Sunday, July 22, 2007

बिहार का सफ़र और मेरी पत्नी की नज़र


कैमरे के सामने रहने वाली तरु ने कैमरे के पीछे अपनी क़ाबिलियत दिखाने की कोशिश की है। उन्होने अपनी पहली बिहार यात्रा को अपने मोबाईल कैमरे में कुछ इस तरह उतारा है। पटना से मधुबनी तक के इस सफ़र में मैं गाड़ी चलाता रहा और मेरी पत्नी अपना मोबाईल कैमरा।
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टेम्पो की छत पर टीवी के साथ सवारी।
जीप पर लदे लोग






















लड़कियों का स्कूल से क्या लेना देना? भैंस तो चराना ज़रुरी है क्योंकि इसी से रोज़ी-रोटी मिलती है

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अरे किसी तरह एक बस मिली है कैसे छोड़े दें दूसरी कब आएगी नहीं आएगी पता नहीं


आप को रुकना पड़ा तो क्या... हम तो बीच सड़क ही टायर की हवा देखेंगे



बस! किसी तरह पहुंचना है
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बिहार में लोग ऐसे सफ़र के आदी हैं। बस-टेम्पो की छत पर सफ़र अपनी आंखो से देखना तरु के लिए नया अनुभव रहा। आप में से कईयों को ऐसा अनुभव होगा।

11 comments:

Rajesh Roshan said...

अच्छी है । कुछ तस्वीरे लगता है compress कि गई है

Neelima said...

अच्छे चित्र हैं!

अनूप शुक्ला said...

सही हैं। सालों पहले वाया बिहार की गयी साइकिल

यात्रा याद आ गयी। :)

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया तस्वीरें!
शुक्रिया!

Udan Tashtari said...

बढ़िया-कभी बिहर का थोड़ा हिस्सा घूमा तो, वो याद आया.

Anonymous said...

क्या लालू राज के ख़ात्मे के बाद भी बिहार में जंगलराज क़ायम है? हालात सुधारने के लिए क्या नीतीश कुमार कुछ नहीं कर रहे?

Pushpa Tripathi said...

pata nahi kyun hum har cheez mein sundarta kyun dekhna chahte hain?
ye tasweeren kya PARADOXES IN THE PROCESS OF DEVELOPMENT ko pradarshit nahi karti,lekin wo hame nahi dikhayi deta ya yun kahen ki hum dekhna aur sochna nahi chahte.

Pankaj said...

Yes subhuman standard of transportation must make us to think Bihar would take time to recover from the long rein of anarchy and negligence. But picture of good quality of road (if you remember the condition of road of Patna-Madhubani five year ago )light the ray of hope that something positive and constructive is taking place in Bihar

Ruby said...

उमाशंकर जी, तस्वीरे अच्छी हैं, बिहार की तस्वीरे, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता...लेकिन विकाशशील बिहार की ही एक तस्वीर है चिरैयाटांड फ्लाईओवर की जो अपने पहली तस्वीर लगे है...सड़कें भी बिहार की ही हैं...यह वही फ्लाईओवर जो लालू के राज में बरसों से बन रहा था और सड़कें भी वही हैं जिनमें गड्ढो के कारण सफर करने से डर लगता था...असल में हमारी आदत हो गई है हमेशा अवगुण ढूंढने की और बिहार के मामले में तो खासकर...इसलिए हमें बिहार हमेशा बुरा ही दिखता है...एक बात और बदलते बिहार की ही तस्वीर यह भी है की आप और आपकी पत्नी ने आराम से सड़क मार्ग से सफ़र तय किया...नहीं तो कुछ साल पहले गुंडा गर्दी इतनी अधिक थी की यह सब इतना सरल और सुलभ नहीं था....

Ruby said...

उमाशंकर जी, तस्वीरे अच्छी हैं, बिहार की तस्वीरे, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता...लेकिन विकाशशील बिहार की ही एक तस्वीर है चिरैयाटांड फ्लाईओवर की जो अपने पहली तस्वीर लगे है...सड़कें भी बिहार की ही हैं...यह वही फ्लाईओवर जो लालू के राज में बरसों से बन रहा था और सड़कें भी वही हैं जिनमें गड्ढो के कारण सफर करने से डर लगता था...असल में हमारी आदत हो गई है हमेशा अवगुण ढूंढने की और बिहार के मामले में तो खासकर...इसलिए हमें बिहार हमेशा बुरा ही दिखता है...एक बात और बदलते बिहार की ही तस्वीर यह भी है की आप और आपकी पत्नी ने आराम से सड़क मार्ग से सफ़र तय किया...नहीं तो कुछ साल पहले गुंडा गर्दी इतनी अधिक थी की यह सब इतना सरल और सुलभ नहीं था....

Ruby said...

उमाशंकर जी, तस्वीरे अच्छी हैं, बिहार की तस्वीरे, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता...लेकिन विकाशशील बिहार की ही एक तस्वीर है चिरैयाटांड फ्लाईओवर की जो अपने पहली तस्वीर लगे है...सड़कें भी बिहार की ही हैं...यह वही फ्लाईओवर जो लालू के राज में बरसों से बन रहा था और सड़कें भी वही हैं जिनमें गड्ढो के कारण सफर करने से डर लगता था...असल में हमारी आदत हो गई है हमेशा अवगुण ढूंढने की और बिहार के मामले में तो खासकर...इसलिए हमें बिहार हमेशा बुरा ही दिखता है...एक बात और बदलते बिहार की ही तस्वीर यह भी है की आप और आपकी पत्नी ने आराम से सड़क मार्ग से सफ़र तय किया...नहीं तो कुछ साल पहले गुंडा गर्दी इतनी अधिक थी की यह सब इतना सरल और सुलभ नहीं था....