पीएसी के सामने प्रधानमंत्री को पेश होने दिया जाए या नहीं इसे लेकर बीजेपी के भीतर ही पसोपेश पैदा हो गया है। सुषमा नियमों का हवाला दे कर कह रही हैं कि प्रधानमंत्री क्या, किसी भी मंत्री की पेशी लोकलेखा समिति के सामने नहीं हो सकती। लेकिन मुरली मनोहर जोशी उचित समय पर उचित फ़ैसले की बात कर रहे हैं। आखिर क्यों?
मुरली मनोहर जोशी बीजेपी की अंदरुनी राजनीति में बहुत पहले हाशिए पर धकेल दिए गए। वे इस समय पीएसी यानि लोकलेखा समिति के मुखिया हैं। पीएसी अपने तौर पर 2जी घोटाले की जांच में जुटी है। बीजेपी जेपीसी की मांग कर रही है। मतलब पीएसी के मुखिया के तौर जोशी जी की क्षमता और महत्व को नकार रही है। लगता है बीजेपी को अपनी ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता पर भरोसा नहीं!
कांग्रेस जेपीसी की मांग पर विपक्ष और कुछ साथी दलों की एकजुटता को तोड़ने में नाकाम रही है। प्रधानमंत्री ने पीएसी के सामने पेश होने की चिठ्ठी लिख कर बेशक एनडीए और यूपीए के कई साथी दलों का भरोसा न जीत पाए हों, जोशी जी के अहम को तो जीत ही लिया है। जोशी जी को भी लंबे समय बाद टीवी और अख़बारों की सुर्खियां मिली हैं। वो अपनी पार्टी की वजह से नहीं। पार्टी ने तो उनके श्रीनगर एकता यात्रा तक में उनको सुर्खियां नहीं बटोरने दी। अब सुर्खियां मिली हैं तो पीए की पेशकश की वजह से। अगर वो पीएम की पेशी की पेशकश को आज ठुकरा देते हैं तो वो तुरंत फोकस से हट जाएंगे। लिहाज़ा वो सही समय का इंतज़ार करेंगे। यानि चुप रह कर ये देखेंगे कि सरकार जेपीसी के लिए तैयार होती दिख रही है या नहीं या फिर बीजेपी समेत जेपीसी समर्थक पार्टियों के हमले की धार कब कुंद पड़ती है।
अभी की हालत में जोशी जी के दोनों हाथ लड्डू हैं। पीएम पेशी के लिए रिक्वेस्ट कर रहे हैं। बीजेपी पीएम की रिक्वेस्ट जल्द टर्न डाउन करवाने के लिए छटपटा रही है। बहुत बढ़ चुकी उम्र और ख़ासतौर पर अपनी ही पार्टी में घट चुकी राजनीतिक उपादेयता जोशी के लिए पीएम की पेशकश दिल्ली की इस सर्द में नज़ले खांसी की दवा जोशीना साबित हो रही है। बेशक उनकी महत्वाकांक्षा पर पार्टी का दबाव या फिर नियम भारी पड़े और प्रधानमंत्री उनके सामने औपचारिक रूप से पेश न हो पाएं, लेकिन जांच के सिलसिले पीएम से अनौपचारिक बातचीत से भी जोशी जी की महत्ता साबित होगी।
बीजेपी की सुषमा जी जैसी नेताओं, और थोड़ा ऊपर उठे तो आडवाणी जी, को समझ में आना चाहिए कि पार्टी में सबके अहम को साथ लेकर चलने का कितना फायदा होगा। सिर्फ वरिष्ठता के हवाले से पीएसी के चेयरमैन का पद ही अहम तो संतुष्टि देने के लिए काफी नहीं होता।
कांग्रेस के रणनीतिकार जेपीसी के घेरे से निकलने में बेशक नकारे साबित हुए हों लेकिन पीएम की ताज़ा पेशकश ने अभी कांग्रेस का हाथ, कुछ समय के लिए ही सही, ऊपर कर दिया है। अब उनको तलाश बीजेपी के अलावे जेपीसी मांग करने वाला दूसरी पार्टियों में भी जोशी जैसी हस्तियों की होगी।
Tuesday, December 28, 2010
Sunday, April 25, 2010
पाकिस्तान उस इलाक़े का दौरा जहां तालिबान नें जड़ें जमायीं...
अभी कुछ घंटे पहले पाकिस्तान से लौटा हूं। यूं तो ये मेरा चौथा दौरा था लेकिन कई लिहाज़ से ये अद्वितीय था। बाजौर के उस इलाक़े में जाना जो हाल तक तालिबान ने अपना गढ़ बना रखा हो...
Thursday, March 25, 2010
Wednesday, September 30, 2009
अकेला शख्स और अमेरिका
इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हूँ. फिलहाल वॉशिंग्टन में हूँ. अमेरिका पूरी दुनिया को परमाणु हथियार ख़त्म करने की सीख देने मैं लगा है. लेकिन ठीक व्हाइट हाउस के सामने १२ साल से धरने पर बैठा शख्स खुद अमेरिका को चुनौती दे रहा है... परमाणु हथियार ख़त्म करने को कह रहा है. दुनिया का सबसे मज़बूत कहा जाने वाला प्रशासन चाह कर भी उस शख्स को हटा नहीं पाया है. दिलचस्प सच्चाई है.... इस तरह की छोटी बड़ी काफ़ी बातें बताने को है. वक़्त नहीं मिल पा रहा. तस्वीरों के साथ जल्द की कुछ बेहतर पेश करने की कोशिश करूँगा. शुक्रिया
Thursday, August 27, 2009
पाक मंदिर पर रिपोर्ट : पीछे की कहानी
पाकिस्तान से रिपोर्टिंग अपने आप में चुनौती का काम है। भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा जो एक शक का माहौल रहता है उसके मद्देनज़र दोनों देशों के पत्रकारों की चुनौती और बढ़ जाती है। पाकिस्तान जा कर ज़मीन से रिपोर्टिंग करने के मुझे अब तक तीन मौक़े मिले हैं। ये तीनों ही मौक़े पाकिस्तान की इतिहास के अहम पड़ाव रहे हैं... इमरजेंसी, बेनज़ीर की हत्या और आम चुनाव।
पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों की हालत पर मेरी इस रिपोर्ट की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इसे मैंने तमाम मुश्किलातों के बीच तैयार की है।
1- स्थानीय वीज़ा के बिना
2- ख़ुद कैमरा चलाते हुए
3- कठिन पहाड़ी रास्ता और
4- पाकिस्तान में इमरजेंसी के हालात
पाकिस्तान जाने वाले भारतीय नागरिकों को वहां के हर ज़िले के लिहाज़ से वीज़ा लेना होता है। मतलब अगर वीज़ा लाहौर का है तो आप सिर्फ लाहौर जाएगे... आस पास के भी किसी और इलाक़े में नहीं। मेरे पास सिर्फ लाहौर का वीज़ा था जबकि कटासराज, नंदना का किला, मकलोड का विष्णु मंदिर झेलम और चकवाल ज़िले में आते हैं। ये सभी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सुदूरवर्ती इलाक़े हैं। यहां तक मेरा पहुंच पाना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि में साउध एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफ्मा) के पत्रकारों के एक डेलिगेशन में शामिल था।
इस पूरी रिपोर्टिंग के दौरान कैमरे से पूरी शूटिंग मैने ख़ुद की। पीस-टू-कैमरा कई बार कैमरे को दीवार या फिर किसी पत्थर पर रख कर करना पड़ा। जो कुछ भी रास्ते में मिलता मैं उसे कैमरे में उतारता गया। सबसे ज़्यादा मुश्किल पेश आयी नंदना फोर्ट के रास्ते में। 5 घंटे की ट्रेकिंग। कोई पगडंडी भी नहीं... जिधर चल पड़ो उधर से ही रास्ता निकालने जैसी हालत। कंटीली झाड़ियां , पहाड़ पर कभी खड़ी चढाई तो कभी सीधी ढ़लान, रास्ता भटक जाना, पीने के पानी का ख़त्म हो जाना और दल के कई साथियों का बीमार पड़ जाना। ये सभी बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं।
3 नवबंर को, इस शूट के बीच में ही पाकिस्तान में जेनरल मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगा दी। इससे सुरक्षा के हालात और ख़राब हो गए। भारतीय नागरिक होने की वजह से मेरे पाकिस्तानी साथी मुझे लेकर काफ़ी चिंतित हो गए... लेकिन सबों ने मेरे काम में पूरा सहयोग दिया और मेरा हौसला बनाए रखा।
इन हालातों के बीच तैयार इस रिपोर्ट में मैंने कटासराज, मकलोड और नंदना मंदिर के भूत और वर्तमान के बारे में बताने की कोशिश की है। स्थानीय गाइड सलमान राशिद साहब के अलावा दल में शामिल पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, नेपाल जैसे देशों से आए पत्रकार साथियों के ऑन-द-स्पॉट कमेंट्स हैं।
एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान में सिर्फ टेरेरिज़्म की बात होती है... मैंने टूरिज़्म की बात कर ये जताने की कोशिश की है कि अगर इस मुल्क के अंदरुनी हालात पर क़ाबू पा लिया गया तो ये न सिर्फ एक बेहतरीन टूरिस्ट डेस्टीनेशन बन सकता है... बल्कि बड़ी तादाद में हिंदू तीर्थ यात्रियों को भी अपनी ओर खींच सकता है।
मेरी इस रिपोर्ट को एनडीटीवी इंडिया पर पहली बार 29 जून 2008 को रात साढ़े नौ बजे प्रसारित किया गया।
पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों की हालत पर मेरी इस रिपोर्ट की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इसे मैंने तमाम मुश्किलातों के बीच तैयार की है।
1- स्थानीय वीज़ा के बिना
2- ख़ुद कैमरा चलाते हुए
3- कठिन पहाड़ी रास्ता और
4- पाकिस्तान में इमरजेंसी के हालात
पाकिस्तान जाने वाले भारतीय नागरिकों को वहां के हर ज़िले के लिहाज़ से वीज़ा लेना होता है। मतलब अगर वीज़ा लाहौर का है तो आप सिर्फ लाहौर जाएगे... आस पास के भी किसी और इलाक़े में नहीं। मेरे पास सिर्फ लाहौर का वीज़ा था जबकि कटासराज, नंदना का किला, मकलोड का विष्णु मंदिर झेलम और चकवाल ज़िले में आते हैं। ये सभी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सुदूरवर्ती इलाक़े हैं। यहां तक मेरा पहुंच पाना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि में साउध एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफ्मा) के पत्रकारों के एक डेलिगेशन में शामिल था।
इस पूरी रिपोर्टिंग के दौरान कैमरे से पूरी शूटिंग मैने ख़ुद की। पीस-टू-कैमरा कई बार कैमरे को दीवार या फिर किसी पत्थर पर रख कर करना पड़ा। जो कुछ भी रास्ते में मिलता मैं उसे कैमरे में उतारता गया। सबसे ज़्यादा मुश्किल पेश आयी नंदना फोर्ट के रास्ते में। 5 घंटे की ट्रेकिंग। कोई पगडंडी भी नहीं... जिधर चल पड़ो उधर से ही रास्ता निकालने जैसी हालत। कंटीली झाड़ियां , पहाड़ पर कभी खड़ी चढाई तो कभी सीधी ढ़लान, रास्ता भटक जाना, पीने के पानी का ख़त्म हो जाना और दल के कई साथियों का बीमार पड़ जाना। ये सभी बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं।
3 नवबंर को, इस शूट के बीच में ही पाकिस्तान में जेनरल मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगा दी। इससे सुरक्षा के हालात और ख़राब हो गए। भारतीय नागरिक होने की वजह से मेरे पाकिस्तानी साथी मुझे लेकर काफ़ी चिंतित हो गए... लेकिन सबों ने मेरे काम में पूरा सहयोग दिया और मेरा हौसला बनाए रखा।
इन हालातों के बीच तैयार इस रिपोर्ट में मैंने कटासराज, मकलोड और नंदना मंदिर के भूत और वर्तमान के बारे में बताने की कोशिश की है। स्थानीय गाइड सलमान राशिद साहब के अलावा दल में शामिल पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, नेपाल जैसे देशों से आए पत्रकार साथियों के ऑन-द-स्पॉट कमेंट्स हैं।
एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान में सिर्फ टेरेरिज़्म की बात होती है... मैंने टूरिज़्म की बात कर ये जताने की कोशिश की है कि अगर इस मुल्क के अंदरुनी हालात पर क़ाबू पा लिया गया तो ये न सिर्फ एक बेहतरीन टूरिस्ट डेस्टीनेशन बन सकता है... बल्कि बड़ी तादाद में हिंदू तीर्थ यात्रियों को भी अपनी ओर खींच सकता है।
मेरी इस रिपोर्ट को एनडीटीवी इंडिया पर पहली बार 29 जून 2008 को रात साढ़े नौ बजे प्रसारित किया गया।
Tuesday, May 5, 2009
kabul day 1
kabul pahunch chuka hun. yahaan se devnagree main blog update karne main kuchh samasyaa hai... comp-net janit. isliye aaj kee pooree baat baad main. yahaan dilli kee garmee se raahat hai. sham 5pm (local time) 19 degree tha... night main to 16 ke aaspaas mehsoos ho rahaa hai... :)
farid usee garm joshee se mila jaise wo pakistan main mila karta tha...
jaaree
पाकिस्तान, तालिबान... अफ़गानिस्तान
आज अफ़गानिस्तान निकल रहा हूं। मक़सद वहां की ज़मीनी हालात को देखना और दिखाना है। एक ऐसे माहौल में जब चारों तरफ तालिबान को लेकर शोर शराबा है... आख़िर उस मुल्क़ में क्या हो रहा है जहां वो (तालिबान) पैदा हुआ, पला-बढ़ा और फिर उसकी विषबेल अपने माली (अमेरिका) को ही लपेटने में जुट गई। अमेरिकी और नाटो फोर्स के दबाव में तालिबान ने अफ़गानिस्तान से लगे पाकिस्तानी इलाक़े का रुख़ तो कर लिया है लेकिन पुरानी ज़मीन से भी उनके पैर पूरी तरह से उखड़े नहीं हैं। कोशिश होगी काबुल की ताज़ा कहानी बताने की।
Sunday, April 26, 2009
सारे लेखक हो गए... पाठक कौन बचा?
महीने बाद ब्लॉग पर आया हूं। देख रहा हूं सभी लिख रहे हैं। किसी के दिल में तो किसी के दिमाग में एक विचार है। किसी के पास अनुभव है तो किसी के पास अपना कोई ख़्याल। अच्छी बात है। होने भी चाहिए। पर देखा कि कोई किसी को पढ़ नहीं रहा। न अनुभव की कद्र है ना ख़्याल पर भरोसा। ब्लॉगवाणी के हिट्स के हिसाब से बता रहा हूं। घंटों पहले की पोस्ट पर रीडर ज़ीरो हैं... पसंद की तो बात ही मत पूछिए। नापसंद का कोई कॉलम नहीं है। याद है मझे दो साल पहले का वो वक्त। छोटी से छोटी बात लिख देने पर भी एकाध पाठक तो आ ही जाते थे। फिर अब क्या हुआ। क्या अपना पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा या किसी और का लिखना!
Sunday, March 8, 2009
मुशर्रफ़ से मुलाक़ात
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ भारत में हैं। व्यक्तिगत दौरे पर। मेरा उनसे आज एक बार फिर आमना सामना हुआ। संक्षिप्त बात हुई। मैंने उनसे कहा कि जब आपने पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाई तब मैं वहीं था... आपके इस क़दम से पाकिस्तान का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत गुस्से में था। अब आप अलग रोल में हैं। पर पाकिस्तान में कोई बदलाव नज़र नहीं आ रहा।
मुशर्रफ़ ने मेरी पंक्तियों का क्या मतलब निकाला मुझे नहीं पता... पर एक पूरी नज़र देखा। मैंने अपना कार्ड आगे बढा दिया। ये कहते हुए कि मौक़ा मिला तो फिर आना चाहूंगा। उन्होने कहा... "स्योर"।
मुशर्रफ़ उस कॉनट्रैक्ट से बंधे थे जिसमें उन्हें किसी से भी कुछ बात करने की मनाही थी। एक मीडिया ग्रुप के अलावा। सो वे अपनी तरफ से कम से कम बोले। अब राष्ट्रपति नहीं हैं... पर कमांडो जैसी अनुशासन का पालन अब भी कर रहे हैं। नहीं तो बताते कि आख़िर जिस वजह से उनके ख़िलाफ पाकिस्तान में मुहिम चलायी गई वो वजहें अब भी क़ायम हैं। ज़रदारी बतौर राष्ट्रपति उन्हीं अधिकारों को छोड़ने को तैयार नहीं जिन्होने जेनरल मुशर्रफ को मुशर्रफ़ के तौर पर ब्रांड कर दिया। पर फिलहाल वे ख़ामोशी में ही बेहतरी समझ रहे हैं। शायद किसी बेहतर कल के इंतज़ार में।
आगे भी और बात होगी।
मुशर्रफ़ ने मेरी पंक्तियों का क्या मतलब निकाला मुझे नहीं पता... पर एक पूरी नज़र देखा। मैंने अपना कार्ड आगे बढा दिया। ये कहते हुए कि मौक़ा मिला तो फिर आना चाहूंगा। उन्होने कहा... "स्योर"।
मुशर्रफ़ उस कॉनट्रैक्ट से बंधे थे जिसमें उन्हें किसी से भी कुछ बात करने की मनाही थी। एक मीडिया ग्रुप के अलावा। सो वे अपनी तरफ से कम से कम बोले। अब राष्ट्रपति नहीं हैं... पर कमांडो जैसी अनुशासन का पालन अब भी कर रहे हैं। नहीं तो बताते कि आख़िर जिस वजह से उनके ख़िलाफ पाकिस्तान में मुहिम चलायी गई वो वजहें अब भी क़ायम हैं। ज़रदारी बतौर राष्ट्रपति उन्हीं अधिकारों को छोड़ने को तैयार नहीं जिन्होने जेनरल मुशर्रफ को मुशर्रफ़ के तौर पर ब्रांड कर दिया। पर फिलहाल वे ख़ामोशी में ही बेहतरी समझ रहे हैं। शायद किसी बेहतर कल के इंतज़ार में।
आगे भी और बात होगी।
Wednesday, December 31, 2008
Thursday, November 27, 2008
मुंबई पर हमला
मुंबई पर फिर हमला हुआ है। हम तैयार हैं कब तैनाती हो जाए...
पर कई बातें ज़ेहन में आती हैं। कुछ ही घंटों के अंदर...
सरकार कहेगी, हम निंदा करते हैं... पूरी तरह जांच की जाएगी... दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी... किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।
पुलिस कहेगी... पहली बार समुद्री रास्ते से आए आंतकी। नया मोडस आपरेंडी।
(हालांकि हमारे एनएसए पहले ही इसके बारे में चेता चुके हैं। पर शायद वो चेते नहीं)
विपक्ष कहेगा, ये सरकार की विफलता है। वो हिंदू आतंकवाद का झूठा ख़ौफ दिखा रही है... असल में ख़तरा जेहादी आतंकवाद का है। हम आए तो पलट देंगे तस्वीर... ।
अख़बार टीवीओं पर ख़बर आएगी... पटरी पर लौटी ज़िंदगी। मुंबई की ज़िंदादिली...
फिर सब कुछ पटरी पर लौट आएगा... अगली वारदात तक.... और कोई चारा भी तो नहीं।
पर कई बातें ज़ेहन में आती हैं। कुछ ही घंटों के अंदर...
सरकार कहेगी, हम निंदा करते हैं... पूरी तरह जांच की जाएगी... दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी... किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।
पुलिस कहेगी... पहली बार समुद्री रास्ते से आए आंतकी। नया मोडस आपरेंडी।
(हालांकि हमारे एनएसए पहले ही इसके बारे में चेता चुके हैं। पर शायद वो चेते नहीं)
विपक्ष कहेगा, ये सरकार की विफलता है। वो हिंदू आतंकवाद का झूठा ख़ौफ दिखा रही है... असल में ख़तरा जेहादी आतंकवाद का है। हम आए तो पलट देंगे तस्वीर... ।
अख़बार टीवीओं पर ख़बर आएगी... पटरी पर लौटी ज़िंदगी। मुंबई की ज़िंदादिली...
फिर सब कुछ पटरी पर लौट आएगा... अगली वारदात तक.... और कोई चारा भी तो नहीं।
Friday, November 7, 2008
अमेरिका का नेशनल फ्लैग मेड इन चाईना...!
ऐसा शायद हम तिरंगे के साथ नहीं कर सकते। ये तिरंगे का अपमान माना जाएगा। ये अमेरिका में ही संभव है। इन तस्वीरों को ग़ौर से देखिए। ये अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज है। लेकिन बना कहां है? मेड इन चाईना! जी हां। ये तस्वीर 5 नवबंर की हैं। नई दिल्ली स्थित अमेरिकन इंफोर्मेशन सेंटर की जहां ओबामा की जीत का जश्न मनाया जा रहा था। पॉलीथीन के बने सैकड़ों झंडे लगाए गए थे। सब पर मेड इन चाईना का ऐसा ही मार्का लगा था। अपना राष्ट्रीय ध्वज चीन में बनवाने के पीछे की वजह साफ है। मानव श्रम की उपलब्धता से लेकर प्रदूषण निरोधी नीति तक... कई कारणों से अमेरिका जैसे विकसित देश को नहीं लगता कि ऐसे छोटे-छोटे कामों में अपना वक्त और ताक़त ख़र्च करें। सस्ता माल चीन से उठा लेते हैं। चाहे राष्ट्रीय ध्वज ही क्यों न हो!
Wednesday, November 5, 2008
टीवी रिपोर्टरों की खींचतान में गए ओबामा!
ये दो तस्वीरें हैं अमेरिकन इंफॉरमेशन सेंटर नई दिल्ली की जहां आज चुनाव नतीजों के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे। ओबामा की जीत के बाद कई चैनलों के रिपोर्टर ओबामा की इस आदमकद कटआउट के साथ पीटीसी करने के चक्कर में आपसी खींचतान में लग गए। नतीजा... अमेरिकी दूतावास की एक महिला अधिकारी ओबामा को उठा ले गई। हां... इसके पहले दिल्ली के एक नामी महिला कॉलेज की लड़कियों ने ओबामा के इस बुत के साथ ख़ूब तस्वीरें खिंचवाईं।

Monday, September 1, 2008
हमारा बिगड़ा मुकद्दर है... क्या किया जाए
बिहार का मंज़र
हमारा बिगड़ा मुकद्दर है
क्या किया जाए
हमारे घर में समंदर है
क्या किया जाए
है भूख प्यास की शिद्दत
हमारे चेहरों पे
ये अब बिहार का मंज़र है
क्या किया जाए!
-तहसीन मुनव्वर
हमारा बिगड़ा मुकद्दर है
क्या किया जाए
हमारे घर में समंदर है
क्या किया जाए
है भूख प्यास की शिद्दत
हमारे चेहरों पे
ये अब बिहार का मंज़र है
क्या किया जाए!
-तहसीन मुनव्वर
Saturday, August 30, 2008
अब तो ख़ैर हो मौला!
बिहार में बाढ़ से तबाही पर जितना लिखा-दिखाया जाए कम है। लोग त्राहि त्राहि कर रहे हैं। सैंकड़ो बह गए हैं। लाखों फंसे हैं। दाने दाने को मोहताज़ हैं। सही में राहत पहुंचाने की बजाए राज्य और केन्द्र की राजनीति जारी है। हालात पर जितना रोया जाए, बयानबाज़ी को जितना दुत्कारा जाए, व्यवस्था के कान में जूं नहीं रेंगती। सरकारी मदद से दूर लोगों का आसरा अब सिर्फ ऊपर वाले का है। इसे तहसीन मुनव्वर चार पंक्तियों में कुछ इस तरह बयां कर रहे हैं-
कई दिन से हैं भूखे लोग
अब तो ख़ैर हो मौला,
ये जीवन बन गया है रोग
अब तो ख़ैर हो मौला,
नज़र जिस सिम्ट भी उठती है
पानी है तबाही है
हर एक घर में है फैला सोग
अब तो ख़ैर हो मौला!
कई दिन से हैं भूखे लोग
अब तो ख़ैर हो मौला,
ये जीवन बन गया है रोग
अब तो ख़ैर हो मौला,
नज़र जिस सिम्ट भी उठती है
पानी है तबाही है
हर एक घर में है फैला सोग
अब तो ख़ैर हो मौला!
Tuesday, August 26, 2008
जम्हूरियत की मज़बूती या सिर्फ सत्ता की लड़ाई?
परवेज़ मु
शर्रफ़ को गए अभी हफ़्ता भी नहीं बीता कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी आपस में भिड़
गए। चुनावी राजनीति में दोनों की पार्टियां पहले भी भिड़तीं रही हैं लेकिन जिस मक़सद से वे एक हुईं थी वो अभी आधा अधूरा ही हासिल हुआ है। ऐसे में ये वक्त उनके लिए कुछ क़दम और साथ चलने का था। नौ साल की सैनिक तानाशाही के बाद पाकिस्तान अभी अभी उसे मुक्त हुआ है। लोकतंत्र की नई कोंपल यहां फूटी है और ये वक्त उसके पलने-बढ़ने और मज़बूत होने का है। लोकतंत्र की हिमायती ताक़तों ने अपना बहुत कुछ खोकर इस कोंपल को पूरे पेड़ में तब्दील होने का सपना पाल रखा है। लेकिन अवाम की ज़रुरत और उसके सपनों से दूर राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरियां होती हैं। यही मजबूरी नवाज़ के पीएमएल एन और ज़रदारी की पीपीपी की भी है। दोनों एक दूसरे की धुरविरोधी पार्टियां रहीं हैं और एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ कर सत्ता तक पहुंचती रही हैं। मुशर्रफ़ नाम की मजबूरी ने दोनों को एक किया। अकेले पार पाने में नाकाम रही इन पार्टियों ने चुनाव के बाद मिल कर सरकार बनायी। लेकिन गठबंधन सरकार बनाने के बाद भी दोनों ने अपने अपने एजेंडे पर चलने की कोशिश जारी रखा। नवाज़ को मुशर्रफ़ से अपना बदला लेना था तो ज़रदारी को पाकिस्तान की राजनीति में ख़ुद को सेट करना। अपने जनाधार के बूते नवाज़ शरीफ मुशर्रफ़ को एक पल भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे तो एनआरओ (नेशनल रिकांसिलिएशन आर्डर) के ज़रिए वापस लौटे और भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हुए ज़रदारी मुशर्रफ़ के ख़िलाफ एक हद से बाहर जाने को तैयार नहीं थे। मुशर्रफ़ को बेनज़ीर की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराने वाले ज़रदारी अमेरिकी दबाव में ही सही... मुशर्रफ़ को साथ लेकर चलने में ही अपनी भलाई समझने लगे थे। लेकिन उन्होने जब देखा कि आम अवाम, वक्कला (वकीलों) और अदलिया (अदालत और जजों) और सिविल सोसाइटी में हवा उनके खिलाफ बनने लगी है तो वो महाभियोग को राज़ी हुए।
ख़ैर। दबाव की रणनीति के ज़रिए और अमेरिका और सेना के मुशर्रफ़ के पीछे से हाथ खींच लेने की वजह से महाभियोग के पहले ही इस सैनिक तानाशाह से पार पा लिया गया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान की राजनीति में एक खालीपन पैदा हो गया। सैनिक तानाशाह के चले जाने के बाद लोकतांत्रिक ताक़तों के एकजुट रहने की किसी वजह के बचा नहीं रहने का खालीपन। अब किससे लड़ें और किसके ख़िलाफ एक रहें। साझा दुश्मन से निज़ात और साझा मंज़िल पा लेने के बाद ही वर्चस्व की आपसी लड़ाई शुरु होती है। आने वाले समय में पाकिस्तान का मुस्तकबिल कौन तय करेगा। कौन उनकी ज़रुरतों को ज़्यादा अच्छी तरह समझता है और कौन उन्हें बेहतर शासन दे सकता है। अपेक्षाकृत उदारवादी और अमेरिका जैसे देशों की तरफ झुकाव रखने वाली पीपीपी के मुखिया आसिफ़ अली ज़रदारी या फिर दक्षिणपंथी राजनीति करने वाले मियां नवाज़ शरीफ़। चुनाव दोनों में से एक का ही होना है। और वो उसका होगा जो पाकिस्तानी अवाम के ज़्यादा क़रीब होने का संदेश देगा। जो उनकी माली हालत बेशक ना ठीक कर सके... सस्ता आटा चावल दाल बेशक मुहैय्या न करा सके... लेकिन उसके उठाए मुद्दे में साथ खड़े होने का भ्रम दे सके।
राजनीति के पुराने खिलाड़ी नवाज़ शरीफ़ को ये बेहतर पता है कि मौजूदा समय में सरकार में रहने से इसकी नाक़ाबिलियत का ठीकरा उनके सिर भी फूटता। मुद्रा स्फीति और बढ़ती महंगाई से पार पाना कोई आसान काम नहीं और ना ही कबाईली इलाक़ो में सर उठ चुके आतंकवादियों पर काबू पाना। तो डूब रहे जहाज़ पर खड़े हो कर डूबने से बेहतर है किनारे बैठ कर बचाओ-बचाओ चिल्लाना। मतलब अगर नवाज़ सरकार में रहते हुए सरकार को अपने एजेंडे पर चलते हुए न दिखा सकें तो विपक्ष में बैठ कर ख़ुद को सरकार से लड़ते हुए तो दिखा ही सकते हैं। इससे वो अवाम में पीपीपी को एक्सोपोज़ भी कर पाएंगे कि देखो जिन वायदों के साथ वो सत्ता में पहुंची उसे वो भूल चुकी है लिहाज़ा अब बारी उनकी है।
दोनों दलों के इस तरह से अलग होने को पाकिस्तान ही नई नवेली जम्हूरियत के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा। इससे लोकतंत्र विरोधी उन ताक़तों को मज़बूती मिलने की आशंका बढ़ गई है जो मौक़े की तलाश में रहती हैं। हालांकि पाकिस्तान की सेना ने राजनीति से ख़ुद को दूर रखने का फैसला किया है और अमेरिका भी पाकिस्तान में लोकतंत्र के अपने प्रयोग को इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहेगा। फिर भी सरकार अगर कमज़ोर और अल्पमत की हो तो आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
इस सब बातों के बीच नवाज़ और ज़रदारी के अलग होने का एक सकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है। मुशर्रफ़ के बाद उनकी समर्थक पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है और उसके ज़्यादातर सदस्य अपने पुराने नेता नवाज़ शरीफ के साथ ही अपना भविष्य देख रहे हैं। ज़ाहिर है कि संसद में कोई मज़बूत विपक्ष बचा नहीं रहा जो कि मज़बूत लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। ऐसे में पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी और अलग अलग विचारधारा वाली पार्टी को देर सबेर एक दूसरे के खिलाफ़ आना ही था। सो वे आ आ गए हैं। ये अलग बात है कि समय से पहले आ गए हैं। लेकिन नवाज़ शरीफ जानते हैं कि अभी पाकिस्तान में दुबारा चुनाव का सही वक्त नहीं आया है। इसलिए वो विपक्ष में बैठने की बात करके भी पीपीपी की सरकार को गिराने की बात फिलहाल नहीं कर रहे। हालांकि उनसे बतौर विपक्षी पार्टी रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा करना बेमानी होगी, लेकिन वो चाहेंगे कि सरकार तब तक चलती रहे जब तक वो उसे अवाम में लताड़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते रहें। अभी उनकी पार्टी का जनाधार सिर्फ पंजाब में है। लेकिन जिस दिन पीपीपी की तरह पीएमएल एन का भी जनाधार बाक़ी के तीनों राज्यों में भी होता दिखेगा, वो चुनाव में जाने में तनिक भी देर नहीं करेंगे। और ऐसा करते हुए वो सिर्फ सत्ता के लिए लड़ते नहीं बल्कि जम्हूरियत को मज़बूत करते भी दिखेंगें।
शर्रफ़ को गए अभी हफ़्ता भी नहीं बीता कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी आपस में भिड़
गए। चुनावी राजनीति में दोनों की पार्टियां पहले भी भिड़तीं रही हैं लेकिन जिस मक़सद से वे एक हुईं थी वो अभी आधा अधूरा ही हासिल हुआ है। ऐसे में ये वक्त उनके लिए कुछ क़दम और साथ चलने का था। नौ साल की सैनिक तानाशाही के बाद पाकिस्तान अभी अभी उसे मुक्त हुआ है। लोकतंत्र की नई कोंपल यहां फूटी है और ये वक्त उसके पलने-बढ़ने और मज़बूत होने का है। लोकतंत्र की हिमायती ताक़तों ने अपना बहुत कुछ खोकर इस कोंपल को पूरे पेड़ में तब्दील होने का सपना पाल रखा है। लेकिन अवाम की ज़रुरत और उसके सपनों से दूर राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरियां होती हैं। यही मजबूरी नवाज़ के पीएमएल एन और ज़रदारी की पीपीपी की भी है। दोनों एक दूसरे की धुरविरोधी पार्टियां रहीं हैं और एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ कर सत्ता तक पहुंचती रही हैं। मुशर्रफ़ नाम की मजबूरी ने दोनों को एक किया। अकेले पार पाने में नाकाम रही इन पार्टियों ने चुनाव के बाद मिल कर सरकार बनायी। लेकिन गठबंधन सरकार बनाने के बाद भी दोनों ने अपने अपने एजेंडे पर चलने की कोशिश जारी रखा। नवाज़ को मुशर्रफ़ से अपना बदला लेना था तो ज़रदारी को पाकिस्तान की राजनीति में ख़ुद को सेट करना। अपने जनाधार के बूते नवाज़ शरीफ मुशर्रफ़ को एक पल भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे तो एनआरओ (नेशनल रिकांसिलिएशन आर्डर) के ज़रिए वापस लौटे और भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हुए ज़रदारी मुशर्रफ़ के ख़िलाफ एक हद से बाहर जाने को तैयार नहीं थे। मुशर्रफ़ को बेनज़ीर की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराने वाले ज़रदारी अमेरिकी दबाव में ही सही... मुशर्रफ़ को साथ लेकर चलने में ही अपनी भलाई समझने लगे थे। लेकिन उन्होने जब देखा कि आम अवाम, वक्कला (वकीलों) और अदलिया (अदालत और जजों) और सिविल सोसाइटी में हवा उनके खिलाफ बनने लगी है तो वो महाभियोग को राज़ी हुए।ख़ैर। दबाव की रणनीति के ज़रिए और अमेरिका और सेना के मुशर्रफ़ के पीछे से हाथ खींच लेने की वजह से महाभियोग के पहले ही इस सैनिक तानाशाह से पार पा लिया गया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान की राजनीति में एक खालीपन पैदा हो गया। सैनिक तानाशाह के चले जाने के बाद लोकतांत्रिक ताक़तों के एकजुट रहने की किसी वजह के बचा नहीं रहने का खालीपन। अब किससे लड़ें और किसके ख़िलाफ एक रहें। साझा दुश्मन से निज़ात और साझा मंज़िल पा लेने के बाद ही वर्चस्व की आपसी लड़ाई शुरु होती है। आने वाले समय में पाकिस्तान का मुस्तकबिल कौन तय करेगा। कौन उनकी ज़रुरतों को ज़्यादा अच्छी तरह समझता है और कौन उन्हें बेहतर शासन दे सकता है। अपेक्षाकृत उदारवादी और अमेरिका जैसे देशों की तरफ झुकाव रखने वाली पीपीपी के मुखिया आसिफ़ अली ज़रदारी या फिर दक्षिणपंथी राजनीति करने वाले मियां नवाज़ शरीफ़। चुनाव दोनों में से एक का ही होना है। और वो उसका होगा जो पाकिस्तानी अवाम के ज़्यादा क़रीब होने का संदेश देगा। जो उनकी माली हालत बेशक ना ठीक कर सके... सस्ता आटा चावल दाल बेशक मुहैय्या न करा सके... लेकिन उसके उठाए मुद्दे में साथ खड़े होने का भ्रम दे सके।
राजनीति के पुराने खिलाड़ी नवाज़ शरीफ़ को ये बेहतर पता है कि मौजूदा समय में सरकार में रहने से इसकी नाक़ाबिलियत का ठीकरा उनके सिर भी फूटता। मुद्रा स्फीति और बढ़ती महंगाई से पार पाना कोई आसान काम नहीं और ना ही कबाईली इलाक़ो में सर उठ चुके आतंकवादियों पर काबू पाना। तो डूब रहे जहाज़ पर खड़े हो कर डूबने से बेहतर है किनारे बैठ कर बचाओ-बचाओ चिल्लाना। मतलब अगर नवाज़ सरकार में रहते हुए सरकार को अपने एजेंडे पर चलते हुए न दिखा सकें तो विपक्ष में बैठ कर ख़ुद को सरकार से लड़ते हुए तो दिखा ही सकते हैं। इससे वो अवाम में पीपीपी को एक्सोपोज़ भी कर पाएंगे कि देखो जिन वायदों के साथ वो सत्ता में पहुंची उसे वो भूल चुकी है लिहाज़ा अब बारी उनकी है।
मामला चीफ जस्टिस इफ्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की बर्खास्तगी और इसके ख़िलाफ वकीलों के आन्दोलन से शुरु हुआ था जो इमरजेंसी के समय और जजों की बर्खास्तगी और वकीलों पर पाबंदी तक गया। इस आंदोलन ने मुशर्रफ़ के खिलाफ अवाम के गुस्से को एक नया आकार और विस्तार दिया। दोनों ही दलों ने इसका फ़ायदा फरवरी के चुनाव में उठाया। पीपीपी सबसे बड़ी तो पीएमएल एन दूसरी बड़ी पार्टी बन कर उभरी। लेकिन पीपीपी ने इन जजों की बहाली में जितनी देरी की, नवाज़ के लिए राजनीतिक ज़मीन उतनी ही तैयार होती गई। वो वक्कला-अदलिया और प्रेस और सिविल सोसाईटी के जो लोग पहले पीपीपी के साथ थे वो सभी नवाज़ के साथ आते चले गए। इससे ज़रदारी के भीतर राजनीतिक असुरक्षा का भाव और घर करता चला गया। वो जजों तो बहाल कर देते तो इसका सेहरा नवाज़ के सर तो बंधता ही, मुशर्रफ़ के फैसलों को गैरकानूनी ठहराने की स्थिति में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामले खुलने का भी अंदेशा बढ़ता। इसलिए उन्होने राष्ट्रपति बनने के बाद ही जजों की बहाली की शर्त रख दी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों पीपीपी का होने से नवाज़ की राजनीतिक पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है। इसलिए नवाज़ उन्होने राष्ट्रपति पद के लिए ज़रदारी के खिलाफ सईद उल जमा सिद्दीकी को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बना दिया है।
दोनों दलों के इस तरह से अलग होने को पाकिस्तान ही नई नवेली जम्हूरियत के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा। इससे लोकतंत्र विरोधी उन ताक़तों को मज़बूती मिलने की आशंका बढ़ गई है जो मौक़े की तलाश में रहती हैं। हालांकि पाकिस्तान की सेना ने राजनीति से ख़ुद को दूर रखने का फैसला किया है और अमेरिका भी पाकिस्तान में लोकतंत्र के अपने प्रयोग को इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहेगा। फिर भी सरकार अगर कमज़ोर और अल्पमत की हो तो आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
इस सब बातों के बीच नवाज़ और ज़रदारी के अलग होने का एक सकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है। मुशर्रफ़ के बाद उनकी समर्थक पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है और उसके ज़्यादातर सदस्य अपने पुराने नेता नवाज़ शरीफ के साथ ही अपना भविष्य देख रहे हैं। ज़ाहिर है कि संसद में कोई मज़बूत विपक्ष बचा नहीं रहा जो कि मज़बूत लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। ऐसे में पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी और अलग अलग विचारधारा वाली पार्टी को देर सबेर एक दूसरे के खिलाफ़ आना ही था। सो वे आ आ गए हैं। ये अलग बात है कि समय से पहले आ गए हैं। लेकिन नवाज़ शरीफ जानते हैं कि अभी पाकिस्तान में दुबारा चुनाव का सही वक्त नहीं आया है। इसलिए वो विपक्ष में बैठने की बात करके भी पीपीपी की सरकार को गिराने की बात फिलहाल नहीं कर रहे। हालांकि उनसे बतौर विपक्षी पार्टी रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा करना बेमानी होगी, लेकिन वो चाहेंगे कि सरकार तब तक चलती रहे जब तक वो उसे अवाम में लताड़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते रहें। अभी उनकी पार्टी का जनाधार सिर्फ पंजाब में है। लेकिन जिस दिन पीपीपी की तरह पीएमएल एन का भी जनाधार बाक़ी के तीनों राज्यों में भी होता दिखेगा, वो चुनाव में जाने में तनिक भी देर नहीं करेंगे। और ऐसा करते हुए वो सिर्फ सत्ता के लिए लड़ते नहीं बल्कि जम्हूरियत को मज़बूत करते भी दिखेंगें।
Monday, August 25, 2008
भिड़ गए नवाज़ और ज़रदारी
परवेज़ मुशर्रफ़ को गए अभी हफ़्ता भी नहीं हुआ है कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी आपस में भिड़ गए। चुनावी राजनीति में दोनों की पार्टियां भिड़तीं पहले भी रही हैं लेकिन जिस मक़सद से वे एक हुईं थी वो अभी आधा अधूरा ही हासिल हुआ है। ऐसे में ये वक्त उनके लिए कुछ क़दम और साथ चलने का था। नौ साल की सैनिक तानाशाही के बाद पाकिस्तान अभी अभी उसे मुक्त हुआ है। लोकतंत्र की नई कोंपल यहां फूटी है और ये वक्त उसके पलने-बढ़ने और मज़बूत होने का है। लोकतंत्र की हिमायती ताक़तों ने अपना बहुत कुछ खोकर इस कोंपल को पूरे पेड़ में तब्दील होने का सपना पाल रखा है।
...जारी
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Thursday, August 21, 2008
अब दिखेगी नवाज़ और ज़रदारी की टक्कर
परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्ती
फे के बाद पाकिस्तान में सियासत ने एक नई करवट ली है। मुशर्रफ़ के जाने को यहां जम्हूरियत की मज़बूती की तरफ एक और बढ़ा क़दम माना जा रहा है। ये बात सही है कि मुशर्रफ़ ने लोकतंत्र को जड़ से उखाड़ने की कोशिश में सैन्य तख़्ता पलट से लेकर ईमरजेंसी लगाने तक कई काम किए। चीफ जस्टिस इफ़्तिखार चौधरी जैसे जजों को बर्ख़ास्त किया और अदालतों की आज़ादी को घेरे रखा। पाकिस्तान इलेक्ट्रानिक मीडिया रेगुलेशन एक्ट (पैमरा) और प्रेस एंड पब्लिसिटी रेगुलेशन आर्डिनेंस के ज़रिए मीडिया को भी बांधे रखा। लेकिन मुशर्रफ़ के जाने के साथ ये सारे सवाल बेशक पीछे छूट गए हैं। लेकिन पाकिस्तान की जम्हूरियत की मज़बूती के लिए कुछ और सवाल बचे हुए हैं।
फे के बाद पाकिस्तान में सियासत ने एक नई करवट ली है। मुशर्रफ़ के जाने को यहां जम्हूरियत की मज़बूती की तरफ एक और बढ़ा क़दम माना जा रहा है। ये बात सही है कि मुशर्रफ़ ने लोकतंत्र को जड़ से उखाड़ने की कोशिश में सैन्य तख़्ता पलट से लेकर ईमरजेंसी लगाने तक कई काम किए। चीफ जस्टिस इफ़्तिखार चौधरी जैसे जजों को बर्ख़ास्त किया और अदालतों की आज़ादी को घेरे रखा। पाकिस्तान इलेक्ट्रानिक मीडिया रेगुलेशन एक्ट (पैमरा) और प्रेस एंड पब्लिसिटी रेगुलेशन आर्डिनेंस के ज़रिए मीडिया को भी बांधे रखा। लेकिन मुशर्रफ़ के जाने के साथ ये सारे सवाल बेशक पीछे छूट गए हैं। लेकिन पाकिस्तान की जम्हूरियत की मज़बूती के लिए कुछ और सवाल बचे हुए हैं।सबसे बड़ा सवाल है कि नए हालात में मियां नवाज़ शरीफ और आसिफ़ अली ज़रदारी कब तक साथ खड़े रह पाएंगे? ये सवाल अचानक उठ नहीं खड़ा है। ये तब भी था जब ये साथ खड़े हुए थे। लेकिन मुशर्रफ़ से लड़ाई की शोर में ये दबा हुआ था। दोनों साथ आए ही थे मुशर्रफ़ को हटाने के लिए। तो जब इनके साझा दुश्मन मुशर्रफ़ सियासी परिदृष्य से हट गए हैं तो ज़ाहिर सी बात है इनके बीच एकता का साझा बहाना भी ख़त्म हो गया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़, पाकिस्तान की ये दो मुख्य पार्टियां पहले एक दूसरे के खिलाफ लड़ती और संसद तक पहुंचती रही हैं। परवेज़ मुशर्रफ ने इन दोनों राजनीतिक पार्टियों के सुप्रीम नेताओं से जम कर दुश्मनी की। नतीज़ा दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है की तर्ज़ पर इन दोनों पार्टियों के नेता साथ आने को मज़बूर हुए। यूं तो 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान' की इन दोनों पार्टियों की विचारधारा में कोई मौलिक विभेद मुश्किल है। लेकिन ये तो साफ़ है कि नवाज़ शरीफ राइटविंग पॉलिटिक्स यानि दश्रिणपंथी राजनीतिक में भरोसा करते हैं और अपेक्षाकृत कट्टरवादी चेहरा माने जाते हैं। वे पाकिस्तान में अमेरिकी दख़ल की मुख़ालफत करते रहते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्व में अपेक्षाकृत उदारवादी नीति वाली पार्टी का रहा है। इसका झुकाव हमेशा पश्चिमी देशों, ख़ासतौर से अमेरिका की तरफ रहा है। बेनज़ीर के पार्टी की कमान संभालने वाले आसिफ़ अली ज़रदारी की यूं तो अभी कोई ठोस राजनीतिक छवि नहीं बन पायी है। वे बस बेनज़ीर की विरासत को आगे ले जाने की कोशिश में जुटे हैं और पार्टी को पुरानी नीति से अलग नहीं ले जा सकते। इसके लिए उनकी अपनी मज़बूरियां भी हैं।
यानि राजनीतिक पार्टी के तौर पर पीपीपी और पीएमएल क्यू की विचारधारा में जो अंतर है वो ख़त्म नहीं हो सकता। होना नहीं चाहिए। लेकिन अगर दोनों मुख्य पार्टियां एक साथ सत्ता में बैठी रहेंगी तो मज़बूत विपक्ष की भूमिका कौन निभाएगा? मुशर्रफ़ की वजह से वजूद में आयी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) मुशर्रफ़ के जाने के साथ ही ख़त्म नहीं तो बहुत कमज़ोर तो पड़ ही गई है। उसके सांसदों के जल्द ही टूट कर अपने पुराने नेता नवाज़ शरीफ के साथ आ जाने की उम्मीद जतायी जा रही है। तो जब कोई मज़बूत विपक्ष नहीं होगा तो मज़बूत जम्हूरियत की बात बेमानी होगी। अगर पीपीपी-पीएमएल (एन) गठबंधन पर नज़र डालें तो इन दोस्ती के दिनों में भी दोनों के बीच सोच और एप्रोट का अंतर साफ दिखाई देता रहा है। इस्लामाबाद से सटे हिल स्टेशन मरी में जारी घोषणापत्र एक तरह से इन दोनों पार्टियों के बीच का या न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) था। हालांकि इसमें सारा ज़ोर मुशर्रफ़ को हटाने और बरख़ास्त जजों की बहाली पर था जो सरकार को समर्थन देने की नवाज़ शरीफ़ की शर्त और नतीज़ा था। फरवरी में चुनाव नतीजे आने के बाद भी सरकार बनने में तक़रीबन एक महीना लग गया तो वो इसलिए कि ज़रदारी नवाज़ की शर्तों को मानने को तैयार नहीं हो पा रहे थे। लेकिन नवाज़ शरीफ की लगातार ज़िद, सरकार से अपने मंत्रियों के इस्तीफे जैसे क़दम और चुनावी वादा न निभाने के चलते जनता में पीपीपी की लगातार होती फज़ीहत से पैदा हुए दबाव का ही नतीज़ा रहा कि आख़िरकार ज़रदारी को मुशर्रफ़ के खिलाफ महाभियोग लाने का ऐलान करना पड़ा। चौतरफा दबाव की वजह से मुशर्रफ तो निकल लिए लेकिन अब गठबंधन सरकार के सामने पेंच जजों की बहाली को लेकर फंसा हुआ है। नवाज़ ने कई बार समय सीमा तय की है लेकिन बहाली को लेकर फैसला लेने में देरी हो रही है। ज़रदारी को डर है कि अगर बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया गया तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मुकद्दमें फिर से खुल सकते हैं। नवाज़ शरीफ बेशक उन्हें अपनी तरफ से ऐसा नहीं होने का भरोसा दे रहे हों लेकिन ज़रदारी का डर बेवजह नहीं है।
बेशक नवाज़ ने मुशर्रफ के पीछे हाथ धोकर नहीं पड़ने की बात फिलहाल मान ली हो। लेकिन मुशर्रफ़ का दिया जो दर्द नवाज़ ने झेला और अदालत और वकीलों ने जो परेशानी उठायी है उसको देखते हुए ये अचरज़ की बात नहीं कि मुशर्रफ़ के खिलाफ़ देर सबेर कानूनी कार्रवाई शुरु की जाए। पुरानी अदालत बहाल होने की स्थिति में इसमें तेज़ी आ सकती है। मुशर्रफ के जाने के पुराने फैसले असंवैधानिक करार दिए जा सकते हैं। ऐसे में मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच हुआ नेशनल रिकांसिलिएशन एलायंस की जद में आ सकता है। मुशर्रफ के जिस नेशनल रिकांसिलेएशन आर्डर के ज़रिए ज़रदारी पर से भ्रष्टाचार के मामले हटाए गए उसे रद्द किया जा सकता है। ऐसे में ज़रदारी फिर से राजनीतिक तौर पर हाशिए पर धकेले जा सकते हैं। मुशर्रफ क हटाने में हुई देरी के चलते वकीलों ने ज़रदारी के खिलाफ जो मोर्चा खोल दिया उससे भी ज़रदारी सहमे हुए हैं। एतेज़ाज़ एहसन जैसे वकील नेता का उभरना भी ज़रदारी को भारी पड़ सकता है। दूसरी तरफ, नए हालात में ज़रदारी को कमज़ोर करने वाली जितनी भी बातें होगीं वो सब नवाज़ शरीफ को सत्ता के क़रीब ले जाने वाली साबित हो सकती हैं। मुशर्रफ़ के हाथों बहाल हुए मौजूदा जजों ने नवाज़ शरीफ के चुनाव लड़ने की पात्रता पर रोक लगा रखी है। पुराने जज आएंगे तो नवाज़ से ये पाबंदी हटनी तय है। नवाज़ का चुन कर संसद में आने का मतलब है ज़रदारी की तरकश से उस तीर का निकल जाना जिसके बूते वो बाद की राजनीति में नवाज़ को दबा कर रखने की कोशिश कर सकते हैं। राजनीतिक में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता ये तो धुर विरोधी रही पार्टियां पीपीपी और पीएमएल (एन) का मिल कर बनाने के फैसले से ही साफ हो गया। लेकिन इसी राजनीति में कोई स्थायी दोस्त भी नहीं होता ये ज़ाहिर होना बाक़ी है। इन दोनों पार्टियों के लिए ये स्वभाविक भी है क्योंकि ये पहले से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे हैं। आगे भी लड़ेगें। बात सिर्फ समय की है।
नवाज़ शरीफ अभी तुरंत चुनाव नहीं चाहेंगे क्योंकि इससे उनपर अपने स्वार्थ के लिए सरकार गिराने का आरोप लग सकता है और पाकिस्तान की सियासत में अभी जो कुछ भी ठीक होता नज़र आ रहा है वो फिर से ग़लत रास्ता पकड़ सकता है। नवाज़ को ये भी पता है कि फरवरी के चुनाव में उनकी पार्टी ने सिर्फ पंजाब प्रांत में उम्दा प्रदर्शन किया जबकि पीपीपी की पकड़ बाक़ी के तीन राज्यों सिंध, बलचिस्तान और एनडब्ल्यूएफपी में भी है। इसलिए जब तक नवाज़ पूरे पाकिस्तान में अपने लिए आधार नहीं बना लेते तब तक वो चुनाव नहीं चाहेंगे। लेकिन आवाम के सामने वो ज़रदारी को कमतर साबित करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगे। बर्ख़ास्त जजों की बहाली की ज़िद के ज़रिए वो सिविल सोसायटी और वकीलों के चहेते तो बन ही गए हैं... आने वाले दिनों में गठबंधन सरकार के होने वाले फैसलों में भी अपनी चला कर वो वोटबैंक पुख़्ता करने की कोशिश में जुटे रहेंगे। यानि दोस्ती के दिनों में दुश्मनी के हथियार जुटाते और संभालते रहेंगे।
BMW का मतलब 'बिको मत वकीलसाहब'
बीएमडब्ल्यू कार दुर्घटना मुकद्दमें में एनडीटीवी के स्टिंग ऑपरेशन पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आ गया है। मामले में फंसे दोनों वरिष्ठ वकील आरके आनंद और आईयू खान को दोषी पाया गया है। दोनों वकीलों से वरिष्ठ वकील होने का दर्ज़ा वापस लेने की अनुशंसा की गई है और इनकी वकालत पर चार महीने की पाबंदी भी लगा दी गई है।
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BMW मतलब Biko-Mat-Wakeelsahab!!!
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BMW मतलब Biko-Mat-Wakeelsahab!!!
Monday, August 18, 2008
आख़िर गए मुशर्रफ़
मुशर्रफ को आख़िरकार इस्तीफ़ा देना पड़ा। मुख्य तौर पर तीन वजहें रहीं। नवाज़ शरीफ और ज़रदारी के नेतृत्व में राजनीतिक दलों की घेराबंदी, पाकिस्तानी सेना का चुप रहना और अमेरिका का मुशर्रफ़ से पीछे से हाथ खींच लेना। पाकिस्तान में जम्हूरियत की मज़बूती के लिए मुशर्रफ को हटाया जाना ज़रुरी माना जा रहा था। अब मुशर्रफ नहीं हैं लेकिन जम्हूरियत की चुनौतियां अब भी बरकरार है।
किसी जम्हूरियत की मज़बूती के लिए एक मज़बूत विपक्ष का होना ज़रुरी है। मुशर्रफ की विदाई के बाद उनकी बनाई पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है। ऐसे में मज़बूत विपक्ष की भूमिका में कोई बड़ी पार्टी नहीं बची है। दो धुरविरोधी पार्टियां पीपीपी और पीएमएल एन सत्ता में साझीदार हैं। अब जब उनका साझा दुश्मन नहीं रहा तो ऐसे में देखना होगा कि अलग अलग नीतियां लेकर चलने वाली ये दोनों पार्टिया कब तक साथ चलती हैं। इनके बीच हितों का टकराव तो होना ही है। लेकिन अभी मुल्क जिस आर्थिक बदहाली और विधि व्यवस्था की नाकामी का शिकार है उससे पार पाए बग़ैर अगर ये आपस में लड़े तो लोकतंत्र विरोधी ताक़तों को फिर मौक़ा मिल सकता है।
आतंकवाद पर क़ाबू पाते हुए और मुल्क को तरक्की की राह पर ले जाते हुए अगर दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के ख़िलाफ चुनाव लड़ा तो ये पाकिस्तान की नई नवेली जम्हूरियत के हित में होगा। स्वार्थ की वजह से लड़े तो जैसा था वैसे की स्थिति में पहुंचने में तनिक भी देर नहीं लगेगी।
किसी जम्हूरियत की मज़बूती के लिए एक मज़बूत विपक्ष का होना ज़रुरी है। मुशर्रफ की विदाई के बाद उनकी बनाई पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है। ऐसे में मज़बूत विपक्ष की भूमिका में कोई बड़ी पार्टी नहीं बची है। दो धुरविरोधी पार्टियां पीपीपी और पीएमएल एन सत्ता में साझीदार हैं। अब जब उनका साझा दुश्मन नहीं रहा तो ऐसे में देखना होगा कि अलग अलग नीतियां लेकर चलने वाली ये दोनों पार्टिया कब तक साथ चलती हैं। इनके बीच हितों का टकराव तो होना ही है। लेकिन अभी मुल्क जिस आर्थिक बदहाली और विधि व्यवस्था की नाकामी का शिकार है उससे पार पाए बग़ैर अगर ये आपस में लड़े तो लोकतंत्र विरोधी ताक़तों को फिर मौक़ा मिल सकता है।
आतंकवाद पर क़ाबू पाते हुए और मुल्क को तरक्की की राह पर ले जाते हुए अगर दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के ख़िलाफ चुनाव लड़ा तो ये पाकिस्तान की नई नवेली जम्हूरियत के हित में होगा। स्वार्थ की वजह से लड़े तो जैसा था वैसे की स्थिति में पहुंचने में तनिक भी देर नहीं लगेगी।
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