Tuesday, June 19, 2007

'असली भूत...देखिए रात 9बजे...सिर्फ इसी चैनल पर...'

रवीश ने 'कस्‍बा' पर एक व्यंग्य लिखा है। उनके भू-चु चैनल की मार्केट खराब करने के लिए मैं यहां कुछ लिख रहा हूं। पढ़िएगा फिर फैसला कीजिएगा।

प्यारे दर्शकों,

रवीश जी की बातों पर मत जाना। भू-चु जब आएगा तब आएगा। कितना चल पाएगा नहीं चल पाएगा वो भी पता नहीं। वो कह रहे हैं कंपिटीशन नहीं है। अरे कंपिटीशन कितना है चैनल चलाने वाले हमारे कुछ दोस्तों से पूछो। वे फेस कर रहे हैं।

कुछ प्रापर्टी डीलरों से पैसा लेकर हमारे एक दोस्त ने एक 'न्यूज़ चैनल' खोला है। सोचा बिजनिस में नया हाथ मारेगें। पूंजी कम थी सो सुनसान इलाके में दफ्तर खोलना पड़ा। दोस्त ने बताया कि एक दिन रात को लाईव था। एंकर सवाल करती गई। कैमरे की तरफ से मेंढ़क और झिंगुर की आवाज़ें आतीं रहीं। रिपोर्टर सेट पर नहीं पहुंचा था। एंकर को टाॅक बैक ठीक से नहीं मिल रहा था। उसे लगा आडियो चैनल वन पर एंबिएंस आ रहा रहा है तो चैनल टू पर रिपोर्टर की भी कुछ ना कुछ आवाज़ आ ही रही होगी। इसी गफलत में सब कुछ चलता है। ब्लैक फ्रेम दिखता रहा। दोस्त ने रिपोर्टर को सज़ा के तौर पर नौकरी से निकाल दिया। लगा कि इस तरह रिपोर्टिंग करेगा तो नये चैनल की तो भद ही पिट जाएगी।

पर उस हफ्ते की टीआरपी ने दोस्त की आंखे खोल दी। उस रिपोर्टर-रहित लाईव ओबी के दौरान दोस्त के चैनल की टीआरपी 55 पार थी। ज़्यादा लगे तो ठीक ठीक लगा लेना। दोस्त ने उस रिपोर्टर को बाईज्ज़त वापस बुलाया। कहा कुछ करने की ज़रुरत नहीं। सुनसान-श्मशानी इलाकों में घूमते रहो। जब तक कुछ ना दिखे तब तक रिपोर्ट फाईल करते रहो। भूतों की ऐशगाह। चुड़ैलों का डेरा। बिजिनेस चल निकाला। एक दोस्त ने शुरु किया तो बाकी भी पीछे हो लिए। अब रवीश भी मैदान में कूदना चाहते हैं। और कहते हैं कंपिटीशन नहीं है।

कंपिटीशन तो अभी ही इतना हो गया है कि दोस्त के भूत को दूसरे चैनल वाले ले उड़ रहे हैं। लाईनअप हमारे दोस्त का होता है पर कैमरा किसी और का पहुंच जाता है। एक रिपोर्टर को तो हमारे दोस्त ने भूत की स्टोरी का ट्रांसफर दूसरे चैनल के कैमरापर्सन को देते हुए पकड़ा। निकाल दिया। आजकल तो हमारा दोस्त अलसुबह ही ओबी वैन निकाल देता है। रिपोर्टरों से कहता है जाओ भूत ढ़ूंढों। लाईव करेगें। जहां थोड़ा भी जंगल-झाड़, पुरानी हवेली टाईप चीज़ नजर आती है... मनोहर कहानी स्टाईल में शुरु हो जाने को कहता है।

पुराने किलों और हवेलियों पर आर्कियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया वालों की निगाह बेशक ना पड़ी हो। हमारी पड़ गई है। एएसआई वालों को भी एक दिन दिन में भूत दिखा गया। लेकिन परेशान होने की बजाए वो खुश थे। दोस्त को फोन किया। बोले कोई ख़बर दिखाने वाला चैनल पहुंच जाता तो कहता कि एएसआई की कोताही देखो। ऐतिहासिक धरोहर को संजो कर नहीं रखा। ईंट ईंट बिखड़ रहा है। बाल की खाल निकालते। अच्छा हुआ आपके रिपोर्टर आए। भूत पर फोकस किया। पर आपको इतना इंटीरियर में जाने की क्या ज़रुरत थी। हमें बोल देते। लाल किला, कुतुब मीनार, पुराना किला...हुमायूं टॅाम्ब... कई जगहों को तो हमने वैसे भी अपने हाल पर छोड़ा हुआ है कि खंडहर बन गया है। थोड़ी और कोताही कर देते तो आपको भूत-बेताल ही नहीं प्रेत-पिशाच भी यहीं मिल जाते। ख़ैर अब डील हो गई है। वे हमारे दोस्त के चैनल के लिए भूत पैदा करेंगे। मुगलकाल के भूत। कुषाण काल और सातवाहन के ज़माने के भूत। मौर्यकाल और गोल्डन एरा यानि गुप्तकाल और मुगलकाल के भूत भी। साउथ इंडिया से रिपोर्टें फाईल होगीं चोलों के काल के भूत की। पल्लवों के काल के भूत की। पर ये सभी भूत आपको दिखाई नहीं ना पड़ें तो आप मज़ाक ना उड़ाना। जो दिख ही गया तो भूत कैसा। भूत की सैंक्टिटी भी तो बचा कर रखनी है ना।

हमारा दोस्त तो अपने चैनल के लिए अपना पैनल तैयार कर रहा है। किस तरह के भूत पर किस तरह की मशानी शक्ति काम करेगी। कौन सी चुड़ैल किस जोगन से भागेगी। रिसर्च चल रहा है। और भागना दिखाना है तो पहले बुलाना पड़ेगा। पहले एक अच्छे गेस्ट के लिए मारामारी-मगज़मारी होती थी। अब अच्छी चुड़ैलों के लिए होगी। वो दिन दूर नहीं जब एक ही चु़ड़ैल आपको अलग अलग कोट पहने कई स्टुडियो में दिखाई पड़ेगी। पर दोस्त ने वादा किया हैं कि हम सबसे पहले आपको दिखाएगें। बिना एक पल गंवाए। बिल्कुल तेज़ी से। चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े।

मैं तो अपने मुंह सिर्फ एक दोस्त की बड़ाई करता जा रहूं हैं। पर ईमानदारी से बताउं तो आपके पास कई विकल्प भी मौजूद हैं। एक तरह के भूत से मन भर गया है तो बस एक रिमोट की दूरी पर दूसरा भूत मिल जाएगा। दबाने भर की देरी है। सांप का बिल भी मिलेगा और नाग नागिन भी। बाबा का चमत्कार भी। कहने का मतलब कि रवीश जी के प्रस्तावित भू-चु चैनल से कहीं बेहतर चींज़े अब भी एवलेबल है। बिल्कुल लाईव। फिर भू-चु का क्या औचित्य। इंतज़ार कैसा।

'तेरा भूत मेरे भूत से सफेद झूठ जैसा! असली भूत सिर्फ हमारे पास! बस देखते रहिए'

आपका
भूतख़बरी

9 comments:

अविनाश said...

यहां भी सीईओ के लिए आवेदन कर रहा हूं. ग़ौर फरमाने की किरपा कीजिएगा.

अरुण said...

ये भूतो को ब्लोगिंग का शौक चर्राया है ,दो तो दिख गये,डाल दो भाइ चैनल पर
:)

Shrish said...

"पर ये सभी भूत आपको दिखाई नहीं ना पड़ें तो आप मज़ाक ना उड़ाना। जो दिख ही गया तो भूत कैसा। भूत की सैंक्टिटी भी तो बचा कर रखनी है ना।"

भाई ये बात तो सच है आखिर उन्हें भी शांति से रहने का हक है, वरना इंसान उन तक पहुँच गया तो उन्हें भी चैन से रहने नहीं देगा।

संजय बेंगाणी said...

:)

mr kaushik said...

dada mein ek sach much ka pret patrakar hoon aajkal free hoon kahin bhoot special ho to batana...desh mein pratham pidhi ke pret ptrakar hone ka gaurav prapt hai...issliye bhoot dekhte hiblog par ruk gaya

Isht Deo Sankrityaayan said...

भाई भूतखबरी जी
सचमुच बहुत बढिया लिखा है. केवल चैनलों की चोंचलेबाजी ही नहीं, एएसआई वालों की भी अच्छी खबर ली है. वैसे भी इतिहास और है ही क्या, सिर्फ भूतों का डेरा. उस डेरे को कोंग्रेस अपने ढंग से भुनाती है तो भाजपा अपने ढंग से, वामपंथी अपने ढंग से भुनाते हैं तो मसाजवादी और दलितवादी अपने ढंग से. कोई लुटेरों को उद्धारक बताता है तो कोई उद्धारकों को लुटेरा. समाज से लेकर राजनीति तक यह केवल विवाद पैदा करने काम आ रहा है. जहाँ तक सवाल एतिहासिक धरोहरों का है, उनके लिए एएसआई के पास पैसा नहीं है. यह अलग बात है कि उनके अफसरों के ऐश करने के लिए कुबेर का खजाना ही खुला हुआ है। भलाई शायद इसी में है कि इतिहास का भूत भागे. या फिर ऐतिहासिक स्थलों पर भूत ही कब्जा जमा लें. कम से कम फिर कोई बखेरा तो खड़ा नहीं होगा. हाँ, हो सके तो जरा एक बार टीआरपी के गड़बड़झाले पर भी लिखें. हर दर्शक तो भूतों-प्रेतों, अपराध कथाओं और एक ही खबर को पूरे दिन बिसूरते रहने से ऊबा रहता है. फिर जबरदस्ती उन्ही मूढताओं पर बेचारी टीआरपी बढ कैसे जाती है, इसका अंदाजा किसी को है क्या?

Valley of Truth said...

ईष्ट देव जी, आपने अलग सवाल और गंभीरता के साथ टिप्पणी की है। टीआरपी के गड़बड़झाले पर आगे ज़रुर बताउंगा। वैसे मेरे ब्लाग का सबसे शुरुआती पोस्ट देखें (टीवी चिंतन लेबल के तहत) तो शायद आपको थोड़ी तसल्ली मिले। और मोहल्ला पर उमाशंकर सिंह का कोना भी देख सकते हैं जहां ख़ासतौर पर मैने टीवी पर ही लिखा है।

जल्दी ही मिलते हैं।
शुक्रिया
उमाशंकर सिंह

ravish said...

uma

meraa lekh ek saal purana hai. tab likha tha ki competition nahi hai. magar ab to bahut hai. Ab to bhooton ke beech raajneeti bhi hogee ki ek hi bhoota ka kyon dikhaya jataa hai. jaisa rajneetik dalo ke pravaktaaon ke beech hotaa hai.

yah bahut achhaa samay hai. kum se kum aadmi nahi dikh raha. uskaa bhoot dikh raha hai. aadmi se to behtar ye bhoot hote hain. jinke darshan ke liye aadmi bhi bechain hai.

avinash ko ceo mat banana. bhu-chu channel ka ceo koi bhi zindaa manushya nahi ho sakta.

vivek said...

uma ji namaskar aap bade bhai hai tabhi to mai apna dard likh raha hu.dard bada bedard hai kyoki badkismati se mai bhi bhoot patrakar hu maf kijiyega bhoot patrakar tha.kyoki kismat ko mere upar taras aa gaya mere production house se vo programme apne channel me chala gaya.
ab mai khali ho gaya hu aur apne dard ki dava dhudha raha hu jis dard ko bhooto,ruho ki khoj karate hue paya tha.had to tab ho jati jab un nakali bhooto ko asali banane ke chakkar me khud ki shalya kriya karni padti thi.mere vichar mera hridaya sab kuch chalani ho jata tha .mere dard ki dava nahi koi par hame lagata hai ya to vo dava aapke pas hai ya fir ravish ji ke pas.
jara seriously lijiyega dar hai kahi ye bimari dubara na lag jaye
advise jarur dijiyega.

vivek gupta