippani is baat se sambandhit nahi hai ki RENUKA JI ne jo kaha wo sahi hai ya galat,kyun ki sahi ya galat SUBJECTIVE hota hai jo aapke values ,morals,ethics,blah blah par depend karta hai,jo apne aap mein SUBJECTIVE hota hain.

agar RENUKA JI ,ne is poore mudde mein MARD jati ko zimmedar nahi tharaya hota ,to shayad aap ise apne blog par nahi likhte.

aapne sabki raay to poochi hai is mudde par ,logon ke tark diye hain ,lekin apna mat nahi vyakt kiya,ho sake to apni raay zahir karen.

Pushpa Tripathi said...

sabhi mardon ko zimmedaar aur doshi karaar dene ka adhikaar kise hai ya nahi hai,hum isi baat ko itna tool kyun de rahen hain,shayad isliye ki aham mudde se logon ko door rakhen.kyun hum kabhi kartavyon ki baat nahi kar sakte?ye alag baat hai ki kartavyon ki baat sirf mahilaon ke liye lagoo hoti hai,is PATRIARCHAL SOCIETY mein .

jab tak aap STATUS QUO ko chunauti nahi dete,kisi ko koi takleef nahi hoti.jis kshan aap POWER STRUCTURE ki ulti dhara mein jaane ka prayas karte hain,aapko LABEL kiya jana shuru ho jata hai.

hum is poore mudde ki gambhirta ko na dekhkar sirf mard jaati par hi kyun atak gaye hain?

ek baat mujhe samajh nahi aati ,jab kabhi bhi mardon mein
kisi aadarsh ki baat hoti hai to ,RAM ,ki hi baat kyun hoti hai?
maryada purushottam RAM,apni patni ke charitra par shak kar ke usko agni pariksha dene ke liye vivash karna,agni pariksha PASS karne ke baad bhi bhi use tyag dena,kya purush jaati mein isi ko aadarsh kahte hain?

hum pati ke apni patni ke prati bharosemand hone ki baat karte hain ,lekin kabhi MARITAL RAPE ki baat nahi karte,kyun?shayad isi liye ki ise samaj ki manyata prapt hai.bhale hi pati patni ko majboor kare,zor zabardasti kare,lekin agar patni ke alawaa aur kisi stri se sambandh nahi rakhe,yani ki BHAROSEMAND rahe to kisi ko koi dikkat nahi hoti.

main FEMINIST hoon,lekin FEMINISM ka matlab stri ki durdasha ke liye har wakt purushon ko zimmedaar tahrana nahi hai.iska ye matlab bhi nahi hai ki aap purush jaati ko saath lekar kaam nahi karen.MAVA naam ki ek sanstha hai jo striyon ke muddon par kaam karti hai jahan MALE FEMINIST hain.

mujhe lagta hai ki hamen FEMINISM ki nayi paribhasha talashne ki zarurat hai,tabhi is tarah ke muddon ko lekar kuch sakaratmak kadam uthaye jaa sakte hain,nahio to har wakt LABELLING mein hi uljhe rahenge.