Tuesday, September 11, 2007

विज्ञापन की दुनिया के कुछ बेहतरीन नमूने!

विज्ञापन की दुनिया काफी दिलचस्प है। कम शब्दों में बहुत कुछ कहना होता या फिर सिर्फ एक तस्वीर के ज़रिए। पेश है विज्ञापन की दुनिया के कुछ ऐसे नमूने जो मेल के ज़रिए एक-दूसरे तक पहुंच रहे हैं।











हो सकता है कि आपमें से कईयों की निगाह इन पर पड़ी हो। लेकिन बाकी भी देखें कि किस तरह के विज्ञापनों को बेहतरीन माना जाता है। कुछ और ऐसे ही विज्ञापन अगली बार...


Wednesday, September 5, 2007

कृष्ण ने किया तो रासलीला, बाक़ी का कैरेक्टर ढ़ीला!

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समय में बेहतरीन काम किए। मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाई। कई और राक्षसों का खात्मा किया। प्रजा को संरक्षण दिया। हाई स्टैंडर सेट किए। इसलिए श्रीकृष्ण को भगवान मानने वालों को मेरा सलाम है। आख़िर उन्होने ने ही कर्ण की रथ के फंसे पहिए के वक्त मौक़ा निकलवाया। अर्जुन से तीर चलवाया। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घेर कर मारने की रणनीति समझायी। अश्वत्थामा के मरने की अफवाह फैला द्रोणाचार्य को निस्तेज किया। शिखंडी को आगे कर पितामह को ढ़ेर करवाया। पांडवों को जिताया। कौरवों को हराया। अगर वो अपना पाॅलिटिकली करेक्ट रोल न निभाते तो हो सकता है कि युद्ध की शक्ल कुछ और होती और महाभारत के बाद का भारत कुछ और। ये अलग बात है कि हज़ारों साल पहले पांडवों की जीत के बाद भी आज कौरवों का ही राज है। नुक्कड़ों...मोहल्लों में द्रौपदी का चीरहरण आज भी बदस्तूर जारी है। पर आज पांडव कहीं नज़र नहीं आते। या अगर वो हैं तो उनको आज के हालात नज़र नहीं आते।

हज़ारों साल पहले पांडव पांच थे। आबादी तेज़ी से बढ़ी है...ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में। पांडवों बाद की उनकी पुश्तों ने एहतियात बरती हो तो भी चलिए... कम से कम उनके पुश्तों की संख्या 50 हज़ार तो होती...पांच करोड़ ना सही। पर आज तो 50 पांडव भी नज़र नहीं आते। फिर कृष्ण जी ने कैसे लोगों को शिक्षा दी? किन लोगों को घर्म के लिए लड़ना सिखाया? किनको जिताया? कहां गए धर्म की हानि के समय उसकी रक्षा के लिए पैदा होने का वादा करने वाले धर्मराज? ऐसा नहीं है कि मैं श्रीकृष्ण के अस्तित्व और उनके किए पर सवाल उठा रहा हूं। ऐसा करुं तो उनको मानने वाले मुझे पूतना के पास भेज देंगे। मैं तो सिर्फ आज की तारीख में उनको देखने की कोशिश कर रहा हूं। भगवान को याद कर रहा हूं। अपने आसपास उनको ढूंढ रहा हूं।

निराश होने की ज़रुरत नहीं। अधर्म पर धर्म की विजय के कर्ताधर्ता के रुप में ना सही, पर व्यक्तित्व के कई पहलुओं में वो आज भी नज़र आते हैं। जैसे कि चुरा कर मलाई खाने वाले आज भी हैं। औऱ वे अकेले नहीं हैं। करोड़ों की तादाद में हैं। प्राईवेट फार्म से लेकर सरकारी दफ्तर तक में हैं। टेबल के नीचे से मलाई खाते हैं। जब मिल जाता है तो अपने बाल-गोपाल में बांटना नहीं भूलते। ऊपर से नीचे तक 'कट' देते हैं। क्या मजाल कि आप उन पर सवाल उठा दें। अशोक मल्होत्रा जैसे जो पकड़े जाने के बाद कहते हैं...मैं नहीं माखन खायो... । कृष्ण दफ्तरों में भी होते हैं। किसको कैसे लंगड़ी लगानी है...किसको कैसे आगे बढ़ाना है...किसको प्रमोशन देना है किसको डिमोट करना है इस रोल को निभाने वाले कृष्ण। अपने अपने धर्मयुद्ध में लिप्त।

आज की चीरहरित होती स्त्रियों की साड़ी में बेशक श्रीकृष्ण ना समाएं। ना ही उसकी साड़ी को हज़ारों मीटर लंबी कर दें। पर गोपियों के साथ रासलीला की उनकी तरह मंशा पालने वालों की तादाद आज लाखों में है। करोड़ों में हैं। आज के कृष्ण नदी किनारे नहीं... स्वीमिंग पूल के आसपास होने की कोशिश करते हैं। या कॅालेज गेट और गर्ल्स स्कूल के आसपास की चाय की दुकानों पर होते हैं। या फिर बड़े बड़े मॅाल में खरीददारी में जुटी लड़कियों के पास मंडराते। बसों में महिलाओं की मज़बूरी की भीड़ के बीच भी उन्हें रासलीला करने की कोशिश करते हैं। ओछी हरकत करना नहीं भूलते। जिनको वे गोपियां मान लेते हैं वे अगर सचेत ना रहें तो उनके कपड़े उतार वो वृक्ष की डाल पर नहीं... अपने घर ही ले जाएं।

ग़रीब दोस्त सुदामा की झेंप मिटाने वाला कृष्ण भी आज कहीं नज़र नहीं आता। सुदामा कांख में चावल दबाए खड़ा रह जाता हो... कृष्ण को आॅफर नहीं कर पाता हो... पर उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। वैसे आज के कई सुदामा स्मार्ट हो गए हैं। कृष्ण बेशक मक्खन के दीवाने रहें हों... पर उन्होंने खुद कभी भैंस को दूहा हो ऐसी जानकारी नहीं मिलती। पर आज तो कृष्ण वही बनते हैं तो देश को दूह सकें। व्यवस्था को निचोड़ सकें।

आज पुराने कृष्ण की पूजा होती है। होनी चाहिए। मलाई खाने और गोपियों के साथ उनकी क्रीड़ा रासलीला है। लेकिन बाकी वही करते हैं तो कहते हैं कि कैरेक्टर ढीला है। ये क्या बात हुई! ज़माना बदल गया है। और बदले हुए ज़माने के ये भी तो पूजनीय हैं।

Tuesday, September 4, 2007

जब सलमान की बहन से नज़रें मिलीं

खचाखच भरी अदालत। सलमान का मुकद्दमा। जोधपुर हाईकोर्ट में जस्टिस पवार की अदालत में तिल रखने की जगह नहीं। सलमान के स्थानीय दोस्त शिशुपाल और उसके कुछ लोगों के साथ किसी तरह अंदर पहुंची अलवीरा। हर किसी के लिए कौतुहल की पात्र। हर कोई उसे देख रहा था। अलग अलग तरह की नज़रें। सम्मान से देखने वाली भी और असम्मानजनक भी।

न चाहते हुए भी मेरी नज़रें उसकी तरफ उठ जाती थीं। मैं बार बार उसके भाव पढ़ने की कोशिश करता था। इसका ख्‍याल रखते हुए कि मेरी नज़रों से उसे कष्ट ना हो। वो हर सुनवाई पर अदालत आ रही थी। पहली बेंच ने जब मामला सुनने से इंकार किया तब भी और जब दूसरी बेंच में मामला अगले दिन के लिए लिस्ट हुआ तब भी। जेल में हरेक रात सलमान पर भारी पड़ रहा था। उससे ज़्यादा परिवारवालों के लिए भारी वक्त था। ये अलवीरा के चेहरे से साफ झलकता था। जैसे ही सलमान के वकीलों और अदालत के बीच बात शुरु होती थी, अलवीरा खड़ी हो जाती थी। हरेक बात सुनने की कोशिश करती थी। जब कोर्ट को दलील पसंद आती थी तो अलवीरा के चेहरे पर उम्मीद झलक आती थी। जब सुनवाई आगे के लिए टलती थी तो फिर वो भारी कदमों से अदालत के बाहर निकल आती थी। बाहर की भीड़ से बचाने के लिए सलमान का बॅाडी गार्ड शेरा इंतज़ार कर रहा होता था।

सलमान ने जो कुछ किया यहां उस पर नहीं विचारा जा रहा। जेल में बंद स्टार भाई के लिए बहन की भावनाओं को पढ़ने की कोशिश भर है ये। अदालत में मामला कई दिनों तक खिंचा। कई मौक़ों पर वो बिल्कुल मेरी कुर्सी की बगल वाली कुर्सी पर होती थी। तब उसके भावों को पढ़ना मुश्किल होता था। इसलिए मैं दूर दूर ही रहने की कोशिश करता था। उसकी हरेक गतिविधि को देखने की कोशिश करता था। कई बार उसके चेहरे पर बिल्कुल कोई भाव ही नहीं होता था। लेकिन आंखे नम सी होती थी। बीच बीच में अपने वकीलों से बात कर लिया करती थी। या मुंबई से साथ आए लोगों से। कभी उत्तेजना में नहीं देखा मैंने उसे। बिल्कुल शांत रहती थी। लेकिन मन में ज़रुर कई लहरें चलती होगीं। ख़ासतौर पर इसलिए भी कि इसी मामले के चार और अभियुक्तों को निचली अदालत ने बरी कर दिया। पांचवे को सेशन कोर्ट ने छोड़ दिया। जबकि उन सबके के खिलाफ भी वही परिस्थिजन्य साक्ष्य थे जिनके आधार पर सलमान को सज़ा सुनाई गई है। अभियोजन पक्ष ने उन पांचो को सज़ा दिलाने के लिए ऊपरी अदालत का दरवाज़ा भी नहीं खटखटाया। परिवारवालों को ये लगना स्वाभाविक है कि सिर्फ सलमान को जानबूझ कर निशाना बनाया गया है।

अलवीरा को पढ़ पाने की इसी कोशिश में एक बार मेरी नज़र उसकी नज़र से मिल गई। हुआ ये था कि अदालत ने मामले की सुनवाई अगले दिन के लिए तय कर दी थी। परिवार वाले जल्द से जल्द ज़मानत चाहते थे। तो जैसे ही मामला एक दिन के लिए औऱ आगे बढ़ा, मैंने अलवीरा की प्रतिक्रिया नोट करनी चाही। उसकी तरफ देखा तो इत्तेफाकन वो उसकी निगाह मुझसे टकरा गई। मैंने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं की थी। ना तो कैमरे पर और ना ही अदालत में। वो कुछ बोल पाने की हालत में नज़र नहीं आती थी। इसलिए। लेकिन जब नज़रें टकरा गईं तो मेरे मुंह से निकला सॅारी...। ये सॅारी मामला एक दिन और बढ़ जाने के लिए था। उसने मेरे सॅारी को समझा। पलकें झुका उसे एक्सेप्ट करने सा भाव दिया। फिर कुर्सी पर बैठ गई। लेकिन उसने नज़रें नहीं हटाई। उसकी नज़र में एक सवाल था। सवाल सलमान मामले मे हो रहे मीडिया ट्रायल का। उसने बोला कुछ नहीं। फिर मुझे ही संदेश देना पड़ा। 'वी आर विद यू।'

ये एक अदालत से दोषी करार सलमान का साथ देने जैसा संदेश नहीं था। बल्कि एक ऐसी बहन के लिए था जो अपने भाई की रिहाई के लिए अदालत के चक्कर काट रही थी। चाहती तो वो होटल के एसी कमरे में बैठी रह सकती थी। मुकद्दमा तो वकीलों को लड़ना था। पर उसकी नज़रें हमेशा जता रही थी कि वो सलमान के बाहर आने का रास्ता देख रही है। और वो उसे रिहा करा कर ही लौटी।

Monday, September 3, 2007

रवीश जी, मुझे भी जाना है स्वर्ग की सीढ़ी तक

(इन बेतुकी पंक्तियों को पढ़ने के पहले कस्बा पर रवीश का लिखा पत्रकारिता का स्वर्ग काल पढ़ें। तभी आप इसे पूरे कंटेक्स्ट में इसे समझ पाएंगे। शुक्रिया)

आदरणीय रवीश जी,

मुझे जलन हो रही है। आखिर मैं क्यों नहीं पहुंचा स्वर्ग की सीढ़ी तक। मुझे क्यों नहीं एसाईन किया जाता इस तरह के काम के लिए। क्यों बार बार नरक दिखाने के लिए ही कहा जाता है। वो भी वो नरक जो इसी धरती पर है...अपने इसी महान भारत देश में। अभी अभी बाॅडी बिल्डर सलमान खान जोधपुर जेल में नरक की ज़िंदगी बिता रहे थे। बिना एसी कूलर के। न बढ़िया खाना और ना छरहरी-भरीपूरी लड़कियों के साथ नाचना गाना... एक चिंकारा को गोली क्या मारी, रह रह कर ज़िंदगी नरक हो जाती है। उनकी नरक की ज़िंदगी को कवर करने मैं वहां था। सलमान में और मेरे में अंतर सिर्फ इतना था कि वो जेल में क़ैद थे और मैं जोधपुर शहर में। वो सात दिन रहे और मैं दस दिन। वो मुंबई लौटे तो हज़ारों समर्थकों की हौसलाअफ़ज़ाई ने उनके मिजाज़ को स्वर्ग सी अनुभूति दी होगी। पर मुझे स्वर्ग की सीढियां नसीब नहीं।

बात सिर्फ इसी नरक की नहीं है। पिछले दिनों बुंदेलखंड में था। पानी के बिना यहां लोगों की ज़िंदगी नरक है। कुंए और गढ्ढों में जमा कचरा पानी पीते हैं। पानी के लिए महिलाएं कई-कई किलोमीटर तक चलती हैं। हमें भी चलना पड़ा। उनकी नरक की ज़िंदगी जानने और दिखाना के लिए हमें नरक के दरवाज़े तक जाना पड़ा। पर क्या मुझ में इतनी क़ाबिलियत नहीं कि कोई मुझे भी स्वर्ग के मुहाने तक जाने दिया जाए।

यहां कब तक गोहाना के दलितों, विदर्भ के किसानों, झारखंड के आदिवासियों, सरकारी अस्पताल में दाखिल मरीज़ो ब्ला... ब्ला... ब्ला... की नरक सी ज़िंदगी दिखाते रहेंगे। क्या फायदा उसका। वो तो नरक में ही हैं और रहेंगे... सोच के बेतुकेपन से हमारी भी ज़िंदगी रह-रह कर नरक हो जाती है। एक नारकीय रिपोर्ट खत्म नहीं होती कि दूसरी आ जाती है। आखिर क्या हमने ठेका ले रखा है नारकीय चीज़ें दिखाने का। क्या सिर्फ यही पत्रकारिता है। नहीं। पत्रकारिता का स्वर्ग काल कुछ और है।

जिसके पास जो होता है उसका उसमें इंटरेस्ट कम हो जाता है। जिनकी नारकीय ज़िंदगी हम दिखाते रहते हैं, उनका खुद का उसे देखने में दिलचस्पी नहीं। वे ऊब चुके हैं उससे। वो ये देखना चाहते हैं कि किस तरह संजय दत्त भगवान की भक्ति कर जेल से बाहर आए और नरक में दुबारा नहीं जाने के लिए मंदिर मंदिर घूम रहे हैं। शायद वो सोचते हैं कि न्यूज़ चैनल पर ही सही, आस्था का प्रोग्राम देख कर उनकी ज़िंदगी भी नरक से निकल आएगी। स्वर्ग की सीढ़ी तो उनके लिए रामबाण है। पाॅजिटिव स्टोरी है। दिखाना चाहिए। उस सीढ़ी तक आने-जाने का खर्चा भी बताना चाहिए। कांवर लेकर तपती सड़क पर चलने वाले कई भक्त हैं जो कंबल ओढ़ कर वहां पहुंच जाएगें। हमारी स्टोरीज़ उनको नरक से नहीं निकाल पाती लेकिन इस एक कोशिश से वो स्वर्ग के सोपान तक पहुंच जाएंगे।

आपने बताया कि द़ौपदी ने डर के आपको फोन कर आॅफ द रिकार्ड बात की। मतलब कोई बाईट नहीं मिली। तो क्या हुआ। पैकेज तब भी बना सकते हैं। द़ौपदी से मिली जानकारी के आधार पर स्वर्ग का रीक्रिएशन कर तो दिखा ही सकते हैं। स्टिंग ठीक नहीं होगा, पर एक फीचर तो बना ही सकते हैं। एंकर आप ही करेंगे। वैसे भी अब तक आपने ज़िंदगी की इतनी तरह के नारकीय आस्पेक्ट को कवर कर लोगों तक पहुंचाया है कि आप भी थोड़ा चेंज चाहते होगें। मुझे जब तक मौक़ा मिले तब तक हो सकता है कि बहुत देर हो जाए। पर आपके पास अपना बजट है।

आप चाहें तो अपनी स्पेशल रिपोर्ट भी बना सकते हैं। स्वर्ग में मध्यम वर्ग है या नहीं। है तो किस हाल में है। लोन लेकर कार खरीद रहा है कि नहीं। यहां का सतपाल कहीं वहां जा कर सत्या पाॅल तो नहीं बन गया। वहां 'हैव और हैव नॅाट' के बीच का फर्क कितना है। क्या दलितों की सोसाईटी स्वर्ग में है या नहीं। बड़ा सवाल तो ये कि क्या किसी दलित को स्वर्ग में जगह मिली भी या नहीं। या धरती पर नरक काट काट कर गए को वहां भी नरक में धकेल दिया गया है। वहां रिजर्वेशन का क्या हाल है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है या सरकार के पास। सवाल बहुतेरे हैं। पर ठहरिए... इन सवालों पर रिपोर्ट करेंगे तो टाईप्ड लगेंगे। कुछ अलग तरह से करना होगा। स्वर्ग के उस प्रभामंडल को बनाए रखना होगा जिसकी वजह हर कोई स्वर्ग जाना चाहता है। ये जानते हुए की भी शरीर छोड़ने के बाद ही जा सकता है...लालच कम नहीं होती। 'धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है...यहीं है...यहीं है' को तो हम सबने कच्ची पक्की स्टोरीज़ कर कर के झुठला ही दिया है। तो, अब तो जो 'स्वर्ग है वो वहीं है...वहीं है...वहीं है...' और इसे बना रहने देने में ही भलाई है। स्वर्ग जाने की लालच रखने वालों की भी और उसकी सीढ़ियां ढुंढ़वाने वालों की भी।

एक बार सीढ़ी का पता चल गया है तो इंवेस्टिगेशन का आधा काम तो हो ही गया है ना। दूसरे की ख़बर टीप कर दिखाने में कोई हर्ज थोड़े ही है। शूट ना करना चाहें तो ट्रांसफर ले लेंगे। वैसे भी स्वर्ग की स्टोरी में रिसर्च की ज़रुरत नज़र नहीं आती। कुछ भी कह देंगे...दिखा देंगे, यहां लोग हाथों हाथ लेंगे। अभी तक के कामों की वजह से शायद ही किसी ने आपका आॅटोग्राफ मांगा हो। पर एक बार अगर आपने अपने अंदाज़ में स्वर्ग पर स्पेशल रिपोर्ट कर दी तो फिर आप रब और ईश के दूत के तौर पर देखे जाने लगेंगे। आपके नाम रवीश की नई व्याख्या होगी। ट्रैकिंग का शौक भी पूरा हो जाएगा। इनविजीबल इंडिया दिखाने के लिए हो सकता है कि पत्रकारिता का एक और पुरस्कार ही मिल जाए।

पर एक बात मत भूलिएगा। मुझे भी जाना है स्वर्ग की सीढ़ी तक!

(ये रचना रवीश के व्यंग्य का विस्तार मात्र है। समानता संयोग से हो सकती है। इसके लिए लेखक ज़िम्मेदार नहीं है। किसी भी विवाद का हल स्वर्ग की अदालत में होगा।)

Wednesday, August 22, 2007

बोनलेस के बाद अब मज़ा लीजिए हेडलेस चिकन का!

(शाकाहारी ब्लागर बंधु इस पोस्ट के लिए कृपया माफ करेगें)

प्रिय ब्लॅाग पाठकों,

यूं तो चिकन कई प्रकार के होते हैं। देसी चिकन और फार्म वाले चिकन। इन्हें कई तरह से तैयार किया जाता है। तंदूर भी और ग्रेवी वाला भी। कईयों को बोनलेस में मज़ा आता है। पर अब चिकन प्रेमियों के लिए हाज़िर है हेडलेस चिकन।

ये व्यंजन बनाया अमेरिका में बैठे भारत के राजदूत रोनेन सेन ने। कह दिया कि परमाणु करार का विरोध करने वाले हेडलेस चिकन की तरह हैं। गर्मागरम व्यंजन भारत पहुंचा। हिन्दी में अनुवाद हुआ बिना सिर वाली मुर्गी। पर जब संसद में हंगामा हुआ तो पता चला कि उनके कहने का मतलब था बिना भेजे वाली मुर्गी। मतलब कि करार का विरोध करने वाले बेवकूफ हैं। थोड़ा और नीचे उतरते तो शायद करार विरोधियों को बर्डफ्लू से पीड़ित चिकन कह देते। पर गनीमत है कि सिर्फ हेडलेस ही कहा। हालांकि अब सेन ने अपने कहे पर माफी मांग ली है। इसलिए वो मामला ख़त्म मान लिया गया है। पर जाने अनजाने हमारे हाथ हेडलेस चिकन बनाने की विधि हाथ लग गई।

ये व्यंजन खाने के लिए नहीं है। सिर्फ बनाने के लिए है। अगर आपका किसी से किसी मुद्दे पर विरोध हो तो आप उसे हेडलेस चिकन बना दें। बिना भेजे वाला करार दे दें। ना भेजा होगा ना वो आपका भेजा फ्राई करेगा। आख़िर उंची शिक्षा का इतना तो फायदा होना चाहिए कि ग़ाली भी दें तो व्यंजन की तरह लगे।

आपका
हेडलेस ब्लागर

मेरा पहला प्यार...जो अब तक मेरी बीवी से भी छिपा है!

प्यार प्यार होता है। पहले प्यार की तो बात ही क्या। छिपाए नहीं छिपता। बशर्ते आप चाहें। पर कई बार आप जब खोलना भी चाहें तो छिपा रहता है। क्योंकि वो प्यार ही ऐसा होता है। फिर भी दुनिया उस प्यार को मानने को तैयार ही नहीं होती। और जब आपकी दुनिया आपके घर में सिमट आए...मतलब आप शादीशुदा हो जाएं तो आपकी बीवी को तो हरगिज़ ये क़बूल नहीं होगा कि आपका प्यार ऐसा होगा। वो भी पहला प्यार। ख़ासतौर पर जब आपने खुद को एक प्यारे इंसान के तौर पर पोर्टे कर रखा हो। दुनियादारी से मिली इसी सीख की वजह से मैंने अपनी बीवी को अब तक अपने पहले प्यार के बारें में नहीं बताया। सच बता भी दूं तो खामख़्वाह शक करेगी। कहेगी मैं ही मिली हूं बेवकूफ बनाने को। बरगलाना किसी और को। नस नस पहचानती हूं तुम्हें।

तो इसी डर से मैंने अबतक अपनी धर्मपत्नी पत्नी को अपने पहले प्यार के बारे में नहीं बताया। ये सोच कर कि अगर वो शक नहीं करेगी तो शायद भरोसा भी ना करे। पर लगा कि आप सबों को बता सकता हूं। क्योंकि मन में कुछ भी छिपाने की आदत नहीं रही। कल को मौक़ा लगे तो आप बता देना मेरी बीवी को। मेरे निर्दोष होने का सर्टिफिकेट देते हुए। वो भरोसा कर लेगी। बहुत निर्दोष है। अपने पति के अलावा उसे किसी की बात पर शक नहीं होता। इतनी निर्दोष कि आपकी सौ झूठी बातों पर भरोसा कर ले पर मेरी एक सच्ची बात पर सौ सवाल। इसलिए आपको वकील बना रहा हूं। जज तो वही रहेगी।

तो मीलार्ड.... मेरा तर्क है कि प्यार की कम से कम 72 परिभाषाएं हैं। एक वाक्य में हम भगवान से प्यार करते हैं। दूसरे वाक्य में हम अपने कुत्ते से भी प्यार करते हैं। तो किस प्यार में क्या आकर्षण तलाशा जाए कि वो वाकई में प्यार ही लगे। लालच या मौक़ापरस्ती नहीं। पर ये तय करना मुश्किल हो जाता है। बेशक मेरे केस में ना हो। क्योंकि... हां मैंने कई कई बार प्यार किया है। शादी हो गई तो क्या। आज भी कईंयों से प्यार करता हूं। आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ना तो मेरे प्यार को ना तो गुनाह ठहरा सकते हैं और ना ही क़ैद कर सकते हैं।... और मेरे पहले प्यार की याद तो आप कभी मिटा ही नहीं सकते। फिर तो ये मुकद्दमा ही बेकार है। आपकी ये अदालत अर्थहीन।

आप वैसे ही प्यार से पूछ लो। क्या रहा मेरा पहला प्यार। जो लाया मेरे जीवन में बहार। इकलौता बेटा होने की वजह से हमेशा मां को लगता रहा कि कहीं मेरे साथ बुरा ना हो जाए। इसलिए वो मेरे कई प्यार को ठुकराती रही। पतंग उड़ाने के प्यार को कि कहीं छत से ना गिर जाए। क्रिकेट में कार्केट की गेंद के इस्तेमाल के प्यार को...कि कहीं गेंद से चोट ना लग जाए। फुटबाल में फारवर्ड खेलने के प्यार को कि धक्का मुक्की ना हो जाए। लकड़ी के डंडे को हाॅकी स्टिक के तौर पर इस्तेमाल के प्यार को कि कहीं किसी से लड़ाई ना हो जाए। बस की छत पर बैठ खुली हवा खाते सफ़र के प्यार को कि कहीं चलती बस से गिर ना पडूं।। पोखर में चचेरे भाईयों को नहाते देख खुद तैरना सीखने की इच्छा के प्यार को कि कहीं डूब ना जाऊं। यहां तक कि दूर जाकर... नेतरहाट में पढ़ने के प्यार को और छात्रावास में अकेले रहने के प्यार को भी...कि बीमार पड़ जाउं तो देखभाल कौन करेगा।

...पर इतनी प्यारी मां होते हुए भी वो मेरे पहले प्यार को रोक नहीं पायी। वो था हीरो की 24 इंच की साईकिल कसा कर उसकी सवारी का प्यार। उसे लगता रहा कि अगर साईकिल पर निकला तो ट्रक के नीचे आ जाउंगा। कोई टक्कर नहीं भी मारा तो भी मैं मारा जाउंगा। इसलिए गाड़ी या रिक्शे में ही ठीक हूं। साईकिल खरीद कर देना ठीक नहीं। फिर भी खरीद दिया। क़रीब साढ़े पांच सौ की।

आज सपने कहीं बड़े हो गए हैं। पर उस साईकिल की नाचती रिम की वो चमक आज भी आंखों में है... जब अपनी साईकिल अपना पहला प्यार था..! उसकी गद्दे वाली सीट... उसका बैक करियर जिस पर किसी को भी बिठा सकता था। कुछ और पैसे दे हैंडिल कैरियर भी लगवाया... ताकि किताब कांपी लगा सकें। आईना और झालड़ के बिना... ताकि बेसिक लुक दे। जंक लगने से बचाने के लिए मिट्टी तेल की मालिश.... पर आज की बीवी को ये कौन समझाए कि एक लड़के का पहला प्यार ऐसा भी हो सकता है। कह दूं कि दीप्ती नवल... अनीता राज... किमी काटकर या फिर हेलेन ही सही... तो शायद एकबारगी वो मान ले। कि ऐसा हो सकता है। हा हा हा। आप भी ठहाके लगाईए।

Sunday, August 19, 2007

हाथों का इस्तेमाल कुछ ऐसा भी!

हाथ कई काम आते हैं। अच्छे काम में... कम अच्छे काम में और बुरे काम में भी। किसी को कुछ देने या किसी से कुछ छीनने के काम... हाथ जोड़ने या फिर तोड़ने के काम। हाथ लगाने या खींचने में। सहारा देने या छुड़ाने में। कई बार हमें किसी काम में दूसरों का हाथ नज़र आता है। जैसे भारत में होने वाली हर आतंकी घटना में आईएसआई का हाथ। कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं फिर दाऊद है जो हमारे हाथ ही नहीं आता। कांग्रेस कहती है कि उसका हाथ ग़रीबों के साथ। परमाणु डील पर अमेरिका से हाथ मिलाने पर लेफ्ट सरकार से हाथ खींचने की बात कर रही है। कोई किसी के हाथ में आकर खिलौना हो जाता है। कहते हैं कि हर सफल मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है। हाथ हिला पास बुलाया जाता है और दूर रहने का इशारा भी। सहलाया भी जाता है और पीटा भी। सिर पर हाथ रख आगे बढाया जाता है और हटा कर गिराया भी। हाथों के इन परंपरागत इस्तेमाल से अलग कुछ अलग हाथ देखिए।











हाथों को रंग कर बनाए गए अनोखे चित्र




Friday, August 17, 2007

जहां हैंडपंप देख कर शादी होती है

हमीरपुर ज़िले के सिसोलर गांव में एक हैंडपंप से पानी भरने की ख़ातिर एक व्यक्ति ने चार लोगों को गोली से उड़ा दिया। इसी सिलसिले में वहां गया। पानी की समस्या कई कई रुप यहां देखने को मिले।

लेकिन सबसे दिलचस्प कहें या दुर्भाग्यपूर्ण कि कई गांवों में लड़कों की शादी एक समस्या बन जाती है। लड़की वाले आते हैं तो पहले गांव में पानी की व्यवस्था देखते हैं। चालू हालत में हैंडपंप घर के आसपास हो तो बात बनते देर नहीं लगती। लेकिन अगर पानी दूर कुंए से लाना हो तो कई मांबाप अपनी बेटी देने को तैयार नहीं होते। हालांकि हर बार ऐसा नहीं होता लेकिन सोचिए जिन कुछ मामलों में ही ऐसा होता होगा कितनी परेशानी वाला होगा। लड़की के लिए अगर थोड़ा क़ाबिल लड़का मिल भी रहा हो तो पानी की कमी रिश्ता नहीं होने देती। और लड़कों की सोचिए। क्या बीतती होगी दिल पर।

ऐसा भी नहीं है कि हर कोई वहां अपना हैंडपंप लगा ले। ज़मीन के नीचे पानी बहुत कम है। चट्टान ज़्यादा हैं। चाह कर भी बोरिंग नहीं होती। होती भी है तो हैंडपंप जल्द सूख जाते हैं। इसलिए कई इलाक़े में तो लोग हैंडपंप पर ताला लगाने से भी नहीं चूकते। तीन साल से सूखा पड़ा है। इसलिए ग्राउंड वाटर रिचार्ज भी नहीं हो पा रहा। सरकार कुछ नहीं कर रही। किसान परेशान हैं। ऊपज नहीं हो रही और लोग दाने दाने को मोहताज।

Tuesday, August 14, 2007

कैमरा भी कर सकता है रिपोर्टर

नीरज गुप्ता को आप में से कई जानते होगें। अरे वही 'वारदात' आजतक वाले... जो बाद में आईबीएन सेवेन में 'क्राईम द किलर' करने लगे। वे जब कैमरे के सामने होते हैं तो सुंदर दिखते हैं। पर जब कैमरे के पीछे होते हैं तो ज़्यादा सुंदर दिखाते हैं। अगर हम और आप दुनिया की कई चीज़ों को उतनी खूबसूरती के साथ नहीं देख पा रहे जितनी कि देखनी चाहिए... तो इसके पीछे एक बड़ी वजह ये है कि नीरज रिपोर्टर बन गए। अगर वे पेशे के तौर फोटोग्राफी कर रहे होते तो शायद बात कुछ और होती। लेकिन अपने व्यस्त क्षणों में भी लंबी छुट्टी लेकर वे कभी एशिया तो कभी मलेशिया घूम आते हैं। यादों के लम्हों की कुछ तस्वीरें ले आते हैं। कभी मोबाईल कैमरे से खींची तो कभी दूसरे कैमरे से। उनकी खींची कुछेक तस्वीर हाथ लगी है। आपकी नज़र कर रहा हूं। दिलचस्प बात ये है कि ये तस्वीरें किराए के कैमरे से खींची गईं हैं।

लद्दाख में इसी तरह की खूबसूरती है। एकबार जाने पर लौट कर आने की इच्छा नहीं होती।

लेह से क़रीब डेढ़ सौ किमी दूर पैगॅाग त्सो। 14,500 फीट की उंचाई पर खारे पानी का झील

सिंधु नदी जिसके किनारे आर्य सभ्यता का जन्म हुआ।

Sunday, August 12, 2007

एक पत्रकार की दुखद मौत, हमारी श्रद्धांजलि


ज़ी न्यूज़ संवाददाता शोभना सिंह की दर्दनाक मौत से हमें भी सदमा लगा है। हम उन्हें काम करते हुए पत्रकार के तौर पर देखते रहे हैं इसलिए जानते हैं। जिस तरह काम करते हुए हिमाचल के छतरु में एवलांच में फंस कर उनकी जान गई....ये ज़िम्मेदारी के प्रति उनकी निष्ठा और काम के प्रति उनके समर्पण को ही दिखाता है। ऐसे पत्रकार को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।

सांसद को पकड़वाएं, ढाई हज़ार रुपये पाएं

फूलपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद अतीक अहमद अब ईनामी बदमाशों की श्रेणी में आ गए हैं। उत्तर प्रदेस शासन ने उन पर पच्चीस सौ रुपये का ईनाम रखा है। सांसद महोदय पर अपने भाई के साथ मिल कर बीएसपी विधायक राजूपाल की हत्या का आरोप है। फिलहाल फरार चल रहे हैं इसलिए ईनाम रखा गया है। इन पर कई दूसरे आपराधिक मामले भी हैं। राज्य में अब बीएसपी की सरकार है। ऐसे में सिर पर ढाई हज़ार का ईनाम उनके लिए तौहीनी की बात हो सकती है। इनका डीलडौल देखें तो ये वाकई में ज़्यादती लगती है। फिर भी आपको कहीं दिखें तो उत्तर प्रदेश पुलिस को बताने का कष्ट करें। अगर ये छोटे मोटे चोर होते तो शायद ढूंढने में ज़्यादा मेहनत लगता और तब शायद ईनाम की रकम भी बड़ी होती। फिर भी ढाई हज़ार भी कोई छोटी रकम नहीं होती। आप भी ढूंढें मैं भी ढूंढता हूं। देखें किस्मत किसका साथ देती है।

Monday, August 6, 2007

सॅारी, आपके ब्लॅाग्स के लिंक डिलीट हो गए हैं

प्रिय ब्लॅागर बंधुओं,

आपमें से जिन साथियों के चिठ्ठों के लिंक मैंने अपने चिठ्ठे पर दिए थे वे मेरी तकनीकी जानकारी की कमज़ोरी के चलते डिलीट हो गए हैं। इसके लिए मुझे खेद है। पहली फुर्सत में मैं उसे दुबारा लगाने की कोशिश करुंगा। अविनाश ने इस काम में तकनीकी मदद का भरोसा दिया है। आप में से कोई चाहें तो इसकी विधि मुझे मेल कर सकते हैं।

आप इसे अन्यथा ना लें।

आपका
उमाशंकर सिंह

Sunday, August 5, 2007

बिहार में बाढ़ और मॅारीशस में मुख्यमंत्री

जब बिहार में बाढ़ का पानी तबाही मचा था, मुख्यमंत्री नीतिश कुमार डाक्टरेट की उपाधि लेने मॅारीशस की यात्रा पर निकल पड़े। 30 अधिकारियों की फौज भी उनके साथ गई। मॅारीशस में उन्होने 'बिहार वीक' का उद्घाटन किया। लेकिन क्या वे अपने साथ बिहार की इन तस्वीरों को ले गए...?... उनको इन तस्वीरों को दुनिया भर में दिखाना चाहिए कि ये बिहार की असली तस्वीर है। लेकिन शायद वो अपने मुख्यमंत्री निवास के आसपास की कुछ चमचमाती तस्वीर दिखा कर दुनिया भर के निवेशकों को लुभाने की कोशिश करते हों।
आपत्ति उनके मॅारीशस यात्रा पर नहीं... यात्रा कि टाईमिंग पर है। और लौट कर आने के बाद भी उनकी आंखें नहीं खुली हैं। वे बस अपने 'भरोसेमंद' ज़िला कलेक्टरों की बात सुन कर ये तय कर रहे हैं कि कौन से ज़िले बाढ़ग्रस्त हैं कौन से नहीं।
जागिए नीतिश जी, इन तस्वीरों को देखिए... एक बार ठीक से देख लेंगे तो शायद नींद नहीं आएगी...आंखे खुल जाएंगी!

Tuesday, July 31, 2007

कैसा दु:संयोग है यह?

सुप्रभात,
रवि की प्रथम किरणें लालिमा लिए हुईं
हाथ में प्रथम ग्रास...साथ में अख़बार
दुनिया भर की ख़बरें
वही बासी, घोर कालिमा लिए हुईं


कैसा दु:संयोग है यह
जो बारम्बार घटित हो रहा है
राजनीति-कूटनीति, युद्ध और क्रांति
उन्नति परंतु अवनति
जनकल्याण किंतु स्वार्थसिद्धि
हत्या, हंगामा, जातीय विद्वेष
दंगे, अविश्वास
विभिन्न तरह के कुत्सित प्रयास
नैतिकता का ह्रास...


पता नहीं इसका चरम कहां है
और कहां है अंत
इसी बिंदु पर विचारता
कोई अच्छी सी कविता लिखने की सोच रहा हूं
पर किंकर्तव्यविमूढ़ हूं
कहां से शुरु करुं और किस पर?


वर्तमान के हालात पर
भविष्य की आशंका पर
या भूत के पश्चाताप पर
फिर कहां तक जाउं?
और उसकी सार्थकता क्या होगी?


शायद, चित्त हल्का हो जाए इस कठिन प्रयास से
परंतु ये बोझिल...और बोझिल होता जाता है
ज्यों ज्यों विचारों में गहरा उतरता हूं
अंतत: अंधेरा छा जाता है मस्तिष्क में
और प्रकाशपुंज की आस में
स्वयं को प्रयत्नहीन पाता हूं!

Saturday, July 28, 2007

आस्ट्रेलिया के ब्लॅागर साथियों के नाम एक पैग़ाम

हनीफ को लेकर आस्ट्रेलिया में बहुत कुछ हुआ। आतंकी होने का आरोप लगा। मुकद्दमा चला। जेल हुई। फिर आरोप वापस लिए गए। टीवी, अखबार समेत कई माध्यमों से देश दुनिया तक ये जानकारी फैली। पर मैं जानना चाहता हूं आस्ट्रेलिया में बैठे अपने ब्लागर साथियों से उनकी जुबानी। भारतीय मूल के लोगों में क्या प्रतिक्रिया है वहां। किस तरह से आस्ट्रेलियाई लोगों ने भी आवाज़ बुलंद की हनीफ को बचाने के लिए। आमतौर पर आस्ट्रेलियाई क्या सोच रहे हैं इस हनीफ मामले के बाद...। और ऐसी बहुत सारी बातें।

मैंने कहा कि इस सूचनाओं के हम तक पहुंचने के कई और रास्ते हैं। पर जब हम ब्लॅाग देखने बैठते हैं तो यहां भी इस तरह की सूचनाएं, जानकारी, अनुभव, नज़रिया देखना चाहते हैं। इस मामले में आस्ट्रेलिया में बैठे ब्लागर साथी हमारी मदद कर सकते हैं। अपने ब्लाग पर लिख सकते हैं। हमें पढ़ कर अच्छा लगेगा। अगर कोई मेरे ब्लाग पर ये संदेश देख पा रहे हैं तो।

औऱ सिर्फ आस्ट्रेलिया या हनीफ मामले में ही नहीं... दुनिया में जहां जहां भी हिन्दी ब्लागर साथी हैं... अपने आसपास की सामयिक घटनाओं से संबंधित सूचनाएं हमारे साथ बांटे तो शायद हम खुद को दुनिया के और पास महसूस कर सकें।

शुक्रिया

Thursday, July 26, 2007

हिन्दी टीवी पत्रकारिता और पाकिस्तान में फ़र्क है

बहुत बहस चल रही है। बड़े विचार दिए जा रहे हैं। मोहल्ला से लेकर कस्बा तक। सारी बातें सच हैं। कई झूठ समेटे हुए। मैंने भी इस पर विचारा और लिखा है। टीवी चिंतन : ख़बर पर नज़र काफी पहले लिखा। कोई कालजयी रचना नहीं है। पर आपको आज भी सच लग सकती है क्योंकि हालात बदले नहीं हैं। कुछ विवाद भी हुआ जब मैंने लिखा और मोहल्ले ने छापा क्‍या टीवी संपादक मदारी हो गये हैं ?

दिलीप मंडल ने पूछा कब था पत्रकारिता का स्‍वर्ण काल? शायद ये जताने की कोशिश की कि हर समय हर तरह की धारा चलती रही है। लेकिन शायद वो भूल रहे हैं कि मानस और तकनीकी परिष्करण के एक अलग-अलग युग रहे हैं। पिछले का हवाला देकर अगले को नहीं बांध सकते। निश्चित ही पत्रकारिता का कभी कोई स्वर्ण काल रहा और ना होगा। लेकिन ख़ासतौर पर आज की टीवी पत्रकारिता के संदर्भ में दूरदर्शन का हवाला देकर खुश नहीं हुआ जा सकता। इतराया नहीं जा सकता। मौजूदा हालात पर रवीश ने कहा हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल । मैं कह चुका हूं शैशवकाल और संक्रमण काल। संदर्भ बेशक बदल जाते हों पर वे एक ही अर्थ रखते हैं।

पर इन कालों के विचार के बीच हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि ये बदलेगा कब। बदलेगा कौन। बदलेगा कैसे। मैं किसी एक चैनल के न्यज़ रुम में कुछ बदलाव की बात नहीं कर रहा हूं। उसके फैसले लेने वाली कोटरी के कुछ चेहरे बदलने की बात भी नहीं कर रहा हूं। क्योंकि कमोबेश सब एक जैसे लगते हैं। कोई यहां से वहां चला जाता है कोई वहां से यहां और कुछ नए झंडे बैनर के तले आ जाते हैं। इसलिए बदलाव की ये बात व्यापक परिपेक्ष्य की है। फैसले लेने और व्यवस्था तय करने की हालत में पहुंचने तक या उसके बाद कई क्रांतिकारी-समाजवादी भी पूंजीवाद के शिकार हो जाते हैं। इसलिए मैं हम सबके के अंदर बदलाव की बात कर रहा हूं। हम... जो इस मीडियम में काम करते हैं। हम में से कुछ हैं जो उसूलों, मापदंडों की बात करते हैं। मैं भी करता हूं। ये सब सुनने में बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन देखने वाली बात है कि क्या पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। हां तो कौन कर रहा है। अगर सिर्फ विचारों की बात है तो विचार कहां तक फैल रहा है। हमारे साथ के कितने लोग उससे प्रभावित हो रहे हैं। बेहतरी के लिए कौन-कौन साथ जुड़ रहे हैं। कोई आत्मचिंतन को विवश भी हो रहा है या नहीं।

किसी चैनल का न्यूज़ रुम अब पाकिस्तान तो है नहीं कि एक रात सैनिक उठेंगे। कुछ संपादक के कमरे में बैठ जाएगें। कुछ पीसीआर में जाकर आॅन एयर जाने वाले कमांड अपने हाथ में ले लेगें। कुछ आउटपुट पर कब्ज़ा कर लेगें। कुछ भूत पिशाची और नंगी काया की नाच वाली स्टोरीज़ को 'ब्लू' करना शुरु कर देगें। कुछ टेप लाईब्रेरी में जाकर नागनागिन वाले आर्काईव्स को मिटाना शुरु कर देगें। और मुशर्रफ की तरह घोषणा कर देगें कि मुल्क... मतलब हिन्दी टीवी पत्रकारिता को अब हम अपनी सोच के हिसाब से चलाएगें। इस तरह से हिन्दी टीवी पत्रकारिता का मौजूदा औघड़ युग बीत जाएगा। किसी के लिए अच्छा होगा तो किसी के लिए बुरा पर ये मीडियम बदल जाएगा। नहीं। ऐसा ऐसे नहीं होगा।

पत्रकारिता को इसके मौलिक सरोकारों की तरफ वापस ले जाना है तो इसके लिए बड़े फोरम पर बहस से भी काम नहीं चलेगा। एक हालिया बहस में जब ऐसे सवाल उठे तो टीवी पत्रकारिता के महानायक समझे जाने वाले ने पतली गली वाला जवाब देना बेहतर समझा। पश्चिम में भारत की छवि सांप सपेरों के देश की रही। इससे हम मुश्किल से उबरने लगे थे। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता के कुछ हरकारों ने आवाज़ लगा लगा कर वो दिन दुबारा ला दिए लगते हैं। ये इसे अंग्रेज़ी में नहीं चलाते क्योंकि ऐसा करने पर, अपने उठने बैठने वालों के बीच ही, इनकी पैंट उतर जाएगी। और हिन्दी वालों की नज़र में ये महान हैं सो कोई पूछता नहीं। समस्या हिन्दी व्यूअर्स के च्वाईस की उतनी नहीं जितनी इनके पूअर व्यूज़ की है। बेहतर च्वाईस पेश करने में दिमागी नाकामी की है। इनकी ये हालत है इसलिए नेता भी चढने लगे हैं। किसी मुश्किल मुद्दे पर अपनी गर्दन बचाने के लिए नेता खुलेआम पत्रकारों से प्रतिप्रश्न करने लगे हैं कि 'इस सवाल में क्या रखा है...क्यों पूछ रहो हो... ये क्या टीआरपी देगा।'

उच्च पदस्थों और नीति नियंताओं को भलाबुरा कहना भी ठीक नहीं। मुझे तो दुख तब ज़्यादा होता है जब में अपने बीच के युवा टीवी पत्रकारों को भुतही भाषा में बात करता देखता हूं। किसी मौक़े पर जो कोशिश उसे व्यवस्था-विरोध की एक अच्छी ख़बर दे सकता है उससे वह झट... 'आन द स्पाट' ही ये कह कर निकल लेता है कि 'ये हमारी यहां नहीं चलेगी। एनडीटीवी पर ही चल सकती है।' अब सभी चैनल तो एनडीटीवी नहीं हो सकता जहां उसूलों को महत्व दिया जाता है। रात आठ बजे जहां कई चैनलों पर एक साथ राखी सावंत नाच रही होती है या फिर ज्योतिष भविष्य के फरेब में दर्शकों को फांसे होते हैं...वहीं विनोद दुआ ठसक के साथ ख़बर पढ़ रहे होते हैं। ख़बरदार कर रहे होते हैं। वैसे ये तो बहुत दूर की बात हो चुकी है। कई चैनलों की हालत तो ऐसी है कि उससे जुड़ा अच्छा से अच्छा पत्रकार भी अपनी किसी ख़बर को लेकर अपने दफ्तर को इंसिस्ट भी नहीं करता। समझाने की कोशिश भी नहीं करता। हो सकता है कि पहले कभी किया हो। अब ये मान बैठा हो कि कुछ नहीं हो सकता। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि छोड़ दें।

कुछ तो ट्रेन से ही कूद कर भाग लिए अपनी जान बचाने। पत्रकारिता को जर्जर पुल करार देते हुए। बाकी जनता को उसी जर्जर पुल के सहारे गुज़रने को अभिशप्त छोड़। और फिर शान से एक भगोड़े मीडियाकर्मी का बयान देते हैं। अरे नहीं भाई। रेस्ट इफ यू मस्ट बट डोंट यू क्विट...वापस आ जाओ। मज़बूत खंभा बनो। पुल को मज़बूती दो।

Wednesday, July 25, 2007

आपके सुझावों की दरकार है

मैंने नीचे की पोस्ट दिमागी तौर पर बहुत परेशान और विवश होकर लिखा था। इस पोस्ट के ज़रिए मैं जो भी कुछ कहना चाह रहा था वो कह चुका और सम्मानित ब्लागर समुदाय ने मौन रह कर ऐसी बेतुकी चीज़ों को प्रोत्साहन नहीं देने पर अपनी सहमति जता दी है। इसलिए अब मैं अपने इस एक तरह के नकारात्मक पोस्ट को ब्लाग से हटा रहा हूं। मेरा ऐसा करना आप में से किसी ग़लत लगे तो बता सकते हैं।

Sunday, July 22, 2007

जिस भैंस को राखे साईयां... मार सके न शेर!

youtube पर जारी ये दृश्य कई मायनों में अद्वितीय हैं, आप भी देखें।


COURTESY:YOUTUBE

बिहार का सफ़र और मेरी पत्नी की नज़र


कैमरे के सामने रहने वाली तरु ने कैमरे के पीछे अपनी क़ाबिलियत दिखाने की कोशिश की है। उन्होने अपनी पहली बिहार यात्रा को अपने मोबाईल कैमरे में कुछ इस तरह उतारा है। पटना से मधुबनी तक के इस सफ़र में मैं गाड़ी चलाता रहा और मेरी पत्नी अपना मोबाईल कैमरा।
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टेम्पो की छत पर टीवी के साथ सवारी।
जीप पर लदे लोग






















लड़कियों का स्कूल से क्या लेना देना? भैंस तो चराना ज़रुरी है क्योंकि इसी से रोज़ी-रोटी मिलती है

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अरे किसी तरह एक बस मिली है कैसे छोड़े दें दूसरी कब आएगी नहीं आएगी पता नहीं


आप को रुकना पड़ा तो क्या... हम तो बीच सड़क ही टायर की हवा देखेंगे



बस! किसी तरह पहुंचना है
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बिहार में लोग ऐसे सफ़र के आदी हैं। बस-टेम्पो की छत पर सफ़र अपनी आंखो से देखना तरु के लिए नया अनुभव रहा। आप में से कईयों को ऐसा अनुभव होगा।

Friday, July 20, 2007

जलप्रपात

अपने उदगम से निकल कर
दूरी तय करती

प्रपात बिन्दू तक पहुंच कर
उंचाईयों से गिरती

चट्टानों से टकरा कर

अपने तल को ढ़ूंढती
जलधारा।

मैंने देखा नहीं है
पर सोचता हूं

ऐसा ही होता होगा
जलप्रपात।

Thursday, July 19, 2007

राष्ट्रपति के हाथों रामनाथ गोयनका अवार्ड लेते रवीश






रवीश के कुछ यादगार पल









राजदीप (ऊपर) और माता-पिता व पत्नी के साथ रवीश

Wednesday, July 18, 2007

क्या वाकई सारे मर्द एक जैसे होते हैं?

'मर्द पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आप तो जानते हैं। वो किस काम से कब कहां होते हैं। किनसे संबंध बनाते है। बीमारी लगाते हैं। फिर आप में फैलाते हैं। ख़ास तौर पर जब दारू पीकर आते हैं तो कंडोम लगाने का ख़्याल नहीं रहता है। आप कंडोम लगाने के लिए कहने से झिझकें नहीं। वो ना लाए तो आप ख़ुद कंडोम ख़रीदें।' - ये रेणुका चौधरी के बयान हैं। वो केन्द्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। उन्होने ये बातें बीते सोमवार को एड्स जागरुकता से जुड़े एक कार्यक्रम में कहीं।

रेणुका के इस बयान के कई पहलू हैं। ये अलग बात है कि मंगलवार को जब इस मसले पर मैंने उनसे बात की तो वो थोड़ी सी पलटती नज़र आयीं। कहा कि मैंने ऐसा देश के सारे मर्दों के लिए नहीं कहा है। ये नहीं कहा कि सारे मर्द भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं। मैंने ये सलाह सिर्फ उन महिलाओं को दी है जो अपने पति की ग़लत हरकतों की वजह से एड्स की शिकार हो गई हैं। रेणुका ने साथ में ये भी जोड़ा कि उनके ऐसा कहने से 'अगर किसी मर्द का दिल घबरा रहा है तो उसे अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए।'

मैंने उनके सोमवार के बयान के टुकड़े को पूरा सुना। एक परिदृश्य में वो घर से...पत्नी से...दूर जाकर काम करने वाले मर्दों की बात कर रही थीं। उनके 'दायें-बाएं' चले जाने की बात कर रही थीं जो एक हद तक सच है। पर व्यापक परिदृश्य में उनका इशारा उन सभी मर्दों की तरफ था तो पत्नी के साथ रहते हुए भी भरोसे के लायक काम नहीं करते। चाहे वो शहरी हो ग्रामीण। पढ़े लिखे हों या अनपढ़। वेलआफ हों या आर्थिक रुप से कमज़ोर।

उनके इस बयान के और भी कई आयाम हैं। इन पर विवाद भी है। पहला कि क्या रेणुका को इस तरह से पूरी मर्द प्रजाति पर सवाल उठाने का अधिकार है। नहीं कहने वालों का तर्क है कि सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। बहुत भरोसेवाले भी होते हैं जो अपनी पत्नी के साथ भरोसे का रिश्ता जीते हैं। इसलिए ये बयान 'राम' जैसे मर्दों को भी धिक्कारने जैसा है। सबको एक हल में जोतने जैसा है।

लेकिन रेणुका की बातों में सच्चाई देखने वालों की भी अपन दलीलें हैं। वे कहते हैं कि मर्दों ने अपनी प्राक़तिक रचना का इतना फ़ायदा उठाया है कि उसे जब भी जहां भी मौक़ा लगा है मुंह मारने से नहीं चूका है। कौमार्य रक्षा का बंधन मर्दों पर नहीं। पैर उनके भारी होते नहीं। सारे क़ायदे महिलाओं के लिए बने हैं। पुरुष तो कुलटा भी नहीं होते। शरीर या समाज के प्रति किसी जवाबदेही के आभाव ने पुरुषों को स्वच्छंदचारी बना दिया है। ऐसे में कुछ 'राम' भी होगे तो गिनते में नहीं आते।

एक और विचार है। वो ये कि रेणुका ने बात तो सही कही लेकिन ऐसा कहना नहीं चाहिए। वो इसलिए कि अगर एड्स पर काबू पाना है तो मर्दों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। उन्हें ग़ैरज़िम्मेदार कह ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं करा सकते। वो छिटक जाएगें। ऐसे में एड्स को लेकर सरकारी जागरुकता प्रोग्राम या नीति पर अमल मुश्किल होगा।

मैं यहां कोई ब्लागमत सर्वेक्षण नहीं करवा रहा। पर चाहता हूं कि आप भी सोचें और बताएं। कि क्या रेणुका ने जो कहा सही कहा। या ग़लत कहा। या उन्होंने सही बात कह कर ग़लती की है।

शुक्रिया

Monday, July 16, 2007

कहीं आपकी फ़ाईल भी तो नहीं अटकी है?

फ़ाईलें चलती हैं। उनकी अपनी चाल होती है। कई बार वो तेज़ी से चलती हैं। कई बार बहुत स्लो। इतनी कि एक टेबल से बगल वाली टेबल तक पहुंचने में दिनों लग जाते हैं। एक महकमे से दूसरे महकमे तक पहुंचने में तो महीनों। जिस मक़सद से फ़ाईल चली हो उसे पूरा होने में तो कई बार ज़िंदगी भी खप जाती है। जिसके लिए उस फ़ाईल को चलना होता है वो चल बसता है पर फ़ाईल नहीं चल पाती।

पदोन्नति की फ़ाईल। पुरस्कृत करने की फ़ाईल। तबादले की फाईल। नौकरी की फ़ाईल। कोर्ट-कचहरी की फ़ाईल। मुआवज़े की फ़ाईल। पेंशन की फ़ाईल। सरकारी लोन की फ़ाईल। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र की भी फ़ाईल। अस्पताल में दाख़िले की फ़ाईल। डिस्चार्ज होने की फ़ाईल। मंत्रालय की फ़ाईल। सरकारी ख़रीद फ़रोख्त की फाईल। बोफोर्स और डेनेल आर्म्स डील की फाईल। केस की फ़ाईल। सीबीआई की जांच की फ़ाईल।

फ़ाईलें तमाम तरह की होतीं हैं। कईं फ़ाईलें एक साथ चलती हैं। उनमें कईयों से हमारा सीधा सरोकार होता है। कईयों से पाला नहीं पड़ा होता है। जिनसे पड़ता है उन्हीं के बारे में समझ में आती है। पहले तो गैस और टेलिफोन कनेक्शन की भी फ़ाईलें चला करती थीं। बिजली मीटर लगाने की फ़ाईल। इन फ़ाईलों की तादाद घटी है क्योंकि अब फ़ाईलों की जगह 'मेलें' चलने लगी हैं। वो ख़ासतौर पर प्राईवेट दफ्तरों। यहां फ़ाईलें आगे नहीं बढ़तीं। यहां मेल फार्वर्ड होतीं हैं। इसके अपने गुण दोष हैं। कई बार पेंडिग बॅाक्स में डाल दी जाती हैं। शो ऐज़ अनरेड। कई बार तुरंत फार्वर्ड होती हैं। फ़ाईल लाने ले जाने वाले पिउन की भी ज़रुरत नहीं होती। बस मेल भेजना होता है। भेज कर बार इतल्ला भी करना होता है। 'डिड यू सी माई मेल। आई हैव जस्ट सेंट टू यू।' मेल पर सारा काम होता है। दूसरों का किया भी अपने नाम होता है। कुछ इसे मेल का खेल कहते हैं।

मेल को छोड़िए। उस संसार पर बात और कभी। अभी हम बात कर रहे हैं फ़ाईलों की। फ़ाईल किस चाल से चलती हैं ये फ़ाईल चलाने वालों की चरित्र पर डिपेंड करता है। फ़ाईलों की स्पीड घटाने-बढ़ाने के पीछे इनकी कुछ अपनी चालें होती हैं। कई बार वो चाल सीधे समझ में आ जाती है। कई बार घुमाफिरा बतायी जाती है। एक किरानी दूसरे के पास भेजता है। दूसरा तीसरे के पास। तीसरा फिर पहले के पास। इस चक्कर में कई ऋतुचक्र निकल जाती हैं।

फ़ाईलों को आगे बढ़ने के लिए चढ़ावे का बड़ा चक्कर है। क्लर्क स्तर पर ये चक्कर 10 से लेकर 10,000 तक का.... कुछ भी हो सकता है। इसमें बिचौलियों का भी बड़ा रोल होता है। जो फ़ाईल आपके जूते घिसने से आगे नहीं बढ़ती...इन बिचौलिए को बीच में लाते ही बढ़ जाती है। ये बड़े एक्सपर्ट होते हैं। किस बात की फ़ाईल है या किस अफ़सर के पास फ़ाईल है ये जाना नहीं कि तुंरत बड़बड़ा देते हैं। कह देते हैं कि 'जानता हूं उसे.... बड़ा काईयां हैं। बिना लिए दिए मानेगा नहीं। आप देख लीजिए क्या कर सकते हैं।'

फ़ाईलें छोटी और बड़ी भी होती हैं। बड़े लेबल की फ़ाईल पर चक्कर भी बड़ा होता है। वहां लेबल आफ इंटेरेस्ट अलग होता है। अंबानी के सेज़ की फाईल मुलायम बढाएं तो अलग बात होती है। मायावती रोके तो अलग। फिर मायावती भी फ़ाईल आगे बढ़वा दें तो कहानी बदल चुकी होती है। कुछ भी हो पर टाटा-बिड़ला जैसे पूंजीपतियों की फ़ाईलें कभी रुकती नहीं। उनकी फ़ाईलों की कांपियां भी कई होती हैं। एक अटकी हैं तो दूसरी चल पड़ती हैं। बंगाल में अटकती है तो हरियाणा में आगे बढ़ जाती है। सरकार बदलने के साथ कई बार फ़ाईलें खोली और बंद भी की जाती हैं। अपनो की बंद की... राजनीतिक विरोधियों की खोल ली।

'फक्करों' की फ़ाईल की तस्वीर अलग होती है। फ़ाईल आगे बढ़ने से उसकी ज़िंदगी बंधी होती है। और जहां किसी तरह का बंधन हो वहां फ़ाईल तेज़ी से कैसे मूव कर सकती है। वो धूल खाती है। वो वसूली मांगती है। नहीं मिलने पर वो गुम जाती है। वो ढ़ूंढ़ने पर भी नहीं मिलती है। मिलती है तो उस पर बड़े बाबू के दस्तख़्त नहीं हुए होते। 'फ़ाईल अभी नहीं देखी है.... फ़ाईल मेरे पास नहीं आयी है... पता करो फ़ाईल कहां है...' जैसे जवाब मिलते हैं। जबकि फ़ाईल वहीं कहीं होती है। वहीं अफ़सर दबा के बैठा होता है।

तो फ़ाईलें दबती भी हैं। पूरी नहीं सही तो उसमें से कुछ रिकार्ड तो ग़ायब हो ही जाते हैं। कई बार तो दफ्तरों में आग लगती है और फ़ाईलें जल जाती हैं। कुछ बचता ही नहीं। क्या कर लोगे।

Thursday, July 12, 2007

जो पाले उसी का कर दो नाश

मिट्टी पानी का खुराक
और धूप, हवा, छांव भी
पौधे ने गमले से सब कुछ लिया
पेड़ बनने के क्रम में।

पौधा गमले में अपनी जड़ें फैलता गया
पेड़ बनने के क्रम में।

और एक दिन,
पौधे ने गमले को ही चटका दिया
पेड़ बनने के क्रम में!!!

Wednesday, July 11, 2007

आओ 'लाईन' मारते हैं...रंगत बदल बदल कर

ब्लू लाईन बसें इन दिनों सुर्खियों में हैं। दरअसल 1995 में दिल्ली की सड़कों पर रेड लाईन बसों का आतंक रहा। फिर दिल्ली सरकार ने एक अजीबोगरीब फैसले के तहत इन बसों की रंगत लाल से ब्लू करने का फ़रमान जारी कर दिया। बसों का रंग बदल देने मात्र से क्या बस आॅपरेटर-ड्राईवर अपनी रंगत बदल लेगें...ये सवाल मेरे दिमाग में उठे क़रीब एक युग होने को आया। इस पर जो कुछ लिखा वो 27 जनवरी 1996 को नवभारत टाईम्स में 'कांटे की बात' कालम में प्रकाशित हुआ। आपके सामने फिर पेश कर रहा हूं।

दो बसों में होड़ लगी थी। एक दूसरी को पछाड़ने की कोशिश में संकरी सड़क पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'

दूसरी ने पलट कर कहा, 'त्वचा का रंग नीला पड़ गया तो क्या हुआ। मन थोड़े ही नीला पड़ा है। बल्कि ये नीलापन तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमुच बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सीटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।'

लेकिन सुना है अब तुममें स्पीड कंट्रोलर नामक कोई यंत्र लगाया जा रहा है। अब तुम पहले की तरह अपना तेवर नहीं दिखा पाओगी।' 'अरे छोड़ो ये सब कहने की बातें हैं। मन को कौन बांध पाया है भला। मेरा ड्राईवर बड़ा होशियार है। दिपु (दिल्ली पुलिस) को देखते ही यंत्र का कनेक्शन कर देता है। और उसके गुज़रते ही हटा देता है। हमारे आपरेटर कुछ दिनों में कुछ ऐसा आविष्कार कर ही लेगें जिससे ये आटोमैटिक हो जाए। अर्थात जिप्सी को देखते ही 40 की स्पी़ड नहीं तो इस्केप वेलोसिटी! और फिर हमारे सभी आपरेटर प्रत्येक रेड लाईट एवं गोलचक्कर पर हर महीने 100 रुपये दक्षिणा क्यों देते हैं। सिर्फ इसलिए न कि मैं बेधड़ रेड लाईट जंप कर सकूं। अपने पायदानों पर भी सवारियों को यात्रा सुख दे सकूं। नियत गति से तेज़ चल सकूं। कहने का मतलब की राजधानी की सड़कों पर मनमानी कर सकूं।'

'लेकिन फिर से ऐसा करने से तो तुम ब्लू लाईन वालों को भी बदनाम कर दोगी।'...'तो ब्लू लाईन वाले भी कौन से दूध के धुले हैं। वे तो और भी ब्लू हैं। फ़र्क सिर्फ इतना है कि अख़बार वाले नाहक ही हमारे पीछे पड़ गए। शायद हमारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से जल गए और हमें बदनाम कर दिया। जबकि अन्य 'लाईनवाले' भी हम से किसी भी माने में कम नहीं हैं। अब देखो न, हम रेड लाईन वालों पर ही आरोप लगा कि हम लोगों की जान से खेलते हैं। बात थोड़ी बहुत सच भी हुई तो क्या। दूसरी प्राईवेट बसवालों ने तो महिलाओं की इज्ज़त से खेलना शुरु कर दिया... और तीन लगातार दिनों में तीन बलात्कार कर डाले (ये वारदात उन दिनों व्हाईट लाईन और चार्टर्ड बसों में हुईं थीं)हम लोगों को कम से कम इज्ज़त की मौत तो देते हैं। और फिर बिजनेस में रिस्क कवर तो करना ही पड़ता है। हमने भी किया। इसी रिस्क कवर करने के क्रम में कुछ मानव रक्त बह गया जिसके कारण हमारी 'रेडनेस' को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। असल में हमारी तरफ से भी कुछ ग़लतियां हुईं। 'दिपु' की तरह इन अख़बार वालों को 'कुछ' देते रहते तो शायद इस बात को वे आगे तक नहीं बढ़ाते।'

'लेकिन हमने सुन रखा है कि इन्होने हर प्रकार की विसंगतियों को जनता के सामने लाने का ठेका लिया हुआ है। इसलिए कुछ भी आफर करते हुए डर लगता है। हालांकि मुलायम सिंह वाले प्रकरण से कुछ आस बंधी थी। लेकिन इन 'काम के लोगों' को पत्रकारिता जगत से परे मान लिया गया। उनकी जगह 'टुटपुंजिया लेखक' अपने को अधिक आदर्शवादी साबित करने में लग गया। हो सकता है कि इन लोगों को आपस में ना बनती हो। फिर दिल्ली पुलिस को उसके सजीले परिधानों से पहचान भी लें। लेकिन इन पत्रकारों को पहचानना आजकल ज़रा मुश्किल काम है। कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। जिसे देखो वही अपने को पत्रकार कहता फिर रहा है। ऐसे में सबों को खुश रखना अपने बूते की बात नहीं है। वो तो भला हो सरकार का जिसने हमें विकल्प सुझा दिया है। अब ब्लू रंग की आड़ में हम अपने 'लाल अस्तित्व' को क़ायम रख सकेंगे।'

मतलब वही हुआ जिसका डर था। अब ब्लू लाईन वालों पर भी पाबंदी की बात हो रही है। रेड लाईन ख़त्म कर ब्लू लाईन बनी। देखते हैं अब इन बसों को दिल्ली सरकार अब क्या रंगत देती है। किसी ना किसी रंग में ये 'लाईनें' चलती रहेंगी...मरेंगी नहीं... दिल्ली की जनता बेशक सड़कों पर मरती रहेंगी।

Tuesday, July 10, 2007

अंतरिक्ष में कल्पना की मौत का भयावह मंज़र

1 फरवरी 2003 को कोलंबिया हादसे ने कल्पना चावला समेत 7 अंतरिक्ष वैज्ञानिक की जान ले ली। टेलिविजन पर अबतक हमने कोलंबिया के कुछ टूटे हूए मलवे की ही तस्वीर देखी थी। लेकिन नीचे कुछ ऐसी तस्वीरें हैं जो कोलंबिया में आग की शुरुआत से लेकर अंत तक की स्थिति बयां करती है। ये एक इस्रायली स्पेस शटल से ली गई तस्वीरें हैं। स्पेस शटल कोलंबिया के आसमान में इस तरह आग के गोले में तब्दील हो जाने से मिशन स्पेशलिस्ट कल्पना चावला के अलावा जिन 6 अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की जानें गईं वे हैं... उनमें एक और महिला थीं। मिशन स्पेशलिस्ट लाउरेल क्लार्क। बाक़ी पांच अंतरिक्ष यात्री थे 1. विलयम सी मैककूल (पायलट) 2. रिक डी हसबैंड (कमांडर) 3. इयान रमोन (पेलोड स्पेशलिस्ट) 4. माइकल पी एंडरसन, (पेलोड स्पेशलिस्ट) 5. डेविड एम ब्राउन (मिशन स्पेशलिस्ट)

इन सबों को हमारी श्रद्धांजलि !

Saturday, July 7, 2007

उत्तरी ध्रुव पर डूबता सूरज - एक तस्वीर

उत्तरी ध्रुव पर अस्त होते सूरज की ये तस्वीर मुझे मेरे एक मित्र ने ईमेल के ज़रिए फारवर्ड की है।
इस अदभुत नज़ारे को आप भी देखें।

Friday, July 6, 2007

बोल्‍ड लेखनी के नाम पर ग़ाली-गलौज नहीं चलेगी

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संगीता तिवारी स्टार न्यूज़ से जुड़ीं हैं। ये पत्रकारिता में जितनी सक्रिय हैं उतनी विचारों की दुनिया में भी। साहित्य में ग़ालियों की भाषा का इस्तेमाल हो या नहीं इस पर इनसे यूं ही बात हुई। बोल्ड लेखनी के नाम पर जिस तरह की स्वच्छंदता चाही जा रही है संगीता उस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं हैं। वे ऐसी लेखनी चाहतीं हैं जिसमें समाज का चेहरा भी साफ हो जाए और अनर्गल शब्दों के प्रयोग से भी बचा जाए। पूरी बात संगीता तिवारी की ही कलम से...

साहित्य में गालियों का इस्तेमाल क्यूं नही..इस पर बहस छिड़ी है..दरअसल ये बहस नयी नही है..इसपर कई बार पहले भी काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन बात महज गालियों की नही बल्कि भाषा को लेकर होती रही है ..मृदुला गर्ग की लेखनी से लेकर ओमप्रकाश वाल्मिकी तक की लेखनी पर खूब कागद कारे किए गए इस बहस में..इस बहस की शुरूआत उस दौर में हुई जिसमें भाषा के आधार पर बोल्ड लेखनी की परिभाषा गढ़ी गयी..कहा गया यथार्थवादी चित्रण हो रहा है..समाज जैसा है वैसा सामने रखा जा रहा है...एक तर्क ये आया था कि दलित साहित्य अगर लिखा जाएगा तो उसी भाषा में जिस भाषा का वो आपसी बातचीत में इस्तेमाल करते हैं..लेकिन यहां चर्चा का दायरा इतना विस्तृत नही है..बात सिर्फ गालियों की हो रही है...साहित्य को समाज का आईना माना जाता है. अगर हमारे समाज में गाली के लिए जगह है तो फिर साहित्य उससे इतर कैसे हो सकता है..यानि गाली के लिए भी जगह होनी चाहिए..दरअसल ये बहस इसपर नही होनी चाहिए कि गाली साहित्य का हिस्सा बन सकती है या नही बल्कि बहस इसपर होनी चाहिए कि इसकी सीमा क्या हो..समाज के अलग अलग वर्ग में गालियों का दायरा भी अलग है..हम किसे आधार मानेंगे..

निजी तौर पर मेरी राय है कि गालियों में भी एक चुनाव होना चाहिए..क्यूंकि साहित्य का काम सिर्फ आईना सामने रखना नही बल्कि अगर कहीं उसमें धुंधलापन है तो उसे भी साफ करना होता है..इसलिए मैं तथाकथिक बोल्ड लेखनी के नाम पर धड़ल्ले से गाली के इस्तेमाल की पक्षधर नही हूं। उमाशंकर सिंह से इस मुद्दे पर यूं ही बात हुई उन्होंने ही बताया कि ऐसी कोई बहस छिड़ी है..मौका मिलते ही मोहल्ला घूम कर आयी। अविनाश जी ने गालियों के प्रयोग को बड़ा तार्किक आधार देने की कोशिश की है..लेकिन अविनाश जी का भदेस का तर्क कहीं से भी तर्कसंगत नही है.. उदाहरण संदर्भों से काट कर नही पेश किया जा सकता। जिन गालियों की बात उन्होंने की है वो हमने भी सुनी है, लेकिन उसके संदर्भ क्या होते हैं ये समझना जरूरी है..हमारा भी सामाजिक दायरा वही है जो उनका है..शादी ब्याह के मौके पर गायी जाने गाली को उदाहरण के तौर पर पेश किया जाना अखर गया..अविनाश को शायद सिर्फ गालियां याद रह गयी..पूरी गीत या उसका भाव नही...औऱ हां मैं गीत का उदाहरण देकर बता सकती हूं कि उसमें भी एक सलीका होता है..

हां एक और बात गाली के पक्ष में ग्रामीण जीवन का उदाहरण धड़ल्ले से दिया जाता है..वहां की जिंदगी और बोलचाल का हवाला दिया गया है..लेकिन गांव, गांव का जीवन और उसके मुद्दे हमने भी करीब से देखा है..लेकिन ऐसा गांव नही मिला जहां गालियों को मान्यता मिली हो..उसका इस्तेमाल बुरा नही माना जाता हो..गांव और गंवई जीवन के बारे में प्रेमचंद ने भी लिखा था..ऐसा लिखा जिसकी प्रासंगिकता आज भी है ..आज भी गांव में उनके चरित्र नज़र आ जाते हैं...समय के साथ धुंधले नही पड़े उस यथार्थ के चित्रण में उन्हें गालियों के प्रयोग की जरूरत नही पड़ी.. हालांकि वो जिस वर्ग की बात कर रहे थे उसके बारे में आज लिखा जाता है तो बोल्ड लेखनी की जाती है...शायद अविनाश के नजरिये से देखे तो प्रेमचंद की लेखनी यथार्थ के करीब नही मानी जा सकती।

दरअसल इन तथाकथित यथार्थवादी लेखकों को आदत पड़ गयी है समाज के अलग अलग हिस्सों को एक फ्रेम में जड़कर देखने की। अगर दलित है तो वो गालियों का इस्तेमाल तो करेगा ही..ये इन लेखकों की सवर्ण मानसिकता है..जहां दलित या समाज के निचले तबके से आने का मतलब है गाली की जुबान..आप ये क्यूं मानकर बैठे हैं कि परिष्कृत भाषा समाज के किसी तबके की बपौती है.. इन्हें समझाओ की कि ऐसा नही है..बदलाव सब तरफ है..एक काम करने वाली जो दलित है भले ही उसने कभी गाली की जुबान बोली हो लेकिन अपने बच्चों को वो बेहतर भाषा देना चाहती है औऱ इस कोशिश में उसने अपनी जुबान भी सुधारी है..फ्रेम में जड़ देखना बंद करें ये यथार्थवादी लेखक..यथार्थ का चेहरा भी बदला है पिछले सालों में...

अच्छा लगा कि इसपर बहस तो छिड़ी है..विस्तार देने की कोशिश करूंगी

Wednesday, July 4, 2007

मुझे नहीं रहना अविनाश के 'मोहल्ले' में

प्रिय अविनाश भाई,

'मोहल्ला' पर मेरे जो भी लेख हैं (उमाशंकर सिंह का कोना) उसे तुंरत प्रभाव से हटा दो । साथ ही मेरे ब्लाग का लिंक (उमाशंकर सिंह... सच की वादी) भी। वजह अगर ज़रूरी हुआ तो ज़रुर बताउंगा।

शुक्रिया
उमाशंकर सिंह