पीएसी के सामने प्रधानमंत्री को पेश होने दिया जाए या नहीं इसे लेकर बीजेपी के भीतर ही पसोपेश पैदा हो गया है। सुषमा नियमों का हवाला दे कर कह रही हैं कि प्रधानमंत्री क्या, किसी भी मंत्री की पेशी लोकलेखा समिति के सामने नहीं हो सकती। लेकिन मुरली मनोहर जोशी उचित समय पर उचित फ़ैसले की बात कर रहे हैं। आखिर क्यों?
मुरली मनोहर जोशी बीजेपी की अंदरुनी राजनीति में बहुत पहले हाशिए पर धकेल दिए गए। वे इस समय पीएसी यानि लोकलेखा समिति के मुखिया हैं। पीएसी अपने तौर पर 2जी घोटाले की जांच में जुटी है। बीजेपी जेपीसी की मांग कर रही है। मतलब पीएसी के मुखिया के तौर जोशी जी की क्षमता और महत्व को नकार रही है। लगता है बीजेपी को अपनी ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता पर भरोसा नहीं!
कांग्रेस जेपीसी की मांग पर विपक्ष और कुछ साथी दलों की एकजुटता को तोड़ने में नाकाम रही है। प्रधानमंत्री ने पीएसी के सामने पेश होने की चिठ्ठी लिख कर बेशक एनडीए और यूपीए के कई साथी दलों का भरोसा न जीत पाए हों, जोशी जी के अहम को तो जीत ही लिया है। जोशी जी को भी लंबे समय बाद टीवी और अख़बारों की सुर्खियां मिली हैं। वो अपनी पार्टी की वजह से नहीं। पार्टी ने तो उनके श्रीनगर एकता यात्रा तक में उनको सुर्खियां नहीं बटोरने दी। अब सुर्खियां मिली हैं तो पीए की पेशकश की वजह से। अगर वो पीएम की पेशी की पेशकश को आज ठुकरा देते हैं तो वो तुरंत फोकस से हट जाएंगे। लिहाज़ा वो सही समय का इंतज़ार करेंगे। यानि चुप रह कर ये देखेंगे कि सरकार जेपीसी के लिए तैयार होती दिख रही है या नहीं या फिर बीजेपी समेत जेपीसी समर्थक पार्टियों के हमले की धार कब कुंद पड़ती है।
अभी की हालत में जोशी जी के दोनों हाथ लड्डू हैं। पीएम पेशी के लिए रिक्वेस्ट कर रहे हैं। बीजेपी पीएम की रिक्वेस्ट जल्द टर्न डाउन करवाने के लिए छटपटा रही है। बहुत बढ़ चुकी उम्र और ख़ासतौर पर अपनी ही पार्टी में घट चुकी राजनीतिक उपादेयता जोशी के लिए पीएम की पेशकश दिल्ली की इस सर्द में नज़ले खांसी की दवा जोशीना साबित हो रही है। बेशक उनकी महत्वाकांक्षा पर पार्टी का दबाव या फिर नियम भारी पड़े और प्रधानमंत्री उनके सामने औपचारिक रूप से पेश न हो पाएं, लेकिन जांच के सिलसिले पीएम से अनौपचारिक बातचीत से भी जोशी जी की महत्ता साबित होगी।
बीजेपी की सुषमा जी जैसी नेताओं, और थोड़ा ऊपर उठे तो आडवाणी जी, को समझ में आना चाहिए कि पार्टी में सबके अहम को साथ लेकर चलने का कितना फायदा होगा। सिर्फ वरिष्ठता के हवाले से पीएसी के चेयरमैन का पद ही अहम तो संतुष्टि देने के लिए काफी नहीं होता।
कांग्रेस के रणनीतिकार जेपीसी के घेरे से निकलने में बेशक नकारे साबित हुए हों लेकिन पीएम की ताज़ा पेशकश ने अभी कांग्रेस का हाथ, कुछ समय के लिए ही सही, ऊपर कर दिया है। अब उनको तलाश बीजेपी के अलावे जेपीसी मांग करने वाला दूसरी पार्टियों में भी जोशी जैसी हस्तियों की होगी।
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Tuesday, December 28, 2010
Thursday, August 21, 2008
BMW का मतलब 'बिको मत वकीलसाहब'
बीएमडब्ल्यू कार दुर्घटना मुकद्दमें में एनडीटीवी के स्टिंग ऑपरेशन पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आ गया है। मामले में फंसे दोनों वरिष्ठ वकील आरके आनंद और आईयू खान को दोषी पाया गया है। दोनों वकीलों से वरिष्ठ वकील होने का दर्ज़ा वापस लेने की अनुशंसा की गई है और इनकी वकालत पर चार महीने की पाबंदी भी लगा दी गई है।
इस पर एक पुरानी पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक कर सकते हैं।
BMW मतलब Biko-Mat-Wakeelsahab!!!
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BMW मतलब Biko-Mat-Wakeelsahab!!!
Thursday, August 7, 2008
जम्मू जाग जाने का वक्त है... पार्ट 2
गतांक से आगे...
जम्मू में कई इलाक़े में कश्मीरी बसे हैं। पंडित और मुसलमान भी। नई नई बस्तियां बसी हैं। एसबेस्टर की और महलनुमा भी। उनके बीच धार्मिक स्थल भी बने हैं। मंदिर भी और मस्ज़िद भी। तब क्यों नहीं स्यापा हुआ। अब क्यों हो रहा है। कम्युनल लाईन पर बात तब क्यों नहीं आयी। अब क्यों आ रही है।
ज़मीन वापस लेने के फैसले के पीछे अगर श्रीनगर के जनांदोलन की दुहाई दी जा रही है तो ये बात किसी से छिपी नहीं है कि कम से कम दो दशक से पूरी घाटी में आंदोलन, हिंसक या अहिंसक, किस बात के लिए हो रहे हैं। भारत से अलग होने के लिए ही ना। तो जनभावना और जनआंदोलन का ख़्याल कर क्यों नहीं खुला छोड़ देते उन्हें। मालूम है धर्मनिरपेक्षों को कि वो इलाका तो चला ही जाए... पूरा देश जूते मारेगा सो अलग। इसलिए उनको बांध के ही सही... साथ रखना है। और वोट मिलता रहे... कुर्सी बची रहे इसले लिए जनभावना की दुहाई देकर चंद अलगाववादियों को खुश रखना है। और ये अगर लोकल पॉलिटिक्स में बने रहने की चालाक रफ्फूगिरी नहीं है तो क्यों कांग्रेस और पीडीपी जैसी सभ्रांत पार्टियों के नेता ज़मीन की लड़ाई में जम्मू के साथ हो लिए हैं। पार्टी लाइन तोड़ रहे है या पार्टी ही छोड़ रहे हैं। इसलिए क्योंकि नहीं हुए तो ज़मीन सूंघ जाएंगे। जो लोकल हीट इन धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के लोकल नेताओं को लोकल स्तर पर हो रहा है वही अगर राष्ट्रीय स्तर पर रास्ट्रीय स्तर के नेताओं को होने लगे तो शायद वो अपना चश्मा उतार फेंके।
ज़मीन देने के ख़िलाफ जब श्रीनगर में आंदोलन शुरु हुआ तो ज़िम्मेदार सैय्यद अली शाह गिलानी जैसे अलगाववादी नेताओं को ठहराया गया। वहां अगर ये मामला गहरा सांप्रदायिक रंग लेने से बचा तो उन टैक्सी ड्राईवरों और व्यापार करने वालों की वजह से जिनकी रोज़ी रोटी ‘टनल पार’ वालों से चलती है। क्योंकि आपने उनको आज़ादी दी नहीं है इसलिए वो इधर वालों पर आश्रित हैं। इसलिए जहां कहीं भी टनल पार वालों पर पत्थर बरसने की नौबत आयी... वो बचा ले गए... बचा ले जाते हैं। जहां पत्थर बरसे वो कैमरों की निगाह में आ नहीं पाए। अगर कोई भुक्तभोगी मिलेगा तो वही आपको बता पाएगा। क्या क्या हुआ। कैसे वापस आए। लेकिन वहां धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का शासन है। इसलिए सब कुछ मैनेज कर लिया गया। लेकिन अब वहीं मीरवाइज़ उमर फारुक सेब का ट्रक लेकर एलओसी क्रॉस करने की बात कर रहे हैं। मेहबूबा कहतीं है कि हमें अलग कर दो इतना ही दिक्कत है तो। क्यों भई। बीजेपी के नेता भड़काऊ हैं तो ये आगे आकर क्यों नहीं कहते कि जम्मू के भाई... इतनी सी ज़मीन के लिए इतना बवाल क्यों। ले लो। क्या इससे कश्मीर कम हो जाएगा। नहीं। कश्मीरियत उंची उठ जाएगी। पर वो ऐसा क्यों करें।
दरअसल कश्मीर किसी आज़ादी की लड़ाई का नहीं राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का शिकार रहा है। जिसका एक सिरा पाकिस्तान को खुलता है। ट्रांसफॉर्मर तो बिहार में भी फुंकते हैं। लेकिन ट्रांसफॉमर फुंकने पर भी ‘जीवे जीवे पाकिस्तान... हम क्या मांगे आज़ादी’ के नारे लगते सुने गए हैं। तो इकॉनॉमिक ब्लोकेड पर तो पाकिस्तान की गोद में बैठने डर दिखाना तो ऐसे नेताओं की फितरत का हिस्सा है। कभी इनको एक्सपोज़ करने की बात क्यों नहीं होती। नंगे पंगे को ही रगड़ कर क्यों खुद को सबसे ठीक होने की गलतफहमी पाले हुए हैं। जान लें। गुजरात हो या जम्मू और कश्मीर, धर्म के नाम पर जहां भी राजनीतिक सत्ता पर बने रहने की मंशा होगी... आज न कल ऐसी ही जलती हुई तस्वीर दिखेगी।
जम्मू जलने के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराने वाले सावधान। हिन्दुत्व का एक फ्लॉप शो देकर कुंद हो चुकी पार्टी में आप एक नई जान भर रहे हो। इस पार्टी में इतनी कूवत होती तो अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ सिर्फ बयानबाज़ी कर चुप नहीं रह जाती। जनभावना को भड़का कोई जनांदोलन का भ्रम दे पाने जैसी हालत भी पैदा कर पाती तो देश कई जगह जल रहा होता। आंतरिक सुरक्षा के नाम पर बहक कर लोग बांग्लादेशियों को सीमा पर घसीटने पर आमादा हो रहे होते। राम मंदिर बनाने के लिए दुबारा से ईंट लेकर आडवाणी के पीछे हो लिए होते। लेकिन अभी सिर्फ सिर्फ जम्मू जला है तो सिर्फ एक वजह से। आपकी वजह से। क्योंकि आपने जलने की पृष्ठभूमि तैयार की। पहले ज़मीन देकर। फिर वापस लेकर।
जम्मू में कई इलाक़े में कश्मीरी बसे हैं। पंडित और मुसलमान भी। नई नई बस्तियां बसी हैं। एसबेस्टर की और महलनुमा भी। उनके बीच धार्मिक स्थल भी बने हैं। मंदिर भी और मस्ज़िद भी। तब क्यों नहीं स्यापा हुआ। अब क्यों हो रहा है। कम्युनल लाईन पर बात तब क्यों नहीं आयी। अब क्यों आ रही है।
ज़मीन वापस लेने के फैसले के पीछे अगर श्रीनगर के जनांदोलन की दुहाई दी जा रही है तो ये बात किसी से छिपी नहीं है कि कम से कम दो दशक से पूरी घाटी में आंदोलन, हिंसक या अहिंसक, किस बात के लिए हो रहे हैं। भारत से अलग होने के लिए ही ना। तो जनभावना और जनआंदोलन का ख़्याल कर क्यों नहीं खुला छोड़ देते उन्हें। मालूम है धर्मनिरपेक्षों को कि वो इलाका तो चला ही जाए... पूरा देश जूते मारेगा सो अलग। इसलिए उनको बांध के ही सही... साथ रखना है। और वोट मिलता रहे... कुर्सी बची रहे इसले लिए जनभावना की दुहाई देकर चंद अलगाववादियों को खुश रखना है। और ये अगर लोकल पॉलिटिक्स में बने रहने की चालाक रफ्फूगिरी नहीं है तो क्यों कांग्रेस और पीडीपी जैसी सभ्रांत पार्टियों के नेता ज़मीन की लड़ाई में जम्मू के साथ हो लिए हैं। पार्टी लाइन तोड़ रहे है या पार्टी ही छोड़ रहे हैं। इसलिए क्योंकि नहीं हुए तो ज़मीन सूंघ जाएंगे। जो लोकल हीट इन धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के लोकल नेताओं को लोकल स्तर पर हो रहा है वही अगर राष्ट्रीय स्तर पर रास्ट्रीय स्तर के नेताओं को होने लगे तो शायद वो अपना चश्मा उतार फेंके।
ज़मीन देने के ख़िलाफ जब श्रीनगर में आंदोलन शुरु हुआ तो ज़िम्मेदार सैय्यद अली शाह गिलानी जैसे अलगाववादी नेताओं को ठहराया गया। वहां अगर ये मामला गहरा सांप्रदायिक रंग लेने से बचा तो उन टैक्सी ड्राईवरों और व्यापार करने वालों की वजह से जिनकी रोज़ी रोटी ‘टनल पार’ वालों से चलती है। क्योंकि आपने उनको आज़ादी दी नहीं है इसलिए वो इधर वालों पर आश्रित हैं। इसलिए जहां कहीं भी टनल पार वालों पर पत्थर बरसने की नौबत आयी... वो बचा ले गए... बचा ले जाते हैं। जहां पत्थर बरसे वो कैमरों की निगाह में आ नहीं पाए। अगर कोई भुक्तभोगी मिलेगा तो वही आपको बता पाएगा। क्या क्या हुआ। कैसे वापस आए। लेकिन वहां धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का शासन है। इसलिए सब कुछ मैनेज कर लिया गया। लेकिन अब वहीं मीरवाइज़ उमर फारुक सेब का ट्रक लेकर एलओसी क्रॉस करने की बात कर रहे हैं। मेहबूबा कहतीं है कि हमें अलग कर दो इतना ही दिक्कत है तो। क्यों भई। बीजेपी के नेता भड़काऊ हैं तो ये आगे आकर क्यों नहीं कहते कि जम्मू के भाई... इतनी सी ज़मीन के लिए इतना बवाल क्यों। ले लो। क्या इससे कश्मीर कम हो जाएगा। नहीं। कश्मीरियत उंची उठ जाएगी। पर वो ऐसा क्यों करें।
दरअसल कश्मीर किसी आज़ादी की लड़ाई का नहीं राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का शिकार रहा है। जिसका एक सिरा पाकिस्तान को खुलता है। ट्रांसफॉर्मर तो बिहार में भी फुंकते हैं। लेकिन ट्रांसफॉमर फुंकने पर भी ‘जीवे जीवे पाकिस्तान... हम क्या मांगे आज़ादी’ के नारे लगते सुने गए हैं। तो इकॉनॉमिक ब्लोकेड पर तो पाकिस्तान की गोद में बैठने डर दिखाना तो ऐसे नेताओं की फितरत का हिस्सा है। कभी इनको एक्सपोज़ करने की बात क्यों नहीं होती। नंगे पंगे को ही रगड़ कर क्यों खुद को सबसे ठीक होने की गलतफहमी पाले हुए हैं। जान लें। गुजरात हो या जम्मू और कश्मीर, धर्म के नाम पर जहां भी राजनीतिक सत्ता पर बने रहने की मंशा होगी... आज न कल ऐसी ही जलती हुई तस्वीर दिखेगी।
जम्मू जलने के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराने वाले सावधान। हिन्दुत्व का एक फ्लॉप शो देकर कुंद हो चुकी पार्टी में आप एक नई जान भर रहे हो। इस पार्टी में इतनी कूवत होती तो अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ सिर्फ बयानबाज़ी कर चुप नहीं रह जाती। जनभावना को भड़का कोई जनांदोलन का भ्रम दे पाने जैसी हालत भी पैदा कर पाती तो देश कई जगह जल रहा होता। आंतरिक सुरक्षा के नाम पर बहक कर लोग बांग्लादेशियों को सीमा पर घसीटने पर आमादा हो रहे होते। राम मंदिर बनाने के लिए दुबारा से ईंट लेकर आडवाणी के पीछे हो लिए होते। लेकिन अभी सिर्फ सिर्फ जम्मू जला है तो सिर्फ एक वजह से। आपकी वजह से। क्योंकि आपने जलने की पृष्ठभूमि तैयार की। पहले ज़मीन देकर। फिर वापस लेकर।
जम्मू जाग जाने का वक्त है
जम्मू जाग जाने का वक्त है। उन लोगों के लिए जिन्होने छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सालों साल से अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति अपना रखी है। आपको ये लाइनें किसी बीजेपी या विश्व हिन्दू परिषद् के नेता का लग सकती हैं। लेकिन यही सच्चाई नज़र आने लगी है। ख़ास तौर पर उन लोगों को जो रोज़ टीवी पर जम्मू के लोगों को सड़क पर उतरते देख रहे हैं। जो जम्मू की महिलाओं को पहली बार उसी तरह से छाती पीटते देख रहे हैं जैसा अब तक सिर्फ कश्मीर में किसी कस्टोडियल कीलिंग के बाद देखने में आता था। जत्थे के जत्थे लोग। पुलिस, आंसू गैस और गोली से जूझते लोग। आप भी देख रहे हैं।जो लोग जम्मू की हालत के लिए बीजेपी जैसी पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराते हैं वो कहीं ना कहीं बीजेपी की मदद करते नज़र आते हैं। एक ऐसी पार्टी जो राम मंदिर के लिए शिला पूजन करा जन भावना को भड़का अयोध्या तक ले गई... वही पार्टी जो हिन्दुत्व का झंडाबरदार बनने का वैसा ही नाटक दूबारा नहीं कर सकी। क्यों। क्योंकि उसका प्रपंच सामने आ गया। फिर वो कभी वो ताक़त नहीं पा सकी। पा सकी होती तो शायद देश में कई जगहों पर वो अपना एजेंडा चला चुकी होती... चला रही होती। गुजरात मोदी के हवाले छोड़ दें तो बाक़ी कहीं हिन्दुत्व फैक्टर बीजेपी के लिए काम करता नज़र नहीं आता। फिर जम्मू में बीजेपी फैक्टर काम कर रहा है तो क्यों।
धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक होने के थोथे आरोप प्रत्यारोप को अलग रख तक तथ्यात्मक तौर से देखें तो ज़्यादा वक्त नहीं लगेगा ये जानने में कि जम्मू को जलाने का काम किसने किया... क्यों किया। एक ज़मीन दी गई अमरनाथ श्राईन बोर्ड को। राज्य सरकार का फैसला था। उस सरकार का जो धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाली पार्टियों से बनी थी। कैबिनेट की मंज़ूरी से फैसला होता है। फैसले के पहले या तो किसी ने इसके दूरगामी प्रभाव की गणना नहीं की... या फिर इसके पीछे डोडा, भरदवाह, किश्तवाड़ समेत जम्मू के तमाम... और जम्मू ही क्यों, पूरे देश के हिन्दू तीर्थ यात्रियों के दिल जीतने की मंशा के तहत किया। इस फैसले के बाद जब श्रीनगर जल उठा तो इस फैसले को ग़लत मान लिया गया और बदल दिया गया। सही बात है। जनभावना के सामनों सरकारों को झुक जाना चाहिए। सो वो झुक गई। अब बारी जम्मू की थी। वो सुलगने लगा। नेताओं को लगा ये मोम के बने लोग हैं। जल्द ही पिघल जाएंगे। लेकिन गर्मी इतनी बढ़ गई कि केन्द्र सरकार तक को पसीना आ गया। किसी भी सरकार का जम्मू से ये इस तरह का पहला एक्सोपज़र है। सो समझ नहीं आ रहा क्या करें। सर्वदलीय बैठक कर लिया। चलो सब मिल के चलते हैं। बीजेपी भी चलेगी। जा के क्या करेंगे... शायद पता नहीं। हां... शांति की अपील करेगें। और लोग शांत हो जाएंगे। गोली का डर भी दिखा रहे हैं। फिर ग़लती कर रहे हैं और हिंसा के लिए ज़िम्मेदार जनता पर थोप रहे हैं।
जम्मू वालों के तर्क को कैसे काटेंगे कि क्या कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। अगर वहां धारा 370 है तो क्या वो जम्मू में नहीं है। अगर जम्मू है तो वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड को इतना विस्तार कैसे दिया गया। इतनी सुविधाएं क्यों बनने दी गई। सिर्फ इसलिए कि श्रीनगर ने विरोध नहीं किया या फिर विरोध उनके अख़्तियार में ही नहीं था। जहां था वहां किया और फैसला बदलवा लिया। तो अब वैसी कोशिश ही जम्मू कर रहा है क्योंकि उसे लगता है कि वैष्णो देवी और अमरनाथ दोनों भारत में ही है। राज्य के एक इलाक़े के लोगों को आंदोलन के ज़रिए सरकार को झुकाने का हक़ है तो दूसरे इलाक़े के लोगों का ये हक़ कोई कैसे छीन सकता है। ये बहाना मत बनाइए कि ये संवेदशील मामला है। ... जारी
Monday, July 28, 2008
“...कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे...”
अहमदाबाद में
धमाके की ख़बर आयी उस समय मैं 64 लोदी स्टेट में था। संसद में नोट लहराए जाने के मामले पर गठित कमिटि के चेयरमैन और वरिष्ठ कांग्रेसी सांसद के सी देव के यहां। धमाका दूर अहमदाबाद में हुआ था लेकिन कुछ ही मिनटों में गूंज दिल्ली में भी सुनाई देगी इस बात का एहसास तो था ही। लिहाज़ा यहां से अपना काम समेट कहीं और चलने की प्रक्रिया में था। तभी बीजेपी दफ्तर से फोन आया। “एबी 97... जी...जी। राजीव प्रताप रुढी जी के यहां।...हां वहीं बाइट देगें...।“ ऐसे मौकों को मन झिड़क देने को करता है। लेकिन धमाकों के बाद प्रतिक्रिया लेने और देने का चलन है। सो चल पड़ा। पहुंच कर कैमरा सजाया ही था कि कहा गया पार्टी अध्यक्ष ही बाइट देगें अपने निवास पर। वहां चलें। हम मशीनी तरीके से चल पड़े। चलने के पहले नोटिस किया कि यहां कई चैनलों को लगातार मॉनीटर किया जा रहा है। दो शख्स लगातार फोन कर चैनलों को बता रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने धमाकों की निंदा की है। कहा है देश में असुरक्षा का माहौल है। इसे चला दें। टाइम्स नाउ पर पट्टी चल पड़ी। फोन करने वाले को त्वरित संतुष्टि का अहसास हुआ... “चल गया... चल गया।“ ख़ैर ये उनका काम था सो उन्हें करना था। धमाकों के बीच प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष की चिंता को चैनलों के ज़रिए फैलाना था।
राजनाथ सिंह के घर ओबी वैन पहुंच रहे थे। छ बज कर पैंतालिस मिनट पर पहला धमाका हुआ था। बम अभी फट ही रहे थे। अभी तक सिर्फ 6 लोगों के मरने की जानकारी आयी थी। अपडेट्स लगातार आ रहे थे। लेकिन ये ज़रुरी तो नहीं कि सारा कुछ देख लेने के बाद ही नेता अपनी प्रतिक्रिया दें। मज़ाक की बात थोड़े ही है। आपको हमको भी तो इंतज़ार रहता है कि देश दुनिया को बताएं कि अमुक अमुक पार्टी के अमुक अमुक नेता क्या कर रहे हैं... क्या कह रहे हैं... जब देश में बम फट रहे हैं। सो ऐसे में पहली प्रतिक्रिया की अपनी वैल्यू है।
10 मिनट के अंदर 16 कैमरे और 6 ओबी वैन्स पहुंच चुके थे। तभी जानकारी मिली की मामला बड़ा हो गया है। लालकृष्ण आडवाणी खुद मीडिया से बात करेंगे। वहां पहुंचें। मैंने अपने साथियों को रोका। कहा पहले यहां सुन लें फिर वहां चलेगें। कैमरे सज चुके थे। ओबी सिग्नल भी ट्रैक हो चुके थे। सो सभी ने हामी भर दी। अंदर जानकारी भेजी गई कि अगर आडवाणी जी बोल गए तो राजनाथ सिंह जी की कौन सुनेगा। बात शायद क्लिक कर गई। राजनाथ सिंह जी सवा आठ से आठ मिनट पहले ही कैमरे के सामने प्रकट हो गए। वही बातें कि जो पार्टी अक्सर करती रहती है। ...आंतकवाद की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा और पोटा जैसे कानून की मांग। अफज़ल को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया अब तक...। सरकार के निकम्मेपन पर विपक्ष की ये लाठी असल में पानी पर पड़ती नज़र आती है। चलिए। इनको सुन लिया। लाइव कट गया। इनका बयान ख़त्म होते होते उधर आडवाणी भी शुरु हो चुके थे। वहां से फोन पर लाइव लिए जा रहे थे। उन्होने प्रतिक्रिया देने का फैसला इतना त्वरित लिया था कि बहुतों की ओबी नहीं पहुंच पायी थी।
इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सत्ता पक्ष का पहलू। ये भी धमाके के तुरंत बाद ही शुरु हो जाता है। मैंने अपने सहयोगी शारिक ख़ान को गृह राज्यमंत्री शकील अहमद को ट्रैक करने का अनुरोध किया था। शारिक का फोन आया कि वो कहीं मयूर विहार में बैठे हैं जहां हमें नहीं बुला सकते। हां फोनो दे सकते हैं सो मैंने ऑफिस को नंबर लिखा दिया है। शकील अहमद साहब ऑन एयर थे। हर बात पर बात करने को तैयार दूसरे गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल कानपुर में थे। कुछ चैनलों ने उनको वहीं ढूंढ निकाला। वे भी बोल रहे थे। ऐसे मौके पर राजनीति नहीं करने की अपील कर रहे थे। इस तरह का बयान कोई पहली बार सुन रहा होता तो शायद अच्छा लगता। कि देखो सत्ता में इतना उंचा उठा नेता राजनीति नहीं करने की बात कर रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा होता है। ख़ासतौर पर जब बम बीजेपी शासित राज्य में फटा हो। सरकार की तरफ से बयान आता है कि۔..."लॉ एंड आर्डर राज्य की ज़िम्मेदारी है।... हमने उनके एक दो तीन पहले ही बता दिया था कि ऐसा कुछ होने वाला है। ये उनकी चूक है।... हम हर मदद देने को तैयार हैं।"
अब तक कैमरा माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल जी के घर भी घूम चुका है। कहीं बाहर से आ रहे हैं। वो आते हैं। फटाफट बैठक करते हैं। अब मीडिया से मुख़ातिब हैं। “...किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा...।“ उनको भी पता है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। उनके ही कार्यकाल में कम से एक दर्जन ऐसे सीरियल ब्लास्ट्स हुए हैं। हर बार आतंकियों को पकड़ सज़ा देने का बात हुई है। एक्का दुक्का पकड़ा गया तो पकड़ा गया नहीं तो हुजी, सिमी, लश्कर जैसे संगठनों का नाम सामने रख कार्रवाई पूरी मान ली गई है। अगर नहीं मानी जाती तो शायद इन्हें एक बार और ऐसा वादा या दावा नहीं करना पड़ता जिसका खोखलापन साफ उजागर होता है।
एक सख्त कानून की मांग करता है। मतलब कि धमाके तो होंगे ही... कहीं ना कहीं वो ये मान कर चल रहा है। उसके बाद पकड़ने और सज़ा देने के लिए कड़ा कानून चाहिए। दूसरा एफबीआई जैसी एजेंसी का झांसा दे रहा है। कई साल बनने में लग जाएगें। अभी तो सिर से उतारो। सुरक्षा के लिए हरेक के पीछे एक पुलिस वाला नहीं लगा सकते। ये हम आप सभी जानते हैं। लेकिन आंतरिक सुरक्षा के लिए ज़रुरी ख़ुफिया तंत्र को क्यों लकवा मार गया है। 17 धमाकों के पीछे लगे आतंकियों ने फोन, ईमेल या बैठकी के ज़रिए आपस में संवाद किया होगा। आपकी नज़र से ये सब क्यों छूट जाता है। क्या मुख़बिर नहीं हैं या सोर्स मनी कम पड़ गया है। कुछ बेसिक्स पर विचारिए। एक दूसरे पर दोषारोपण तो राजनीति का स्वभाविक चरित्र है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि मामले की गंभीरता का एहसास तभी हो जब अपने घर का कोई इसका शिकार हो। तब शायद आप ये कह पाने की हालत में नहीं होगे कि…” हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे...”
धमाके की ख़बर आयी उस समय मैं 64 लोदी स्टेट में था। संसद में नोट लहराए जाने के मामले पर गठित कमिटि के चेयरमैन और वरिष्ठ कांग्रेसी सांसद के सी देव के यहां। धमाका दूर अहमदाबाद में हुआ था लेकिन कुछ ही मिनटों में गूंज दिल्ली में भी सुनाई देगी इस बात का एहसास तो था ही। लिहाज़ा यहां से अपना काम समेट कहीं और चलने की प्रक्रिया में था। तभी बीजेपी दफ्तर से फोन आया। “एबी 97... जी...जी। राजीव प्रताप रुढी जी के यहां।...हां वहीं बाइट देगें...।“ ऐसे मौकों को मन झिड़क देने को करता है। लेकिन धमाकों के बाद प्रतिक्रिया लेने और देने का चलन है। सो चल पड़ा। पहुंच कर कैमरा सजाया ही था कि कहा गया पार्टी अध्यक्ष ही बाइट देगें अपने निवास पर। वहां चलें। हम मशीनी तरीके से चल पड़े। चलने के पहले नोटिस किया कि यहां कई चैनलों को लगातार मॉनीटर किया जा रहा है। दो शख्स लगातार फोन कर चैनलों को बता रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने धमाकों की निंदा की है। कहा है देश में असुरक्षा का माहौल है। इसे चला दें। टाइम्स नाउ पर पट्टी चल पड़ी। फोन करने वाले को त्वरित संतुष्टि का अहसास हुआ... “चल गया... चल गया।“ ख़ैर ये उनका काम था सो उन्हें करना था। धमाकों के बीच प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष की चिंता को चैनलों के ज़रिए फैलाना था।राजनाथ सिंह के घर ओबी वैन पहुंच रहे थे। छ बज कर पैंतालिस मिनट पर पहला धमाका हुआ था। बम अभी फट ही रहे थे। अभी तक सिर्फ 6 लोगों के मरने की जानकारी आयी थी। अपडेट्स लगातार आ रहे थे। लेकिन ये ज़रुरी तो नहीं कि सारा कुछ देख लेने के बाद ही नेता अपनी प्रतिक्रिया दें। मज़ाक की बात थोड़े ही है। आपको हमको भी तो इंतज़ार रहता है कि देश दुनिया को बताएं कि अमुक अमुक पार्टी के अमुक अमुक नेता क्या कर रहे हैं... क्या कह रहे हैं... जब देश में बम फट रहे हैं। सो ऐसे में पहली प्रतिक्रिया की अपनी वैल्यू है।
10 मिनट के अंदर 16 कैमरे और 6 ओबी वैन्स पहुंच चुके थे। तभी जानकारी मिली की मामला बड़ा हो गया है। लालकृष्ण आडवाणी खुद मीडिया से बात करेंगे। वहां पहुंचें। मैंने अपने साथियों को रोका। कहा पहले यहां सुन लें फिर वहां चलेगें। कैमरे सज चुके थे। ओबी सिग्नल भी ट्रैक हो चुके थे। सो सभी ने हामी भर दी। अंदर जानकारी भेजी गई कि अगर आडवाणी जी बोल गए तो राजनाथ सिंह जी की कौन सुनेगा। बात शायद क्लिक कर गई। राजनाथ सिंह जी सवा आठ से आठ मिनट पहले ही कैमरे के सामने प्रकट हो गए। वही बातें कि जो पार्टी अक्सर करती रहती है। ...आंतकवाद की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा और पोटा जैसे कानून की मांग। अफज़ल को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया अब तक...। सरकार के निकम्मेपन पर विपक्ष की ये लाठी असल में पानी पर पड़ती नज़र आती है। चलिए। इनको सुन लिया। लाइव कट गया। इनका बयान ख़त्म होते होते उधर आडवाणी भी शुरु हो चुके थे। वहां से फोन पर लाइव लिए जा रहे थे। उन्होने प्रतिक्रिया देने का फैसला इतना त्वरित लिया था कि बहुतों की ओबी नहीं पहुंच पायी थी।
इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सत्ता पक्ष का पहलू। ये भी धमाके के तुरंत बाद ही शुरु हो जाता है। मैंने अपने सहयोगी शारिक ख़ान को गृह राज्यमंत्री शकील अहमद को ट्रैक करने का अनुरोध किया था। शारिक का फोन आया कि वो कहीं मयूर विहार में बैठे हैं जहां हमें नहीं बुला सकते। हां फोनो दे सकते हैं सो मैंने ऑफिस को नंबर लिखा दिया है। शकील अहमद साहब ऑन एयर थे। हर बात पर बात करने को तैयार दूसरे गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल कानपुर में थे। कुछ चैनलों ने उनको वहीं ढूंढ निकाला। वे भी बोल रहे थे। ऐसे मौके पर राजनीति नहीं करने की अपील कर रहे थे। इस तरह का बयान कोई पहली बार सुन रहा होता तो शायद अच्छा लगता। कि देखो सत्ता में इतना उंचा उठा नेता राजनीति नहीं करने की बात कर रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा होता है। ख़ासतौर पर जब बम बीजेपी शासित राज्य में फटा हो। सरकार की तरफ से बयान आता है कि۔..."लॉ एंड आर्डर राज्य की ज़िम्मेदारी है।... हमने उनके एक दो तीन पहले ही बता दिया था कि ऐसा कुछ होने वाला है। ये उनकी चूक है।... हम हर मदद देने को तैयार हैं।"
अब तक कैमरा माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल जी के घर भी घूम चुका है। कहीं बाहर से आ रहे हैं। वो आते हैं। फटाफट बैठक करते हैं। अब मीडिया से मुख़ातिब हैं। “...किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा...।“ उनको भी पता है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। उनके ही कार्यकाल में कम से एक दर्जन ऐसे सीरियल ब्लास्ट्स हुए हैं। हर बार आतंकियों को पकड़ सज़ा देने का बात हुई है। एक्का दुक्का पकड़ा गया तो पकड़ा गया नहीं तो हुजी, सिमी, लश्कर जैसे संगठनों का नाम सामने रख कार्रवाई पूरी मान ली गई है। अगर नहीं मानी जाती तो शायद इन्हें एक बार और ऐसा वादा या दावा नहीं करना पड़ता जिसका खोखलापन साफ उजागर होता है।
एक सख्त कानून की मांग करता है। मतलब कि धमाके तो होंगे ही... कहीं ना कहीं वो ये मान कर चल रहा है। उसके बाद पकड़ने और सज़ा देने के लिए कड़ा कानून चाहिए। दूसरा एफबीआई जैसी एजेंसी का झांसा दे रहा है। कई साल बनने में लग जाएगें। अभी तो सिर से उतारो। सुरक्षा के लिए हरेक के पीछे एक पुलिस वाला नहीं लगा सकते। ये हम आप सभी जानते हैं। लेकिन आंतरिक सुरक्षा के लिए ज़रुरी ख़ुफिया तंत्र को क्यों लकवा मार गया है। 17 धमाकों के पीछे लगे आतंकियों ने फोन, ईमेल या बैठकी के ज़रिए आपस में संवाद किया होगा। आपकी नज़र से ये सब क्यों छूट जाता है। क्या मुख़बिर नहीं हैं या सोर्स मनी कम पड़ गया है। कुछ बेसिक्स पर विचारिए। एक दूसरे पर दोषारोपण तो राजनीति का स्वभाविक चरित्र है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि मामले की गंभीरता का एहसास तभी हो जब अपने घर का कोई इसका शिकार हो। तब शायद आप ये कह पाने की हालत में नहीं होगे कि…” हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे...”
Sunday, March 16, 2008
सरबजीत को फांसी और ख़बरबाज़ी
patinetsसरबजीत को 1 अप्रैल को फांसी की ख़बर पाकिस्तान के एक उर्दू अख़बार डेली एक्सप्रेस के हवाले से आयी। जब मुझे जानकारी मिली तो मैंने इसकी आधिकारिक पुष्टि चाही। कोट लखपत जेल के सुपरिटेंडेंट जावेद लतीफ को फोन घुमाया। रविवार को वे उपलब्ध नहीं थे। पाकिस्तान के इंटेरियर मिनिस्टर हमीद नवाज़ ने भी अपना फोन नहीं उठाया। लाहौर पुलिस के डिप्टी डायरेक्टर पब्लिक रिलेशन अतहर खान ने इस बाबत कोई जानकारी होने से मना कर दिया। बिना आधिकारिक पुष्टि के मैं इस ख़बर को रोके हुए था। क़रीब घंटे डेढ़ घंटे बाद एक हिन्दी और एक अंग्रेज़ी चैनल पर ये ख़बर चल पड़ी। सरबजीत को एक अप्रैल को फांसी...। अजीब हैरत की स्थिति थी। उनके पास भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं लेकिन ख़बर लपक ली गई। एंजेसी के ज़रिए जो ख़बर आयी उसमें भी आधिकारिक पुष्टि नहीं होने की बात थी।
एक चैनल ने पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी के हवाले से पट्टी चलानी शुरु की। लेकिन मेरी बात बर्नी साहब से हुई तो उन्होने भी इस ख़बर के कंफर्मेशन से मना किया। उस चैनल को ऐसा कुछ कहने से भी। कहा सोमवार 10-11 बजे तक ही कहा जा सकेगा। क्योंकि ये सिर्फ दो मुल्कों के आपसी रिश्तों का ही नहीं एक पूरे परिवार की संवेदना से जुड़ा मामला भी है। चैनलों पर ख़बर चलने के साथ ही सरबजीत के परिवार की मन स्थिति का अंदाज़ा मुझे हो रहा था।
भगवान ना करे सच हो... पर अगर फांसी की तारीख मुकर्रर हो भी गई है तो होनी अपना काम करेगा। लेकिन मेरा प्वाईंट सिर्फ इतना है कि क्या आधिकारिक पुष्टि होने तक इस ख़बर को रोका नहीं जा सकता था? क्या सरबजीत के परिवारवालों की एक और रात की नींद उड़ने से बचाया नहीं जा सकता था। सच है कि ख़बर हमने भी चलायी लेकिन इस पर फोकस करते हुए कि सरबजीत के रिहा होने की उम्मीद अभी पूरी तरह टूटी नहीं है। दया याचिका के दो मौक़े उसके पास और हैं। शायद ऊपरवाला सुन ले।
एक चैनल ने पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी के हवाले से पट्टी चलानी शुरु की। लेकिन मेरी बात बर्नी साहब से हुई तो उन्होने भी इस ख़बर के कंफर्मेशन से मना किया। उस चैनल को ऐसा कुछ कहने से भी। कहा सोमवार 10-11 बजे तक ही कहा जा सकेगा। क्योंकि ये सिर्फ दो मुल्कों के आपसी रिश्तों का ही नहीं एक पूरे परिवार की संवेदना से जुड़ा मामला भी है। चैनलों पर ख़बर चलने के साथ ही सरबजीत के परिवार की मन स्थिति का अंदाज़ा मुझे हो रहा था।
भगवान ना करे सच हो... पर अगर फांसी की तारीख मुकर्रर हो भी गई है तो होनी अपना काम करेगा। लेकिन मेरा प्वाईंट सिर्फ इतना है कि क्या आधिकारिक पुष्टि होने तक इस ख़बर को रोका नहीं जा सकता था? क्या सरबजीत के परिवारवालों की एक और रात की नींद उड़ने से बचाया नहीं जा सकता था। सच है कि ख़बर हमने भी चलायी लेकिन इस पर फोकस करते हुए कि सरबजीत के रिहा होने की उम्मीद अभी पूरी तरह टूटी नहीं है। दया याचिका के दो मौक़े उसके पास और हैं। शायद ऊपरवाला सुन ले।
जूता चोर, गद्दी छोड़, जूता-खोर

ये वैसा ही जूता है जिसे लेकर शोर मच रहा है। द्रास के पास मच्छोई ग्लेशियर पर भारतीय सेना के जवानों के लिए विंटर वार फेयर ट्रेनिंग पर डॉक्यूमेंटरी बनाते समय मुझे ये आज से सात आठ साल पहले पहनना पड़ा था। ये जूते कहां के बने हैं और इनकी कब ख़रीद हुई ये मुझे नहीं पता... पर इन जूतों में भी पैर को ठंड से तसल्ली नहीं थी। मैं दो-तीन जुराबें पहना करता था। जूते उतारते वक्त तब भी जुराबों में नमी जमी मिला करती थीं। बर्फ के तौर पर। हालांकि तब एनडीए की सरकार थी। सीएजी की रिपोर्ट अब खुलासा कर रही है कि फौज़ियों के जूतों की ख़रीददारी में घपला हुआ है। यूपीए के ज़माने में।
जूता चोर... गद्दी छोड़... जूताखोर... सोमवार को संसद में शायद यही नारा लगने वाला है। सियाचिन जैसे जमा देने वाले इलाक़ों में तैनात भारतीय सेना के जवानों के लिए ख़रीदे जा रहे जूतों में धांधली की बात सीएजी रिपोर्ट में सामने आने के बाद विपक्ष चुप नहीं बैठने वाला। ख़ासतौर पर वो एनडीए, जिसके रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नाडिस पर ताबूत घोटाले का आरोप लगाते हुए यूपीए ने ताबूत चोर तक करार दिया था।
Wednesday, December 26, 2007
बंद करें मोदी को गलियाना!
सुनते सुनते कान पक गए... आंख फूटने को आयी। जिसे देखो वही कलम घसीट दे रहा है। मोदी ये... मोदी वो...। अरे भई लिख देने भर से क्रांति हो जाती तो ऐसे कई हैं जो हर तीन-चार घंटे में एक कम से कम एक क्रांति तो कर ही देते। पर वो कोशिश कर देख चुके। कई एंगल दे कर देख चुके। ऐसा कर अच्छा किया। अपने को अभिव्यक्त कर जनमानस को जगाने की कोशिश करनी चाहिए। पर जब बहुमत नहीं माना तो भाई अब हम और आप भी स्वीकार लें ना कि मोदी जीत गए। क़ूवत है तो हम संविधान बदलने की कोशिश करें। मोदी को कानून के शिकंजे में लाने का अभियान चलाएं। नहीं कर सकते तो अब अपनी कुंठा से पार पा लें। जिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी का विरोध विचारधारा के स्तर पर किया... उन्होने ने भी अब उनकी चुनावी जीत को स्वीकार लिया है। हालांकि वे अपने स्तर पर मोदी-विरोध जारी रखेगें... लेकिन कम से कम उस बचकाने-तुलनात्मक अध्ययन के तौर पर तो नहीं जैसा कि हम में से कई करने में जुटे हैं। तथ्य आधारित विरोध होना चाहिए... सिर्फ शब्दाडंबर भरे विरोध से काम नहीं चला है। नहीं चलेगा।
ऐसे कईयों को देख चुका हूं जो मुसलमान के घर का पानी पीना नहीं पसंद करते लेकिन जब लिखने-बोलने बैठते हैं तो सांप्रदायिक सौहार्द की मोतियां बिछा देते हैं। इनमें कुछ नेता हैं तो कुछ लिखाड़ भी। उनके शब्दों का खोखलापन हम और आप पकड़ सकते हैं। मुझे लगता है कि हाथ में कंप्यूटर या कलम और ठीक-ठाक फुर्सत भर होने से ज़रुरी नहीं कि अच्छा लिख भी लिया जाए। उदाहरणों, प्रतीकों, उपमाओं के ज़रिए बात करने की बजाए हमें सीधी बात करनी चाहिए। मोदी अगर खोटा सिक्का है तो ये सिक्का अगली बार नहीं चलेगा। लेकिन अगर संवैधानिक कसौटी ऐसी हो कि जिसे ऐंड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर 'मौत का सौदागर' साबित करने पर तुला जाए और वो फिर भी मुंह चिढ़ा जाए तो कम से कम अपनी इज्ज़त बचाने के लिए विरोध का दायरा बड़ा कर दिया जाना चाहिए।
सीधा सा मतलब है। अब मोदी के खिलाफ नहीं... देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ लिखिए। अगर आपको लगता है कि तमाम कारगुज़ारियां के बाद भी मोदी कैसे जीत गए तो इसका दोष यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दीजिए। उसमें वोट के साथ भावनाओं को कैसे हिस्सेदारी दी जाए इसका तरीक़ा सुझाइए। मोदी को गलिया देना आसान है। पर ऐसे शख्स को गद्दी पर नहीं देखना चाहते हैं तो हम सबको लेखनी में और क़ूवत पालनी होगी। और ये क़ूवत में नहीं पाल सकते तो छोड़ देना चाहिए।
ऐसे कईयों को देख चुका हूं जो मुसलमान के घर का पानी पीना नहीं पसंद करते लेकिन जब लिखने-बोलने बैठते हैं तो सांप्रदायिक सौहार्द की मोतियां बिछा देते हैं। इनमें कुछ नेता हैं तो कुछ लिखाड़ भी। उनके शब्दों का खोखलापन हम और आप पकड़ सकते हैं। मुझे लगता है कि हाथ में कंप्यूटर या कलम और ठीक-ठाक फुर्सत भर होने से ज़रुरी नहीं कि अच्छा लिख भी लिया जाए। उदाहरणों, प्रतीकों, उपमाओं के ज़रिए बात करने की बजाए हमें सीधी बात करनी चाहिए। मोदी अगर खोटा सिक्का है तो ये सिक्का अगली बार नहीं चलेगा। लेकिन अगर संवैधानिक कसौटी ऐसी हो कि जिसे ऐंड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर 'मौत का सौदागर' साबित करने पर तुला जाए और वो फिर भी मुंह चिढ़ा जाए तो कम से कम अपनी इज्ज़त बचाने के लिए विरोध का दायरा बड़ा कर दिया जाना चाहिए।
सीधा सा मतलब है। अब मोदी के खिलाफ नहीं... देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ लिखिए। अगर आपको लगता है कि तमाम कारगुज़ारियां के बाद भी मोदी कैसे जीत गए तो इसका दोष यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दीजिए। उसमें वोट के साथ भावनाओं को कैसे हिस्सेदारी दी जाए इसका तरीक़ा सुझाइए। मोदी को गलिया देना आसान है। पर ऐसे शख्स को गद्दी पर नहीं देखना चाहते हैं तो हम सबको लेखनी में और क़ूवत पालनी होगी। और ये क़ूवत में नहीं पाल सकते तो छोड़ देना चाहिए।
Sunday, December 23, 2007
जीत गए मोदी...कांग्रेस ने खो दी...
यही नारा लग रहा था दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के घर पर। चुनाव नतीजो की तस्वीर जैसे ही साफ हुई...बीजेपी समर्थक टिड्डी दल की तरह निकल आए। उन्हीं के बीच नारा लग रहा था... जीत गए मोदी... कांग्रेस ने खो दी...। इस पर पहले ही कागद कारे कर चुका हूं। कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा। बस इतना कि अब तो मोदी को स्वीकारना ही होगा। सिर्फ गुजरात में ही नहीं...शायद पूरे देश में। हिंदुत्व का भूत बलबती होकर लौट आया है। पार्टी इसे आम सभा चुनाव में भी भुनाने में क़सर नहीं छोड़ेगी। संकेत मिल रहे हैं। आडवाणी ने कह दिया है... ये जीत राष्ट्रीय राजनीति का टर्निग प्वाइंट है।
दूसरे संकेत भी हैं। जब पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी को अपना प्राइममिनिस्टीरियल कैंडिडेट घोषित किया तो वेंकैय्या नायडू ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं। उनके केंद्रीय राजनीति में आने का कोई प्रस्ताव नहीं है। आज जब मैंने राजनाथ सिंह के कैटेगोरिकली पूछा कि क्या मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं...उनकी इस जीत के बाद क्या पार्टी देश भर में उनका इस्तेमाल नहीं करेगी... थोड़ी खीज़ और मजबूरी के साथ राजनाथ बोले...वे पहले से हैं और रहेंगे...
बहुत पेंचदगियां हैं जो आसानी से समझी जा सकती हैं। बीजेपी के भीतर भी और पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भी। लेकिन फिलहाल तो एक ही तथ्य है। वो ये कि मोदी जीत गए हैं। वो सोचें जो मोदी के बिना की सोचने की ज़िद पाले बैठे हैं...कि आखिर क्यों जीत गए मोदी और क्यों कांग्रेस ने खो दी...
दूसरे संकेत भी हैं। जब पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी को अपना प्राइममिनिस्टीरियल कैंडिडेट घोषित किया तो वेंकैय्या नायडू ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं। उनके केंद्रीय राजनीति में आने का कोई प्रस्ताव नहीं है। आज जब मैंने राजनाथ सिंह के कैटेगोरिकली पूछा कि क्या मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हैं...उनकी इस जीत के बाद क्या पार्टी देश भर में उनका इस्तेमाल नहीं करेगी... थोड़ी खीज़ और मजबूरी के साथ राजनाथ बोले...वे पहले से हैं और रहेंगे...
बहुत पेंचदगियां हैं जो आसानी से समझी जा सकती हैं। बीजेपी के भीतर भी और पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भी। लेकिन फिलहाल तो एक ही तथ्य है। वो ये कि मोदी जीत गए हैं। वो सोचें जो मोदी के बिना की सोचने की ज़िद पाले बैठे हैं...कि आखिर क्यों जीत गए मोदी और क्यों कांग्रेस ने खो दी...
Thursday, December 20, 2007
मोदी, सोनिया और मीडिया
बड़ा शोर मचा रहा। मोदी...मोदी...मोदी। अब शांत होने लगा है। मतदान हो चुके हैं। नतीज़े का इंतज़ार है। और छटपटाहट भी। मोदी जीतेंगे या हार जाएंगें। गद्दी रहेगी या जाएगी। जनता ने तय कर दिया है। किसी को पता नहीं। पर अंदाज़ा सभी लगा रहे हैं। आप भी और हम भी।
मोदी हारे तो वो वाह-वाह करेंगे जो चाहते हैं कि मोदी हार जाए। ऐसे भी हैं जो कहेंगे देखो ये मेरा कमाल है। पर अगर मोदी जीते तो शायद वो ये नहीं स्वीकार पाएंगे कि देखो... ये मेरा किया धरा है! और मोदी मायावती से भी ज़्यादा तन कर मीडिया से मुखातिब हों तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। वैसे मोदी मीडिया और सोनिया दोनों के शुक्रगुज़ार होंगे। नहीं होगें तो ये उनकी कृतघ्नता होगी। आखिर इन्हीं दोनों ने आखिरी क्षणों में उनकी डूबती-उतरती सांसों को थामा। एक ने मौत का सौदागर कहा तो दूसरे ने इस सौदागर की दुकान सजाए रखी। वैसे ये मेरा व्यक्तिगत विचार है जिसे सबके सामने रख रहा हूं। ग़लत हूं तो सही बताइए।
बीजेपी के कई आला नेता आॅफ द रिकार्ड बातचीत में स्वीकारते हैं कि सोनिया ने अगर मौत का सौदागर नहीं कहा होता तो गुजरात में कमल मुरछा जाता। दरअसल मुसलमान के संहारक के रुप में मोदी इतनी बार दिखाए-पढ़ाए गए कि बात उन हिंदुओं के मन में भी बैठ गई जिन्हें शायद मोदी का बतौर मुख्यमंत्री काम पसंद नहीं आया। यहीं धर्मांधता ने अपना रंग दिखाया। विकास या विनाश के स्थानीय मुद्दे पीछे छूट गए। हिंदू-मुसलमान के बीच का सनातनी-तनातनी को फोकस कर लिया गया। खाली पेट भी जयश्री राम के नारे से खुश रहने वालों के इस देश में बस और क्या चाहिए। आधार तैयार हो गया वोट के पोलराईजेशन का।
अरे मोदी की सत्ता को अपनी मौत मरने देते। बयान आधारित कहानियों की जगह तथ्य आधारित बात करते। गुजरात में विकास नहीं हुआ है तो क्या यूपी और बिहार में हुआ है? और अगर वाकई नहीं हुआ है तो क्या सड़क पर पड़े गढ्ढे दिखाए आपने? क्या भुखमरी दिखा पाए? या फिर सूखे...अकाल में सरकार का नकारापन? नहीं ना? या दिखाया भी तो उसे मुद्दा बना नहीं परोस सके? परोसा तो वोटर क्यों उस थाल में मुंह मारते नज़र आए? नहीं। बस बहस में पड़े रहे। एजेंडा तय करते रहे। लगा इसी से हार तय कर देंगे। अच्छा होता कि मोदी को मुसलमान-विरोधी की बजाए हिंदू-विरोधी साबित कर पाते। शायद ये बेतुकापन ही असर कर जाता!
मोदी इस देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही मुख्यमंत्री हैं। क्यों हैं? मौत का सौदागर है तो कैसे बैठे हैं गद्दी पर? बताइए सोनिया जी। बदलिए संविधान। भेजिए इनको अंदर। केंद्र में सरकार आपकी है। खाली बयान देकर 10 जनपथ में मत बैठ जाईए। आपके इस एक बयान ने बड़ा खेल कर दिया लगता है। मोदी फिर आ रहे लगते हैं। एग्ज़िट पोल्स बता रहे हैं। बहुत घटा कर भी उनको 90 तो दिया ही जा रहा है। अगर वो वाकई आ गए तो फिर पांच साल वही करेंगे जो वो चाहेंगे। तब क्या आपका ये बयान काम आएगा? उन मुसलमानों के जिनके घर उजड़ गए। जिनके अपने दंगों के शिकार हुए। आपका क्या। आप तो फिर अगली बार के इंतज़ार में बैठ जाएंगे।
आप मुझे मोदी-समर्थक कह सकते हैं। संघी होने का आरोप भी लगा सकते हैं। अगर मोदी के विरोध का मतलब मोदी के जीत की राह को आसान बनना है तो मैं वैसा संघी बनना पसंद करुंगा जो अपनी महत्ता दिखाने को ही सही...सही में मोदी को नीचे उतारना चाहता है।
फिलहाल तो मोदी की तरफ से सोनिया औऱ मीडिया को बधाई!
मोदी हारे तो वो वाह-वाह करेंगे जो चाहते हैं कि मोदी हार जाए। ऐसे भी हैं जो कहेंगे देखो ये मेरा कमाल है। पर अगर मोदी जीते तो शायद वो ये नहीं स्वीकार पाएंगे कि देखो... ये मेरा किया धरा है! और मोदी मायावती से भी ज़्यादा तन कर मीडिया से मुखातिब हों तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। वैसे मोदी मीडिया और सोनिया दोनों के शुक्रगुज़ार होंगे। नहीं होगें तो ये उनकी कृतघ्नता होगी। आखिर इन्हीं दोनों ने आखिरी क्षणों में उनकी डूबती-उतरती सांसों को थामा। एक ने मौत का सौदागर कहा तो दूसरे ने इस सौदागर की दुकान सजाए रखी। वैसे ये मेरा व्यक्तिगत विचार है जिसे सबके सामने रख रहा हूं। ग़लत हूं तो सही बताइए।
बीजेपी के कई आला नेता आॅफ द रिकार्ड बातचीत में स्वीकारते हैं कि सोनिया ने अगर मौत का सौदागर नहीं कहा होता तो गुजरात में कमल मुरछा जाता। दरअसल मुसलमान के संहारक के रुप में मोदी इतनी बार दिखाए-पढ़ाए गए कि बात उन हिंदुओं के मन में भी बैठ गई जिन्हें शायद मोदी का बतौर मुख्यमंत्री काम पसंद नहीं आया। यहीं धर्मांधता ने अपना रंग दिखाया। विकास या विनाश के स्थानीय मुद्दे पीछे छूट गए। हिंदू-मुसलमान के बीच का सनातनी-तनातनी को फोकस कर लिया गया। खाली पेट भी जयश्री राम के नारे से खुश रहने वालों के इस देश में बस और क्या चाहिए। आधार तैयार हो गया वोट के पोलराईजेशन का।
अरे मोदी की सत्ता को अपनी मौत मरने देते। बयान आधारित कहानियों की जगह तथ्य आधारित बात करते। गुजरात में विकास नहीं हुआ है तो क्या यूपी और बिहार में हुआ है? और अगर वाकई नहीं हुआ है तो क्या सड़क पर पड़े गढ्ढे दिखाए आपने? क्या भुखमरी दिखा पाए? या फिर सूखे...अकाल में सरकार का नकारापन? नहीं ना? या दिखाया भी तो उसे मुद्दा बना नहीं परोस सके? परोसा तो वोटर क्यों उस थाल में मुंह मारते नज़र आए? नहीं। बस बहस में पड़े रहे। एजेंडा तय करते रहे। लगा इसी से हार तय कर देंगे। अच्छा होता कि मोदी को मुसलमान-विरोधी की बजाए हिंदू-विरोधी साबित कर पाते। शायद ये बेतुकापन ही असर कर जाता!
मोदी इस देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही मुख्यमंत्री हैं। क्यों हैं? मौत का सौदागर है तो कैसे बैठे हैं गद्दी पर? बताइए सोनिया जी। बदलिए संविधान। भेजिए इनको अंदर। केंद्र में सरकार आपकी है। खाली बयान देकर 10 जनपथ में मत बैठ जाईए। आपके इस एक बयान ने बड़ा खेल कर दिया लगता है। मोदी फिर आ रहे लगते हैं। एग्ज़िट पोल्स बता रहे हैं। बहुत घटा कर भी उनको 90 तो दिया ही जा रहा है। अगर वो वाकई आ गए तो फिर पांच साल वही करेंगे जो वो चाहेंगे। तब क्या आपका ये बयान काम आएगा? उन मुसलमानों के जिनके घर उजड़ गए। जिनके अपने दंगों के शिकार हुए। आपका क्या। आप तो फिर अगली बार के इंतज़ार में बैठ जाएंगे।
आप मुझे मोदी-समर्थक कह सकते हैं। संघी होने का आरोप भी लगा सकते हैं। अगर मोदी के विरोध का मतलब मोदी के जीत की राह को आसान बनना है तो मैं वैसा संघी बनना पसंद करुंगा जो अपनी महत्ता दिखाने को ही सही...सही में मोदी को नीचे उतारना चाहता है।
फिलहाल तो मोदी की तरफ से सोनिया औऱ मीडिया को बधाई!
Saturday, October 13, 2007
ईद पर सोनिया गांधी की बधाई सिर्फ मुसलमानों को!
ईद सिर्फ मुसलमानों की है। सभी देशवासियों की नहीं। कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को यही लगता है। तभी कांग्रेस मुख्यालय से उनके नाम से मोबाईल पर जो संदेश आया है वो सिर्फ मुसलमान भाईयों और बहनों के लिए ही है। पूरा टेक्स्ट इस तरह है:"On the occasion of Eid-ul-Fitr I would like to greet all our muslim brothers and sisters. May this festival bring peace and harmony."
Sender: SoniaGandhi
sent:13-Oct-2007
19:56:57
अब ये सोनिया के ख़ुद के शब्द हैं या फिर उनके क़ाबिल सलाहकारों के, ये तो कांग्रेस ही जाने। लेकिन ये उंचे पदों पर बैठे व्यक्तित्वों की तरफ से जारी होने वाले शुभकामना संदेशों के एकदम अलग है। ईद मेरे घर में भी मनायी जा रही है। लेकिन मुझे शुभकामना क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं हिंदू हूं? तो फिर हिंदुओं के मोबाईल पर संदेश ही क्यों? वाह सोनिया जी! वाह कांग्रेस!
होता ये आया है कि त्यौहारों के मौक़े पर इन लोगों की तरफ से देशवासियों को बधाई दी जाती है। लेकिन लगता है ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोशिश में कांग्रेस ने पर्व त्यौहारों पर मुंह-देखी बात करनी शुरु कर दी है। चुनाव जो आने वाला है। लेकिन उससे पहले दशहरा और दीवाली आने वाले हैं। अब सोनिया से क्या उम्मीद करें कि इन मौक़ों पर उनके संदेश में सिर्फ हिन्दू भाईयों और बहनों को शुभकामनाएं होंगी? अगर नहीं तो क्यों? अगर हां तो क्यों?
कांग्रेस या तो भूल सुधारे या फिर दे कोई जवाब।
Friday, October 5, 2007
छक्कों पर करोड़ों लुटाने वालों, शहीदों को भी देखो!
मेजर दिनेश रघुरमण और मेजर के.पी. विनय ने कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहादत दे दी। शहीद होने के पहले इन्होंने कम से कम नौ आतंकवादियों को मार गिराया। तीन दिन हो गए लेकिन लगता नहीं कि किसी ने भी इनकी शहादत को अभी तक नोटिस किया है। सेना का विभागीय सम्मान और मदद अपनी जगह। लेकिन ना तो खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी बीजेपी, सेकुलर होने का राग अलापने वाली कांग्रेस, अमिताभ के सम्मान की ख़ातिर सोनिया से भिड़ने वाले अमर सिंह, आतंकवाद के खिलाफ भौंहे तान फोटो खिंचवाने वाले नरेन्द्र मोदी या खिलाड़ियों को जर और ज़मीन बांटने वाले हरियाणा या झारखंड जैसे किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री.... किसी की भी तरफ से सम्मान के दो बोल अब तक सामने नहीं आए हैं।
जम्मू औऱ कश्मीर में जवान से लेकर अफ़सर तक जान की बाज़ी लगाते रहते हैं। ये सच है कि कुर्बानी ईनाम के लिए नहीं दी जाती। लेकिन एक तरफ ये नायक अपनी गोलियों से देश के दुश्मनों को मारते हैं तो भी ख़ामोशी पसरी रहती। दूसरी तरफ बैट से निकलने वाले छक्कों पर करोड़ों बरसते हैं। सम्मान में मंच सजते हैं। कारवां निकलता है। पर सोचिए। देश का मान असल में कौन बढ़ा रहे हैं?
देश के इन वीर सपूतों को हमारी श्रद्धांजलि!!!
जम्मू औऱ कश्मीर में जवान से लेकर अफ़सर तक जान की बाज़ी लगाते रहते हैं। ये सच है कि कुर्बानी ईनाम के लिए नहीं दी जाती। लेकिन एक तरफ ये नायक अपनी गोलियों से देश के दुश्मनों को मारते हैं तो भी ख़ामोशी पसरी रहती। दूसरी तरफ बैट से निकलने वाले छक्कों पर करोड़ों बरसते हैं। सम्मान में मंच सजते हैं। कारवां निकलता है। पर सोचिए। देश का मान असल में कौन बढ़ा रहे हैं?
देश के इन वीर सपूतों को हमारी श्रद्धांजलि!!!
Wednesday, September 12, 2007
हल्की होती राजनीतिक रिपोर्टिंग...
अमर सिंह को कई लोग हल्के व्यक्तित्व का मालिक मानते हैं। मैं भी उसी इंप्रेशन में रहता रहा हूं। उनकी कई बातें ऐसा करने को पत्रकारों को बाध्य करती हैं। लेकिन कुछ दिनों पहले उनसे पार्लियामेंट में कुछ पत्रकारों ने उनसे एक सवाल किया। संदर्भ था न्यूक्लियर डील को लेकर लेफ्ट फ्रंट का बयान कि यूपीए सरकार के साथ उनका हनीमून खत्म हो गया है और किसी भी वक्त तलाक हो सकता है। पूछा गया कि 'ऐसी बातें कही जा रहीं हैं...क्या मतलब निकाला जाए।' अमर सिंह ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया... 'ये गंभीर राजनीतिक मामला है। इसे लेकर शादी...तलाक...हनीमून जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।' फिर उन्होने अपना जवाब दिया। बेशक अपनी राजनीतिक हित-साधना के हिसाब से ही दिया हो।
ऐसा नहीं है इस वाकये के बाद अमर सिंह मेरे लिए महापुरुष हो गए हों। पर कई बार आप अपने छोटे से भी सीखते हो। पर हज़ारों ऐसे होते हैं जो पूर्वजों से भी नहीं सीखते। रातों रात ना सही... अनुभवों से सीखना तो सीख ही लेनी चाहिए।
इतनी बड़ी भूमिका मैंने इसलिए बांधी क्योंकि 11 सितंबर 2007 को भी कुछ ऐसा ही हुआ। जवाब देने वालों की तरफ से नहीं। सवाल पूछने वालों की तरफ से। शेरों वाली कुर्सी पर बैठने वाले बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे कीचड़ में कमल तलाशते दिल्ली में थे। बीजेपी नेताओं को मनाने। क्यों? क्योंकि प्रतिभा पाटिल यानि एक मराठी के राष्ट्रपति बनाने को लेकर शिवसेना ने बीजेपी-एनडीए की उल्टी लाईन ले ली थी। पाटिल यूपीए की उम्मीदवार थीं... फिर भी शिवसेना ने उनको सपोर्ट किया। वो जीत गईं...बिना शिवसैनिकों के भी जीत जातीं। लेकिन प्रतिभा पाटिल की जीत ने लगता है शिवसैनिकों का गर्व से सिर उतना उंचा नहीं किया। इसलिए वो मराठा-प्रतिष्ठा का प्रश्न भुला कर फिर हिन्दी-भाषी-प्रमुख-हिन्दुओं की पार्टी बीजेपी की गोद में आ बैठे हैं। बिना लाज शरम के दिल्ली तक आए। जिस आडवाणी को अनसुना कर गए थे उनकी चौखट तक गए। सब कुछ गुडी-गुडी नोट पर हुआ।
फिर प्रेस कांफ्रेंस की बारी। पूरी दिल्ली की मीडिया। एक से एक धुरंधर पत्रकार। टीवी और प्रिंट के भी। सवाल जवाब का दौर। कई अच्छे सवाल भी। पर जिस एक तरह के सवाल ने डाॅमिनेट किया वो रहा... 'आपका और बीजेपी का तो तलाक होने वाला था, फिर अचानक आप लोग हनीमून पर कैसे जा रहे हैं?' जवाब गोपीनाथ मुंडे ने दिया... 'बच्चों ने मना किया इस उम्र में तलाक लेने को...शादी को बीस साल हो गए हैं सो साथ ही रहना है...।' ऐसे ही कई और सवाल पूछे गए। उद्धव औऱ गोपीनाथ हंस कर टालते-जवाब देते गए। कोई गहराई हो सवाल में तभी तो सोच कर बोलें। रटते रहे कि गिल-शिकवे दूर हो गए हैं। अब शिवसेना बीजेपी के साथ रहेगी। एनडीए के नेता को अपना नेता मानेगी।
बयान आधारित इस बात स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है। पर दिक्कत ये है कि राजनीतिक अवसरवाद का नमूना पेश करने वाली शिवसेना से ऐसा सवाल पूछने वाले कम ही थे...जिससे उद्धव या मुंडे को जवाब देने में परेशानी हो। पेशानी पर बल पड़े। हल्के सवालों को वे और भी हल्के में टालते गए। सामने बैठी पत्रकारों की टोली को लाफ्टर चैलेंज का आडियेंस मान हंसाते गए। जिनके भी सवाल पर वे हंसे और हंसाए वे अपने को धन्य समझते रहे। राजनीतिक रिपोर्टिंग तलाक और हनीमून जैसे शब्दों के सहारे ख़बर ढूंढती रही। कुछ सवाल और भी रहे। सीटों का बंटवारा क्या होगा। सीएम कौन बनेगा। अरे जैसा मुफीद लगेगा कर लेंगे। पूछना क्या। आख़िर साथ साथ रहना है।
पर कुछेक पत्रकारों ने जता दिया कि वे इन नेताओं के साथ मसखराबाज़ी करने नहीं आए हैं। एक ने पूछा... 'क्या आपलोग इस डर से साथ आए हैं क्योंकि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने श्रीकृष्ण कमीशन की रिपोर्ट पर अमल का संकेत दिया है?' जवाब गोलमोल रहा। एक औऱ सवाल... 'राष्ट्रपति चुनाव के समय आपने मराठी प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए बीजेपी से किनारा कर लिया...अब चुनावों की बारी आयी तो आपको लग रहा है बीजेपी के बिना आपकी कुर्सी नहीं बन सकती...तो आप फिर साथ आ गए हैं...क्या भविष्य में मराठी प्रतिष्ठा के किसी और सवाल पर आप बीजेपी से दुबारा तो नहीं कट लेंगे।' जवाब... 'जो हो गया हो गया... हम साथ साथ... 20 साल से...और अब और मज़बूती से रहेंगे।'
कहते हैं कि ख़बर मौन से निकाली जाती है। जो बोल कर बतायी जाए और जो सुनी-सुनाई जाए वो ज़्यादातर प्रपोगैंडा होती हैं। लेकिन मौजूदा माहौल में मौन को तोड़ ख़बर निकालने वाले सवाल कम ही सुनाई पड़ते हैं। पूछे भी जाते हैं तो जवाब मौन में दबा दिए जाते हैं। ज़्यादातर तो प्रपोगैंडा के आजू-बाजू ही घूमते दिखते हैं। वही संदेश जाता है जो राजनीतिक पार्टियां कहना और फैलाना चाहती हैं। न्यूज़ रूम और एडिटर की भूमिका अगर बहुत इंवोल्वमेंट वाला ना हो तो ज़्यादातर राजनीतिक ख़बरों में चकल्लस ही नज़र आता है। दरअसल हर तरफ हल्कापन आ रहा है। हम सभी शिकार हो रहे हैं। इसलिए कई बार अमर सिंह, अपने नाटकीय अंदाज़ में भी, कथनी में सही नज़र आने लगे हैं। सवाल पूछने वालों से ज़्यादा भारी नज़र आने लगे हैं।
(मैंने अपने इस अनुभव में उन राजनीतिक संवाददाताओं-संपादकों पर टिप्पणी नहीं की है जिन्होंने समय समय पर शासन-सत्ता को चुनौती दी है... और राजनीतिक अवसरवादिता को आईना दिखाया है और आज भी दिखा रहे हैं। शुक्रिया)
ऐसा नहीं है इस वाकये के बाद अमर सिंह मेरे लिए महापुरुष हो गए हों। पर कई बार आप अपने छोटे से भी सीखते हो। पर हज़ारों ऐसे होते हैं जो पूर्वजों से भी नहीं सीखते। रातों रात ना सही... अनुभवों से सीखना तो सीख ही लेनी चाहिए।
इतनी बड़ी भूमिका मैंने इसलिए बांधी क्योंकि 11 सितंबर 2007 को भी कुछ ऐसा ही हुआ। जवाब देने वालों की तरफ से नहीं। सवाल पूछने वालों की तरफ से। शेरों वाली कुर्सी पर बैठने वाले बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे कीचड़ में कमल तलाशते दिल्ली में थे। बीजेपी नेताओं को मनाने। क्यों? क्योंकि प्रतिभा पाटिल यानि एक मराठी के राष्ट्रपति बनाने को लेकर शिवसेना ने बीजेपी-एनडीए की उल्टी लाईन ले ली थी। पाटिल यूपीए की उम्मीदवार थीं... फिर भी शिवसेना ने उनको सपोर्ट किया। वो जीत गईं...बिना शिवसैनिकों के भी जीत जातीं। लेकिन प्रतिभा पाटिल की जीत ने लगता है शिवसैनिकों का गर्व से सिर उतना उंचा नहीं किया। इसलिए वो मराठा-प्रतिष्ठा का प्रश्न भुला कर फिर हिन्दी-भाषी-प्रमुख-हिन्दुओं की पार्टी बीजेपी की गोद में आ बैठे हैं। बिना लाज शरम के दिल्ली तक आए। जिस आडवाणी को अनसुना कर गए थे उनकी चौखट तक गए। सब कुछ गुडी-गुडी नोट पर हुआ।
फिर प्रेस कांफ्रेंस की बारी। पूरी दिल्ली की मीडिया। एक से एक धुरंधर पत्रकार। टीवी और प्रिंट के भी। सवाल जवाब का दौर। कई अच्छे सवाल भी। पर जिस एक तरह के सवाल ने डाॅमिनेट किया वो रहा... 'आपका और बीजेपी का तो तलाक होने वाला था, फिर अचानक आप लोग हनीमून पर कैसे जा रहे हैं?' जवाब गोपीनाथ मुंडे ने दिया... 'बच्चों ने मना किया इस उम्र में तलाक लेने को...शादी को बीस साल हो गए हैं सो साथ ही रहना है...।' ऐसे ही कई और सवाल पूछे गए। उद्धव औऱ गोपीनाथ हंस कर टालते-जवाब देते गए। कोई गहराई हो सवाल में तभी तो सोच कर बोलें। रटते रहे कि गिल-शिकवे दूर हो गए हैं। अब शिवसेना बीजेपी के साथ रहेगी। एनडीए के नेता को अपना नेता मानेगी।
बयान आधारित इस बात स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है। पर दिक्कत ये है कि राजनीतिक अवसरवाद का नमूना पेश करने वाली शिवसेना से ऐसा सवाल पूछने वाले कम ही थे...जिससे उद्धव या मुंडे को जवाब देने में परेशानी हो। पेशानी पर बल पड़े। हल्के सवालों को वे और भी हल्के में टालते गए। सामने बैठी पत्रकारों की टोली को लाफ्टर चैलेंज का आडियेंस मान हंसाते गए। जिनके भी सवाल पर वे हंसे और हंसाए वे अपने को धन्य समझते रहे। राजनीतिक रिपोर्टिंग तलाक और हनीमून जैसे शब्दों के सहारे ख़बर ढूंढती रही। कुछ सवाल और भी रहे। सीटों का बंटवारा क्या होगा। सीएम कौन बनेगा। अरे जैसा मुफीद लगेगा कर लेंगे। पूछना क्या। आख़िर साथ साथ रहना है।
पर कुछेक पत्रकारों ने जता दिया कि वे इन नेताओं के साथ मसखराबाज़ी करने नहीं आए हैं। एक ने पूछा... 'क्या आपलोग इस डर से साथ आए हैं क्योंकि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने श्रीकृष्ण कमीशन की रिपोर्ट पर अमल का संकेत दिया है?' जवाब गोलमोल रहा। एक औऱ सवाल... 'राष्ट्रपति चुनाव के समय आपने मराठी प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए बीजेपी से किनारा कर लिया...अब चुनावों की बारी आयी तो आपको लग रहा है बीजेपी के बिना आपकी कुर्सी नहीं बन सकती...तो आप फिर साथ आ गए हैं...क्या भविष्य में मराठी प्रतिष्ठा के किसी और सवाल पर आप बीजेपी से दुबारा तो नहीं कट लेंगे।' जवाब... 'जो हो गया हो गया... हम साथ साथ... 20 साल से...और अब और मज़बूती से रहेंगे।'
कहते हैं कि ख़बर मौन से निकाली जाती है। जो बोल कर बतायी जाए और जो सुनी-सुनाई जाए वो ज़्यादातर प्रपोगैंडा होती हैं। लेकिन मौजूदा माहौल में मौन को तोड़ ख़बर निकालने वाले सवाल कम ही सुनाई पड़ते हैं। पूछे भी जाते हैं तो जवाब मौन में दबा दिए जाते हैं। ज़्यादातर तो प्रपोगैंडा के आजू-बाजू ही घूमते दिखते हैं। वही संदेश जाता है जो राजनीतिक पार्टियां कहना और फैलाना चाहती हैं। न्यूज़ रूम और एडिटर की भूमिका अगर बहुत इंवोल्वमेंट वाला ना हो तो ज़्यादातर राजनीतिक ख़बरों में चकल्लस ही नज़र आता है। दरअसल हर तरफ हल्कापन आ रहा है। हम सभी शिकार हो रहे हैं। इसलिए कई बार अमर सिंह, अपने नाटकीय अंदाज़ में भी, कथनी में सही नज़र आने लगे हैं। सवाल पूछने वालों से ज़्यादा भारी नज़र आने लगे हैं।
(मैंने अपने इस अनुभव में उन राजनीतिक संवाददाताओं-संपादकों पर टिप्पणी नहीं की है जिन्होंने समय समय पर शासन-सत्ता को चुनौती दी है... और राजनीतिक अवसरवादिता को आईना दिखाया है और आज भी दिखा रहे हैं। शुक्रिया)
Wednesday, September 5, 2007
कृष्ण ने किया तो रासलीला, बाक़ी का कैरेक्टर ढ़ीला!
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समय में बेहतरीन काम किए। मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाई। कई और राक्षसों का खात्मा किया। प्रजा को संरक्षण दिया। हाई स्टैंडर सेट किए। इसलिए श्रीकृष्ण को भगवान मानने वालों को मेरा सलाम है। आख़िर उन्होने ने ही कर्ण की रथ के फंसे पहिए के वक्त मौक़ा निकलवाया। अर्जुन से तीर चलवाया। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घेर कर मारने की रणनीति समझायी। अश्वत्थामा के मरने की अफवाह फैला द्रोणाचार्य को निस्तेज किया। शिखंडी को आगे कर पितामह को ढ़ेर करवाया। पांडवों को जिताया। कौरवों को हराया। अगर वो अपना पाॅलिटिकली करेक्ट रोल न निभाते तो हो सकता है कि युद्ध की शक्ल कुछ और होती और महाभारत के बाद का भारत कुछ और। ये अलग बात है कि हज़ारों साल पहले पांडवों की जीत के बाद भी आज कौरवों का ही राज है। नुक्कड़ों...मोहल्लों में द्रौपदी का चीरहरण आज भी बदस्तूर जारी है। पर आज पांडव कहीं नज़र नहीं आते। या अगर वो हैं तो उनको आज के हालात नज़र नहीं आते।
हज़ारों साल पहले पांडव पांच थे। आबादी तेज़ी से बढ़ी है...ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में। पांडवों बाद की उनकी पुश्तों ने एहतियात बरती हो तो भी चलिए... कम से कम उनके पुश्तों की संख्या 50 हज़ार तो होती...पांच करोड़ ना सही। पर आज तो 50 पांडव भी नज़र नहीं आते। फिर कृष्ण जी ने कैसे लोगों को शिक्षा दी? किन लोगों को घर्म के लिए लड़ना सिखाया? किनको जिताया? कहां गए धर्म की हानि के समय उसकी रक्षा के लिए पैदा होने का वादा करने वाले धर्मराज? ऐसा नहीं है कि मैं श्रीकृष्ण के अस्तित्व और उनके किए पर सवाल उठा रहा हूं। ऐसा करुं तो उनको मानने वाले मुझे पूतना के पास भेज देंगे। मैं तो सिर्फ आज की तारीख में उनको देखने की कोशिश कर रहा हूं। भगवान को याद कर रहा हूं। अपने आसपास उनको ढूंढ रहा हूं।
निराश होने की ज़रुरत नहीं। अधर्म पर धर्म की विजय के कर्ताधर्ता के रुप में ना सही, पर व्यक्तित्व के कई पहलुओं में वो आज भी नज़र आते हैं। जैसे कि चुरा कर मलाई खाने वाले आज भी हैं। औऱ वे अकेले नहीं हैं। करोड़ों की तादाद में हैं। प्राईवेट फार्म से लेकर सरकारी दफ्तर तक में हैं। टेबल के नीचे से मलाई खाते हैं। जब मिल जाता है तो अपने बाल-गोपाल में बांटना नहीं भूलते। ऊपर से नीचे तक 'कट' देते हैं। क्या मजाल कि आप उन पर सवाल उठा दें। अशोक मल्होत्रा जैसे जो पकड़े जाने के बाद कहते हैं...मैं नहीं माखन खायो... । कृष्ण दफ्तरों में भी होते हैं। किसको कैसे लंगड़ी लगानी है...किसको कैसे आगे बढ़ाना है...किसको प्रमोशन देना है किसको डिमोट करना है इस रोल को निभाने वाले कृष्ण। अपने अपने धर्मयुद्ध में लिप्त।
आज की चीरहरित होती स्त्रियों की साड़ी में बेशक श्रीकृष्ण ना समाएं। ना ही उसकी साड़ी को हज़ारों मीटर लंबी कर दें। पर गोपियों के साथ रासलीला की उनकी तरह मंशा पालने वालों की तादाद आज लाखों में है। करोड़ों में हैं। आज के कृष्ण नदी किनारे नहीं... स्वीमिंग पूल के आसपास होने की कोशिश करते हैं। या कॅालेज गेट और गर्ल्स स्कूल के आसपास की चाय की दुकानों पर होते हैं। या फिर बड़े बड़े मॅाल में खरीददारी में जुटी लड़कियों के पास मंडराते। बसों में महिलाओं की मज़बूरी की भीड़ के बीच भी उन्हें रासलीला करने की कोशिश करते हैं। ओछी हरकत करना नहीं भूलते। जिनको वे गोपियां मान लेते हैं वे अगर सचेत ना रहें तो उनके कपड़े उतार वो वृक्ष की डाल पर नहीं... अपने घर ही ले जाएं।
ग़रीब दोस्त सुदामा की झेंप मिटाने वाला कृष्ण भी आज कहीं नज़र नहीं आता। सुदामा कांख में चावल दबाए खड़ा रह जाता हो... कृष्ण को आॅफर नहीं कर पाता हो... पर उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। वैसे आज के कई सुदामा स्मार्ट हो गए हैं। कृष्ण बेशक मक्खन के दीवाने रहें हों... पर उन्होंने खुद कभी भैंस को दूहा हो ऐसी जानकारी नहीं मिलती। पर आज तो कृष्ण वही बनते हैं तो देश को दूह सकें। व्यवस्था को निचोड़ सकें।
आज पुराने कृष्ण की पूजा होती है। होनी चाहिए। मलाई खाने और गोपियों के साथ उनकी क्रीड़ा रासलीला है। लेकिन बाकी वही करते हैं तो कहते हैं कि कैरेक्टर ढीला है। ये क्या बात हुई! ज़माना बदल गया है। और बदले हुए ज़माने के ये भी तो पूजनीय हैं।
हज़ारों साल पहले पांडव पांच थे। आबादी तेज़ी से बढ़ी है...ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में। पांडवों बाद की उनकी पुश्तों ने एहतियात बरती हो तो भी चलिए... कम से कम उनके पुश्तों की संख्या 50 हज़ार तो होती...पांच करोड़ ना सही। पर आज तो 50 पांडव भी नज़र नहीं आते। फिर कृष्ण जी ने कैसे लोगों को शिक्षा दी? किन लोगों को घर्म के लिए लड़ना सिखाया? किनको जिताया? कहां गए धर्म की हानि के समय उसकी रक्षा के लिए पैदा होने का वादा करने वाले धर्मराज? ऐसा नहीं है कि मैं श्रीकृष्ण के अस्तित्व और उनके किए पर सवाल उठा रहा हूं। ऐसा करुं तो उनको मानने वाले मुझे पूतना के पास भेज देंगे। मैं तो सिर्फ आज की तारीख में उनको देखने की कोशिश कर रहा हूं। भगवान को याद कर रहा हूं। अपने आसपास उनको ढूंढ रहा हूं।
निराश होने की ज़रुरत नहीं। अधर्म पर धर्म की विजय के कर्ताधर्ता के रुप में ना सही, पर व्यक्तित्व के कई पहलुओं में वो आज भी नज़र आते हैं। जैसे कि चुरा कर मलाई खाने वाले आज भी हैं। औऱ वे अकेले नहीं हैं। करोड़ों की तादाद में हैं। प्राईवेट फार्म से लेकर सरकारी दफ्तर तक में हैं। टेबल के नीचे से मलाई खाते हैं। जब मिल जाता है तो अपने बाल-गोपाल में बांटना नहीं भूलते। ऊपर से नीचे तक 'कट' देते हैं। क्या मजाल कि आप उन पर सवाल उठा दें। अशोक मल्होत्रा जैसे जो पकड़े जाने के बाद कहते हैं...मैं नहीं माखन खायो... । कृष्ण दफ्तरों में भी होते हैं। किसको कैसे लंगड़ी लगानी है...किसको कैसे आगे बढ़ाना है...किसको प्रमोशन देना है किसको डिमोट करना है इस रोल को निभाने वाले कृष्ण। अपने अपने धर्मयुद्ध में लिप्त।
आज की चीरहरित होती स्त्रियों की साड़ी में बेशक श्रीकृष्ण ना समाएं। ना ही उसकी साड़ी को हज़ारों मीटर लंबी कर दें। पर गोपियों के साथ रासलीला की उनकी तरह मंशा पालने वालों की तादाद आज लाखों में है। करोड़ों में हैं। आज के कृष्ण नदी किनारे नहीं... स्वीमिंग पूल के आसपास होने की कोशिश करते हैं। या कॅालेज गेट और गर्ल्स स्कूल के आसपास की चाय की दुकानों पर होते हैं। या फिर बड़े बड़े मॅाल में खरीददारी में जुटी लड़कियों के पास मंडराते। बसों में महिलाओं की मज़बूरी की भीड़ के बीच भी उन्हें रासलीला करने की कोशिश करते हैं। ओछी हरकत करना नहीं भूलते। जिनको वे गोपियां मान लेते हैं वे अगर सचेत ना रहें तो उनके कपड़े उतार वो वृक्ष की डाल पर नहीं... अपने घर ही ले जाएं।
ग़रीब दोस्त सुदामा की झेंप मिटाने वाला कृष्ण भी आज कहीं नज़र नहीं आता। सुदामा कांख में चावल दबाए खड़ा रह जाता हो... कृष्ण को आॅफर नहीं कर पाता हो... पर उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। वैसे आज के कई सुदामा स्मार्ट हो गए हैं। कृष्ण बेशक मक्खन के दीवाने रहें हों... पर उन्होंने खुद कभी भैंस को दूहा हो ऐसी जानकारी नहीं मिलती। पर आज तो कृष्ण वही बनते हैं तो देश को दूह सकें। व्यवस्था को निचोड़ सकें।
आज पुराने कृष्ण की पूजा होती है। होनी चाहिए। मलाई खाने और गोपियों के साथ उनकी क्रीड़ा रासलीला है। लेकिन बाकी वही करते हैं तो कहते हैं कि कैरेक्टर ढीला है। ये क्या बात हुई! ज़माना बदल गया है। और बदले हुए ज़माने के ये भी तो पूजनीय हैं।
Wednesday, July 18, 2007
क्या वाकई सारे मर्द एक जैसे होते हैं?
'मर्द पर
भरोसा नहीं किया जा सकता। आप तो जानते हैं। वो किस काम से कब कहां होते हैं। किनसे संबंध बनाते है। बीमारी लगाते हैं। फिर आप में फैलाते हैं। ख़ास तौर पर जब दारू पीकर आते हैं तो कंडोम लगाने का ख़्याल नहीं रहता है। आप कंडोम लगाने के लिए कहने से झिझकें नहीं। वो ना लाए तो आप ख़ुद कंडोम ख़रीदें।' - ये रेणुका चौधरी के बयान हैं। वो केन्द्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। उन्होने ये बातें बीते सोमवार को एड्स जागरुकता से जुड़े एक कार्यक्रम में कहीं।
रेणुका के इस बयान के कई पहलू हैं। ये अलग बात है कि मंगलवार को जब इस मसले पर मैंने उनसे बात की तो वो थोड़ी सी पलटती नज़र आयीं। कहा कि मैंने ऐसा देश के सारे मर्दों के लिए नहीं कहा है। ये नहीं कहा कि सारे मर्द भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं। मैंने ये सलाह सिर्फ उन महिलाओं को दी है जो अपने पति की ग़लत हरकतों की वजह से एड्स की शिकार हो गई हैं। रेणुका ने साथ में ये भी जोड़ा कि उनके ऐसा कहने से 'अगर किसी मर्द का दिल घबरा रहा है तो उसे अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए।'
मैंने उनके सोमवार के बयान के टुकड़े को पूरा सुना। एक परिदृश्य में वो घर से...पत्नी से...दूर जाकर काम करने वाले मर्दों की बात कर रही थीं। उनके 'दायें-बाएं' चले जाने की बात कर रही थीं जो एक हद तक सच है। पर व्यापक परिदृश्य में उनका इशारा उन सभी मर्दों की तरफ था तो पत्नी के साथ रहते हुए भी भरोसे के लायक काम नहीं करते। चाहे वो शहरी हो ग्रामीण। पढ़े लिखे हों या अनपढ़। वेलआफ हों या आर्थिक रुप से कमज़ोर।
उनके इस बयान के और भी कई आयाम हैं। इन पर विवाद भी है। पहला कि क्या रेणुका को इस तरह से पूरी मर्द प्रजाति पर सवाल उठाने का अधिकार है। नहीं कहने वालों का तर्क है कि सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। बहुत भरोसेवाले भी होते हैं जो अपनी पत्नी के साथ भरोसे का रिश्ता जीते हैं। इसलिए ये बयान 'राम' जैसे मर्दों को भी धिक्कारने जैसा है। सबको एक हल में जोतने जैसा है।
लेकिन रेणुका की बातों में सच्चाई देखने वालों की भी अपन दलीलें हैं। वे कहते हैं कि मर्दों ने अपनी प्राक़तिक रचना का इतना फ़ायदा उठाया है कि उसे जब भी जहां भी मौक़ा लगा है मुंह मारने से नहीं चूका है। कौमार्य रक्षा का बंधन मर्दों पर नहीं। पैर उनके भारी होते नहीं। सारे क़ायदे महिलाओं के लिए बने हैं। पुरुष तो कुलटा भी नहीं होते। शरीर या समाज के प्रति किसी जवाबदेही के आभाव ने पुरुषों को स्वच्छंदचारी बना दिया है। ऐसे में कुछ 'राम' भी होगे तो गिनते में नहीं आते।
एक और विचार है। वो ये कि रेणुका ने बात तो सही कही लेकिन ऐसा कहना नहीं चाहिए। वो इसलिए कि अगर एड्स पर काबू पाना है तो मर्दों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। उन्हें ग़ैरज़िम्मेदार कह ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं करा सकते। वो छिटक जाएगें। ऐसे में एड्स को लेकर सरकारी जागरुकता प्रोग्राम या नीति पर अमल मुश्किल होगा।
मैं यहां कोई ब्लागमत सर्वेक्षण नहीं करवा रहा। पर चाहता हूं कि आप भी सोचें और बताएं। कि क्या रेणुका ने जो कहा सही कहा। या ग़लत कहा। या उन्होंने सही बात कह कर ग़लती की है।
शुक्रिया
भरोसा नहीं किया जा सकता। आप तो जानते हैं। वो किस काम से कब कहां होते हैं। किनसे संबंध बनाते है। बीमारी लगाते हैं। फिर आप में फैलाते हैं। ख़ास तौर पर जब दारू पीकर आते हैं तो कंडोम लगाने का ख़्याल नहीं रहता है। आप कंडोम लगाने के लिए कहने से झिझकें नहीं। वो ना लाए तो आप ख़ुद कंडोम ख़रीदें।' - ये रेणुका चौधरी के बयान हैं। वो केन्द्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। उन्होने ये बातें बीते सोमवार को एड्स जागरुकता से जुड़े एक कार्यक्रम में कहीं।रेणुका के इस बयान के कई पहलू हैं। ये अलग बात है कि मंगलवार को जब इस मसले पर मैंने उनसे बात की तो वो थोड़ी सी पलटती नज़र आयीं। कहा कि मैंने ऐसा देश के सारे मर्दों के लिए नहीं कहा है। ये नहीं कहा कि सारे मर्द भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं। मैंने ये सलाह सिर्फ उन महिलाओं को दी है जो अपने पति की ग़लत हरकतों की वजह से एड्स की शिकार हो गई हैं। रेणुका ने साथ में ये भी जोड़ा कि उनके ऐसा कहने से 'अगर किसी मर्द का दिल घबरा रहा है तो उसे अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए।'
मैंने उनके सोमवार के बयान के टुकड़े को पूरा सुना। एक परिदृश्य में वो घर से...पत्नी से...दूर जाकर काम करने वाले मर्दों की बात कर रही थीं। उनके 'दायें-बाएं' चले जाने की बात कर रही थीं जो एक हद तक सच है। पर व्यापक परिदृश्य में उनका इशारा उन सभी मर्दों की तरफ था तो पत्नी के साथ रहते हुए भी भरोसे के लायक काम नहीं करते। चाहे वो शहरी हो ग्रामीण। पढ़े लिखे हों या अनपढ़। वेलआफ हों या आर्थिक रुप से कमज़ोर।
उनके इस बयान के और भी कई आयाम हैं। इन पर विवाद भी है। पहला कि क्या रेणुका को इस तरह से पूरी मर्द प्रजाति पर सवाल उठाने का अधिकार है। नहीं कहने वालों का तर्क है कि सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। बहुत भरोसेवाले भी होते हैं जो अपनी पत्नी के साथ भरोसे का रिश्ता जीते हैं। इसलिए ये बयान 'राम' जैसे मर्दों को भी धिक्कारने जैसा है। सबको एक हल में जोतने जैसा है।
लेकिन रेणुका की बातों में सच्चाई देखने वालों की भी अपन दलीलें हैं। वे कहते हैं कि मर्दों ने अपनी प्राक़तिक रचना का इतना फ़ायदा उठाया है कि उसे जब भी जहां भी मौक़ा लगा है मुंह मारने से नहीं चूका है। कौमार्य रक्षा का बंधन मर्दों पर नहीं। पैर उनके भारी होते नहीं। सारे क़ायदे महिलाओं के लिए बने हैं। पुरुष तो कुलटा भी नहीं होते। शरीर या समाज के प्रति किसी जवाबदेही के आभाव ने पुरुषों को स्वच्छंदचारी बना दिया है। ऐसे में कुछ 'राम' भी होगे तो गिनते में नहीं आते।
एक और विचार है। वो ये कि रेणुका ने बात तो सही कही लेकिन ऐसा कहना नहीं चाहिए। वो इसलिए कि अगर एड्स पर काबू पाना है तो मर्दों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। उन्हें ग़ैरज़िम्मेदार कह ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं करा सकते। वो छिटक जाएगें। ऐसे में एड्स को लेकर सरकारी जागरुकता प्रोग्राम या नीति पर अमल मुश्किल होगा।
मैं यहां कोई ब्लागमत सर्वेक्षण नहीं करवा रहा। पर चाहता हूं कि आप भी सोचें और बताएं। कि क्या रेणुका ने जो कहा सही कहा। या ग़लत कहा। या उन्होंने सही बात कह कर ग़लती की है।
शुक्रिया
Saturday, June 16, 2007
बाप की ज़मीन का टुकड़ा बेटों में बंट रहा होगा!
किसान, ज़मीन और सत्ता की भूमिका पर अनिल रघुवंशी ने अपने ब्लाग एक हिन्दुस्तानी की डायरी में काफी कुछ लिखा है। लगातार लिख रहे हैं। मैंने टिप्पणी लिखी तो बड़ी लंबी हो गई। इसलिए इसे मैं यहां ले आया। पर इसे पढ़ने के पहले कृपा अनिल जी को (शाम से आंखे नम-सी हैं, हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों, हिम्मत है तो करके दिखाओ) ज़रुर पढ़ें। नहीं तो मेरा लिखे का पूरा संदर्भ समझने में शायद दिक्कत हो।
अनिल जी,
इस विषय पर मैं लंबे अर्से से कुछ लिखने की सोच रहा था पर बस सोचता रहा। खैर आपने ने इस तरह लिखा है कि आगे कुछ बचता ही नहीं। पोस्ट बेशक जारी हो पर हर पोस्ट अपने आप में पूरी बात कहती है। मैं मक्खन नहीं लगा रहा बल्कि दो शब्द कह कर भरोसा दिलाना चाहता हूं कि मैं लिखना चाह रहा था क्योंकि मैंने भी ज़मीन और किसानों से जुड़ी बातों को देखा और महसूस किया है। आपको एक संस्मरण सुना शायद बात और साफ कर सकूं।
बात बिहार चुनाव के नतीज़े के दिन की है। मैं नतीजों पर फौरी प्रतिक्रिया जानने शरद यादव जी के घर सुबह से ही डटा था। शरद जी जब अपने ड्राईंग रुम में आए तो बात टीवी पत्रकारिता की छेड़ दी। उनका कहना था कि बिहार में इतना अच्छा चुनाव हुआ पर कवरेज नहीं मिला। वे आरोप लगा रहे थे कि सिर्फ हिंसा गोली बंदूक ही टीवी दिखाता है और ऐसा कहते हुए वे पत्रकारों को ताना सा देने लगे। पहले तो मैं चुपचाप सुनता रहा फिर फट पड़ा। मैने कहा ठीक है कि टीवी ने फोकस नहीं किया पर फोकस करते तो किस बात पर। आपने कभी विकास को मुद्दा बनाया क्या। क्या मधुबनी का सकरी चीनी मिल २० साल से बंद है। दरभंगा के रैय्याम मिल की हालत भी यही है। ऐसे मिल तमाम हैं। इलाक़े के लोगों ने गन्ना उपजाना बंद कर दिया है। आपने या किसी राजनीतिक दल ने कहा कि इस बार जीतेगें तो सकरी और इस जैसे तमाम चीनी मिल के ताले खुलवाएंगें। क्या आपने वादा किया किसानों को पलायन कर पंजाब हरियाणा महाराष्ट्र नहीं जाने देगें जहां उनका दोहन तो होता है पर मान सम्मान भी नहीं मिलता। क्या आपने वादा किया कि खेती में कैपिटल इंवेस्टमेंट करेगें ज़मीन को और टुकड़ों में नहीं बंटने देगें। जोत की ज़मीन और छोटी नहीं होने देगें। किसान जो सालभर का पेट पालने लायक अनाज मुश्किल से उगा पाते हैं उसे अधिशेष उत्पादन या सरप्लस प्रोडक्शन में बदलेगें ताकि बेच कर वे कुछ नकदी भी हासिल कर सके और देश की अनाज की जरुरत में भागीदारी भी। क्या आपने अपने घोषणा पत्र में लिखा कि हल बैल की जगह हर गांव को ट्रैक्टर देगें। मैं बस बोलता ही गया।
मेरा पैतृक गांव नरपतिनगर है। मधुबनी ज़िले में आता है। मेरी पैदाईश मधुबनी में हुई और बाबूजी वकील हैं। पर बचपन में गांव में खेतों पर खूब घूमा हूं। पटनी (दमकल से सिंचाई) और कदली (धान रोपाई के समय खेतों में पैर से कीचड़ करना ताकि धान के पौधों को अंगूलियों से आसानी से रोपा जा सके। दरअसल मेरे बाबा (दादा जी को हम बाबा कहते हैं) ज़मीनदार थे। सीलिंग लागू हुआ ज़मीनदारी चली गई। पर फतलाहा टोली के जो खेतिहर मज़दूर थे उनकी हालत जस की तस रही। गांव के आसपास की ज़मीन तो बची रही लेकिन निर्मली और नेपाल सीमा के इलाके की ज़मीन पर लाल झंडा गाड़ दिया गया। ज़मीनदारों की ज़मीन तो चली गई पर फायदा निश्चित ही उनको नहीं हुआ जिनके लिए बिनोवा भावे ने भूदान आंदोलन चलाया। सरकार ने सीलिंग लागू किया। उनमें से कुछ आज भी हमारे बचे हुए ज़मीन के टुकड़ों पर काम करता है। पनपियाई (हल्का नाश्ता) और मरुआ की रोटी जलखई (दोपहर का खाना) पर। धान-गेहूं काटते हैं तो १२ या १६ बोझा काटने पर एक बोझा बोईन (मेहनताना) मिलता है। पेट नहीं भरता। न अपना न अपने परिवार का।
आज फतलाहा और खतरटोली के अधिकांश खेतिहर मज़दूर शहरों में जा कर चापाकल गाड़ने का काम करते हैं रिक्शा चलाने का काम करते हैं। या फिर फैक्टरियों में जहां उन्हें थोड़ा बहुत कैश मिलता है। ऐसे भी है जो पंजाब में अपने खून पसीने से खेत लहलहाते हैं। वो ऐसा बिहार में क्यों नहीं कर पाते। आप जैसे नेता कहां सोते रहते हैं। आज टीवी को कोस रहे हैं कि चुनाव में सकारात्मक चीजें नहीं उठायी। नेताओं को एक ही सकारात्मक चीज नज़र आती है वो है जातीय समीकरण। कहां किस जाति का उम्मीदवार कितनी वोट ले कर आएगा। नेताओ की राजनीति जाति केन्द्रित हो गई है तो टीवी को क्यों कोस रहे हैं कि वो हिंसा मारधाड़ और एक्शन से भरपूर सीन ही दिखाता है। इतना और इसके अलावा भी बहुत मैं सुनाता चला गया। क्योंकि ऐसी वन टू वन मुलाक़ात पहली बार हो रही थी। इसलिए कुछ सुनने के बाद शरद यादव ने पूछा आपका नाम क्या है। मैने अपना नाम बताया तो उन्होने नेता वाली अंदाज़ में कहा अच्छी पकड़ है उमाशंकर। ऐसे भी कभी कभी ऐसे भी मिलते रहो। बात करते रहो। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि मुझे पता है कि सिर्फ बात करते रहने से कोई तब्दीली नहीं आएगी। कुछ करना भी पड़ेगा।
इस बहस के बीच ही बिहार में नीतिश कुमार की सरकार बन गई। संसद सत्र के दौरान और उसके अलावा भी शरद यादव मिलते हैं... सेज़ से सब्ज़ी भाजी बेचने में रिलायंस जैसी कंपनियों लोलुपता... हर मुद्दे पर वो लड़ाई लड़ने की बात करते हैं। अच्छी बात है। पर बिहार में किसानों के लिए क्या हो रहा है शायद आप सबों को बेहतर पता हो।
मैंने अपने संदर्भ से बात कही। सिर्फ शरद जी के हवाले से कही तो इसलिए क्योंकि इसे लेकर उनके और मेरे बीच लंबी बात हुई। लेकिन वो अकेले नेता क़सूरवार नहीं हैं। तमाम नेता हैं जो किसान हित की पोथी दिखा कर चुनावी गणित बिठाते हैं। पूरे देश में हालत खराब है। नीतियां ढंग की बनती नहीं। जो बनती हैं चलती नहीं। कुछ राज्य अपवाद हो सकते हैं। पर किसानों की हालत पर कोई नेता गंभीर नहीं। विदर्भ में मर रहे किसानों को स्मार्ट कार्ड मिलेगा।
अपनी इस लंबी टिप्पणी का अंत अपनी एक गुम गई कविता से करना चाहूंगा। सिर्फ पहली चार पंक्ति याद है बाकि कागज़ों में कहीं खो गई।
'ऐ मानव जिस क्षण तू ये कविता गढ़ रहा होगा
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा
किस किस पर लिखेगा तू किस किस को छोड़ेगा
तेरी लेखनी से तेज़ सृष्टिचक्र चल रहा होगा।
घर की ही बात लो तो कई चित्र उभरते हैं
तुम्हारे धरोहर और संस्कार ऐसे टूट बिखरते हैं
कि कहीं कोई अपना अपनों से कट रहा होगा
बाप की ज़मीन का टुकड़ा बेटों में बंट रहा होगा!
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा...'
रिसर्च वगैरह नहीं कर पाता। देखी सुनी लिखता हूं। इसलिए कोई ग़लती हो तो बताने की कृपा करें।
शुक्रिया। आपका,
उमाशंकर सिंह
अनिल जी,
इस विषय पर मैं लंबे अर्से से कुछ लिखने की सोच रहा था पर बस सोचता रहा। खैर आपने ने इस तरह लिखा है कि आगे कुछ बचता ही नहीं। पोस्ट बेशक जारी हो पर हर पोस्ट अपने आप में पूरी बात कहती है। मैं मक्खन नहीं लगा रहा बल्कि दो शब्द कह कर भरोसा दिलाना चाहता हूं कि मैं लिखना चाह रहा था क्योंकि मैंने भी ज़मीन और किसानों से जुड़ी बातों को देखा और महसूस किया है। आपको एक संस्मरण सुना शायद बात और साफ कर सकूं।
बात बिहार चुनाव के नतीज़े के दिन की है। मैं नतीजों पर फौरी प्रतिक्रिया जानने शरद यादव जी के घर सुबह से ही डटा था। शरद जी जब अपने ड्राईंग रुम में आए तो बात टीवी पत्रकारिता की छेड़ दी। उनका कहना था कि बिहार में इतना अच्छा चुनाव हुआ पर कवरेज नहीं मिला। वे आरोप लगा रहे थे कि सिर्फ हिंसा गोली बंदूक ही टीवी दिखाता है और ऐसा कहते हुए वे पत्रकारों को ताना सा देने लगे। पहले तो मैं चुपचाप सुनता रहा फिर फट पड़ा। मैने कहा ठीक है कि टीवी ने फोकस नहीं किया पर फोकस करते तो किस बात पर। आपने कभी विकास को मुद्दा बनाया क्या। क्या मधुबनी का सकरी चीनी मिल २० साल से बंद है। दरभंगा के रैय्याम मिल की हालत भी यही है। ऐसे मिल तमाम हैं। इलाक़े के लोगों ने गन्ना उपजाना बंद कर दिया है। आपने या किसी राजनीतिक दल ने कहा कि इस बार जीतेगें तो सकरी और इस जैसे तमाम चीनी मिल के ताले खुलवाएंगें। क्या आपने वादा किया किसानों को पलायन कर पंजाब हरियाणा महाराष्ट्र नहीं जाने देगें जहां उनका दोहन तो होता है पर मान सम्मान भी नहीं मिलता। क्या आपने वादा किया कि खेती में कैपिटल इंवेस्टमेंट करेगें ज़मीन को और टुकड़ों में नहीं बंटने देगें। जोत की ज़मीन और छोटी नहीं होने देगें। किसान जो सालभर का पेट पालने लायक अनाज मुश्किल से उगा पाते हैं उसे अधिशेष उत्पादन या सरप्लस प्रोडक्शन में बदलेगें ताकि बेच कर वे कुछ नकदी भी हासिल कर सके और देश की अनाज की जरुरत में भागीदारी भी। क्या आपने अपने घोषणा पत्र में लिखा कि हल बैल की जगह हर गांव को ट्रैक्टर देगें। मैं बस बोलता ही गया।
मेरा पैतृक गांव नरपतिनगर है। मधुबनी ज़िले में आता है। मेरी पैदाईश मधुबनी में हुई और बाबूजी वकील हैं। पर बचपन में गांव में खेतों पर खूब घूमा हूं। पटनी (दमकल से सिंचाई) और कदली (धान रोपाई के समय खेतों में पैर से कीचड़ करना ताकि धान के पौधों को अंगूलियों से आसानी से रोपा जा सके। दरअसल मेरे बाबा (दादा जी को हम बाबा कहते हैं) ज़मीनदार थे। सीलिंग लागू हुआ ज़मीनदारी चली गई। पर फतलाहा टोली के जो खेतिहर मज़दूर थे उनकी हालत जस की तस रही। गांव के आसपास की ज़मीन तो बची रही लेकिन निर्मली और नेपाल सीमा के इलाके की ज़मीन पर लाल झंडा गाड़ दिया गया। ज़मीनदारों की ज़मीन तो चली गई पर फायदा निश्चित ही उनको नहीं हुआ जिनके लिए बिनोवा भावे ने भूदान आंदोलन चलाया। सरकार ने सीलिंग लागू किया। उनमें से कुछ आज भी हमारे बचे हुए ज़मीन के टुकड़ों पर काम करता है। पनपियाई (हल्का नाश्ता) और मरुआ की रोटी जलखई (दोपहर का खाना) पर। धान-गेहूं काटते हैं तो १२ या १६ बोझा काटने पर एक बोझा बोईन (मेहनताना) मिलता है। पेट नहीं भरता। न अपना न अपने परिवार का।
आज फतलाहा और खतरटोली के अधिकांश खेतिहर मज़दूर शहरों में जा कर चापाकल गाड़ने का काम करते हैं रिक्शा चलाने का काम करते हैं। या फिर फैक्टरियों में जहां उन्हें थोड़ा बहुत कैश मिलता है। ऐसे भी है जो पंजाब में अपने खून पसीने से खेत लहलहाते हैं। वो ऐसा बिहार में क्यों नहीं कर पाते। आप जैसे नेता कहां सोते रहते हैं। आज टीवी को कोस रहे हैं कि चुनाव में सकारात्मक चीजें नहीं उठायी। नेताओं को एक ही सकारात्मक चीज नज़र आती है वो है जातीय समीकरण। कहां किस जाति का उम्मीदवार कितनी वोट ले कर आएगा। नेताओ की राजनीति जाति केन्द्रित हो गई है तो टीवी को क्यों कोस रहे हैं कि वो हिंसा मारधाड़ और एक्शन से भरपूर सीन ही दिखाता है। इतना और इसके अलावा भी बहुत मैं सुनाता चला गया। क्योंकि ऐसी वन टू वन मुलाक़ात पहली बार हो रही थी। इसलिए कुछ सुनने के बाद शरद यादव ने पूछा आपका नाम क्या है। मैने अपना नाम बताया तो उन्होने नेता वाली अंदाज़ में कहा अच्छी पकड़ है उमाशंकर। ऐसे भी कभी कभी ऐसे भी मिलते रहो। बात करते रहो। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि मुझे पता है कि सिर्फ बात करते रहने से कोई तब्दीली नहीं आएगी। कुछ करना भी पड़ेगा।
इस बहस के बीच ही बिहार में नीतिश कुमार की सरकार बन गई। संसद सत्र के दौरान और उसके अलावा भी शरद यादव मिलते हैं... सेज़ से सब्ज़ी भाजी बेचने में रिलायंस जैसी कंपनियों लोलुपता... हर मुद्दे पर वो लड़ाई लड़ने की बात करते हैं। अच्छी बात है। पर बिहार में किसानों के लिए क्या हो रहा है शायद आप सबों को बेहतर पता हो।
मैंने अपने संदर्भ से बात कही। सिर्फ शरद जी के हवाले से कही तो इसलिए क्योंकि इसे लेकर उनके और मेरे बीच लंबी बात हुई। लेकिन वो अकेले नेता क़सूरवार नहीं हैं। तमाम नेता हैं जो किसान हित की पोथी दिखा कर चुनावी गणित बिठाते हैं। पूरे देश में हालत खराब है। नीतियां ढंग की बनती नहीं। जो बनती हैं चलती नहीं। कुछ राज्य अपवाद हो सकते हैं। पर किसानों की हालत पर कोई नेता गंभीर नहीं। विदर्भ में मर रहे किसानों को स्मार्ट कार्ड मिलेगा।
अपनी इस लंबी टिप्पणी का अंत अपनी एक गुम गई कविता से करना चाहूंगा। सिर्फ पहली चार पंक्ति याद है बाकि कागज़ों में कहीं खो गई।
'ऐ मानव जिस क्षण तू ये कविता गढ़ रहा होगा
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा
किस किस पर लिखेगा तू किस किस को छोड़ेगा
तेरी लेखनी से तेज़ सृष्टिचक्र चल रहा होगा।
घर की ही बात लो तो कई चित्र उभरते हैं
तुम्हारे धरोहर और संस्कार ऐसे टूट बिखरते हैं
कि कहीं कोई अपना अपनों से कट रहा होगा
बाप की ज़मीन का टुकड़ा बेटों में बंट रहा होगा!
उस क्षण भी हर तरफ कलयुग घट रहा होगा...'
रिसर्च वगैरह नहीं कर पाता। देखी सुनी लिखता हूं। इसलिए कोई ग़लती हो तो बताने की कृपा करें।
शुक्रिया। आपका,
उमाशंकर सिंह
Thursday, June 14, 2007
मधुबनी पेंटिग देखने जापान जाना होगा!
दूसरी कड़ी...
हालांकि अब तक के सारे बदलाव माध्यमगत ही हैं लेकिन इन बदलावों ने कला के स्तर में गुनात्मक गिरावट ला दिया है। चित्रकला अब बड़े पैमाने पर हो रही है। लेकिन यह पहले वाला आकर्षण पैदा नहीं करती।
इसके कई कारण
हैं। मूल कारण है इसे मिल जाने वाला वह बाज़ार जिसने इस कला के पीछ काम करने वाली भावना तक को बदल दिया। इसकी मांग को देख कर अधिकांश कलाकार इसे कला के बजाए व्यवसाय की नज़र से देखने लगे। इसमें कलाकारों की कुछ ऐसी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का भी हाथ रहा जिसने उन्हें मधुबनी चित्रकला को सिर्फ जीवकोपार्जन के विकल्प के रुप में अपनाने को बाध्य किया। जितवारपुर गांव के श्री दिवस चंद्र झा का मानना है कि यह जिस रुप में हमें रोज़गार प्रदान करता है वही ठीक है। इनकी शिकायत है कि अच्छा चित्र बना कर इन्होने कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पुरस्कार जीते लेकिन इससे इनकी आर्थिक हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब इनके पास कम से कम अपना पक्के का मकान तो है।
इसी हालत का फायदा उठा कर कुछ स्थानीय और बाहरी बिचौलियों ने संगठित रुप में इस कला का 'उत्पादन' शुरु कर दिया। उन्होने अपनी संस्थाओं में चित्रकला के लिए ऐसे लोगों को रखा को इस कला का क ख ग भी नहीं जानते। ये लोग संस्थाओं से इसलिए जुड़ गए क्योंकि ये इससे उन्हें पैसे मिलते हैं। रोज़गार के तौर पर इसे लेना ग़लत नहीं है बशर्ते की कला के साथ छेड़छाड़ न की जाए। लेकिन यहां विशुद्द बाज़ारू किस्म की चीज़ों पर पेंटिंग बनाई जाती है। साड़ी, दुपट्टा, मेजपोश, बेडशीट, तकियाखोल, जैकेट कुछ नहीं छूटा। सब कुछ बाज़ार की मांग के हिसाब से तैयार होता है।
बाज़ार में जब इस तरह की पेंटिग पहुंचती है तो लोग मधुबनी पेंटिग के नाम पर इन्हीं चीज़ों से परिचित होते हैं। जानकारी की कमी के कारण व्यवसायिक शैली के इन विकृत चित्रों को लोग खरीद तो लेते हैं कि चलो मधुबनी पेंटिग लेते हैं, लेकिन ये उन्हें वो मानसिक संतुष्टि नहीं दे पाता जो कला के कद्रदान असल में ढ़ूंढ़ते हैं। शायद यही वजह है कि कला के शौकीनों की दिलचस्पी अब मधुबनी चित्रकला में उस तरह की नहीं रही जैसी पहले कभी हुआ करती थी। आधुनिक चित्रकला के सिद्धहस्त मनु पारेख ने कभी मधुबनी चित्रकला में काफी सक्रिय दिलचस्पी ली थी। एक गहराई तक जाने के बाद उन्होने मुझसे कहा था कि 'एक उंचाई पर पहुंचने के बाद उतार अवश्यंभावी होता है। यही मधुबनी चित्रकला के साथ हो रहा है।' बाज़ारीकरण पर उन्होने कहा कि ' इस संदर्भ में कुछ भी नहीं किया जा सकता। व्यावसायिकता समय की मांग है। '
इस हालत के लिए इस कला के वास्तविक कलाकार स्वयं भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। आर्थिक रुप से कमज़ोर कलाकार को जाने दें तो भी वे कलाकार दायरे में आते हैं जो पहले से साधन संपन्न थे या फिर अपनी कलाकारी से संपन्नता प्राप्त कर चुके हैं। उन पर मुख्य रुप से ये आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होने अपनी तमाम क्षमताओं के बावजूद इसे सही दिशा में निर्देशित और मार्गदर्शित करने की ज़रुरत को नहीं समझा। नतीज़तन, विकास और परिवर्धन की एक सीमा तक पहुंचने के बाद ये पथभ्रमित सी हो गई और दिशा खो बैठी।
हालांकि अब भी ऐसे कलाकार हैं जो इस कला के प्रति पूरा समर्पण भाव रखते हैं लेकिन उनकी संख्या नगण्यप्राय ही है। रांटी गांव की श्रीमती गोदावरी दत्ता, जिनको कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है, ने कई साल पहले मुझसे कहा था कि 'चुंकि सभी लोग अत्यधिक मंहगी पेंटिग नहीं खरीद सकते इसलिए उनके लिए विशुद्ध व्यावसायिक रुप से बनाए गए चित्र ही ठीक हैं। इसलिए व्यावसायिकता आई है तो ठीक ही है।' इसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि चित्रकला को हर आदमी तक पहुंचाना चाहिए भले ही उसका रुप विकृत क्यों ना हो जाए! जबकि आम जन तक इस कला को पहुंचाने के और भी कई रास्ते हैं। मधुबनी पेंटिंग का एक संग्रहालय बनाया जा सकता है जो भारत में नहीं है। जापान ने बना लिया है।
मधुबनी चि्त्रकला के सिद्धहस्त और बाल भवन नई दिल्ली से संबद्ध श्री सत्यनारायण लाल 'कर्ण' इस हालत पर गंभीर चिंता जताते हैं। 'यदि इस कला के मूल रुप को बचाना है तो इसके लिए नई पीढ़ी के कलाकारों को इस तरह से प्रशिक्षित करना होगा कि वे इसे कला के रुप में ही लें व्यवसाय के रुप में नहीं।' श्री कर्ण मधुबनी में एक संग्रहालय की ज़रुरत महसूस करते हैं 'नहीं तो बाद की पीढियों को वास्तविक मधुबनी चित्रकला देखने के लिए जापान जाना पड़ेगा जहां एक संग्रहालय बनाया जा चुका है और दुर्भल नमूनों को यहां एकत्र किया जा रहा है।' इसलिए आज सरकार और इससे भी अधिक प्रबुद्ध कलाकारों और स्थानीय समाज की ये ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और धरोहर को बचाने के लिए आगे आएं।
फिलहाल इतना ही।
हालांकि अब तक के सारे बदलाव माध्यमगत ही हैं लेकिन इन बदलावों ने कला के स्तर में गुनात्मक गिरावट ला दिया है। चित्रकला अब बड़े पैमाने पर हो रही है। लेकिन यह पहले वाला आकर्षण पैदा नहीं करती।
इसके कई कारण
हैं। मूल कारण है इसे मिल जाने वाला वह बाज़ार जिसने इस कला के पीछ काम करने वाली भावना तक को बदल दिया। इसकी मांग को देख कर अधिकांश कलाकार इसे कला के बजाए व्यवसाय की नज़र से देखने लगे। इसमें कलाकारों की कुछ ऐसी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का भी हाथ रहा जिसने उन्हें मधुबनी चित्रकला को सिर्फ जीवकोपार्जन के विकल्प के रुप में अपनाने को बाध्य किया। जितवारपुर गांव के श्री दिवस चंद्र झा का मानना है कि यह जिस रुप में हमें रोज़गार प्रदान करता है वही ठीक है। इनकी शिकायत है कि अच्छा चित्र बना कर इन्होने कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पुरस्कार जीते लेकिन इससे इनकी आर्थिक हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब इनके पास कम से कम अपना पक्के का मकान तो है।इसी हालत का फायदा उठा कर कुछ स्थानीय और बाहरी बिचौलियों ने संगठित रुप में इस कला का 'उत्पादन' शुरु कर दिया। उन्होने अपनी संस्थाओं में चित्रकला के लिए ऐसे लोगों को रखा को इस कला का क ख ग भी नहीं जानते। ये लोग संस्थाओं से इसलिए जुड़ गए क्योंकि ये इससे उन्हें पैसे मिलते हैं। रोज़गार के तौर पर इसे लेना ग़लत नहीं है बशर्ते की कला के साथ छेड़छाड़ न की जाए। लेकिन यहां विशुद्द बाज़ारू किस्म की चीज़ों पर पेंटिंग बनाई जाती है। साड़ी, दुपट्टा, मेजपोश, बेडशीट, तकियाखोल, जैकेट कुछ नहीं छूटा। सब कुछ बाज़ार की मांग के हिसाब से तैयार होता है।
बाज़ार में जब इस तरह की पेंटिग पहुंचती है तो लोग मधुबनी पेंटिग के नाम पर इन्हीं चीज़ों से परिचित होते हैं। जानकारी की कमी के कारण व्यवसायिक शैली के इन विकृत चित्रों को लोग खरीद तो लेते हैं कि चलो मधुबनी पेंटिग लेते हैं, लेकिन ये उन्हें वो मानसिक संतुष्टि नहीं दे पाता जो कला के कद्रदान असल में ढ़ूंढ़ते हैं। शायद यही वजह है कि कला के शौकीनों की दिलचस्पी अब मधुबनी चित्रकला में उस तरह की नहीं रही जैसी पहले कभी हुआ करती थी। आधुनिक चित्रकला के सिद्धहस्त मनु पारेख ने कभी मधुबनी चित्रकला में काफी सक्रिय दिलचस्पी ली थी। एक गहराई तक जाने के बाद उन्होने मुझसे कहा था कि 'एक उंचाई पर पहुंचने के बाद उतार अवश्यंभावी होता है। यही मधुबनी चित्रकला के साथ हो रहा है।' बाज़ारीकरण पर उन्होने कहा कि ' इस संदर्भ में कुछ भी नहीं किया जा सकता। व्यावसायिकता समय की मांग है। '
इस हालत के लिए इस कला के वास्तविक कलाकार स्वयं भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। आर्थिक रुप से कमज़ोर कलाकार को जाने दें तो भी वे कलाकार दायरे में आते हैं जो पहले से साधन संपन्न थे या फिर अपनी कलाकारी से संपन्नता प्राप्त कर चुके हैं। उन पर मुख्य रुप से ये आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होने अपनी तमाम क्षमताओं के बावजूद इसे सही दिशा में निर्देशित और मार्गदर्शित करने की ज़रुरत को नहीं समझा। नतीज़तन, विकास और परिवर्धन की एक सीमा तक पहुंचने के बाद ये पथभ्रमित सी हो गई और दिशा खो बैठी।
हालांकि अब भी ऐसे कलाकार हैं जो इस कला के प्रति पूरा समर्पण भाव रखते हैं लेकिन उनकी संख्या नगण्यप्राय ही है। रांटी गांव की श्रीमती गोदावरी दत्ता, जिनको कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है, ने कई साल पहले मुझसे कहा था कि 'चुंकि सभी लोग अत्यधिक मंहगी पेंटिग नहीं खरीद सकते इसलिए उनके लिए विशुद्ध व्यावसायिक रुप से बनाए गए चित्र ही ठीक हैं। इसलिए व्यावसायिकता आई है तो ठीक ही है।' इसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि चित्रकला को हर आदमी तक पहुंचाना चाहिए भले ही उसका रुप विकृत क्यों ना हो जाए! जबकि आम जन तक इस कला को पहुंचाने के और भी कई रास्ते हैं। मधुबनी पेंटिंग का एक संग्रहालय बनाया जा सकता है जो भारत में नहीं है। जापान ने बना लिया है।मधुबनी चि्त्रकला के सिद्धहस्त और बाल भवन नई दिल्ली से संबद्ध श्री सत्यनारायण लाल 'कर्ण' इस हालत पर गंभीर चिंता जताते हैं। 'यदि इस कला के मूल रुप को बचाना है तो इसके लिए नई पीढ़ी के कलाकारों को इस तरह से प्रशिक्षित करना होगा कि वे इसे कला के रुप में ही लें व्यवसाय के रुप में नहीं।' श्री कर्ण मधुबनी में एक संग्रहालय की ज़रुरत महसूस करते हैं 'नहीं तो बाद की पीढियों को वास्तविक मधुबनी चित्रकला देखने के लिए जापान जाना पड़ेगा जहां एक संग्रहालय बनाया जा चुका है और दुर्भल नमूनों को यहां एकत्र किया जा रहा है।' इसलिए आज सरकार और इससे भी अधिक प्रबुद्ध कलाकारों और स्थानीय समाज की ये ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और धरोहर को बचाने के लिए आगे आएं।
फिलहाल इतना ही।
Madhubani Painting : विकृत होती कला
मधुबनी चित्रकला को नज़दीक से देखता रहा हूं। इसमें जो बड़े बदलाव हुए हैं उनको पकड़ने की कोशिश की है। आलेख लंबा बन पड़ा है इसलिए दो कड़ियों में दे रहा हूं। पहली कड़ी....
विका
स और आधुनिकता की दौड़ से सैंकड़ों मील दूर खड़ा उत्तर बिहार का मधुबनी ज़िला अपनी आदर्शभूत पहचान लिए ज्यों का त्यों खड़ा है। कुछेक को छोड़, जो बदलाब यहां नज़र आता है उसकी बानगी अच्छा संकेत नहीं देती। ये बात यहां कि परंपरागत मधुबनी या मिथिला चित्रकला के लिए भी लागू होती है। कला के व्यवसायीकरण का यहां बड़ा असर दिखाई पड़ता है।
मधुबनी चित्रकला कब शुरु हुई इसका ठीक ठीक पता करना मुश्किल है। ऐसा माना जाता है कि ये रामायणकाल में भी अस्तित्व में था। उस समय इस कला का स्वरुप स्वभाविक रुप से पारंपरिक था। शादी-ब्याह, तीज-त्योहार के मौक़े पर घर की मिट्टी की दीवारों पर गोबर और प्राकृतिक रंगों की मदद से चित्र उकेरे जाते थे। मुख्य उद्देश्य घर आंगन को सजाना संवारना ही था। कमोबेश यही स्थिति आधुनिक काल में सन 1964 तक रही।
स और आधुनिकता की दौड़ से सैंकड़ों मील दूर खड़ा उत्तर बिहार का मधुबनी ज़िला अपनी आदर्शभूत पहचान लिए ज्यों का त्यों खड़ा है। कुछेक को छोड़, जो बदलाब यहां नज़र आता है उसकी बानगी अच्छा संकेत नहीं देती। ये बात यहां कि परंपरागत मधुबनी या मिथिला चित्रकला के लिए भी लागू होती है। कला के व्यवसायीकरण का यहां बड़ा असर दिखाई पड़ता है।मधुबनी चित्रकला कब शुरु हुई इसका ठीक ठीक पता करना मुश्किल है। ऐसा माना जाता है कि ये रामायणकाल में भी अस्तित्व में था। उस समय इस कला का स्वरुप स्वभाविक रुप से पारंपरिक था। शादी-ब्याह, तीज-त्योहार के मौक़े पर घर की मिट्टी की दीवारों पर गोबर और प्राकृतिक रंगों की मदद से चित्र उकेरे जाते थे। मुख्य उद्देश्य घर आंगन को सजाना संवारना ही था। कमोबेश यही स्थिति आधुनिक काल में सन 1964 तक रही।
1964 में ये इलाका अकाल से बुरी तरह प्रभावित हुआ। बहुत से सरकारी और ग़ैर सरकारी लोगों ने इस इलाके का दौरा किया। तब पहली बार बाहरी लोगों का ध्यान इस कला की तरफ गया। जितवारपुर गांव की श्रीमती सीता देवी, जिन्हें इस कला के लिए पहला पद्मश्री सम्मान मिला, अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन मैं उनसे 1995 में मिला था। लंबी बात हुई थी। उन्होने बताया कि उस अकाल के दौरान ही किसी व्यक्ति के आग्रह पर उन्होने मिट्टी की दीवार से इस कला को पहली बार कागज़ पर उतारा। बदले में उन्हें कुछ आर्थिक मदद मिली।
बदलाव की तरफ ये पहला कदम था। इसके कुछ समय बाद हाथ से बने कागज़ों का बतौर माध्यम धड़ल्ले से इस्तेमाल होने लगा। इससे इसे दुनियाभर में फैलने में मदद मिली। लेकिन फैब्रिक कलर के साथ कपड़ों पर भी चित्रकारी की जाने लगी। अब तो हालत ये है कि रेडिमेड कपड़ों के साथ साथ सनमाईका पर भी चित्रकारी की जा रही है।
पहले इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक रंग वनस्पतियों से तैयार किए जाते थे। लाल रंग संध्या के फूल से और हरा रंग पुरैन के पत्ते से निचोड़ा जाता था। इसी तरह अपराजिता फूल से नीला रंग और सिंघाड़ा के पौधे से पीला रंग बनाया जाता था। सिंघाड़ा के पौधे की ही डंठल से नारंगी रंग बनता और और दीए की लौ की कालिख जमा कर काला रंग बनाया जाता था। इस तरह से बने रंग और टिकाऊ बनाने के लिए इनमें केले के पेड़ से निकलने वाला रस या फिर साधारण गोंद मिलाया जाता था। काफी मेहनत से और कम मात्रा में तैयार होने वाले इन रंगों की अपनी पहचान थी जो मधुबनी चित्रकला को विशिष्टता प्रदान करती थी। 'कचनी' (रेखांकन) और 'भरनी' (मोटी कूची से भरे) दोनों ही तरह के चित्रों में इन रंगों का संयमित इस्तेमाल होता था जिससे चित्रकला की विषय-वस्तु की गरिमापूर्ण अभिव्यक्ति होती थी।
चाहे वो 'कोह
बर' (शादी के मौके पर मूल रूप से दीवार पर बनाया जाने वाला शुभ चित्र जिस में बांस, पुरैन के छ पत्ते आदि होते हैं) हो या भगवान कृष्ण की रासलीला का चित्रण, इन सब में रंगों का इस्तेमाल स्वभाविक पृष्ठभूमि पर ऐसी सहजता से होता था क ये हमारे सामने बरबस धर्म और संस्कृति के वास्तविक दृश्य पैदा कर देने में सक्षम प्रतीत होते थे। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। सिंथेटिक और फैब्रिक रंगों के इस्तेमाल ने मधुबनी चित्रकला के रंगों की दुनिया ही बदल दी है। चमकीले रंगों के भड़काऊ इस्तेमाल से ख़रीददार को प्रभावित और आकर्षित करने की ललक ने चित्रकला में पर्याप्त हल्कापन ला दिया है। आंखो को अन्यथा उत्तेजित करने वाले ये चटकीले रंग चित्रकला का बाज़ार फैलाने के उद्देश्य में भले ही सफल रहे हों। लेकिन इतना तय है कि बदले हुए माध्यमों पर रंगों के इस असंतुलित-असंयमित प्रयोग ने चित्रकला की परंपरागत विषय वस्तु पर आक्षेप करना शुरु कर दिया है। तभी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त महासुंदरी देवी के साथ चित्रकारी करने वाली उनकी पुत्रवधु विभा दास का कहना है कि 'परंपरागत और सांस्कृतिक विषयों को चित्रकारी का मूल बनाए रखना आज एक बड़ी चुनौती बन गई है।'
बर' (शादी के मौके पर मूल रूप से दीवार पर बनाया जाने वाला शुभ चित्र जिस में बांस, पुरैन के छ पत्ते आदि होते हैं) हो या भगवान कृष्ण की रासलीला का चित्रण, इन सब में रंगों का इस्तेमाल स्वभाविक पृष्ठभूमि पर ऐसी सहजता से होता था क ये हमारे सामने बरबस धर्म और संस्कृति के वास्तविक दृश्य पैदा कर देने में सक्षम प्रतीत होते थे। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। सिंथेटिक और फैब्रिक रंगों के इस्तेमाल ने मधुबनी चित्रकला के रंगों की दुनिया ही बदल दी है। चमकीले रंगों के भड़काऊ इस्तेमाल से ख़रीददार को प्रभावित और आकर्षित करने की ललक ने चित्रकला में पर्याप्त हल्कापन ला दिया है। आंखो को अन्यथा उत्तेजित करने वाले ये चटकीले रंग चित्रकला का बाज़ार फैलाने के उद्देश्य में भले ही सफल रहे हों। लेकिन इतना तय है कि बदले हुए माध्यमों पर रंगों के इस असंतुलित-असंयमित प्रयोग ने चित्रकला की परंपरागत विषय वस्तु पर आक्षेप करना शुरु कर दिया है। तभी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त महासुंदरी देवी के साथ चित्रकारी करने वाली उनकी पुत्रवधु विभा दास का कहना है कि 'परंपरागत और सांस्कृतिक विषयों को चित्रकारी का मूल बनाए रखना आज एक बड़ी चुनौती बन गई है।' जारी...
दूसरी कड़ी जल्द ही
Saturday, June 9, 2007
बिहार में लालू की रेल
रेल मंत्री
लालू यादव देश-दुनिया में अपने मैनेजमेंट स्किल का लोहा मनवाने पर तुले हैं। आए दिन ख़बर आती है कि अमेरिका की फलां यूनिवर्सिटी ने लालू को बुलाया, तो फ्रांस के फलां स्कूल आॅफ बिजनेस ने। लालू आईआईएम अहमदाबाद भी हो आए। पर मुझे लगता है कि लालू के तथाकथिक मैनेजमेंट स्किल से सबसे ज़्यादा किसी ने सीखा है तो वो है बिहार के वो लोग जो ट्रेन में बिना टिकट सफर करते हैं। जेनरल तो जेनरल, एसी कोच में भी वो बिना टिकट या बिना सही टिकट के घुस जाते हैं। वाह! क्या मैनेज करते हैं। टीटीई भी उनके मुंह नहीं लगता। आलम तो ऐसा भी होता है कि जिसका रिजर्वेशन वो बेचारा खड़ा रहता है और गुंडे मवाली सीट पर पसर जाते हैं। आंखों देखी कह रहा हूं। कल ही मगध एक्सप्रेस ले लौटा हूं।
लालू यादव देश-दुनिया में अपने मैनेजमेंट स्किल का लोहा मनवाने पर तुले हैं। आए दिन ख़बर आती है कि अमेरिका की फलां यूनिवर्सिटी ने लालू को बुलाया, तो फ्रांस के फलां स्कूल आॅफ बिजनेस ने। लालू आईआईएम अहमदाबाद भी हो आए। पर मुझे लगता है कि लालू के तथाकथिक मैनेजमेंट स्किल से सबसे ज़्यादा किसी ने सीखा है तो वो है बिहार के वो लोग जो ट्रेन में बिना टिकट सफर करते हैं। जेनरल तो जेनरल, एसी कोच में भी वो बिना टिकट या बिना सही टिकट के घुस जाते हैं। वाह! क्या मैनेज करते हैं। टीटीई भी उनके मुंह नहीं लगता। आलम तो ऐसा भी होता है कि जिसका रिजर्वेशन वो बेचारा खड़ा रहता है और गुंडे मवाली सीट पर पसर जाते हैं। आंखों देखी कह रहा हूं। कल ही मगध एक्सप्रेस ले लौटा हूं।लालू जी, जब तक अपने गृह राज्य में सफ़र करने वाले मुसाफिरों की सहूलियत और उनमें सुरक्षा का भाव नहीं भरेगें जब तक आप दुनिया क्या जीतेगें। रेल को हज़ारों करोड़ के मुनाफे में ले जाएं लेकिन आपकी असली कमाई आपके राज्य में नज़र आती है। ये हमारा भी राज्य है इसलिए शर्म आती है।
Thursday, May 31, 2007
BMW मतलब Biko-Mat-Wakeelsahab!!!
एनडीटी
वी ने अभियोजन और बचाव पक्ष के वकीलों की आपसी मिलीभगत और गवाह को ख़रीदने की कोशिश का एक स्टिंग आपरेशन दिखाया है। चारों तरफ इसकी सराहना हो रही है। व्यवस्था की झकझोड़ देने वाली इस ख़बर का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें दो बड़े वकीलों को इंसाफ की सौदेबाज़ी करते पकड़ा गया है... बल्कि ये न्यापालिका से जुड़े लोगों में फैले भ्रष्टाचार की गंभीरता का अहसास कराने वाली पहली बड़ी ख़बर है। चश्मदीद कुलकर्णी की विश्वसनीयता को शक से देखने वाले अपनी जगह, पर अपना काम ईमानदारी से करने वाले वकील भी अपनी बिरादरी के दो दिग्गजो के व्यवहार को शर्मनाक बता रहे हैं। बीएम़डब्ल्यू मामले पर अदालत की कड़ी निगाह है और इसलिए जिस चश्मदीद को अभियोजन पक्ष ने हटा दिया, सच्चाई जानने की गरज से अदालत ने उसे बुला लिया। लेकिन जिस वकील को सज़ा दिलाने की ज़िम्मदारी दी गई वो कैमरे पर उससे डिगता नज़र आया।
न्यापालिका की सक्रियता के चलते जनहित से जुड़े बड़े बड़े मामलों पर कार्रवाई हुई है। लेकिन ये भी सच है कि न्यापालिका भी भ्रष्टाचार व्याप्त है। मीडिया की जद में हर कोई आता है लेकिन अब तक न्यापालिका में बैठे दलालों-घूसखोरों के पर्दाफ़ाश के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया गया है। न्यापालिका में बड़ी तादाद में ईमानदार और न्याय का साथ देने लोग भी हैं। इसलिए किसी एक के चलते पूरी न्यापालिका पर कीचड़ उछालने से बचना भी ज़रुरी है। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का का डंडा भी काफी मज़बूत है। ये मानना भी ठीक नहीं कि इस ख़बर के साथ ही न्यापालिका से छन कर आती भ्रष्टाचार को लेकर मीडिया का रुख वैसा ही हो जाएगा जैसा कार्यपालिका और विधायिका को लेकर रहता है। लेकिन मौक़े को ऐसे भी नहीं जाने देना चाहिए। भेद को आगे भी खोलना चाहिए।
न्यापालि
का में फैले ग़लत आचरणों के खिलाफ मीडिया के तनने पर एक अंदेशा जो सताता है वो ये कि पहले से ही तपी तपायी विधायिका इस मौके का फायदा उठा कर और हालात को बरगला कर मीडिया पर कानूनी शिकंजा कसने की कोशिश ना करे। संसद में पहले भी स्टिंग आपरेशन जैसी चीज़ों पर पाबंदी लगाने की मांग उठायी जा चुकी है। ऐसा नहीं है कि स्टिंग आपरेशन ही मीडिया का एकमात्र नखदंत है। पर इन तरह के आपरेशन्स के ज़रिए कई रोग साफ साफ दिख, देखे और दिखाए जाते हैं। अगर सनसनी पर संयम बरता जाए और व्यक्तिगत जिंदगी में ग़ैरज़रुरी ताकाझांकी से बचा जाए तो इसे और प्रभावशाली और अपेक्षाकृत कम आलोचित होने वाला हथियार बनाया जा सकता है। एनडीटीवी के इस स्टिंग आपरेशन की यही ख़ासियत है कि इसमें कोई व्यक्तिगत आग्रह दुराग्रह में नहीं फंसा गया है। ऐसे मामलों में अक्सर जद में आया व्यक्ति दलील देने लगता है कि टेप बनावटी है इसकी जांच करायी जाए। इसमें तस्वीर आवाज़ मेरी नहीं मुझे फंसाया जा रहा है। लेकिन यहां आरके आनंद भी मान रहे हैं कि वे कैमरे में कैद हैं और आयू खान भी अपनी कही बात से इंकार नहीं कर रहे। पर वे इसका विश्लषण इस तरह से कर रहे हैं कि अपनी साख बचायी जा सके। अब अदालत इस पूरे मामले की अपनी तरह से पड़ताल कर नतीज़े पर पहुंचेगी और तब तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।
महत्वपूर्ण बात है कि एनडीटीवी की इस ख़बर पर दूसरे चैनलों ने भी आवाज़ उठायी है।
आईबीएन सेवेन ने ख़ास तौर पर। नहीं तो देखने में ये आता है कि एक चैनल की ख़बर मान कर दूसरे चुप्पी साध लेते हैं। पर ख़बर तो ख़बर होती है इसकी या उसकी नहीं होती। देश के हित में होती है। शुरुआत कोई कर सकता है पर सबके साथ आ जाने में बुराई नहीं है। आते भी हैं। आजतक पर जब सवाल के बदले सांसदों को पैसे मांगते दिखाया गया था तब भी इसी तरह की एका दिखी थी चैनलों में। वो ख़बर सबने पकड़ी। अभियान-सा बन गया। दस सांसद निकाल दिए गए। स्टार न्यूज़ के मुंबई दफ्तर पर हमला हुआ तो सबों ने एक तरह से उस चैनल को आपने पर पैच कर दिया। सरकार को कड़े कदम उठाने पड़े। यही मीडिया की ताक़त है और ये तब और बढ़ जाती है जब सब मिल कर आवाज़ बुलंद करते हैं।
फिलहाल
व्यापक प्रभाव पैदा कर सकने की कूवत रखने वाली ख़बरों को मिलाजुला अभियान बनाने की तरफ कुछ क़दम बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। मौजूदा हालात में ये एक महज संयोग भी हो सकता है या कुछ कैलकुलेटिव मूव भी... पर व्यवस्था दलालों के खिलाफ अभियान को संस्थागत रुप देने की ज़रुरत है। आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी चलती रहे तो इसे परस्पर विरोधाभासी नहीं कहा जा सकता।
वी ने अभियोजन और बचाव पक्ष के वकीलों की आपसी मिलीभगत और गवाह को ख़रीदने की कोशिश का एक स्टिंग आपरेशन दिखाया है। चारों तरफ इसकी सराहना हो रही है। व्यवस्था की झकझोड़ देने वाली इस ख़बर का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें दो बड़े वकीलों को इंसाफ की सौदेबाज़ी करते पकड़ा गया है... बल्कि ये न्यापालिका से जुड़े लोगों में फैले भ्रष्टाचार की गंभीरता का अहसास कराने वाली पहली बड़ी ख़बर है। चश्मदीद कुलकर्णी की विश्वसनीयता को शक से देखने वाले अपनी जगह, पर अपना काम ईमानदारी से करने वाले वकील भी अपनी बिरादरी के दो दिग्गजो के व्यवहार को शर्मनाक बता रहे हैं। बीएम़डब्ल्यू मामले पर अदालत की कड़ी निगाह है और इसलिए जिस चश्मदीद को अभियोजन पक्ष ने हटा दिया, सच्चाई जानने की गरज से अदालत ने उसे बुला लिया। लेकिन जिस वकील को सज़ा दिलाने की ज़िम्मदारी दी गई वो कैमरे पर उससे डिगता नज़र आया।न्यापालिका की सक्रियता के चलते जनहित से जुड़े बड़े बड़े मामलों पर कार्रवाई हुई है। लेकिन ये भी सच है कि न्यापालिका भी भ्रष्टाचार व्याप्त है। मीडिया की जद में हर कोई आता है लेकिन अब तक न्यापालिका में बैठे दलालों-घूसखोरों के पर्दाफ़ाश के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया गया है। न्यापालिका में बड़ी तादाद में ईमानदार और न्याय का साथ देने लोग भी हैं। इसलिए किसी एक के चलते पूरी न्यापालिका पर कीचड़ उछालने से बचना भी ज़रुरी है। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का का डंडा भी काफी मज़बूत है। ये मानना भी ठीक नहीं कि इस ख़बर के साथ ही न्यापालिका से छन कर आती भ्रष्टाचार को लेकर मीडिया का रुख वैसा ही हो जाएगा जैसा कार्यपालिका और विधायिका को लेकर रहता है। लेकिन मौक़े को ऐसे भी नहीं जाने देना चाहिए। भेद को आगे भी खोलना चाहिए।
न्यापालि
का में फैले ग़लत आचरणों के खिलाफ मीडिया के तनने पर एक अंदेशा जो सताता है वो ये कि पहले से ही तपी तपायी विधायिका इस मौके का फायदा उठा कर और हालात को बरगला कर मीडिया पर कानूनी शिकंजा कसने की कोशिश ना करे। संसद में पहले भी स्टिंग आपरेशन जैसी चीज़ों पर पाबंदी लगाने की मांग उठायी जा चुकी है। ऐसा नहीं है कि स्टिंग आपरेशन ही मीडिया का एकमात्र नखदंत है। पर इन तरह के आपरेशन्स के ज़रिए कई रोग साफ साफ दिख, देखे और दिखाए जाते हैं। अगर सनसनी पर संयम बरता जाए और व्यक्तिगत जिंदगी में ग़ैरज़रुरी ताकाझांकी से बचा जाए तो इसे और प्रभावशाली और अपेक्षाकृत कम आलोचित होने वाला हथियार बनाया जा सकता है। एनडीटीवी के इस स्टिंग आपरेशन की यही ख़ासियत है कि इसमें कोई व्यक्तिगत आग्रह दुराग्रह में नहीं फंसा गया है। ऐसे मामलों में अक्सर जद में आया व्यक्ति दलील देने लगता है कि टेप बनावटी है इसकी जांच करायी जाए। इसमें तस्वीर आवाज़ मेरी नहीं मुझे फंसाया जा रहा है। लेकिन यहां आरके आनंद भी मान रहे हैं कि वे कैमरे में कैद हैं और आयू खान भी अपनी कही बात से इंकार नहीं कर रहे। पर वे इसका विश्लषण इस तरह से कर रहे हैं कि अपनी साख बचायी जा सके। अब अदालत इस पूरे मामले की अपनी तरह से पड़ताल कर नतीज़े पर पहुंचेगी और तब तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।महत्वपूर्ण बात है कि एनडीटीवी की इस ख़बर पर दूसरे चैनलों ने भी आवाज़ उठायी है।
आईबीएन सेवेन ने ख़ास तौर पर। नहीं तो देखने में ये आता है कि एक चैनल की ख़बर मान कर दूसरे चुप्पी साध लेते हैं। पर ख़बर तो ख़बर होती है इसकी या उसकी नहीं होती। देश के हित में होती है। शुरुआत कोई कर सकता है पर सबके साथ आ जाने में बुराई नहीं है। आते भी हैं। आजतक पर जब सवाल के बदले सांसदों को पैसे मांगते दिखाया गया था तब भी इसी तरह की एका दिखी थी चैनलों में। वो ख़बर सबने पकड़ी। अभियान-सा बन गया। दस सांसद निकाल दिए गए। स्टार न्यूज़ के मुंबई दफ्तर पर हमला हुआ तो सबों ने एक तरह से उस चैनल को आपने पर पैच कर दिया। सरकार को कड़े कदम उठाने पड़े। यही मीडिया की ताक़त है और ये तब और बढ़ जाती है जब सब मिल कर आवाज़ बुलंद करते हैं।फिलहाल
व्यापक प्रभाव पैदा कर सकने की कूवत रखने वाली ख़बरों को मिलाजुला अभियान बनाने की तरफ कुछ क़दम बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। मौजूदा हालात में ये एक महज संयोग भी हो सकता है या कुछ कैलकुलेटिव मूव भी... पर व्यवस्था दलालों के खिलाफ अभियान को संस्थागत रुप देने की ज़रुरत है। आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी चलती रहे तो इसे परस्पर विरोधाभासी नहीं कहा जा सकता।
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