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Wednesday, April 23, 2008

इन पंक्तियों को आप पूरा करें...

ऐ कवि,

जिस क्षण तू ये कविता लिख रहा होगा
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा
किस किस पर लिखेगा तू किस किस को छोड़ेगा
तेरी लेखनी से तेज़ सृष्टिचक्र चल रहा होगा

घर की ही बात लो तो
कई चित्र उभरते हैं
तुम्हारे धरोहर औऱ संस्कार
ऐसे टूट बिखरते हैं
कि कहीं कोई अपना अपनो से कट रहा होगा
बाप की ज़मीन का टुकड़ा बेटों में बंट रहा होगा
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा...

ये पंक्तियां मैने अपने कॉलेज के दिनों में लिखी। कम से कम दो पन्नों पर। इनमें ओजोन परत में बड़े हो रहे छेद पर भी लिखा...

पर्यावरण का प्रश्न अधिकार के बाहर है
खुद किया गया विनाश प्रतिकार के बाहर है
तू फ्रिज़ का पानी पी इधर... सो रहा होगा
ओजोन परत का छेद उधर... बड़ा हो रहा होगा

किस किस पर लिखेगा तू किस किस को छोड़ेगा...
तेरी लेखनी से तेज़ सृष्टिचक्र चल रहा होगा...

मेरी डायरी के ये पन्ने गुम गए। कई साल से ढूंढ़ रहा हूं। नहीं मिल रहे। लेकिन अगर आप इन पंक्तियों को आगे बढ़ा पाएं तो शायद तसल्ली मिले।

Tuesday, July 31, 2007

कैसा दु:संयोग है यह?

सुप्रभात,
रवि की प्रथम किरणें लालिमा लिए हुईं
हाथ में प्रथम ग्रास...साथ में अख़बार
दुनिया भर की ख़बरें
वही बासी, घोर कालिमा लिए हुईं


कैसा दु:संयोग है यह
जो बारम्बार घटित हो रहा है
राजनीति-कूटनीति, युद्ध और क्रांति
उन्नति परंतु अवनति
जनकल्याण किंतु स्वार्थसिद्धि
हत्या, हंगामा, जातीय विद्वेष
दंगे, अविश्वास
विभिन्न तरह के कुत्सित प्रयास
नैतिकता का ह्रास...


पता नहीं इसका चरम कहां है
और कहां है अंत
इसी बिंदु पर विचारता
कोई अच्छी सी कविता लिखने की सोच रहा हूं
पर किंकर्तव्यविमूढ़ हूं
कहां से शुरु करुं और किस पर?


वर्तमान के हालात पर
भविष्य की आशंका पर
या भूत के पश्चाताप पर
फिर कहां तक जाउं?
और उसकी सार्थकता क्या होगी?


शायद, चित्त हल्का हो जाए इस कठिन प्रयास से
परंतु ये बोझिल...और बोझिल होता जाता है
ज्यों ज्यों विचारों में गहरा उतरता हूं
अंतत: अंधेरा छा जाता है मस्तिष्क में
और प्रकाशपुंज की आस में
स्वयं को प्रयत्नहीन पाता हूं!

Friday, July 20, 2007

जलप्रपात

अपने उदगम से निकल कर
दूरी तय करती

प्रपात बिन्दू तक पहुंच कर
उंचाईयों से गिरती

चट्टानों से टकरा कर

अपने तल को ढ़ूंढती
जलधारा।

मैंने देखा नहीं है
पर सोचता हूं

ऐसा ही होता होगा
जलप्रपात।

Thursday, July 12, 2007

जो पाले उसी का कर दो नाश

मिट्टी पानी का खुराक
और धूप, हवा, छांव भी
पौधे ने गमले से सब कुछ लिया
पेड़ बनने के क्रम में।

पौधा गमले में अपनी जड़ें फैलता गया
पेड़ बनने के क्रम में।

और एक दिन,
पौधे ने गमले को ही चटका दिया
पेड़ बनने के क्रम में!!!

Wednesday, June 27, 2007

"तुम"

स्मृतियों के मरुप्रदेश में
आत्मिक मित्र की तलाश।

कई मुखाकृतियां...।
निज कर्मों में लिप्त सभी।
मृगमरीचिका।

तुम।
एक सुखद अनुभूति।
संतप्त हृदय में
एक सुसीत सी छवि।

कोई घनिष्ठता नहीं,
संभवत:
मित्रता भी नहीं।

तथापि
मन मस्तिष्क में
प्रतिध्वनित,
चंद शब्द।

विरल मिलन के
कुछ
अविस्मरणीय क्षण।

सूक्ष्म आत्मिक बंधन में
आबद्ध।
तुम,
सदा... सर्वदा...!

Wednesday, June 20, 2007

कविताएं जन्म ले रहीं हैं...

मेरे मस्तिष्क में
कविताएं जन्म ले रहीं हैं
मेरे अनुभव-अनुभूतियों को
शब्द-रुप दे रहीं हैं।

मेरी कविताएं
मेरे अनुभव की तरह व्यापकता लिए हुईं हैं,
ये कहीं मृतप्राय: हैं...
तो कहीं जीवंतता लिए हुईं हैं।

ये शब्द सामर्थ्य
मेरे अनुभवों ने ही मुझे प्रदत्त किए हैं
इन्हें कमलबद्ध करने को भी
उन्होंने ही उद्यत किए हैं।

मेरी भावना ही मेरी लेखनी की आत्मा है
जो कभी पुलकित
तो कभी मर्माहित हुईं हैं,

अतएव,
दोनों ही मेरी कविता में समाहित हुईं हैं।
मेरी ईच्छाएं
चंद पूरित...,
चंद अभी दमित हैं

अभिलाषाएं
कुछ सूख चुकीं,
कुछ अभी हरित हैं

पर मेरा विश्वास
अभी भी,
अपेक्षाओं के साथ खड़ा है,
इसलिए तो मेरे संवेदन ने
शब्द रुप धरा है!

Friday, June 1, 2007

चल मेरे संग बिहार तू!

बिहार की तरफ चलते हुए अचानक अपनी एक पुरानी तुकबंदी याद आ गई। इसे अक्सर मैं दिल्ली में मुश्किलों में घिरे, परेशान यार-दोस्तों-जानकारों को सुना कर हंसाने की कोशिश करता हूं। आज आप सबों के साथ बांट रहा हूं...

दुर्गम्य पथ के क्लांत पथिक मत शून्य को निहार तू
दिल्ली में परेशान हैं तो चल मेरे संग बिहार तू।

कुछ कर गुज़रने की ख़्वाहिश ले आया तुम्हें इस शहर में
यहां दर दर भटका तू आठों पहर में

महानगर है देता है दर्द हमेशा
फरेब यहां हर किसी का है पेशा

इससे पहले कि तू भी बन जाए इनके जैसा
अपनी जड़ों को पहचान... हालात से ख़ुद को उबार तू

दिल्ली में परेशान हैं तो चल मेरे संग बिहार तू

मैनेज करना तूने बेशक सीखा हो
पर सीख सका ना चाटुकारिता

जहां मिलानी थी हां में हां
तू खोल बैठ गया गीता

आदर्श भरी बातों से कर चुका अपना बंटाधार तू
मत कर और टाईम खोटा असलियत को स्वीकार तू

दिल्ली में परेशान है तो मेरे संग बिहार तू

यूं तो ये प्रदेश भी रहा है सदियों से बीमार
पर लालू जा चुके और आए हैं नीतीश कुमार

दावा है बदल देगें तस्वीर
चला के अपने तीर

जंगलराज के ख़ौफ से मत अपना मन मार तू
उम्मीदों को दे एक नया आकार तू

दिल्ली में परेशान है तो चल मेरे संग बिहार तू

कहते हैं यहां गुंडागर्दी है... करप्शन है... डूब जाती है नैय्या
लेकिन यहां के बड़े बदमाश भी दिल्ली में कहलाते हैं छुटभैय्या

अपने संस्कार को बचा... मत कर उस लाईन को अख़्तियार तू
नहीं तो मौक़े तलाशता पहुंच जाएगा तिहाड़ तू

दिल्ली में परेशान है तो चल मेरे संग बिहार तू


उम्मीद है आप सब भी मुस्कुरा रहे होगें। लौट के मिलता हूं।

शुक्रिया

Thursday, May 17, 2007

देवताओं की साठगांठ!

नेता यूं तो एक दूसरे के खिलाफ जमकर बयानबाज़ी करते हैं... लड़ते हैं... नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं... लेकिन कहीं न कहीं उनके बीच एक अनकहा सा समझौता भी होता है... वे एक दूसरे को बेहतर समझते हैं और मौक़े के हिसाब से अपनी रणनीति तय करते हैं। इसी पर मन ही मन कुछ विचारा तो ये पंक्तियां लिख बैठा...


जीवन
जेठ भरी दुपहरिया
सूरज की तीखी किरणों के समक्ष
खिन्न मन संघर्ष की सोचता
शायद आग के अस्तित्व को ही समाप्त करने को आतुर
इंद्र की तरफ अपेक्षित निगाह से ताकता
इस बात से अनभिज्ञ
कि इंद्र और सूर्य का हिस्सा बंटा हुआ है
तभी तो कभी ना बुझने वाला सूर्य
बादलों के बीच अपने को निस्तेज़ कर लेता है
और तब सूर्य के अस्तित्व को स्वीकारता इंद्र-कण
अपने सीने पर सतरंगी लकीरें खींच डालता है
पर एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारते हुए भी
वे जीवन में कभी साथ नहीं आते
शायद पोल खुलने का भय है
देवता कहला कर भी वे एक नहीं हो पाए
नेताओं को क्या ताना दें!


(बादलों के बीच सूरज की इस तस्वीर की ख़ासियत ये है कि ये मोबाईल फोन कैमरे से ली गई है। ये कलाकारी है हमारे मित्र नीरज गुप्ता जी की है... उनसे सहमति लिए बग़ैर इस्तेमाल कर रहा हूं... उनको बताना मत)

Monday, May 14, 2007

ये कैसी वेदना है?

अपनी एक कविता आप सब के सामने रख रहा हूं। पुरानी डायरी से मिली है।


ये कैसी वेदना है?
घुटन हो रही है, चीख लोगों तक नहीं पहुंच सकती
समस्त हवन सामग्री
अभी धू धू कर जली नहीं है तिल तिल कर सुलग रही है
शायद चिता की चन्द उन लकड़ियों के समान
जो कल तक एक सम्पूर्ण तना था
नियति ने उसे विच्छिन्न कर दिया है
पर अभी भी वह अपने शिराओं से प्राप्त खनिज से गीला है
झोंक दिया गया है उसे उस जगत में
हवा और धूप झेल चुके उन अभ्यासवृद्ध सूखी लकड़ियों के साथ
जो जलना जानते हैं और जल रहे हैं
भले ही उनकी अग्नि किसी निष्प्राण शरीर को ही जला रही है
उनकी पूछ है, वे काम के हैं
पर मत भूलो
जीवन जेठ की दुपहरिया में इनकी नीरवता भी समाप्त हो जाएगी
ये भी प्रज्वलित हो उठेगें
हो सकता है कि लापरवाही में इनकी लपटें
घर के छप्पड़ तक पहुंच जाएं
तब मत कहना कि
भोजन पकाने वाला वही आग
सर्वनाशी भी है!

शुक्रिया
उमाशंकर सिंह
valleyoftruth.blogspot.com