जवाब मिल गया है। अल्टीमेट ख़ुलासा हो गया है। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि बेनज़ीर की हत्या हादसे में हुई... गोली या धमाके से नहीं। लेकिन शायद उन्हें भी ये बात नहीं पता कि बेनज़ीर की हत्या महज़ एक रोज-रेज का मामला है! रोड रेज नहीं समझते? अरे सड़क पर चलते हुए दो वाहन चालकों के बीच जब को पंगा हो जाए। फिर तू तू मैं मैं होते होते नौबत यहां तक पहुंच जाए कि वे एक दूसरे की जान लेने पर उतर आएं। और जो ले सकता है वो सामने वाले की जान ले ले! एक्ज़ाक्टली यही हुआ है रावलपिंडी में! आपको नहीं पता! तो सुन लीजिए।
दरअसल हुआ ये कि जब बेनज़ीर अपना भाषण ख़त्म कर गाड़ी में बैठीं तो पीछे से मोटरसाइकिल सवार दो-तीन नौजवानों ने साइड लेने के लिए उन्हें हार्न दिया। बेनज़ीर उनकी अनदेखी कर अपनी नेतागिरी में जुटी रहीं। उन्होने ने सोचा कि वो प्रेसिडेंट मुशर्रफ को चुनौती दे रही हैं। भला उनसे कौन टकरा सकता है! लेकिन मोटरसाईकिल पर सवाल नौजवान जल्दी में थे। बेनज़ीर के काफ़िले की धीमी रफ्तार उन्हें नहीं भा रही थी। उन्होने बार बार हार्न दिया। पर लोकतंत्र बहाली की मदहोशी में डूबी बेनज़ीर ने उन्हें हर बार अनसुना कर दिया।
फिर विवश होकर उन नौजवानों में से एक ने पिस्तौल निकाल ली। दूसरे ने भी जोश में निकाल ली। और फिर फ़ायर कर दिया! इसमें आश्चर्य की क्या बात है! दिल्ली की सड़कों पर तो ऐसा होता रहता है। तब आपको आश्चर्य नहीं लगता! अब फ़ायर कर दिया तो कर दिया! भई ये पाकिस्तान का गन कल्चर है। हम आप क्या कर सकते हैं! एक ने फ़ायर किया तो दूसरे से रहा नहीं गया। उसने फिदायीन बटन दी दबा दी। पाकिस्तान में आपको बहुत सारे शख़्स आपको ऐसे बटन के साथ घूमते मिलेगें। ये छोटी-मोटी बातों पर भी ख़ुद को उड़ा देने की क़ाबिलियत रखते हैं। ये बात कई साल बाद मुल्क लौटीं बेनज़ीर नहीं समझ पायीं। आने के पहले पाकिस्तान का ट्रैफ़िक रुल बुक तो पढ़ लेना था! साइड दे दिया होता!
पर जब आप सड़क पर चलते हैं तो एक भ्रम भी पाले चलते हैं कि आप ही सही चल रहे हैं। और आपको इसका नुक्सान भी उठाना पड़ता है। तो जब बेनज़ीर ने साइड नहीं दी तो मोटरसाईकिल सवार नौजवानों ने ... जो जल्दी में थे... सोचा बेनज़ीर को भी साथ लिए चलते हैं! सो उन्होने ख़ुद के साथ साथ बेनज़ीर को भी उड़ा लिया! बस इतनी सी बात है और आप मीडिया वाले पता नहीं क्या तिल का ताड़ बना रहे हो! पाकिस्तान की सरकार को भी बताईएगा। कहां वो हादसा या हक़ीकत के चक्कर में पड़ी है। हमारे यहां कि होनी-अनहोनी सीरियल की तर्ज़ पर। इस रोड-रेज मामले की रावलपिंडी के लोकल थाने में प्रोपर एफआईआर करायी जाए।
Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts
Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts
Saturday, December 29, 2007
Tuesday, October 16, 2007
महानता की ओर बढ़ते कदम
नेताओं के महान बनने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। आधुनिक भारतीय नेतृत्व के इतिहास में ये सिर्फ दूसरा मौक़ा है जब कोई नेता अपने कार्मिक वजहों से महानता प्राप्त कर सकता है... और काफी हद तक कर भी रहा है।
ऐसा एक मौक़ा था देश की आज़ादी के पहले, जब देश को आज़ाद कराने का मक़सद हमारे उस समय के अगुवों के सामने था। उन्हें हिंसा-अहिंसा जैसे रास्तों पर चल कर हमारे देश को आज़ाद कराया। इस क्रम में उन्होंने लाठियां खायीं, कई-कई बार जेल गए, प्रताड़ना झेली, फांसी पर चढ़े... और तब जा कर महान कहलाए। कुछ ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महानता पायी।
आज के हालात अलग हैं। स्वतंत्रता आज हमारी चेरी है। हम सभी अपने अपने ढंग से स्वतंत्र हैं। हम उसमें उसी से खेल रहे हैं। सो और स्वतंत्रता प्राप्त करने की ज़रुरत हमारे नेताओं के सामने नहीं है। आने वाले कई सालों तक हमारी ग़ुलामी की कोई उम्मीद भी नहीं है कि हम अभी से किसी नए स्वतंत्रता आंदोलन की तैयारी करें। अगर हम ग़ुलाम हुए भी तो वो ग़ुलामी पिछली ग़ुलामी जैसी नहीं होगी। हमारे पास सुख सुविधा के तमाम साधन होंगे। बस सोच अपनी नहीं होगी। तंत्र भी संभवत: अपना ही होगा लेकिन उसे चलाने वाला तांत्रिक कोई और होगा। 'इह' लोकतंत्र से हम 'पर' लोकतंत्र में होंगे। स्वर्ग सा आनंद लूटेंगे। तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन की बात कैसी और नेताओं के महान बनने का मौक़ा कैसा।
रही सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महान बनने की बात तो उसमें भी अब सीमित स्कोप है। कुरीति समझी जाने वाली कई रीतियों को तो अब सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। ख़ासतौर पर लेनदेन संबंधी रीतियों को। समय-साल के हिसाब से नए-नए कंसेप्ट उभर कर सामने आ रहे हैं। इनमें चीज़ों को नए ढंग से व्याख्यित-परिभाषित किया जा रहा है। कल तक जो अनैतिक था, आज अलग-अलग तर्कों के सहारे नैतिक है। व्यक्तिगत लक्ष्यों के प्रति पूरा समर्पण ही आजकल नैतिकता बन गई है। ऐसे समय में नेता लोग किसे सुरीति माने और किसे कुरीति और किसे मिटा कर अपनी महानता दिखाएं? लेकिन महान तो बनना है चाहे इसके लिए महानता की नई परिभाषा ही क्यों ना गढ़नी पड़े। महानता की ओर ले जाने वाले कदमों को पुनर्निधारण ही क्यों न करना पड़े। सच है कि हर कोई अपने अपने ढंग से महान बनने की सोचता और जुगत भिड़ाता है। इसमें मीडिया उसकी सहायता के लिए बैठा है।
बिना पब्लिक के जे जाने गुप चुप तरीक़े से महान तो बना नहीं जा सकता। इसलिए परंपरागत छुटभैय्येपन से मुक्ति पानी होगी। लीक से हट कर कुछ नया करना होगा। या फिर मर जाना होगा क्योंकि बुरा से बुरा नेता भी मरने के बाद महान हो जाता है।
धोती कुरता पहन कर, किसी विचारधारा का चोगा ओढ़ कर, देश के लिए बिना मांगे जान देने की बात भर करने से अब नोटिस नहीं मिलती। अच्छी योजनाएं भी बनीं, शिलान्यास भी हुआ, काग़ज़ की नाव भी बनी, उसे प्लेन की तरह कुछ देर हवा में उड़ाया भी गया... लेकिन नाम न मिला। पिछले कई साल से बंधुआ मज़दूरी मिटाने, जनसंख्या क़ाबू करने और पर्यावरण बचाने की बात की... जनता ने ध्यान नहीं दिया। वर्षों प्राईम-मिनिस्टर रहे, मंत्रिमंडल में कई फेरबदल किए, देश चलाया, तनावों से जूझते दिखे और किंचित आध्यात्मिकता भी दिखाई... लेकिन इन सबसे महान बनने में कोई सहूलियत नहीं मिली।
अचानक कुछ घोटाले-कारगुज़ारियों के पन्ने फड़फड़ाए... हवाला, चारा, रिश्वत, जालसाज़ी...। श्रृंखला की एक से एक कड़ी। कैमरे की लाईटें चमकीं। कलम उठे। विरोध में ही सही, लिखा-बोला जाने लगा। अदालत आते-जाते समय टीवी पर दिखाए जाने लगे। जेल तक की नौबत आयी। पहले तो ख़राब लगा। फिर याद आया कि जेल यात्रा से ही तो महानता की जड़ को मज़बूती मिलती है।
फिर तो संकट का ये काल वरदान-सा लगने लगा। अपने प्रभाव को दिखा कर अपनी महत्ता बरक़रार रखने का... उसे बताने का सुअवसर है यह। कैसे करोड़पति लखपति बना जाता है इसका नज़ीर पेश कर जनता को प्रेरित किया जा सकता है। चोरी कर सीनाज़ोरी को महिमामंडित कर भी महान बना जा सकता है। नेताओं के वक्तव्यों में, इसकी झलक साफ देखी जा सकती है...अगर आंखे खोल कर देखें तो। सचमुच, भौतिक-उपभोक्तावादी आधुनिक भारत के महान व्यक्तित्व बनने जा रहे हैं वो!
(25दिसंबर1996 की मेरी डायरी का एक पन्ना)
ऐसा एक मौक़ा था देश की आज़ादी के पहले, जब देश को आज़ाद कराने का मक़सद हमारे उस समय के अगुवों के सामने था। उन्हें हिंसा-अहिंसा जैसे रास्तों पर चल कर हमारे देश को आज़ाद कराया। इस क्रम में उन्होंने लाठियां खायीं, कई-कई बार जेल गए, प्रताड़ना झेली, फांसी पर चढ़े... और तब जा कर महान कहलाए। कुछ ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महानता पायी।
आज के हालात अलग हैं। स्वतंत्रता आज हमारी चेरी है। हम सभी अपने अपने ढंग से स्वतंत्र हैं। हम उसमें उसी से खेल रहे हैं। सो और स्वतंत्रता प्राप्त करने की ज़रुरत हमारे नेताओं के सामने नहीं है। आने वाले कई सालों तक हमारी ग़ुलामी की कोई उम्मीद भी नहीं है कि हम अभी से किसी नए स्वतंत्रता आंदोलन की तैयारी करें। अगर हम ग़ुलाम हुए भी तो वो ग़ुलामी पिछली ग़ुलामी जैसी नहीं होगी। हमारे पास सुख सुविधा के तमाम साधन होंगे। बस सोच अपनी नहीं होगी। तंत्र भी संभवत: अपना ही होगा लेकिन उसे चलाने वाला तांत्रिक कोई और होगा। 'इह' लोकतंत्र से हम 'पर' लोकतंत्र में होंगे। स्वर्ग सा आनंद लूटेंगे। तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन की बात कैसी और नेताओं के महान बनने का मौक़ा कैसा।
रही सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महान बनने की बात तो उसमें भी अब सीमित स्कोप है। कुरीति समझी जाने वाली कई रीतियों को तो अब सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। ख़ासतौर पर लेनदेन संबंधी रीतियों को। समय-साल के हिसाब से नए-नए कंसेप्ट उभर कर सामने आ रहे हैं। इनमें चीज़ों को नए ढंग से व्याख्यित-परिभाषित किया जा रहा है। कल तक जो अनैतिक था, आज अलग-अलग तर्कों के सहारे नैतिक है। व्यक्तिगत लक्ष्यों के प्रति पूरा समर्पण ही आजकल नैतिकता बन गई है। ऐसे समय में नेता लोग किसे सुरीति माने और किसे कुरीति और किसे मिटा कर अपनी महानता दिखाएं? लेकिन महान तो बनना है चाहे इसके लिए महानता की नई परिभाषा ही क्यों ना गढ़नी पड़े। महानता की ओर ले जाने वाले कदमों को पुनर्निधारण ही क्यों न करना पड़े। सच है कि हर कोई अपने अपने ढंग से महान बनने की सोचता और जुगत भिड़ाता है। इसमें मीडिया उसकी सहायता के लिए बैठा है।
बिना पब्लिक के जे जाने गुप चुप तरीक़े से महान तो बना नहीं जा सकता। इसलिए परंपरागत छुटभैय्येपन से मुक्ति पानी होगी। लीक से हट कर कुछ नया करना होगा। या फिर मर जाना होगा क्योंकि बुरा से बुरा नेता भी मरने के बाद महान हो जाता है।
धोती कुरता पहन कर, किसी विचारधारा का चोगा ओढ़ कर, देश के लिए बिना मांगे जान देने की बात भर करने से अब नोटिस नहीं मिलती। अच्छी योजनाएं भी बनीं, शिलान्यास भी हुआ, काग़ज़ की नाव भी बनी, उसे प्लेन की तरह कुछ देर हवा में उड़ाया भी गया... लेकिन नाम न मिला। पिछले कई साल से बंधुआ मज़दूरी मिटाने, जनसंख्या क़ाबू करने और पर्यावरण बचाने की बात की... जनता ने ध्यान नहीं दिया। वर्षों प्राईम-मिनिस्टर रहे, मंत्रिमंडल में कई फेरबदल किए, देश चलाया, तनावों से जूझते दिखे और किंचित आध्यात्मिकता भी दिखाई... लेकिन इन सबसे महान बनने में कोई सहूलियत नहीं मिली।
अचानक कुछ घोटाले-कारगुज़ारियों के पन्ने फड़फड़ाए... हवाला, चारा, रिश्वत, जालसाज़ी...। श्रृंखला की एक से एक कड़ी। कैमरे की लाईटें चमकीं। कलम उठे। विरोध में ही सही, लिखा-बोला जाने लगा। अदालत आते-जाते समय टीवी पर दिखाए जाने लगे। जेल तक की नौबत आयी। पहले तो ख़राब लगा। फिर याद आया कि जेल यात्रा से ही तो महानता की जड़ को मज़बूती मिलती है।
फिर तो संकट का ये काल वरदान-सा लगने लगा। अपने प्रभाव को दिखा कर अपनी महत्ता बरक़रार रखने का... उसे बताने का सुअवसर है यह। कैसे करोड़पति लखपति बना जाता है इसका नज़ीर पेश कर जनता को प्रेरित किया जा सकता है। चोरी कर सीनाज़ोरी को महिमामंडित कर भी महान बना जा सकता है। नेताओं के वक्तव्यों में, इसकी झलक साफ देखी जा सकती है...अगर आंखे खोल कर देखें तो। सचमुच, भौतिक-उपभोक्तावादी आधुनिक भारत के महान व्यक्तित्व बनने जा रहे हैं वो!
(25दिसंबर1996 की मेरी डायरी का एक पन्ना)
Wednesday, October 3, 2007
"आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"
लोकसभा चुनाव के पुन: मंडराते सत्य को देखते हुए भारत की जनता ने एक मीटिंग का आयोजन किया। मक़सद ये रहा कि इस बार सरकार बनाने के लिए कैसे लोगों को सांसद चुना जाए। इस मीटिंग में देश के कोने कोने से और हर तबके के लोग शामिल हुए। तमाम प्रकार की मीटिंग्स की 'आम प्रकृति' के विपरीत यह एक अद्वितीय मीटिंग थी जिसमें लिए गए फ़ैसले बिल्कुल समयानुकूल रहे।
दिल्ली चलो के बैनर तले लोग ट्रेन भर भर के दिल्ली आए। फिर भी सबों ने रेल का पूरा-पूरा किराया दिया। ताकि लालू जी के मुनाफ़े में कोई कमी ना आए। वे आरक्षित डिब्बे में भी नहीं घुसे। अनुशासित व्यवहार किया। सभी शांतिपूर्वक सभा-स्थल तक पहुंचे। मीटिंग के दौरान और पश्चात भी जूतमपैज़ार की कोई नौबत नहीं आयी। बिना किसी विशेष बहस या गहन विचार-विमर्श के मीटिंगकर्ता एक नतीज़े पर पहुंच गए। किसी ने भी अलग राग नहीं अलापा। मतभिन्नता प्रकट नहीं की। इस प्रकार ये प्रयास सफल होता प्रतीत हुआ।
पहली बार देश की सम्पूर्ण जनता किसी मुद्दे पर एकमत हुई है। शायद इसलिए भी कि अब कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। देश की व्यवस्था के मूल को तो वो पहले से ही समझ रही थी। इस मीटिंग की उपलब्धि ये रही कि उसे स्वीकार भी लिया गया। तय हुआ कि अब औऱ मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए। समय आ गया है जब 'समय की मांग' को ध्यान में रख कर ही कदम उठाएं जाएं। अभी तक सांसद बनने वाले अधिकतर नेता नक़ाब ओढ़ते रहे हैं। इससे उन्हें समझने में भोली जनता को कठिनाई होती है। जनता को समझाने के लिए नेताओं को भी प्रपंचों का सहारा लेना पड़ता है। अत क्यों ना इस मजबूरी को मिटा दिया जाए। नेताओं को अपने असली रुप में सामने आने का मौक़ा दिया जाए।
तो सर्वसम्मति से यही फ़ैसला लिया गया कि उम्मीदवार चाहे जिस भी किसी पार्टी का हो, या उसे अघोषित अंतरंग संबंध रखता हो, सांसद चुने जाने के योग्य समझे जाएंगे बशर्ते आगे लिखे मापदंडों पर खरे उतरते हों।
इस बार आदर्श-मूल्यों आदि की बात करना ग़लत तरीक़े से सांसद चुने जाने का प्रयास माना जाएगा। इसलिए इस बार वही उम्मीदवार सफल होगें जो आपराधिक कार्यवृति या मनोवृति के हों। हर तरह के अपराध करने में सक्षम हों। उनका पढ़ा-लिखा होना तो अब तक ज़रुरी नहीं ही था... इस बार पुलिस रिकार्ड में फिंगर प्रिंट वाले को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, झूठे गवाह तैयार करने, प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने, पुलिस से मिलीभगत रखने जैसे कामों में दक्ष उम्मीदवार प्रिय पात्र होंगे।
इस विकासशील देश के भावी सांसदों को हर प्रकार के अपराध करने का अनुभव होना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में नई तकनीकी का इस्तेमाल करने, जैसे तंदूरी हत्या, करने वाले केन्द्र बिंदु में रहेंगे। सज़ायाफ्ता या हिस्ट्रीशीटर निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। प्रेरणा के लिए अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन, पप्पू यादव जैसे नेताओं की मोम की प्रतिमा संसद के गलियारे में लगायी जाएंगी। अमिताभ और शाहरुख़ से भी कोमल प्रतिमाएं... ताकि इनके सामने ग़लती से भी कोई आदर्श और मूल्यों की बात करे तो प्रतिमाएं शर्म से गल जाएं। और सच्चे आदर्शवादी नेता मौक़े पर ही पकड़े जाएं।
देश की जनता ने महसूस किया है कि मतदान के दौरान बूथ कैप्चरिंग आदि में सौ झमेले हैं। नाहक निर्दोषों की जान चली जाती है। उम्मीदवारों पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं और चुनाव आयोग का समय ख़राब होता है। इसलिए इस बार प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार की जगह लाउडिस्पीकर से ये बताना होगा कि मतदाताओं को वोट डालने बूथ तक जाना है या नहीं। अगर नहीं जाना तो और अच्छी बात है। वे आराम से घर पर बैठ एमटीवी देखें और लहर नमक़ीन खाकर मतदान तिथि को सेलिब्रेट करें। उधर प्रत्याशीगण यथाशक्ति वोटों का बंटवारा कर लें। इससे गोली बारूद के पैसे बचेंगे। इन पैसों से नेता और उनके प्यादों को दारू की और बोतलें मिल सकेंगी।
इन बातों के अलावा, जिन नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि संतोषप्रद नहीं रही है, लेकिन इस विषय में कुछ कर गुज़रने की जिनकी गहरी महत्वाकांक्षा है, उनके लिए भी जनता ने संसद के दरवाज़े खुले रखने का फ़ैसला किया है। शर्त सिर्फ यही कि चुनाव होने के ऐन पहले तक वे अपनी योग्यता साबित कर दें।
अंत में, भारतीय जनता की सिर्फ एक विनती है। संसद में पहुंचने के बाद एकाध करोड़ जैसी छोटी मोटी रकम के लिए भ्रष्टाचार की गरिमा को क्षति ना पहुंचाएं। सेज़, रिटेल सेक्टर में विदेशी कंपनियां, हवाई अड्डों के निजीकरण जैसे बड़े मौक़े हैं। हमेशा अरबों में खेलने की कोशिश करें। जनता का नारा है, "आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"।
आप भी लगाइए।
दिल्ली चलो के बैनर तले लोग ट्रेन भर भर के दिल्ली आए। फिर भी सबों ने रेल का पूरा-पूरा किराया दिया। ताकि लालू जी के मुनाफ़े में कोई कमी ना आए। वे आरक्षित डिब्बे में भी नहीं घुसे। अनुशासित व्यवहार किया। सभी शांतिपूर्वक सभा-स्थल तक पहुंचे। मीटिंग के दौरान और पश्चात भी जूतमपैज़ार की कोई नौबत नहीं आयी। बिना किसी विशेष बहस या गहन विचार-विमर्श के मीटिंगकर्ता एक नतीज़े पर पहुंच गए। किसी ने भी अलग राग नहीं अलापा। मतभिन्नता प्रकट नहीं की। इस प्रकार ये प्रयास सफल होता प्रतीत हुआ।
पहली बार देश की सम्पूर्ण जनता किसी मुद्दे पर एकमत हुई है। शायद इसलिए भी कि अब कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। देश की व्यवस्था के मूल को तो वो पहले से ही समझ रही थी। इस मीटिंग की उपलब्धि ये रही कि उसे स्वीकार भी लिया गया। तय हुआ कि अब औऱ मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए। समय आ गया है जब 'समय की मांग' को ध्यान में रख कर ही कदम उठाएं जाएं। अभी तक सांसद बनने वाले अधिकतर नेता नक़ाब ओढ़ते रहे हैं। इससे उन्हें समझने में भोली जनता को कठिनाई होती है। जनता को समझाने के लिए नेताओं को भी प्रपंचों का सहारा लेना पड़ता है। अत क्यों ना इस मजबूरी को मिटा दिया जाए। नेताओं को अपने असली रुप में सामने आने का मौक़ा दिया जाए।
तो सर्वसम्मति से यही फ़ैसला लिया गया कि उम्मीदवार चाहे जिस भी किसी पार्टी का हो, या उसे अघोषित अंतरंग संबंध रखता हो, सांसद चुने जाने के योग्य समझे जाएंगे बशर्ते आगे लिखे मापदंडों पर खरे उतरते हों।
इस बार आदर्श-मूल्यों आदि की बात करना ग़लत तरीक़े से सांसद चुने जाने का प्रयास माना जाएगा। इसलिए इस बार वही उम्मीदवार सफल होगें जो आपराधिक कार्यवृति या मनोवृति के हों। हर तरह के अपराध करने में सक्षम हों। उनका पढ़ा-लिखा होना तो अब तक ज़रुरी नहीं ही था... इस बार पुलिस रिकार्ड में फिंगर प्रिंट वाले को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, झूठे गवाह तैयार करने, प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने, पुलिस से मिलीभगत रखने जैसे कामों में दक्ष उम्मीदवार प्रिय पात्र होंगे।
इस विकासशील देश के भावी सांसदों को हर प्रकार के अपराध करने का अनुभव होना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में नई तकनीकी का इस्तेमाल करने, जैसे तंदूरी हत्या, करने वाले केन्द्र बिंदु में रहेंगे। सज़ायाफ्ता या हिस्ट्रीशीटर निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। प्रेरणा के लिए अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन, पप्पू यादव जैसे नेताओं की मोम की प्रतिमा संसद के गलियारे में लगायी जाएंगी। अमिताभ और शाहरुख़ से भी कोमल प्रतिमाएं... ताकि इनके सामने ग़लती से भी कोई आदर्श और मूल्यों की बात करे तो प्रतिमाएं शर्म से गल जाएं। और सच्चे आदर्शवादी नेता मौक़े पर ही पकड़े जाएं।
देश की जनता ने महसूस किया है कि मतदान के दौरान बूथ कैप्चरिंग आदि में सौ झमेले हैं। नाहक निर्दोषों की जान चली जाती है। उम्मीदवारों पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं और चुनाव आयोग का समय ख़राब होता है। इसलिए इस बार प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार की जगह लाउडिस्पीकर से ये बताना होगा कि मतदाताओं को वोट डालने बूथ तक जाना है या नहीं। अगर नहीं जाना तो और अच्छी बात है। वे आराम से घर पर बैठ एमटीवी देखें और लहर नमक़ीन खाकर मतदान तिथि को सेलिब्रेट करें। उधर प्रत्याशीगण यथाशक्ति वोटों का बंटवारा कर लें। इससे गोली बारूद के पैसे बचेंगे। इन पैसों से नेता और उनके प्यादों को दारू की और बोतलें मिल सकेंगी।
इन बातों के अलावा, जिन नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि संतोषप्रद नहीं रही है, लेकिन इस विषय में कुछ कर गुज़रने की जिनकी गहरी महत्वाकांक्षा है, उनके लिए भी जनता ने संसद के दरवाज़े खुले रखने का फ़ैसला किया है। शर्त सिर्फ यही कि चुनाव होने के ऐन पहले तक वे अपनी योग्यता साबित कर दें।
अंत में, भारतीय जनता की सिर्फ एक विनती है। संसद में पहुंचने के बाद एकाध करोड़ जैसी छोटी मोटी रकम के लिए भ्रष्टाचार की गरिमा को क्षति ना पहुंचाएं। सेज़, रिटेल सेक्टर में विदेशी कंपनियां, हवाई अड्डों के निजीकरण जैसे बड़े मौक़े हैं। हमेशा अरबों में खेलने की कोशिश करें। जनता का नारा है, "आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"।
आप भी लगाइए।
Monday, July 16, 2007
कहीं आपकी फ़ाईल भी तो नहीं अटकी है?
फ़ाईलें चलती हैं। उनकी अपनी चाल होती है। कई बार वो तेज़ी से चलती हैं। कई बार बहुत स्लो। इतनी कि एक टेबल से बगल वाली टेबल तक पहुंचने में दिनों लग जाते हैं। एक महकमे से दूसरे महकमे तक पहुंचने में तो महीनों। जिस मक़सद से फ़ाईल चली हो उसे पूरा होने में तो कई बार ज़िंदगी भी खप जाती है। जिसके लिए उस फ़ाईल को चलना होता है वो चल बसता है पर फ़ाईल नहीं चल पाती।
पदोन्नति की फ़ाईल। पुरस्कृत करने की फ़ाईल। तबादले की फाईल। नौकरी की फ़ाईल। कोर्ट-कचहरी की फ़ाईल। मुआवज़े की फ़ाईल। पेंशन की फ़ाईल। सरकारी लोन की फ़ाईल। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र की भी फ़ाईल। अस्पताल में दाख़िले की फ़ाईल। डिस्चार्ज होने की फ़ाईल। मंत्रालय की फ़ाईल। सरकारी ख़रीद फ़रोख्त की फाईल। बोफोर्स और डेनेल आर्म्स डील की फाईल। केस की फ़ाईल। सीबीआई की जांच की फ़ाईल।
फ़ाईलें तमाम तरह की होतीं हैं। कईं फ़ाईलें एक साथ चलती हैं। उनमें कईयों से हमारा सीधा सरोकार होता है। कईयों से पाला नहीं पड़ा होता है। जिनसे पड़ता है उन्हीं के बारे में समझ में आती है। पहले तो गैस और टेलिफोन कनेक्शन की भी फ़ाईलें चला करती थीं। बिजली मीटर लगाने की फ़ाईल। इन फ़ाईलों की तादाद घटी है क्योंकि अब फ़ाईलों की जगह 'मेलें' चलने लगी हैं। वो ख़ासतौर पर प्राईवेट दफ्तरों। यहां फ़ाईलें आगे नहीं बढ़तीं। यहां मेल फार्वर्ड होतीं हैं। इसके अपने गुण दोष हैं। कई बार पेंडिग बॅाक्स में डाल दी जाती हैं। शो ऐज़ अनरेड। कई बार तुरंत फार्वर्ड होती हैं। फ़ाईल लाने ले जाने वाले पिउन की भी ज़रुरत नहीं होती। बस मेल भेजना होता है। भेज कर बार इतल्ला भी करना होता है। 'डिड यू सी माई मेल। आई हैव जस्ट सेंट टू यू।' मेल पर सारा काम होता है। दूसरों का किया भी अपने नाम होता है। कुछ इसे मेल का खेल कहते हैं।
मेल को छोड़िए। उस संसार पर बात और कभी। अभी हम बात कर रहे हैं फ़ाईलों की। फ़ाईल किस चाल से चलती हैं ये फ़ाईल चलाने वालों की चरित्र पर डिपेंड करता है। फ़ाईलों की स्पीड घटाने-बढ़ाने के पीछे इनकी कुछ अपनी चालें होती हैं। कई बार वो चाल सीधे समझ में आ जाती है। कई बार घुमाफिरा बतायी जाती है। एक किरानी दूसरे के पास भेजता है। दूसरा तीसरे के पास। तीसरा फिर पहले के पास। इस चक्कर में कई ऋतुचक्र निकल जाती हैं।
फ़ाईलों को आगे बढ़ने के लिए चढ़ावे का बड़ा चक्कर है। क्लर्क स्तर पर ये चक्कर 10 से लेकर 10,000 तक का.... कुछ भी हो सकता है। इसमें बिचौलियों का भी बड़ा रोल होता है। जो फ़ाईल आपके जूते घिसने से आगे नहीं बढ़ती...इन बिचौलिए को बीच में लाते ही बढ़ जाती है। ये बड़े एक्सपर्ट होते हैं। किस बात की फ़ाईल है या किस अफ़सर के पास फ़ाईल है ये जाना नहीं कि तुंरत बड़बड़ा देते हैं। कह देते हैं कि 'जानता हूं उसे.... बड़ा काईयां हैं। बिना लिए दिए मानेगा नहीं। आप देख लीजिए क्या कर सकते हैं।'
फ़ाईलें छोटी और बड़ी भी होती हैं। बड़े लेबल की फ़ाईल पर चक्कर भी बड़ा होता है। वहां लेबल आफ इंटेरेस्ट अलग होता है। अंबानी के सेज़ की फाईल मुलायम बढाएं तो अलग बात होती है। मायावती रोके तो अलग। फिर मायावती भी फ़ाईल आगे बढ़वा दें तो कहानी बदल चुकी होती है। कुछ भी हो पर टाटा-बिड़ला जैसे पूंजीपतियों की फ़ाईलें कभी रुकती नहीं। उनकी फ़ाईलों की कांपियां भी कई होती हैं। एक अटकी हैं तो दूसरी चल पड़ती हैं। बंगाल में अटकती है तो हरियाणा में आगे बढ़ जाती है। सरकार बदलने के साथ कई बार फ़ाईलें खोली और बंद भी की जाती हैं। अपनो की बंद की... राजनीतिक विरोधियों की खोल ली।
'फक्करों' की फ़ाईल की तस्वीर अलग होती है। फ़ाईल आगे बढ़ने से उसकी ज़िंदगी बंधी होती है। और जहां किसी तरह का बंधन हो वहां फ़ाईल तेज़ी से कैसे मूव कर सकती है। वो धूल खाती है। वो वसूली मांगती है। नहीं मिलने पर वो गुम जाती है। वो ढ़ूंढ़ने पर भी नहीं मिलती है। मिलती है तो उस पर बड़े बाबू के दस्तख़्त नहीं हुए होते। 'फ़ाईल अभी नहीं देखी है.... फ़ाईल मेरे पास नहीं आयी है... पता करो फ़ाईल कहां है...' जैसे जवाब मिलते हैं। जबकि फ़ाईल वहीं कहीं होती है। वहीं अफ़सर दबा के बैठा होता है।
तो फ़ाईलें दबती भी हैं। पूरी नहीं सही तो उसमें से कुछ रिकार्ड तो ग़ायब हो ही जाते हैं। कई बार तो दफ्तरों में आग लगती है और फ़ाईलें जल जाती हैं। कुछ बचता ही नहीं। क्या कर लोगे।
पदोन्नति की फ़ाईल। पुरस्कृत करने की फ़ाईल। तबादले की फाईल। नौकरी की फ़ाईल। कोर्ट-कचहरी की फ़ाईल। मुआवज़े की फ़ाईल। पेंशन की फ़ाईल। सरकारी लोन की फ़ाईल। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र की भी फ़ाईल। अस्पताल में दाख़िले की फ़ाईल। डिस्चार्ज होने की फ़ाईल। मंत्रालय की फ़ाईल। सरकारी ख़रीद फ़रोख्त की फाईल। बोफोर्स और डेनेल आर्म्स डील की फाईल। केस की फ़ाईल। सीबीआई की जांच की फ़ाईल।
फ़ाईलें तमाम तरह की होतीं हैं। कईं फ़ाईलें एक साथ चलती हैं। उनमें कईयों से हमारा सीधा सरोकार होता है। कईयों से पाला नहीं पड़ा होता है। जिनसे पड़ता है उन्हीं के बारे में समझ में आती है। पहले तो गैस और टेलिफोन कनेक्शन की भी फ़ाईलें चला करती थीं। बिजली मीटर लगाने की फ़ाईल। इन फ़ाईलों की तादाद घटी है क्योंकि अब फ़ाईलों की जगह 'मेलें' चलने लगी हैं। वो ख़ासतौर पर प्राईवेट दफ्तरों। यहां फ़ाईलें आगे नहीं बढ़तीं। यहां मेल फार्वर्ड होतीं हैं। इसके अपने गुण दोष हैं। कई बार पेंडिग बॅाक्स में डाल दी जाती हैं। शो ऐज़ अनरेड। कई बार तुरंत फार्वर्ड होती हैं। फ़ाईल लाने ले जाने वाले पिउन की भी ज़रुरत नहीं होती। बस मेल भेजना होता है। भेज कर बार इतल्ला भी करना होता है। 'डिड यू सी माई मेल। आई हैव जस्ट सेंट टू यू।' मेल पर सारा काम होता है। दूसरों का किया भी अपने नाम होता है। कुछ इसे मेल का खेल कहते हैं।
मेल को छोड़िए। उस संसार पर बात और कभी। अभी हम बात कर रहे हैं फ़ाईलों की। फ़ाईल किस चाल से चलती हैं ये फ़ाईल चलाने वालों की चरित्र पर डिपेंड करता है। फ़ाईलों की स्पीड घटाने-बढ़ाने के पीछे इनकी कुछ अपनी चालें होती हैं। कई बार वो चाल सीधे समझ में आ जाती है। कई बार घुमाफिरा बतायी जाती है। एक किरानी दूसरे के पास भेजता है। दूसरा तीसरे के पास। तीसरा फिर पहले के पास। इस चक्कर में कई ऋतुचक्र निकल जाती हैं।
फ़ाईलों को आगे बढ़ने के लिए चढ़ावे का बड़ा चक्कर है। क्लर्क स्तर पर ये चक्कर 10 से लेकर 10,000 तक का.... कुछ भी हो सकता है। इसमें बिचौलियों का भी बड़ा रोल होता है। जो फ़ाईल आपके जूते घिसने से आगे नहीं बढ़ती...इन बिचौलिए को बीच में लाते ही बढ़ जाती है। ये बड़े एक्सपर्ट होते हैं। किस बात की फ़ाईल है या किस अफ़सर के पास फ़ाईल है ये जाना नहीं कि तुंरत बड़बड़ा देते हैं। कह देते हैं कि 'जानता हूं उसे.... बड़ा काईयां हैं। बिना लिए दिए मानेगा नहीं। आप देख लीजिए क्या कर सकते हैं।'
फ़ाईलें छोटी और बड़ी भी होती हैं। बड़े लेबल की फ़ाईल पर चक्कर भी बड़ा होता है। वहां लेबल आफ इंटेरेस्ट अलग होता है। अंबानी के सेज़ की फाईल मुलायम बढाएं तो अलग बात होती है। मायावती रोके तो अलग। फिर मायावती भी फ़ाईल आगे बढ़वा दें तो कहानी बदल चुकी होती है। कुछ भी हो पर टाटा-बिड़ला जैसे पूंजीपतियों की फ़ाईलें कभी रुकती नहीं। उनकी फ़ाईलों की कांपियां भी कई होती हैं। एक अटकी हैं तो दूसरी चल पड़ती हैं। बंगाल में अटकती है तो हरियाणा में आगे बढ़ जाती है। सरकार बदलने के साथ कई बार फ़ाईलें खोली और बंद भी की जाती हैं। अपनो की बंद की... राजनीतिक विरोधियों की खोल ली।
'फक्करों' की फ़ाईल की तस्वीर अलग होती है। फ़ाईल आगे बढ़ने से उसकी ज़िंदगी बंधी होती है। और जहां किसी तरह का बंधन हो वहां फ़ाईल तेज़ी से कैसे मूव कर सकती है। वो धूल खाती है। वो वसूली मांगती है। नहीं मिलने पर वो गुम जाती है। वो ढ़ूंढ़ने पर भी नहीं मिलती है। मिलती है तो उस पर बड़े बाबू के दस्तख़्त नहीं हुए होते। 'फ़ाईल अभी नहीं देखी है.... फ़ाईल मेरे पास नहीं आयी है... पता करो फ़ाईल कहां है...' जैसे जवाब मिलते हैं। जबकि फ़ाईल वहीं कहीं होती है। वहीं अफ़सर दबा के बैठा होता है।
तो फ़ाईलें दबती भी हैं। पूरी नहीं सही तो उसमें से कुछ रिकार्ड तो ग़ायब हो ही जाते हैं। कई बार तो दफ्तरों में आग लगती है और फ़ाईलें जल जाती हैं। कुछ बचता ही नहीं। क्या कर लोगे।
Wednesday, July 11, 2007
आओ 'लाईन' मारते हैं...रंगत बदल बदल कर
ब्लू लाईन बसें इन दिनों सुर्खियों में हैं। दरअसल 1995 में दिल्ली की सड़कों पर रेड लाईन बसों का आतंक रहा। फिर दिल्ली सरकार ने एक अजीबोगरीब फैसले के तहत इन बसों की रंगत लाल से ब्लू करने का फ़रमान जारी कर दिया। बसों का रंग बदल देने मात्र से क्या बस आॅपरेटर-ड्राईवर अपनी रंगत बदल लेगें...ये सवाल मेरे दिमाग में उठे क़रीब एक युग होने को आया। इस पर जो कुछ लिखा वो 27 जनवरी 1996 को नवभारत टाईम्स में 'कांटे की बात' कालम में प्रकाशित हुआ। आपके सामने फिर पेश कर रहा हूं।
दो बसों में होड़ लगी थी। एक दूसरी को पछाड़ने की कोशिश में संकरी सड़क पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'
दो बसों में होड़ लगी थी। एक दूसरी को पछाड़ने की कोशिश में संकरी सड़क पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'
दूसरी ने पलट कर कहा, 'त्वचा का रंग नीला पड़ गया तो क्या हुआ। मन थोड़े
ही नीला पड़ा है। बल्कि ये नीलापन तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमुच बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सीटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।'
ही नीला पड़ा है। बल्कि ये नीलापन तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमुच बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सीटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।' लेकिन सुना है अब तुममें स्पीड कंट्रोलर नामक कोई यंत्र लगाया जा रहा है। अब तुम पहले की तरह अपना तेवर नहीं दिखा पाओगी।' 'अरे छोड़ो ये सब कहने की बातें हैं। मन को कौन बांध पाया है भला। मेरा ड्राईवर बड़ा होशियार है। दिपु (दिल्ली पुलिस) को देखते ही यंत्र का कनेक्शन कर देता है। और उसके गुज़रते ही हटा देता है। हमारे आपरेटर कुछ दिनों में कुछ ऐसा आविष्कार कर ही लेगें जिससे ये आटोमैटिक हो जाए। अर्थात जिप्सी को देखते ही 40 की स्पी़ड नहीं तो इस्केप वेलोसिटी! और फिर हमारे सभी आपरेटर प्रत्येक रेड लाईट एवं गोलचक्कर पर हर महीने 100 रुपये दक्षिणा क्यों देते हैं। सिर्फ इसलिए न कि मैं बेधड़ रेड लाईट जंप कर सकूं। अपने पायदानों पर भी सवारियों को यात्रा सुख दे सकूं। नियत गति से तेज़ चल सकूं। कहने का मतलब की राजधानी की सड़कों पर मनमानी कर सकूं।'
'लेकिन फिर से ऐसा करने से तो तुम ब्लू लाईन वालों को भी बदनाम कर दोगी।'...'तो ब्लू लाईन वाले भी कौन से दूध के धुले हैं। वे तो और भी ब्लू हैं। फ़र्क सिर्फ इतना है कि अख़बार वाले नाहक ही हमारे पीछे पड़ गए। शायद हमारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से जल गए और हमें बदनाम कर दिया। जबकि अन्य 'लाईनवाले' भी हम से किसी भी माने में कम नहीं हैं। अब देखो न, हम रेड लाईन वालों पर ही आरोप लगा कि हम लोगों की जान से खेलते हैं। बात थोड़ी बहुत सच भी हुई तो क्या। दूसरी प्राईवेट बसवालों ने तो महिलाओं की इज्ज़त से खेलना शुरु कर दिया... और तीन लगातार दिनों में तीन बलात्कार कर डाले (ये वारदात उन दिनों व्हाईट लाईन और चार्टर्ड बसों में हुईं थीं)। हम लोगों को कम से कम इज्ज़त की मौत तो देते हैं। और फिर बिजनेस में रिस्क कवर तो करना ही पड़ता है। हमने भी किया। इसी रिस्क कवर करने के क्रम में कुछ मानव रक्त बह गया जिसके कारण हमारी 'रेडनेस' को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। असल में हमारी तरफ से भी कुछ ग़लतियां हुईं। 'दिपु' की तरह इन अख़बार वालों को 'कुछ' देते रहते तो शायद इस बात को वे आगे तक नहीं बढ़ाते।'
'लेकिन हमने सुन रखा है कि इन्होने हर प्रकार की विसंगतियों को जनता के सामने लाने का ठेका लिया हुआ है। इसलिए कुछ भी आफर करते हुए डर लगता है। हालांकि मुलायम सिंह वाले प्रकरण से कुछ आस बंधी थी। लेकिन इन 'काम के लोगों' को पत्रकारिता जगत से परे मान लिया गया। उनकी जगह 'टुटपुंजिया लेखक' अपने को अधिक आदर्शवादी साबित करने में लग गया। हो सकता है कि इन लोगों को आपस में ना बनती हो। फिर दिल्ली पुलिस को उसके सजीले परिधानों से पहचान भी लें। लेकिन इन पत्रकारों को पहचानना आजकल ज़रा मुश्किल काम है। कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। जिसे देखो वही अपने को पत्रकार कहता फिर रहा है। ऐसे में सबों को खुश रखना अपने बूते की बात नहीं है। वो तो भला हो सरकार का जिसने हमें विकल्प सुझा दिया है। अब ब्लू रंग की आड़ में हम अपने 'लाल अस्तित्व' को क़ायम रख सकेंगे।'
मतलब वही हुआ जिसका डर था। अब ब्लू लाईन वालों पर भी पाबंदी की बात हो रही है। रेड लाईन ख़त्म कर ब्लू लाईन बनी। देखते हैं अब इन बसों को दिल्ली सरकार अब क्या रंगत देती है। किसी ना किसी रंग में ये 'लाईनें' चलती रहेंगी...मरेंगी नहीं... दिल्ली की जनता बेशक सड़कों पर मरती रहेंगी।
Friday, June 22, 2007
लालू जी, मेरी 'सेक्स समस्या' दूर कीजिए!
बचपन में हुई ग़लतियों का ख़ामियाज़ा अक्सर जवानी में उठाना पड़ता है। मुझे भी पड़ा है। जबकि बचपन में मैंने ऐसी कोई ग़लती भी नहीं की। ये तो मेरे दादाजी थे जिन्होंने मेरा नाम उमाशंकर रख दिया। इस नाम के साथ बड़ा होता गया। ग़लती तब भी नहीं की। बस ग़लती एक हुई। एक बार रेल टिकट कटाने ख़ुद न जाकर अपने किसी जानकार को भेज दिया। ग़लती उससे भी नहीं हुई। वो टिकट लेकर आ गया।
मैं खुशी-खुशी ट्रेन में बैठ गया। रास्ते में पता नहीं कहां टीटीई आया। मैं ऊपर की बर्थ पर सो रहा था। उसने पहले बहुत आवाज़ दी होगी। मैं चादर तान के सोता रहा। वो और तेज़ चिल्लाया। मैं उठ बैठा। उसने तल्ख होकर कहा टिकट दिखाइए। मैने दिखा दिया। बोला इस टिकट पर आप कैसे सफर कर रहे हैं। मैंने ताज्जुब से पूछा क्यों? फिर क्या हवाई जहाज के टिकट पर सफ़र करें। उसने पलटवार किया। आप हवाई जहाज की टिकट पर बेशक ना करें लेकिन किसी महिला की टिकट पर भी सफ़र ना करें। पढ़े लिखे लगते हैं। शोभा नहीं देता।
मेरा माथा ठनका। मैंने कहा पर टिकट तो मेरी ही है। चार्ट में देख लीजिए। उमाशंकर सिंह लिखा होगा। चेकर ने फिर मुझ पर शक की निगाह मारी। बोला क्यों बहस कर रहे हैं। ये बर्थ उमा सिंह के नाम पर है और चार्ट में साफ साफ लिखा है 'एफ' 30। यानि तीस साल की महिला उमा सिंह का टिकट है ये।
मुझे माजरा समझते देर नहीं लगा। मैने अपना आईकार्ड वाईकार्ड निकाला। पर वो देखने को तैयार ही नहीं हुआ। टिकट में सेक्स के खाने में 'मेल' के 'एम' की जगह 'फीमेल' का 'एफ' लिखा जाना मेरे लिए बड़ी समस्या बन गयी। ग़ाज़ियाबाद के आसपास से ट्रेन में गुज़रते हुए दीवारों पर कई तरह की सेक्स समस्याओं के बारे में पढ़ा था। पर ये तो बिल्कुल नई तरह की सेक्स समस्या थी। इलाज़ के लिए कोई ताकतवाला ही चाहिए था... रेलवे का कोई बड़ा अधिकारी। पर समझ नहीं आया किसे फोन करुं। इस मर्ज की कहां से दवा लाऊं। '28 रैगरपुरा' में भी शायद ही मिले।
समझाने की कोशिश की कि ग़लती रेलवे की है। जिसने टिकट काटा उसने कम्प्यूटर में ग़लत लिख दिया होगा। शायद मेरे लंबे नाम को थोड़ा छोटा करने के लिए। जेनेरली मेरे नाम को या तो 'यू एस सिंह' कर देते हैं या फिर 'उमाशंकर' लिख कर ही छोड़ देते हैं। सिंह नहीं लगाते। पर उमा सिंह तो मेरे लिए भी नया नाम था। रिजर्वेशन फार्म मैंने अपने हाथों से ही भर जानकार को दिया था। सो यहां भी ग़लती की गुंजाइश कम होगी। तो जब मैंने ऐसी कोई ग़लती नहीं की तो मेरा क्या क़सूर। किसी और की ग़लती की सज़ा मुझे ना दें। ये टिकट मेरी ही है। तब तक एक दो सहयात्री मेरे फेवर में आए गए थे। उन्होने टीटीई को समझाया कि ये जब से चढ़े हैं मेल ही चढ़े हैं। फीमेल नहीं। आप मान जाईए। टीटीई साहब मुश्किल से माने।
सेक्स को लेकर मेरी ये समस्या एकाध मौक़ों पर और हुई है। आगे ना हो इसलिए लालू जी, आपसे अनुरोध है। आप रेल मंत्री हैं। आपसे ज़्यादा 'ताकतवाला' इन दिनों कोई नज़र नहीं आता। आप इस तरह की सेक्स-समस्या से ग्रसित यात्रियों को बेशक ना कहते हों कि 'मिल तो लें'। पर मैं सोचता हूं कि 'मिल ही लूं'। सेक्स से जुड़ी मेरी इस समस्या को आप ही दूर कर सकते हैं। ऐसी समस्या कई और यात्रियों के साथ भी हुई हो सकतीं हैं। अभी भी हो रही हो सकती हैं। ऐसी समस्या ना हो इसके लिए आप कम्प्यूटर से टिकट काटने वालों से थोड़ी सावधानी बरतने को कहें। इसमें शक नहीं कि वो बहुत मेहनत करते हैं। पर ग़लती की गुंजाइश ना छोड़ों तो ऐसी 'लोकलाज' वाली समस्या से हम बच जाएगें। नहीं तो दुनिया तो बाद में, पहले आपके टीटीई ही हमें नहीं छोड़ेगें। हा हा हा!
हां, टिकट कटाने वाले भी काउंटर छोड़ने के पहले टिकट की डीटेल और पैसे का हिसाब मिला लें।
शुभ यात्रा
मैं खुशी-खुशी ट्रेन में बैठ गया। रास्ते में पता नहीं कहां टीटीई आया। मैं ऊपर की बर्थ पर सो रहा था। उसने पहले बहुत आवाज़ दी होगी। मैं चादर तान के सोता रहा। वो और तेज़ चिल्लाया। मैं उठ बैठा। उसने तल्ख होकर कहा टिकट दिखाइए। मैने दिखा दिया। बोला इस टिकट पर आप कैसे सफर कर रहे हैं। मैंने ताज्जुब से पूछा क्यों? फिर क्या हवाई जहाज के टिकट पर सफ़र करें। उसने पलटवार किया। आप हवाई जहाज की टिकट पर बेशक ना करें लेकिन किसी महिला की टिकट पर भी सफ़र ना करें। पढ़े लिखे लगते हैं। शोभा नहीं देता।
मेरा माथा ठनका। मैंने कहा पर टिकट तो मेरी ही है। चार्ट में देख लीजिए। उमाशंकर सिंह लिखा होगा। चेकर ने फिर मुझ पर शक की निगाह मारी। बोला क्यों बहस कर रहे हैं। ये बर्थ उमा सिंह के नाम पर है और चार्ट में साफ साफ लिखा है 'एफ' 30। यानि तीस साल की महिला उमा सिंह का टिकट है ये।
मुझे माजरा समझते देर नहीं लगा। मैने अपना आईकार्ड वाईकार्ड निकाला। पर वो देखने को तैयार ही नहीं हुआ। टिकट में सेक्स के खाने में 'मेल' के 'एम' की जगह 'फीमेल' का 'एफ' लिखा जाना मेरे लिए बड़ी समस्या बन गयी। ग़ाज़ियाबाद के आसपास से ट्रेन में गुज़रते हुए दीवारों पर कई तरह की सेक्स समस्याओं के बारे में पढ़ा था। पर ये तो बिल्कुल नई तरह की सेक्स समस्या थी। इलाज़ के लिए कोई ताकतवाला ही चाहिए था... रेलवे का कोई बड़ा अधिकारी। पर समझ नहीं आया किसे फोन करुं। इस मर्ज की कहां से दवा लाऊं। '28 रैगरपुरा' में भी शायद ही मिले।
समझाने की कोशिश की कि ग़लती रेलवे की है। जिसने टिकट काटा उसने कम्प्यूटर में ग़लत लिख दिया होगा। शायद मेरे लंबे नाम को थोड़ा छोटा करने के लिए। जेनेरली मेरे नाम को या तो 'यू एस सिंह' कर देते हैं या फिर 'उमाशंकर' लिख कर ही छोड़ देते हैं। सिंह नहीं लगाते। पर उमा सिंह तो मेरे लिए भी नया नाम था। रिजर्वेशन फार्म मैंने अपने हाथों से ही भर जानकार को दिया था। सो यहां भी ग़लती की गुंजाइश कम होगी। तो जब मैंने ऐसी कोई ग़लती नहीं की तो मेरा क्या क़सूर। किसी और की ग़लती की सज़ा मुझे ना दें। ये टिकट मेरी ही है। तब तक एक दो सहयात्री मेरे फेवर में आए गए थे। उन्होने टीटीई को समझाया कि ये जब से चढ़े हैं मेल ही चढ़े हैं। फीमेल नहीं। आप मान जाईए। टीटीई साहब मुश्किल से माने।
सेक्स को लेकर मेरी ये समस्या एकाध मौक़ों पर और हुई है। आगे ना हो इसलिए लालू जी, आपसे अनुरोध है। आप रेल मंत्री हैं। आपसे ज़्यादा 'ताकतवाला' इन दिनों कोई नज़र नहीं आता। आप इस तरह की सेक्स-समस्या से ग्रसित यात्रियों को बेशक ना कहते हों कि 'मिल तो लें'। पर मैं सोचता हूं कि 'मिल ही लूं'। सेक्स से जुड़ी मेरी इस समस्या को आप ही दूर कर सकते हैं। ऐसी समस्या कई और यात्रियों के साथ भी हुई हो सकतीं हैं। अभी भी हो रही हो सकती हैं। ऐसी समस्या ना हो इसके लिए आप कम्प्यूटर से टिकट काटने वालों से थोड़ी सावधानी बरतने को कहें। इसमें शक नहीं कि वो बहुत मेहनत करते हैं। पर ग़लती की गुंजाइश ना छोड़ों तो ऐसी 'लोकलाज' वाली समस्या से हम बच जाएगें। नहीं तो दुनिया तो बाद में, पहले आपके टीटीई ही हमें नहीं छोड़ेगें। हा हा हा!
हां, टिकट कटाने वाले भी काउंटर छोड़ने के पहले टिकट की डीटेल और पैसे का हिसाब मिला लें।
शुभ यात्रा
Monday, June 18, 2007
"हे नारद जी, मेरा भी इस्तीफा ले लो"
इस्तीफा एक गुणकारी पदा
र्थ है। इसका उपयोग कई परिस्थितियों में किया जाता है। यह कई प्रकार की कार्यसिद्धियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। एक ओर ये जहां किसी को संकट में डालने के लिए लिए प्रयुक्त होता है तो वहीं दूसरी ओर संकट से उबारनके क्रम में भी इसका जम कर इस्तेमाल होता है। यह किसी भी मौसम में दिया और लिया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर जिसका 'नेट' चर्चा में होता है उसकी हर छोटी बड़ी ग़लतियों पर चिल्ला चिल्ला कर इस्तीफा मांगने का अपना औचित्य बनता जा रहा है। इस्तीफों के पीछे अपने तील-तिकड़म हैं। इस्तीफों के लिए तर्क भी गढ़े जा रहे हैं। कुतर्क भी दिए जा रहे हैं।
इस उपभोक्तावादी युग में इस्तीफा भी एक उत्पाद है जिसका अपना एक बाज़ार है। ब्लॅाग पर ये बाज़ार आजकल काफी गर्म है। कमप्यूटर तकनीकी के सहारे इस्तीफे को एक नया आयाम मिला है। यों कह सकते हैं कि वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई का लोहा गर्म है और इस्तीफा उस पर चोट। धड़ाधड़ इस्तीफे दिए जा रहे हैं। मज़े की बात है कि इसकी कोई विशेष मांग भी नहीं है। मांग से अधिक आपूर्ति है। सो इस्तीफों का भाव काफी गिर गया लगता है। जिसे देखो उसी के पास इस्तीफा है। जो नहीं दे रहा या जिनको अभी देने की ज़रुरत नहीं, उम्मीद है वो भी जल्द ही कांख में इस्तीफा दबाए माउस क्लिक करेगें। और ऐसे भी हैं जो अपने चिठ्ठों में चाह कर भी कुछ ऐसा विवादस्पद नहीं लिख पाए जिससे उन्होने हिट्स मिलते, उनमें से भी कुछ इस्तीफा देने को तत्पर दिख रहे हैं। शायद इसके ज़रिए कुछ बटोर लें। भईया यही तो समर्पण है। 'ब्लॅागतांत्रिक'... सॅारी लोकतांत्रिक आस्था है। जब कोई उपाय नहीं है तो इस्तीफा है।
वैसे इस्तीफा देना भी कोई हंसी खेल नहीं है। बहुत लोग चाहते हुए भी नहीं दे पाते हैं। उन्हें उनके वैचारिक नूरा-कुश्ती के सहयोगी, पालनहार से इसकी इजाज़त नहीं मिलती। कुछ तो इस्तीफा देने के पहले धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। कि शायद कोई रास्ता निकल आए। अगर ऐसा नहीं होता है तब वे कितने बोछिल मन और खिसियाए मूड से इस्तीफा तैयार करता है ये रामजाने... (हे प्रभु रक्षा करना, रामजाने नाम का कोई ब्लॅागर ना हो। नहीं तो वो मुझसे लड़ मरेगा कि मेरा नाम क्यों लिखा)। उसके बाद भी कितनी बड़ी विडंबना है कि किसी का इस्तीफा मंज़ूर नहीं होता और किसी को इस्तीफे के लिए मजबूर किया जाता है। कोई इसे चुनौती के रुप में स्वीकारता है तो किसी के लिए ये त्रासदी भरा है।
इस्तीफों का अपना इतिहास रहा है। विभिन्न दौरों और मोड़ों से गुज़रता हुआ यह आज ब्लॅागिंग तक जा पहुंचा है। यहां यह किसी के लिए यह अंतिम उपाय है तो किसी के लिए प्रथम प्रतिक्रिया बन गया है। अपनी कलम (या कहें की-बोर्ड) की कमज़ोरी को छिपाने और हिट्स बटोरने का का साधन बन गया है। अगर आप पर झूठा लांछन लगा है तो आप अपने स्तंभ पर बने रहते हुए भी ठोस तर्कों और साक्ष्यों के ज़रिए अपनी निर्दोषता साबित करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन नहीं। विपत्ति के समय पलायनवादी मन अपेक्षाकृत शार्टकट रास्ते से अपना संदेश देना चाहता है। लांछन लगा है। खुद को स्वच्छ साबित करना है। एग्रीगेटर से इस्तीफा दे दो। जनता यही कहेगी कि देखो भई बेचारे पर आरोप लगा नही कि इस्तीफा मेल कर दिया। कितना नैतिक और गैरसांप्रदायिक आदमी है।
कोई कोई तो पूरी आग उगल देता है फिर भी इस्तीफा नहीं देता। नारद पर बना रहता है। उस पर मुकद्दमा भी नहीं चलता। और वो पद छोड़ना तो दूर... दूर दूर तक मंशा भी ज़ाहिर नहीं करता कि अंगूली उठने पर इस्तीफा दे दूंगा। कितना घाघ है। और उसे देखो। इस्तीफा लिए तैयार बैठा था। अपने ऊपर लगे आरोपों के प्रति कितना संवेदनशील है। और हो भी क्यों ना। उसे पता है कि अगर उसने आज इस्तीफा नहीं दिया और अपनी डाल पर बैठा रहा तो रोज़ उसकी ख़बर ली जाएगी। कई साथी चिठ्ठाकार लताडेगें। कुछ इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार देगें। समूह मे जगहंसाई होगी। इसलिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प है। दे दो। उसके बाद कैसे उठोगे-बैठोगे-सोचोगे-लिखोगे ये कोई देखने वाला नहीं होगा। सार्वजनिक परिदृश्य से बाहर हो जाओगे। उसके बाद लोग तुम्हें भूलने के साथ-साथ तुम पर लगे आरोपों को भी भूल जाएगें। तब तक अपनी भावी रणनीति तय करते रहो।
ब्लॅागिंग की दुनिया में बकवाद-विवादों के मौके तो आते ही रहते हैं। उसमें तुम जैसा कोई दूसरा शामिल होगा। बस इसी समय शेर की तरह दहाड़ उठना। तुमने भी गंद लिखा... तुमने भी गंद लिखा। उसके बाद उसे भी इस्तीफे की तरफ धकेल देना। ब्लॅागर्स की दुनिया में तुम फिर से उभर आओगे। वैचारिक जंग जीत जाओगे। अपनी नई एग्रीगेटर की दूकान सजा लोगे। इसलिए हे वत्स। तुम अभी इस एग्रीगेटर से तो इस्तीफा दे ही दो!
र्थ है। इसका उपयोग कई परिस्थितियों में किया जाता है। यह कई प्रकार की कार्यसिद्धियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। एक ओर ये जहां किसी को संकट में डालने के लिए लिए प्रयुक्त होता है तो वहीं दूसरी ओर संकट से उबारनके क्रम में भी इसका जम कर इस्तेमाल होता है। यह किसी भी मौसम में दिया और लिया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर जिसका 'नेट' चर्चा में होता है उसकी हर छोटी बड़ी ग़लतियों पर चिल्ला चिल्ला कर इस्तीफा मांगने का अपना औचित्य बनता जा रहा है। इस्तीफों के पीछे अपने तील-तिकड़म हैं। इस्तीफों के लिए तर्क भी गढ़े जा रहे हैं। कुतर्क भी दिए जा रहे हैं।इस उपभोक्तावादी युग में इस्तीफा भी एक उत्पाद है जिसका अपना एक बाज़ार है। ब्लॅाग पर ये बाज़ार आजकल काफी गर्म है। कमप्यूटर तकनीकी के सहारे इस्तीफे को एक नया आयाम मिला है। यों कह सकते हैं कि वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई का लोहा गर्म है और इस्तीफा उस पर चोट। धड़ाधड़ इस्तीफे दिए जा रहे हैं। मज़े की बात है कि इसकी कोई विशेष मांग भी नहीं है। मांग से अधिक आपूर्ति है। सो इस्तीफों का भाव काफी गिर गया लगता है। जिसे देखो उसी के पास इस्तीफा है। जो नहीं दे रहा या जिनको अभी देने की ज़रुरत नहीं, उम्मीद है वो भी जल्द ही कांख में इस्तीफा दबाए माउस क्लिक करेगें। और ऐसे भी हैं जो अपने चिठ्ठों में चाह कर भी कुछ ऐसा विवादस्पद नहीं लिख पाए जिससे उन्होने हिट्स मिलते, उनमें से भी कुछ इस्तीफा देने को तत्पर दिख रहे हैं। शायद इसके ज़रिए कुछ बटोर लें। भईया यही तो समर्पण है। 'ब्लॅागतांत्रिक'... सॅारी लोकतांत्रिक आस्था है। जब कोई उपाय नहीं है तो इस्तीफा है।
वैसे इस्तीफा देना भी कोई हंसी खेल नहीं है। बहुत लोग चाहते हुए भी नहीं दे पाते हैं। उन्हें उनके वैचारिक नूरा-कुश्ती के सहयोगी, पालनहार से इसकी इजाज़त नहीं मिलती। कुछ तो इस्तीफा देने के पहले धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। कि शायद कोई रास्ता निकल आए। अगर ऐसा नहीं होता है तब वे कितने बोछिल मन और खिसियाए मूड से इस्तीफा तैयार करता है ये रामजाने... (हे प्रभु रक्षा करना, रामजाने नाम का कोई ब्लॅागर ना हो। नहीं तो वो मुझसे लड़ मरेगा कि मेरा नाम क्यों लिखा)। उसके बाद भी कितनी बड़ी विडंबना है कि किसी का इस्तीफा मंज़ूर नहीं होता और किसी को इस्तीफे के लिए मजबूर किया जाता है। कोई इसे चुनौती के रुप में स्वीकारता है तो किसी के लिए ये त्रासदी भरा है।
इस्तीफों का अपना इतिहास रहा है। विभिन्न दौरों और मोड़ों से गुज़रता हुआ यह आज ब्लॅागिंग तक जा पहुंचा है। यहां यह किसी के लिए यह अंतिम उपाय है तो किसी के लिए प्रथम प्रतिक्रिया बन गया है। अपनी कलम (या कहें की-बोर्ड) की कमज़ोरी को छिपाने और हिट्स बटोरने का का साधन बन गया है। अगर आप पर झूठा लांछन लगा है तो आप अपने स्तंभ पर बने रहते हुए भी ठोस तर्कों और साक्ष्यों के ज़रिए अपनी निर्दोषता साबित करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन नहीं। विपत्ति के समय पलायनवादी मन अपेक्षाकृत शार्टकट रास्ते से अपना संदेश देना चाहता है। लांछन लगा है। खुद को स्वच्छ साबित करना है। एग्रीगेटर से इस्तीफा दे दो। जनता यही कहेगी कि देखो भई बेचारे पर आरोप लगा नही कि इस्तीफा मेल कर दिया। कितना नैतिक और गैरसांप्रदायिक आदमी है।
कोई कोई तो पूरी आग उगल देता है फिर भी इस्तीफा नहीं देता। नारद पर बना रहता है। उस पर मुकद्दमा भी नहीं चलता। और वो पद छोड़ना तो दूर... दूर दूर तक मंशा भी ज़ाहिर नहीं करता कि अंगूली उठने पर इस्तीफा दे दूंगा। कितना घाघ है। और उसे देखो। इस्तीफा लिए तैयार बैठा था। अपने ऊपर लगे आरोपों के प्रति कितना संवेदनशील है। और हो भी क्यों ना। उसे पता है कि अगर उसने आज इस्तीफा नहीं दिया और अपनी डाल पर बैठा रहा तो रोज़ उसकी ख़बर ली जाएगी। कई साथी चिठ्ठाकार लताडेगें। कुछ इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार देगें। समूह मे जगहंसाई होगी। इसलिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प है। दे दो। उसके बाद कैसे उठोगे-बैठोगे-सोचोगे-लिखोगे ये कोई देखने वाला नहीं होगा। सार्वजनिक परिदृश्य से बाहर हो जाओगे। उसके बाद लोग तुम्हें भूलने के साथ-साथ तुम पर लगे आरोपों को भी भूल जाएगें। तब तक अपनी भावी रणनीति तय करते रहो।
ब्लॅागिंग की दुनिया में बकवाद-विवादों के मौके तो आते ही रहते हैं। उसमें तुम जैसा कोई दूसरा शामिल होगा। बस इसी समय शेर की तरह दहाड़ उठना। तुमने भी गंद लिखा... तुमने भी गंद लिखा। उसके बाद उसे भी इस्तीफे की तरफ धकेल देना। ब्लॅागर्स की दुनिया में तुम फिर से उभर आओगे। वैचारिक जंग जीत जाओगे। अपनी नई एग्रीगेटर की दूकान सजा लोगे। इसलिए हे वत्स। तुम अभी इस एग्रीगेटर से तो इस्तीफा दे ही दो!
Sunday, June 17, 2007
"हे नारद, मेरा भी इस्तीफा ले लो"
इस्तीफा एक गुणकारी पदार्थ है। इसका उपयोग कई परिस्थितियों में किया जाता है। यह कई प्रकार की कार्यसिद्धियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। एक ओर ये जहां किसी को संकट में डालने के लिए प्रयुक्त होता है तो वहीं दूसरी ओर संकट से उबारने के क्रम में भी इसका जम कर इस्तेमाल होता है। यह किसी भी मौसम में दिया और लिया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर जिसका 'नेट' चर्चा में होता है उसकी हर छोटी बड़ी ग़लतियों पर चिल्ला चिल्ला कर इस्तीफा मांगने का अपना औचित्य बनता जा रहा है। इस्तीफों के पीछे अपने तील-तिकड़म हैं। इस्तीफों के लिए तर्क भी गढ़े जा रहे हैं। कुतर्क भी दिए जा रहे हैं।इस उपभोक्तावादी युग में इस्तीफा भी एक उत्पाद है जिसका अपना एक बाज़ार है। ब्लॅाग पर ये बाज़ार आजकल काफी गर्म है। कमप्यूटर तकनीकी के सहारे इस्तीफे को एक नया आयाम मिला है। यों कह सकते हैं कि वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई का लोहा गर्म है और इस्तीफा उस पर चोट। धड़ाधड़ इस्तीफे दिए जा रहे हैं। मज़े की बात है कि इसकी कोई विशेष मांग भी नहीं है। मांग से अधिक आपूर्ति है। सो इस्तीफों का भाव काफी गिर गया लगता है। जिसे देखो उसी के पास इस्तीफा है। जो नहीं दे रहा या जिनको अभी देने की ज़रुरत नहीं, उम्मीद है वो भी जल्द ही कांख में इस्तीफा दबाए माउस क्लिक करेगें। और ऐसे भी हैं जो अपने चिठ्ठों में चाह कर भी कुछ ऐसा विवादस्पद नहीं लिख पाए जिससे उन्होने हिट्स मिलते, उनमें से भी कुछ इस्तीफा देने को तत्पर दिख रहे हैं। शायद इसके ज़रिए कुछ बटोर लें। भईया यही तो समर्पण है। 'ब्लॅागतांत्रिक'... सॅारी लोकतांत्रिक आस्था है। जब कोई उपाय नहीं है तो इस्तीफा है।
वैसे इस्तीफा देना भी कोई हंसी खेल नहीं है। बहुत लोग चाहते हुए भी नहीं दे पाते हैं। उन्हें उनके वैचारिक नूरा-कुश्ती के सहयोगी, पालनहार से इसकी इजाज़त नहीं मिलती। कुछ तो इस्तीफा देने के पहले धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। कि शायद कोई रास्ता निकल आए। अगर ऐसा नहीं होता है तब वे कितने बोछिल मन और खिसियाए मूड से इस्तीफा तैयार करता है ये रामजाने... (हे प्रभु रक्षा करना, रामजाने नाम का कोई ब्लॅागर ना हो। नहीं तो वो मुझसे लड़ मरेगा कि मेरा नाम क्यों लिखा)। उसके बाद भी कितनी बड़ी विडंबना है कि किसी का इस्तीफा मंज़ूर नहीं होता और किसी को इस्तीफे के लिए मजबूर किया जाता है। कोई इसे चुनौती के रुप में स्वीकारता है तो किसी के लिए ये त्रासदी भरा है।
इस्तीफों का अपना इतिहास रहा है। विभिन्न दौरों और मोड़ों से गुज़रता हुआ यह आज ब्लॅागिंग तक जा पहुंचा है। यहां यह किसी के लिए यह अंतिम उपाय है तो किसी के लिए प्रथम प्रतिक्रिया बन गया है। अपनी कलम (या कहें की-बोर्ड) की कमज़ोरी को छिपाने और हिट्स बटोरने का का साधन बन गया है। अगर आप पर झूठा लांछन लगा है तो आप अपने स्तंभ पर बने रहते हुए भी ठोस तर्कों और साक्ष्यों के ज़रिए अपनी निर्दोषता साबित करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन नहीं। विपत्ति के समय पलायनवादी मन अपेक्षाकृत शार्टकट रास्ते से अपना संदेश देना चाहता है। लांछन लगा है। खुद को स्वच्छ साबित करना है। एग्रीगेटर से इस्तीफा दे दो। जनता यही कहेगी कि देखो भई बेचारे पर आरोप लगा नही कि इस्तीफा मेल कर दिया। कितना नैतिक और गैरसांप्रदायिक आदमी है।
कोई कोई तो पूरी आग उगल देता है फिर भी इस्तीफा नहीं देता। नारद पर बना रहता है। उस पर मुकद्दमा भी नहीं चलता। और वो पद छोड़ना तो दूर... दूर दूर तक मंशा भी ज़ाहिर नहीं करता कि अंगूली उठने पर इस्तीफा दे दूंगा। कितना घाघ है। और उसे देखो। इस्तीफा लिए तैयार बैठा था। अपने ऊपर लगे आरोपों के प्रति कितना संवेदनशील है। और हो भी क्यों ना। उसे पता है कि अगर उसने आज इस्तीफा नहीं दिया और अपनी डाल पर बैठा रहा तो रोज़ उसकी ख़बर ली जाएगी। कई साथी चिठ्ठाकार लताडेगें। कुछ इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार देगें। समूह मे जगहंसाई होगी। इसलिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प है। दे दो। उसके बाद कैसे उठोगे-बैठोगे-सोचोगे-लिखोगे ये कोई देखने वाला नहीं होगा। सार्वजनिक परिदृश्य से बाहर हो जाओगे। उसके बाद लोग तुम्हें भूलने के साथ-साथ तुम पर लगे आरोपों को भी भूल जाएगें। तब तक अपनी भावी रणनीति तय करते रहो।
ब्लॅागिंग की दुनिया में बकवाद-विवादों के मौके तो आते ही रहते हैं। उसमें तुम जैसा कोई दूसरा शामिल होगा। बस इसी समय शेर की तरह दहाड़ उठना। तुमने भी गंद लिखा... तुमने भी गंद लिखा। उसके बाद उसे भी इस्तीफे की तरफ धकेल देना। ब्लॅागर्स की दुनिया में तुम फिर से उभर आओगे। वैचारिक जंग जीत जाओगे। अपनी नई एग्रीगेटर की दूकान सजा लोगे। इसलिए हे वत्स। तुम अभी इस एग्रीगेटर से तो इस्तीफा दे ही दो!
Saturday, May 26, 2007
रंग बदला, तेवर नहीं
(कई बार जब मैं अपना पिछला लिखा देखता हूं तो मन करता है धीरे धीरे वो सब भी आपके सामने रखूं। आज की मेरी पोस्ट ऐसी ही है। दरअसल 1995 में दिल्ली की सड़कों पर रेड लाईन बसों का आतंक रहा। फिर दिल्ली सरकार ने एक अजीबोगरीब फैसले के तहत इन बसों की रंगत लाल से ब्लू करने का फैसला किया। इस पर जो कुछ दिमाग में आया कागज़ पर उकेर दिया। 27 जनवरी 1996 को नवभारत टाईम्स में प्रकाशित अपना व्यंग्य आपके सामने रख रहा हूं।)
दूसरी ने पलट कर कहा, 'त्वचा का रंग नीला पड़ गया तो क्या हुआ। मन थोड़े ही नीला पड़ा है। बल्कि ये तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमु
च बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सिटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।' लेकिन सुना है अब तुममें स्पीड कंट्रोलर नामक कोई यंत्र लगाया जा रहा है। अब तुम पहले की तरह अपना तेवर नहीं दिखा पाओगी।'
'अरे छोड़ो ये सब कहने की बातें हैं। मन को कौन बांध पाया है भला। मेरा ड्राईवर बड़ा होशियार है। दिपु (दिल्ली पुलिस) को देखते ही यंत्र का कनेक्शन कर देता है। और उसके गुज़रते ही हटा देता है। हमारे आपरेटर कुछ दिनों में कुछ ऐसा आविष्कार कर ही लेगें जिससे ये आटोमैटिक हो जाए। अर्थात जिप्सी को देखते ही 40 की स्पी़ड नहीं तो इस्केप वेलोसिटी! और फिर हमारे सभी आपरेटर प्रत्येक रेड लाईट एवं गोलचक्कर पर हर महीने 100 रुपये दक्षिणा क्यों देते हैं। सिर्फ इसलिए न कि मैं बेधड़ रेड लाईट जंप कर सकूं। अपने पायदानों पर भी सवारियों को यात्रा सुख दे सकूं। नियत गति से तेज़ चल सकूं। कहने का मतलब की राजधानी की सड़कों पर मनमानी कर सकूं।'
दो बसों में होड़ लगी थी। एक दूसरी को पछाड़ने की कोशिश में संकरी सड़क
पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'
पर भी दोनों तीव्र गति से भागी जा रहीं थीं। एक बस ने दूसरी से कहा, 'अब तो तू पीछे हो चल। तू अब रेड लाईन नहीं रही। तेरा रंग अब लाल नहीं रहा। तेरे बदन का रंग अब धीरे धीरे नीला पड़ गया है।'दूसरी ने पलट कर कहा, 'त्वचा का रंग नीला पड़ गया तो क्या हुआ। मन थोड़े ही नीला पड़ा है। बल्कि ये तो मेरे अंदर के ज़हर को ही दर्शाता है। और मेरे ड्राईवर की धमनियों में बहने वाला रक्त तो अभी भी रेड ही है। उसकी तो त्वचा का रंग भी नहीं बदला। मानसिकता बदलने की बात तो दूर। वह तो अभी भी मेरी स्टीयरिंग और एक्सिलेटर के साथ वैसी ही अठखेलियां करता है, जैसी पहले किया करता था। ब्रेक लगाने के मामले में वो अब भी वैसा ही बेपरवाह है। कभी तो झटके से लगा देता है...कभी लगाता ही नहीं। सचमु
च बड़ा झेड़ता है मुझे। कंडक्टर सवारियों को पूर्व की भांति ही मुझमें ठूंसता रहता है। हैल्पर मुझ पर थाप देकर और सिटी बजा कर मेरी गति को और रोमांचकारी बना देता है। वो तो शुक्र है कि हम टाटा और लीलैंड जैसे घरानों में पैदा हुए हैं वर्ना.....।' लेकिन सुना है अब तुममें स्पीड कंट्रोलर नामक कोई यंत्र लगाया जा रहा है। अब तुम पहले की तरह अपना तेवर नहीं दिखा पाओगी।''अरे छोड़ो ये सब कहने की बातें हैं। मन को कौन बांध पाया है भला। मेरा ड्राईवर बड़ा होशियार है। दिपु (दिल्ली पुलिस) को देखते ही यंत्र का कनेक्शन कर देता है। और उसके गुज़रते ही हटा देता है। हमारे आपरेटर कुछ दिनों में कुछ ऐसा आविष्कार कर ही लेगें जिससे ये आटोमैटिक हो जाए। अर्थात जिप्सी को देखते ही 40 की स्पी़ड नहीं तो इस्केप वेलोसिटी! और फिर हमारे सभी आपरेटर प्रत्येक रेड लाईट एवं गोलचक्कर पर हर महीने 100 रुपये दक्षिणा क्यों देते हैं। सिर्फ इसलिए न कि मैं बेधड़ रेड लाईट जंप कर सकूं। अपने पायदानों पर भी सवारियों को यात्रा सुख दे सकूं। नियत गति से तेज़ चल सकूं। कहने का मतलब की राजधानी की सड़कों पर मनमानी कर सकूं।'
'लेकिन फिर से ऐसा करने से तो तुम ब्लू लाईन वालों को भी बदनाम कर दोगी।'...'तो ब्लू लाईन वाले भी कौन से दूध के धुले हैं। वे तो और भी ब्लू हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अख़बार वाले नाहक ही हमारे पीछे पड़ गए। शायद हमारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से जल गए और हमें बदनाम कर दिया। जबकि अन्य 'लाईनवाले' भी हम से किसी भी माने में कम नहीं हैं। अब देखो न, हम रेड लाईन वालों पर ही आरोप लगा कि हम लोगों की जान से खेलते हैं। बात थोड़ी बहुत सच भी हुई तो क्या। दूसरी प्राईवेट बसवालों ने तो महिलाओं की इज्ज़त से खेलना शुरु कर दिया... और तीन लगातार दिनों में तीन बलात्कार कर डाले। हम लोगों को कम से कम इज्ज़त की मौत तो देते हैं। और फिर बिजनेस में रिस्क कवर तो करना ही पड़ता है। हमने भी किया। इसी रिस्क कवर करने के क्रम में कुछ मानव रक्त बह गया जिसके कारण हमरी 'रेडनेस' को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। असल में हमारी तरफ से भी कुछ ग़लतियां हुईं। 'दिपु' की तरह इन अख़बार वालों को 'कुछ' देते रहते तो शायद इस बात को वे आगे तक नहीं बढ़ाते।'
'लेकिन हमने सुन रखा है कि इन्होने हर प्रकार की विसंगतियों को जनता के सामने लाने का ठेका लिया हुआ है। इसलिए कुछ भी आफर करते हुए डर लगता है। हालांकि मुलायम सिंह वाले प्रकरण से कुछ आस बंधी थी। लेकिन इन 'काम के लोगों को पत्रकारिता जगत से परे मान लिया गया। उनकी जगह 'टुटपुंजिया लेखक' अपने को अधिक आदर्शवादी साबित करने में लग गया। हो सकता है कि इन लोगों को आपस में ना बनती हो। फिर दिल्ली पुलिस को उसके सजीले परिधानों से पहचान भी लें। लेकिन इन पत्रकारों को पहचानना आजकल ज़रा मुश्किल काम है। कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। जिसे देखो वही अपने को पत्रकार कहता फिर रहा है। ऐसे में सबों को खुश रखना अपने बूते की बात नहीं है। वो तो भला हो सरकार का जिसने हमें विकल्प सुझा दिया है। अब ब्लू रंग की आड़ में हम अपने 'लाल अस्तित्व' को क़ायम रख सकेंगे।'
Sunday, May 6, 2007
एक व्यंग्य यह भी
चुसूल यात्रा समेत कश्मीर वादी पर अपनी बात आगे जारी रखूंगा। फिलहाल मेरी नज़र एक व्यंग्य रचना पर पड़ी जो मैंने अब से क़रीब ग्यारह साल पहले लिखा था। 18 जुलाई 1996 को नवभारत टाइम्स में इसी शीर्षक के साथ छपे अपने इस व्यंग्य को बिना एक शब्द काटे-जोड़े आपके सामने रख रहा हूं। आपलोगों को अगर ठीक लगे तो बाद में इस रचना के पीछे की प्रेरणा के बारे में भी बताउंगा...
व्यंग्य है क्या? एक काॅम्प्लेक्स ही ना! ये आख़िर जनमता कहां से है? असफलता जनित खीज से ही तो! मतभिन्नता हो सकती है। पर इतना तो तय है कि सभी उच्चता चाहते हैं। स्थिति की उच्चता। चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक। ये सभी अर्थ से स्वत: जुड़े हुए हैं सो आर्थिक भी। अब इस रेस में पिछड़ा हुआ मगर जागरुक घोड़ा अपनी बौद्धिक उच्चता ही साबित-स्थापित करना चाहता है। इसलिए वह लिखता है। लिखने को भी असंख्य विषय हैं। सैंकड़ों बातें हैं। वह उधर नहीं जाता। उस लेखनी को मानने को भी मन से तैयार नहीं। कुतर्क देता है कि वो तो सिर्फ सूचनाओं का हस्तांतरण है। कुछ इधर से तो कुछ उधर से उठा कर। उस पर मौलिकता का लेबर लगा कर। जिनमें सोच की निजता नहीं रहती। या फिर कुछ आदर्शवादी बातों का विस्तारित बंडल। जो कम से कम आज की दुनिया को नहीं चाहिए।
तो फिर क्या चाहती है ये दुनिया? कटाक्ष! दूसरों की टिकिया को बिल्कुल साधारण साबित कर देने वाला विज्ञापन। इन सब की जड़ में क्या है? वही अपनी प्रतिष्ठा की ज़िद। सफलता की चाह। दूसरों को नीचा देखने की महत्वाकांक्षा। अपनी दमित भावनाओं को तुष्ट करने की ललक। यहां आकर आदर्श के शाब्दिक तर्क बेकार हो जाते हैं। शुरु होता है वैचारिक तिकड़म को शब्दरुप देने का सिलसिला।
जैसा कि पहले भी लिखा गया है। सभी चाहते हैं दौलत और शोहरत। चाहते हैं उन्हें नोटिस किया जाए। अपने समाज में, सर्किल में देश में और दुनिया में। लेकिन आपको कैसे नोटिस किया जाए भाई? हवाला में आपका नाम नहीं, बोफोर्स को मृतप्राय: है और यूरिया के वक्त भी आप सोते रहे। दाऊद से तो क्या किसी राव तक से आपका नज़दीकी संबंध नहीं। १९८४ के दंगों में भी आपने ख़ास योगदान नहीं किया। बेहमई कर इलेक्शन लड़ते तब भी चलता। लेकिन नहीं। इंडस्ट्रियलिस्ट-कैपिटलिस्ट आप हैं नहीं और एन्नाराई बन नहीं सकते। तो माफ कीजिएगा भूखे मरने वालों को नोटिस करने का यहां कोई प्रावधान नहीं। आप जितनी क़ूवत वालों की यहां कोई पूछ नहीं।
मान लीजिए आप लिखते हैं और इसी से वो सब कुछ पा लेना चाहते हैं जो अन्यत्र आपको नहीं मिला, तो क्या कोई स्कूप है आपके पास? क्लिंटन-बेनज़ीर संबंध का। या कोई केन्द्रीय मंत्री है जिसकी बदौलत आप कूद सकें। कोई आपको पालने वाला है। आपके लिए कोई इतना नरम और मुलायम है कि जो अपने कोटे आपको कुछ दे। नहीं न! एक तो आप अंग्रेज़ी के आॅथर भी नहीं और अपने अवैध संबंधों का ख़ुलासा भी आप नहीं करेगें। आपका किसी से अवैध संबंध रहा इसकी भी कोई गांरटी नहीं। अपनी यौन कुंठा के बारे में लिख कर बड़े लेखक होने का प्रमाण आप दे नहीं सकते। 'दिल्ली' नहीं तो 'पटना' ही लिख दीजिए। आपका सेटेनिक वर्सेज़ तक आपके लिए फलदायी नहीं हो सकता क्योंकि आप सहिष्णु कहे जाने वाले धर्म के अवलंबी हैं।
फिर तो मुश्किल है आपको नोटिस करना। अब तो आपको वही नोटिस कर सकता है जो नियतिवश या मजबूरीवश आपकी ही स्थिति से गुज़र रहा हो। जो अभी तक समाज में, इवेन अपने परिवार में भी अपने लिए इच्छित जगह नहीं बना पाया हो। जो करना तो बहुत कुछ चाहता हो पर कुछ कर नहीं पा रहा हो। सिवाए आत्मप्रशंसा के। दूसरों के सफलता की असलियत खोलने के। उसमें आवश्यकतानुसार मिर्च मसाला डालने के। चटकारे ले लेकर सुनाने के। जबकि उसे निश्चत पता है कि स्थिति आएगी तो वो भी ख़ुशी ख़शी वही करेगा जैसा उसके पड़ोसी या बाॅस ने या फिर देश के किसी नेता या लेखक-पत्रकार ने किया होगा। कोई तभी तक ईमानदार है जब तक कि उसे बेईमानी का मौक़ा नहीं मिलता। यही मौक़ा आपको नहीं मिला है। आपको ही क्यों बहुतों को नहीं मिला है। वे सभी आजतक की असफलता से खीजे हैं। जले भुने बैठे हैं।
उठाइए कलम और रख दीजिए उनके मर्म पर। चुभने के बावजूद तसल्ली मिलेगी। कुछ ऐसा लिखिए कि सब से आगे निकल चुके भाई-बान्धवों पर दुलन्ती प्रहार कीजिए। भड़ास निकालिए। अपनी असफलता के झूठ की तुलना दूसरों की सफलता के सच से करिए। लाख मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करिए। उनको कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं। हां, आपका एक पाठक वर्ग है। वह ज़रूर आपको नोटिस करेगा कि कितने बड़े बुद्धिजीवी हैं। आसपास की ही बात करते हैं। और आपका लिखा हुआ छपेगा।
व्यंग्य है क्या? एक काॅम्प्लेक्स ही ना! ये आख़िर जनमता कहां से है? असफलता जनित खीज से ही तो! मतभिन्नता हो सकती है। पर इतना तो तय है कि सभी उच्चता चाहते हैं। स्थिति की उच्चता। चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक। ये सभी अर्थ से स्वत: जुड़े हुए हैं सो आर्थिक भी। अब इस रेस में पिछड़ा हुआ मगर जागरुक घोड़ा अपनी बौद्धिक उच्चता ही साबित-स्थापित करना चाहता है। इसलिए वह लिखता है। लिखने को भी असंख्य विषय हैं। सैंकड़ों बातें हैं। वह उधर नहीं जाता। उस लेखनी को मानने को भी मन से तैयार नहीं। कुतर्क देता है कि वो तो सिर्फ सूचनाओं का हस्तांतरण है। कुछ इधर से तो कुछ उधर से उठा कर। उस पर मौलिकता का लेबर लगा कर। जिनमें सोच की निजता नहीं रहती। या फिर कुछ आदर्शवादी बातों का विस्तारित बंडल। जो कम से कम आज की दुनिया को नहीं चाहिए।
तो फिर क्या चाहती है ये दुनिया? कटाक्ष! दूसरों की टिकिया को बिल्कुल साधारण साबित कर देने वाला विज्ञापन। इन सब की जड़ में क्या है? वही अपनी प्रतिष्ठा की ज़िद। सफलता की चाह। दूसरों को नीचा देखने की महत्वाकांक्षा। अपनी दमित भावनाओं को तुष्ट करने की ललक। यहां आकर आदर्श के शाब्दिक तर्क बेकार हो जाते हैं। शुरु होता है वैचारिक तिकड़म को शब्दरुप देने का सिलसिला।
जैसा कि पहले भी लिखा गया है। सभी चाहते हैं दौलत और शोहरत। चाहते हैं उन्हें नोटिस किया जाए। अपने समाज में, सर्किल में देश में और दुनिया में। लेकिन आपको कैसे नोटिस किया जाए भाई? हवाला में आपका नाम नहीं, बोफोर्स को मृतप्राय: है और यूरिया के वक्त भी आप सोते रहे। दाऊद से तो क्या किसी राव तक से आपका नज़दीकी संबंध नहीं। १९८४ के दंगों में भी आपने ख़ास योगदान नहीं किया। बेहमई कर इलेक्शन लड़ते तब भी चलता। लेकिन नहीं। इंडस्ट्रियलिस्ट-कैपिटलिस्ट आप हैं नहीं और एन्नाराई बन नहीं सकते। तो माफ कीजिएगा भूखे मरने वालों को नोटिस करने का यहां कोई प्रावधान नहीं। आप जितनी क़ूवत वालों की यहां कोई पूछ नहीं।
मान लीजिए आप लिखते हैं और इसी से वो सब कुछ पा लेना चाहते हैं जो अन्यत्र आपको नहीं मिला, तो क्या कोई स्कूप है आपके पास? क्लिंटन-बेनज़ीर संबंध का। या कोई केन्द्रीय मंत्री है जिसकी बदौलत आप कूद सकें। कोई आपको पालने वाला है। आपके लिए कोई इतना नरम और मुलायम है कि जो अपने कोटे आपको कुछ दे। नहीं न! एक तो आप अंग्रेज़ी के आॅथर भी नहीं और अपने अवैध संबंधों का ख़ुलासा भी आप नहीं करेगें। आपका किसी से अवैध संबंध रहा इसकी भी कोई गांरटी नहीं। अपनी यौन कुंठा के बारे में लिख कर बड़े लेखक होने का प्रमाण आप दे नहीं सकते। 'दिल्ली' नहीं तो 'पटना' ही लिख दीजिए। आपका सेटेनिक वर्सेज़ तक आपके लिए फलदायी नहीं हो सकता क्योंकि आप सहिष्णु कहे जाने वाले धर्म के अवलंबी हैं।
फिर तो मुश्किल है आपको नोटिस करना। अब तो आपको वही नोटिस कर सकता है जो नियतिवश या मजबूरीवश आपकी ही स्थिति से गुज़र रहा हो। जो अभी तक समाज में, इवेन अपने परिवार में भी अपने लिए इच्छित जगह नहीं बना पाया हो। जो करना तो बहुत कुछ चाहता हो पर कुछ कर नहीं पा रहा हो। सिवाए आत्मप्रशंसा के। दूसरों के सफलता की असलियत खोलने के। उसमें आवश्यकतानुसार मिर्च मसाला डालने के। चटकारे ले लेकर सुनाने के। जबकि उसे निश्चत पता है कि स्थिति आएगी तो वो भी ख़ुशी ख़शी वही करेगा जैसा उसके पड़ोसी या बाॅस ने या फिर देश के किसी नेता या लेखक-पत्रकार ने किया होगा। कोई तभी तक ईमानदार है जब तक कि उसे बेईमानी का मौक़ा नहीं मिलता। यही मौक़ा आपको नहीं मिला है। आपको ही क्यों बहुतों को नहीं मिला है। वे सभी आजतक की असफलता से खीजे हैं। जले भुने बैठे हैं।
उठाइए कलम और रख दीजिए उनके मर्म पर। चुभने के बावजूद तसल्ली मिलेगी। कुछ ऐसा लिखिए कि सब से आगे निकल चुके भाई-बान्धवों पर दुलन्ती प्रहार कीजिए। भड़ास निकालिए। अपनी असफलता के झूठ की तुलना दूसरों की सफलता के सच से करिए। लाख मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करिए। उनको कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं। हां, आपका एक पाठक वर्ग है। वह ज़रूर आपको नोटिस करेगा कि कितने बड़े बुद्धिजीवी हैं। आसपास की ही बात करते हैं। और आपका लिखा हुआ छपेगा।
Subscribe to:
Posts (Atom)
