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Thursday, March 25, 2010
Friday, November 7, 2008
अमेरिका का नेशनल फ्लैग मेड इन चाईना...!
ऐसा शायद हम तिरंगे के साथ नहीं कर सकते। ये तिरंगे का अपमान माना जाएगा। ये अमेरिका में ही संभव है। इन तस्वीरों को ग़ौर से देखिए। ये अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज है। लेकिन बना कहां है? मेड इन चाईना! जी हां। ये तस्वीर 5 नवबंर की हैं। नई दिल्ली स्थित अमेरिकन इंफोर्मेशन सेंटर की जहां ओबामा की जीत का जश्न मनाया जा रहा था। पॉलीथीन के बने सैकड़ों झंडे लगाए गए थे। सब पर मेड इन चाईना का ऐसा ही मार्का लगा था। अपना राष्ट्रीय ध्वज चीन में बनवाने के पीछे की वजह साफ है। मानव श्रम की उपलब्धता से लेकर प्रदूषण निरोधी नीति तक... कई कारणों से अमेरिका जैसे विकसित देश को नहीं लगता कि ऐसे छोटे-छोटे कामों में अपना वक्त और ताक़त ख़र्च करें। सस्ता माल चीन से उठा लेते हैं। चाहे राष्ट्रीय ध्वज ही क्यों न हो!
Wednesday, November 5, 2008
टीवी रिपोर्टरों की खींचतान में गए ओबामा!
ये दो तस्वीरें हैं अमेरिकन इंफॉरमेशन सेंटर नई दिल्ली की जहां आज चुनाव नतीजों के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे। ओबामा की जीत के बाद कई चैनलों के रिपोर्टर ओबामा की इस आदमकद कटआउट के साथ पीटीसी करने के चक्कर में आपसी खींचतान में लग गए। नतीजा... अमेरिकी दूतावास की एक महिला अधिकारी ओबामा को उठा ले गई। हां... इसके पहले दिल्ली के एक नामी महिला कॉलेज की लड़कियों ने ओबामा के इस बुत के साथ ख़ूब तस्वीरें खिंचवाईं।

Wednesday, October 24, 2007
Thursday, September 13, 2007
क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये!
इंसानी रिश्तों की संभावनाएं अनंत हैं और उनमें छिपी आशंकाएं भी। ये कई तरह से और कई रुपों में हमारे आसपास मौजूद रहती हैं। कई बार जानकारी में तो कई बार अनजाने में ही सही। कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो उसे जीने वालों को तो खुशी देते हैं लेकिन उनसे जुड़े दूसरों को तकलीफ। बनते, बिगड़ते, टूटते और फिर बनते रिश्तों के बीच ज़िंदगी जारी रहती है। 
इन दो तस्वीरों को मेरे एक दोस्त ने ईमेल के ज़रिए भेजा है। इस प्रतीकात्मक तस्वीरों को आप भी देखिए और बताईये कि इसमें ज़्यादा तकलीफ़देह कौन-सी होगी! या ये भी... कि दोनों ही तस्वीरें स्वाभाविक हैं...तकलीफदेह नहीं!

इन दो तस्वीरों को मेरे एक दोस्त ने ईमेल के ज़रिए भेजा है। इस प्रतीकात्मक तस्वीरों को आप भी देखिए और बताईये कि इसमें ज़्यादा तकलीफ़देह कौन-सी होगी! या ये भी... कि दोनों ही तस्वीरें स्वाभाविक हैं...तकलीफदेह नहीं!
Wednesday, September 12, 2007
एक तस्वीर... और सब कुछ साफ साफ!
जितना 'इनडीसीप्लीन वे' में सोचोगे... उतनी ही क्रिएटीविटी आएगी। विज्ञापन के विशेषज्ञ अक्सर ऐसा सिद्धांत बताते हैं। उनका मतलब होता है लीक से हट कर... एक रास्ते पर सरपट भागते हुए नहीं... दिमाग के बंद कोनों का इस्तेमाल कर... लेकिन बेतरतीबी से नहीं...तरतीब से...एक संदेश के साथ! बेहतरीन माने जाने वाले इन विज्ञापनों को शायद इसी तरह बनाया गया है!
Tuesday, September 11, 2007
विज्ञापन की दुनिया के कुछ बेहतरीन नमूने!
Sunday, August 19, 2007
हाथों का इस्तेमाल कुछ ऐसा भी!
हाथ कई काम आते हैं। अच्छे काम में... कम अच्छे काम में और बुरे काम में भी। किसी को कुछ देने या किसी से कुछ छीनने के काम... हाथ जोड़ने या फिर तोड़ने के काम। हाथ लगाने या खींचने में। सहारा देने या छुड़ाने में। कई बार हमें किसी काम में दूसरों का हाथ नज़र आता है। जैसे भारत में होने वाली हर आतंकी घटना में आईएसआई का हाथ। कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं फिर दाऊद है जो हमारे हाथ ही नहीं आता। कांग्रेस कहती है कि उसका हाथ ग़रीबों के साथ। परमाणु डील पर अमेरिका से हाथ मिलाने पर लेफ्ट सरकार से हाथ खींचने की बात कर रही है। कोई किसी के हाथ में आकर खिलौना हो जाता है। कहते हैं कि हर सफल मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है। हाथ हिला पास बुलाया जाता है और दूर रहने का इशारा भी। सहलाया भी जाता है और पीटा भी। सिर पर हाथ रख आगे बढाया जाता है और हटा कर गिराया भी। हाथों के इन परंपरागत इस्तेमाल से अलग कुछ अलग हाथ देखिए।Sunday, August 5, 2007
बिहार में बाढ़ और मॅारीशस में मुख्यमंत्री


जब बिहार में बाढ़ का पानी तबाही मचा था, मुख्यमंत्री नीतिश कुमार डाक्टरेट की उपाधि लेने मॅारीशस की यात्रा पर निकल पड़े। 30 अधिकारियों की फौज भी उनके साथ गई। मॅारीशस में उन्होने 'बिहार वीक' का उद्घाटन किया। लेकिन क्या वे अपने साथ बिहार की इन तस्वीरों को ले गए...?... उनको इन तस्वीरों को दुनिया भर में दिखाना चाहिए कि ये बिहार की असली तस्वीर है। लेकिन शायद वो अपने मुख्यमंत्री निवास के आसपास की कुछ चमचमाती तस्वीर दिखा कर दुनिया भर के निवेशकों को लुभाने की कोशिश करते हों। आपत्ति उनके मॅारीशस यात्रा पर नहीं... यात्रा कि टाईमिंग पर है। और लौट कर आने के बाद भी उनकी आंखें नहीं खुली हैं। वे बस अपने 'भरोसेमंद' ज़िला कलेक्टरों की बात सुन कर ये तय कर रहे हैं कि कौन से ज़िले बाढ़ग्रस्त हैं कौन से नहीं।
जागिए नीतिश जी, इन तस्वीरों को देखिए... एक बार ठीक से देख लेंगे तो शायद नींद नहीं आएगी...आंखे खुल जाएंगी!
जागिए नीतिश जी, इन तस्वीरों को देखिए... एक बार ठीक से देख लेंगे तो शायद नींद नहीं आएगी...आंखे खुल जाएंगी!Sunday, July 22, 2007
जिस भैंस को राखे साईयां... मार सके न शेर!
youtube पर जारी ये दृश्य कई मायनों में अद्वितीय हैं, आप भी देखें।
COURTESY:YOUTUBE
COURTESY:YOUTUBE
बिहार का सफ़र और मेरी पत्नी की नज़र

कैमरे के सामने रहने वाली तरु ने कैमरे के पीछे अपनी क़ाबिलियत दिखाने की कोशिश की है। उन्होने अपनी पहली बिहार यात्रा को अपने मोबाईल कैमरे में कुछ इस तरह उतारा है। पटना से मधुबनी तक के इस सफ़र में मैं गाड़ी चलाता रहा और मेरी पत्नी अपना मोबाईल कैमरा।
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ये सभी तस्वीरें मोबाईल फोन कैमरे से ली गई हैं। उम्मीद है कि जिन्होने गोवा देखा है उनकी यादें ताज़ा हो गई होगीं और जिन्होने नहीं देखा है उनकी ललक और बढ़ गई होगी। 





















टेम्पो की छत पर टीवी के साथ सवारी। 





