Thursday, June 14, 2007

मधुबनी पेंटिग देखने जापान जाना होगा!

दूसरी कड़ी...

हालांकि अब तक के सारे बदलाव माध्यमगत ही हैं लेकिन इन बदलावों ने कला के स्तर में गुनात्मक गिरावट ला दिया है। चित्रकला अब बड़े पैमाने पर हो रही है। लेकिन यह पहले वाला आकर्षण पैदा नहीं करती।

इसके कई कारण हैं। मूल कारण है इसे मिल जाने वाला वह बाज़ार जिसने इस कला के पीछ काम करने वाली भावना तक को बदल दिया। इसकी मांग को देख कर अधिकांश कलाकार इसे कला के बजाए व्यवसाय की नज़र से देखने लगे। इसमें कलाकारों की कुछ ऐसी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का भी हाथ रहा जिसने उन्हें मधुबनी चित्रकला को सिर्फ जीवकोपार्जन के विकल्प के रुप में अपनाने को बाध्य किया। जितवारपुर गांव के श्री दिवस चंद्र झा का मानना है कि यह जिस रुप में हमें रोज़गार प्रदान करता है वही ठीक है। इनकी शिकायत है कि अच्छा चित्र बना कर इन्होने कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पुरस्कार जीते लेकिन इससे इनकी आर्थिक हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब इनके पास कम से कम अपना पक्के का मकान तो है।

इसी हालत का फायदा उठा कर कुछ स्थानीय और बाहरी बिचौलियों ने संगठित रुप में इस कला का 'उत्पादन' शुरु कर दिया। उन्होने अपनी संस्थाओं में चित्रकला के लिए ऐसे लोगों को रखा को इस कला का क ख ग भी नहीं जानते। ये लोग संस्थाओं से इसलिए जुड़ गए क्योंकि ये इससे उन्हें पैसे मिलते हैं। रोज़गार के तौर पर इसे लेना ग़लत नहीं है बशर्ते की कला के साथ छेड़छाड़ न की जाए। लेकिन यहां विशुद्द बाज़ारू किस्म की चीज़ों पर पेंटिंग बनाई जाती है। साड़ी, दुपट्टा, मेजपोश, बेडशीट, तकियाखोल, जैकेट कुछ नहीं छूटा। सब कुछ बाज़ार की मांग के हिसाब से तैयार होता है।

बाज़ार में जब इस तरह की पेंटिग पहुंचती है तो लोग मधुबनी पेंटिग के नाम पर इन्हीं चीज़ों से परिचित होते हैं। जानकारी की कमी के कारण व्यवसायिक शैली के इन विकृत चित्रों को लोग खरीद तो लेते हैं कि चलो मधुबनी पेंटिग लेते हैं, लेकिन ये उन्हें वो मानसिक संतुष्टि नहीं दे पाता जो कला के कद्रदान असल में ढ़ूंढ़ते हैं। शायद यही वजह है कि कला के शौकीनों की दिलचस्पी अब मधुबनी चित्रकला में उस तरह की नहीं रही जैसी पहले कभी हुआ करती थी। आधुनिक चित्रकला के सिद्धहस्त मनु पारेख ने कभी मधुबनी चित्रकला में काफी सक्रिय दिलचस्पी ली थी। एक गहराई तक जाने के बाद उन्होने मुझसे कहा था कि 'एक उंचाई पर पहुंचने के बाद उतार अवश्यंभावी होता है। यही मधुबनी चित्रकला के साथ हो रहा है।' बाज़ारीकरण पर उन्होने कहा कि ' इस संदर्भ में कुछ भी नहीं किया जा सकता। व्यावसायिकता समय की मांग है। '

इस हालत के लिए इस कला के वास्तविक कलाकार स्वयं भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। आर्थिक रुप से कमज़ोर कलाकार को जाने दें तो भी वे कलाकार दायरे में आते हैं जो पहले से साधन संपन्न थे या फिर अपनी कलाकारी से संपन्नता प्राप्त कर चुके हैं। उन पर मुख्य रुप से ये आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होने अपनी तमाम क्षमताओं के बावजूद इसे सही दिशा में निर्देशित और मार्गदर्शित करने की ज़रुरत को नहीं समझा। नतीज़तन, विकास और परिवर्धन की एक सीमा तक पहुंचने के बाद ये पथभ्रमित सी हो गई और दिशा खो बैठी।

हालांकि अब भी ऐसे कलाकार हैं जो इस कला के प्रति पूरा समर्पण भाव रखते हैं लेकिन उनकी संख्या नगण्यप्राय ही है। रांटी गांव की श्रीमती गोदावरी दत्ता, जिनको कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है, ने कई साल पहले मुझसे कहा था कि 'चुंकि सभी लोग अत्यधिक मंहगी पेंटिग नहीं खरीद सकते इसलिए उनके लिए विशुद्ध व्यावसायिक रुप से बनाए गए चित्र ही ठीक हैं। इसलिए व्यावसायिकता आई है तो ठीक ही है।' इसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि चित्रकला को हर आदमी तक पहुंचाना चाहिए भले ही उसका रुप विकृत क्यों ना हो जाए! जबकि आम जन तक इस कला को पहुंचाने के और भी कई रास्ते हैं। मधुबनी पेंटिंग का एक संग्रहालय बनाया जा सकता है जो भारत में नहीं है। जापान ने बना लिया है।

मधुबनी चि्त्रकला के सिद्धहस्त और बाल भवन नई दिल्ली से संबद्ध श्री सत्यनारायण लाल 'कर्ण' इस हालत पर गंभीर चिंता जताते हैं। 'यदि इस कला के मूल रुप को बचाना है तो इसके लिए नई पीढ़ी के कलाकारों को इस तरह से प्रशिक्षित करना होगा कि वे इसे कला के रुप में ही लें व्यवसाय के रुप में नहीं।' श्री कर्ण मधुबनी में एक संग्रहालय की ज़रुरत महसूस करते हैं 'नहीं तो बाद की पीढियों को वास्तविक मधुबनी चित्रकला देखने के लिए जापान जाना पड़ेगा जहां एक संग्रहालय बनाया जा चुका है और दुर्भल नमूनों को यहां एकत्र किया जा रहा है।' इसलिए आज सरकार और इससे भी अधिक प्रबुद्ध कलाकारों और स्थानीय समाज की ये ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और धरोहर को बचाने के लिए आगे आएं।

फिलहाल इतना ही।

2 comments:

Manish Kumar said...

मधुबनी पेटिंग के व्यवसायीकरण के बारे में आपने ध्यान खींचा उसके लिए आपका शुक्रिया।

अनिल रघुराज said...

कितनी विडंबना है कि 1964 में अकाल न पड़ता तो इस कला की सुध ही मिलती। जापान में संग्रहालय है, अपने देश में नहीं। इसी से पता चलता है कि हमारी सरकारें भारत की अमूल्य धरोधरों का कितना सम्मान करती हैं। कला के लिए तो ज्यादातर सत्ता और समाज का संरक्षण जरूरी होता है। उमा, आपने दिखा दिया कि असली रिपोर्टर की कलम (की-बोर्ड) किसी खोखले बुद्धिजीवी से कितनी ज्यादा जानदार होती है।