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Thursday, August 27, 2009

पाक मंदिर पर रिपोर्ट : पीछे की कहानी

पाकिस्तान से रिपोर्टिंग अपने आप में चुनौती का काम है। भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा जो एक शक का माहौल रहता है उसके मद्देनज़र दोनों देशों के पत्रकारों की चुनौती और बढ़ जाती है। पाकिस्तान जा कर ज़मीन से रिपोर्टिंग करने के मुझे अब तक तीन मौक़े मिले हैं। ये तीनों ही मौक़े पाकिस्तान की इतिहास के अहम पड़ाव रहे हैं... इमरजेंसी, बेनज़ीर की हत्या और आम चुनाव।
पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों की हालत पर मेरी इस रिपोर्ट की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इसे मैंने तमाम मुश्किलातों के बीच तैयार की है।

1- स्थानीय वीज़ा के बिना

2- ख़ुद कैमरा चलाते हुए

3- कठिन पहाड़ी रास्ता और

4- पाकिस्तान में इमरजेंसी के हालात

पाकिस्तान जाने वाले भारतीय नागरिकों को वहां के हर ज़िले के लिहाज़ से वीज़ा लेना होता है। मतलब अगर वीज़ा लाहौर का है तो आप सिर्फ लाहौर जाएगे... आस पास के भी किसी और इलाक़े में नहीं। मेरे पास सिर्फ लाहौर का वीज़ा था जबकि कटासराज, नंदना का किला, मकलोड का विष्णु मंदिर झेलम और चकवाल ज़िले में आते हैं। ये सभी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सुदूरवर्ती इलाक़े हैं। यहां तक मेरा पहुंच पाना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि में साउध एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफ्मा) के पत्रकारों के एक डेलिगेशन में शामिल था।

इस पूरी रिपोर्टिंग के दौरान कैमरे से पूरी शूटिंग मैने ख़ुद की। पीस-टू-कैमरा कई बार कैमरे को दीवार या फिर किसी पत्थर पर रख कर करना पड़ा। जो कुछ भी रास्ते में मिलता मैं उसे कैमरे में उतारता गया। सबसे ज़्यादा मुश्किल पेश आयी नंदना फोर्ट के रास्ते में। 5 घंटे की ट्रेकिंग। कोई पगडंडी भी नहीं... जिधर चल पड़ो उधर से ही रास्ता निकालने जैसी हालत। कंटीली झाड़ियां , पहाड़ पर कभी खड़ी चढाई तो कभी सीधी ढ़लान, रास्ता भटक जाना, पीने के पानी का ख़त्म हो जाना और दल के कई साथियों का बीमार पड़ जाना। ये सभी बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं।

3 नवबंर को, इस शूट के बीच में ही पाकिस्तान में जेनरल मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगा दी। इससे सुरक्षा के हालात और ख़राब हो गए। भारतीय नागरिक होने की वजह से मेरे पाकिस्तानी साथी मुझे लेकर काफ़ी चिंतित हो गए... लेकिन सबों ने मेरे काम में पूरा सहयोग दिया और मेरा हौसला बनाए रखा।

इन हालातों के बीच तैयार इस रिपोर्ट में मैंने कटासराज, मकलोड और नंदना मंदिर के भूत और वर्तमान के बारे में बताने की कोशिश की है। स्थानीय गाइड सलमान राशिद साहब के अलावा दल में शामिल पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, नेपाल जैसे देशों से आए पत्रकार साथियों के ऑन-द-स्पॉट कमेंट्स हैं।

एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान में सिर्फ टेरेरिज़्म की बात होती है... मैंने टूरिज़्म की बात कर ये जताने की कोशिश की है कि अगर इस मुल्क के अंदरुनी हालात पर क़ाबू पा लिया गया तो ये न सिर्फ एक बेहतरीन टूरिस्ट डेस्टीनेशन बन सकता है... बल्कि बड़ी तादाद में हिंदू तीर्थ यात्रियों को भी अपनी ओर खींच सकता है।

मेरी इस रिपोर्ट को एनडीटीवी इंडिया पर पहली बार 29 जून 2008 को रात साढ़े नौ बजे प्रसारित किया गया।

Sunday, March 8, 2009

मुशर्रफ़ से मुलाक़ात

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ भारत में हैं। व्यक्तिगत दौरे पर। मेरा उनसे आज एक बार फिर आमना सामना हुआ। संक्षिप्त बात हुई। मैंने उनसे कहा कि जब आपने पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाई तब मैं वहीं था... आपके इस क़दम से पाकिस्तान का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत गुस्से में था। अब आप अलग रोल में हैं। पर पाकिस्तान में कोई बदलाव नज़र नहीं आ रहा।
मुशर्रफ़ ने मेरी पंक्तियों का क्या मतलब निकाला मुझे नहीं पता... पर एक पूरी नज़र देखा। मैंने अपना कार्ड आगे बढा दिया। ये कहते हुए कि मौक़ा मिला तो फिर आना चाहूंगा। उन्होने कहा... "स्योर"।

मुशर्रफ़ उस कॉनट्रैक्ट से बंधे थे जिसमें उन्हें किसी से भी कुछ बात करने की मनाही थी। एक मीडिया ग्रुप के अलावा। सो वे अपनी तरफ से कम से कम बोले। अब राष्ट्रपति नहीं हैं... पर कमांडो जैसी अनुशासन का पालन अब भी कर रहे हैं। नहीं तो बताते कि आख़िर जिस वजह से उनके ख़िलाफ पाकिस्तान में मुहिम चलायी गई वो वजहें अब भी क़ायम हैं। ज़रदारी बतौर राष्ट्रपति उन्हीं अधिकारों को छोड़ने को तैयार नहीं जिन्होने जेनरल मुशर्रफ को मुशर्रफ़ के तौर पर ब्रांड कर दिया। पर फिलहाल वे ख़ामोशी में ही बेहतरी समझ रहे हैं। शायद किसी बेहतर कल के इंतज़ार में।

आगे भी और बात होगी।

Tuesday, August 26, 2008

जम्हूरियत की मज़बूती या सिर्फ सत्ता की लड़ाई?

परवेज़ मुशर्रफ़ को गए अभी हफ़्ता भी नहीं बीता कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी आपस में भिड़ गए। चुनावी राजनीति में दोनों की पार्टियां पहले भी भिड़तीं रही हैं लेकिन जिस मक़सद से वे एक हुईं थी वो अभी आधा अधूरा ही हासिल हुआ है। ऐसे में ये वक्त उनके लिए कुछ क़दम और साथ चलने का था। नौ साल की सैनिक तानाशाही के बाद पाकिस्तान अभी अभी उसे मुक्त हुआ है। लोकतंत्र की नई कोंपल यहां फूटी है और ये वक्त उसके पलने-बढ़ने और मज़बूत होने का है। लोकतंत्र की हिमायती ताक़तों ने अपना बहुत कुछ खोकर इस कोंपल को पूरे पेड़ में तब्दील होने का सपना पाल रखा है। लेकिन अवाम की ज़रुरत और उसके सपनों से दूर राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरियां होती हैं। यही मजबूरी नवाज़ के पीएमएल एन और ज़रदारी की पीपीपी की भी है। दोनों एक दूसरे की धुरविरोधी पार्टियां रहीं हैं और एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ कर सत्ता तक पहुंचती रही हैं। मुशर्रफ़ नाम की मजबूरी ने दोनों को एक किया। अकेले पार पाने में नाकाम रही इन पार्टियों ने चुनाव के बाद मिल कर सरकार बनायी। लेकिन गठबंधन सरकार बनाने के बाद भी दोनों ने अपने अपने एजेंडे पर चलने की कोशिश जारी रखा। नवाज़ को मुशर्रफ़ से अपना बदला लेना था तो ज़रदारी को पाकिस्तान की राजनीति में ख़ुद को सेट करना। अपने जनाधार के बूते नवाज़ शरीफ मुशर्रफ़ को एक पल भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे तो एनआरओ (नेशनल रिकांसिलिएशन आर्डर) के ज़रिए वापस लौटे और भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हुए ज़रदारी मुशर्रफ़ के ख़िलाफ एक हद से बाहर जाने को तैयार नहीं थे। मुशर्रफ़ को बेनज़ीर की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराने वाले ज़रदारी अमेरिकी दबाव में ही सही... मुशर्रफ़ को साथ लेकर चलने में ही अपनी भलाई समझने लगे थे। लेकिन उन्होने जब देखा कि आम अवाम, वक्कला (वकीलों) और अदलिया (अदालत और जजों) और सिविल सोसाइटी में हवा उनके खिलाफ बनने लगी है तो वो महाभियोग को राज़ी हुए।

ख़ैर। दबाव की रणनीति के ज़रिए और अमेरिका और सेना के मुशर्रफ़ के पीछे से हाथ खींच लेने की वजह से महाभियोग के पहले ही इस सैनिक तानाशाह से पार पा लिया गया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान की राजनीति में एक खालीपन पैदा हो गया। सैनिक तानाशाह के चले जाने के बाद लोकतांत्रिक ताक़तों के एकजुट रहने की किसी वजह के बचा नहीं रहने का खालीपन। अब किससे लड़ें और किसके ख़िलाफ एक रहें। साझा दुश्मन से निज़ात और साझा मंज़िल पा लेने के बाद ही वर्चस्व की आपसी लड़ाई शुरु होती है। आने वाले समय में पाकिस्तान का मुस्तकबिल कौन तय करेगा। कौन उनकी ज़रुरतों को ज़्यादा अच्छी तरह समझता है और कौन उन्हें बेहतर शासन दे सकता है। अपेक्षाकृत उदारवादी और अमेरिका जैसे देशों की तरफ झुकाव रखने वाली पीपीपी के मुखिया आसिफ़ अली ज़रदारी या फिर दक्षिणपंथी राजनीति करने वाले मियां नवाज़ शरीफ़। चुनाव दोनों में से एक का ही होना है। और वो उसका होगा जो पाकिस्तानी अवाम के ज़्यादा क़रीब होने का संदेश देगा। जो उनकी माली हालत बेशक ना ठीक कर सके... सस्ता आटा चावल दाल बेशक मुहैय्या न करा सके... लेकिन उसके उठाए मुद्दे में साथ खड़े होने का भ्रम दे सके।


राजनीति के पुराने खिलाड़ी नवाज़ शरीफ़ को ये बेहतर पता है कि मौजूदा समय में सरकार में रहने से इसकी नाक़ाबिलियत का ठीकरा उनके सिर भी फूटता। मुद्रा स्फीति और बढ़ती महंगाई से पार पाना कोई आसान काम नहीं और ना ही कबाईली इलाक़ो में सर उठ चुके आतंकवादियों पर काबू पाना। तो डूब रहे जहाज़ पर खड़े हो कर डूबने से बेहतर है किनारे बैठ कर बचाओ-बचाओ चिल्लाना। मतलब अगर नवाज़ सरकार में रहते हुए सरकार को अपने एजेंडे पर चलते हुए न दिखा सकें तो विपक्ष में बैठ कर ख़ुद को सरकार से लड़ते हुए तो दिखा ही सकते हैं। इससे वो अवाम में पीपीपी को एक्सोपोज़ भी कर पाएंगे कि देखो जिन वायदों के साथ वो सत्ता में पहुंची उसे वो भूल चुकी है लिहाज़ा अब बारी उनकी है।




मामला चीफ जस्टिस इफ्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की बर्खास्तगी और इसके ख़िलाफ वकीलों के आन्दोलन से शुरु हुआ था जो इमरजेंसी के समय और जजों की बर्खास्तगी और वकीलों पर पाबंदी तक गया। इस आंदोलन ने मुशर्रफ़ के खिलाफ अवाम के गुस्से को एक नया आकार और विस्तार दिया। दोनों ही दलों ने इसका फ़ायदा फरवरी के चुनाव में उठाया। पीपीपी सबसे बड़ी तो पीएमएल एन दूसरी बड़ी पार्टी बन कर उभरी। लेकिन पीपीपी ने इन जजों की बहाली में जितनी देरी की, नवाज़ के लिए राजनीतिक ज़मीन उतनी ही तैयार होती गई। वो वक्कला-अदलिया और प्रेस और सिविल सोसाईटी के जो लोग पहले पीपीपी के साथ थे वो सभी नवाज़ के साथ आते चले गए। इससे ज़रदारी के भीतर राजनीतिक असुरक्षा का भाव और घर करता चला गया। वो जजों तो बहाल कर देते तो इसका सेहरा नवाज़ के सर तो बंधता ही, मुशर्रफ़ के फैसलों को गैरकानूनी ठहराने की स्थिति में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामले खुलने का भी अंदेशा बढ़ता। इसलिए उन्होने राष्ट्रपति बनने के बाद ही जजों की बहाली की शर्त रख दी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों पीपीपी का होने से नवाज़ की राजनीतिक पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है। इसलिए नवाज़ उन्होने राष्ट्रपति पद के लिए ज़रदारी के खिलाफ सईद उल जमा सिद्दीकी को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बना दिया है।



दोनों दलों के इस तरह से अलग होने को पाकिस्तान ही नई नवेली जम्हूरियत के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा। इससे लोकतंत्र विरोधी उन ताक़तों को मज़बूती मिलने की आशंका बढ़ गई है जो मौक़े की तलाश में रहती हैं। हालांकि पाकिस्तान की सेना ने राजनीति से ख़ुद को दूर रखने का फैसला किया है और अमेरिका भी पाकिस्तान में लोकतंत्र के अपने प्रयोग को इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहेगा। फिर भी सरकार अगर कमज़ोर और अल्पमत की हो तो आशंकाएं बढ़ जाती हैं।



इस सब बातों के बीच नवाज़ और ज़रदारी के अलग होने का एक सकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है। मुशर्रफ़ के बाद उनकी समर्थक पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है और उसके ज़्यादातर सदस्य अपने पुराने नेता नवाज़ शरीफ के साथ ही अपना भविष्य देख रहे हैं। ज़ाहिर है कि संसद में कोई मज़बूत विपक्ष बचा नहीं रहा जो कि मज़बूत लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। ऐसे में पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी और अलग अलग विचारधारा वाली पार्टी को देर सबेर एक दूसरे के खिलाफ़ आना ही था। सो वे आ आ गए हैं। ये अलग बात है कि समय से पहले आ गए हैं। लेकिन नवाज़ शरीफ जानते हैं कि अभी पाकिस्तान में दुबारा चुनाव का सही वक्त नहीं आया है। इसलिए वो विपक्ष में बैठने की बात करके भी पीपीपी की सरकार को गिराने की बात फिलहाल नहीं कर रहे। हालांकि उनसे बतौर विपक्षी पार्टी रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा करना बेमानी होगी, लेकिन वो चाहेंगे कि सरकार तब तक चलती रहे जब तक वो उसे अवाम में लताड़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते रहें। अभी उनकी पार्टी का जनाधार सिर्फ पंजाब में है। लेकिन जिस दिन पीपीपी की तरह पीएमएल एन का भी जनाधार बाक़ी के तीनों राज्यों में भी होता दिखेगा, वो चुनाव में जाने में तनिक भी देर नहीं करेंगे। और ऐसा करते हुए वो सिर्फ सत्ता के लिए लड़ते नहीं बल्कि जम्हूरियत को मज़बूत करते भी दिखेंगें।

Monday, August 25, 2008

भिड़ गए नवाज़ और ज़रदारी

परवेज़ मुशर्रफ़ को गए अभी हफ़्ता भी नहीं हुआ है कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी आपस में भिड़ गए। चुनावी राजनीति में दोनों की पार्टियां भिड़तीं पहले भी रही हैं लेकिन जिस मक़सद से वे एक हुईं थी वो अभी आधा अधूरा ही हासिल हुआ है। ऐसे में ये वक्त उनके लिए कुछ क़दम और साथ चलने का था। नौ साल की सैनिक तानाशाही के बाद पाकिस्तान अभी अभी उसे मुक्त हुआ है। लोकतंत्र की नई कोंपल यहां फूटी है और ये वक्त उसके पलने-बढ़ने और मज़बूत होने का है। लोकतंत्र की हिमायती ताक़तों ने अपना बहुत कुछ खोकर इस कोंपल को पूरे पेड़ में तब्दील होने का सपना पाल रखा है।

...जारी

Thursday, August 21, 2008

अब दिखेगी नवाज़ और ज़रदारी की टक्कर

परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफे के बाद पाकिस्तान में सियासत ने एक नई करवट ली है। मुशर्रफ़ के जाने को यहां जम्हूरियत की मज़बूती की तरफ एक और बढ़ा क़दम माना जा रहा है। ये बात सही है कि मुशर्रफ़ ने लोकतंत्र को जड़ से उखाड़ने की कोशिश में सैन्य तख़्ता पलट से लेकर ईमरजेंसी लगाने तक कई काम किए। चीफ जस्टिस इफ़्तिखार चौधरी जैसे जजों को बर्ख़ास्त किया और अदालतों की आज़ादी को घेरे रखा। पाकिस्तान इलेक्ट्रानिक मीडिया रेगुलेशन एक्ट (पैमरा) और प्रेस एंड पब्लिसिटी रेगुलेशन आर्डिनेंस के ज़रिए मीडिया को भी बांधे रखा। लेकिन मुशर्रफ़ के जाने के साथ ये सारे सवाल बेशक पीछे छूट गए हैं। लेकिन पाकिस्तान की जम्हूरियत की मज़बूती के लिए कुछ और सवाल बचे हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल है कि नए हालात में मियां नवाज़ शरीफ और आसिफ़ अली ज़रदारी कब तक साथ खड़े रह पाएंगे? ये सवाल अचानक उठ नहीं खड़ा है। ये तब भी था जब ये साथ खड़े हुए थे। लेकिन मुशर्रफ़ से लड़ाई की शोर में ये दबा हुआ था। दोनों साथ आए ही थे मुशर्रफ़ को हटाने के लिए। तो जब इनके साझा दुश्मन मुशर्रफ़ सियासी परिदृष्य से हट गए हैं तो ज़ाहिर सी बात है इनके बीच एकता का साझा बहाना भी ख़त्म हो गया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़, पाकिस्तान की ये दो मुख्य पार्टियां पहले एक दूसरे के खिलाफ लड़ती और संसद तक पहुंचती रही हैं। परवेज़ मुशर्रफ ने इन दोनों राजनीतिक पार्टियों के सुप्रीम नेताओं से जम कर दुश्मनी की। नतीज़ा दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है की तर्ज़ पर इन दोनों पार्टियों के नेता साथ आने को मज़बूर हुए। यूं तो 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान' की इन दोनों पार्टियों की विचारधारा में कोई मौलिक विभेद मुश्किल है। लेकिन ये तो साफ़ है कि नवाज़ शरीफ राइटविंग पॉलिटिक्स यानि दश्रिणपंथी राजनीतिक में भरोसा करते हैं और अपेक्षाकृत कट्टरवादी चेहरा माने जाते हैं। वे पाकिस्तान में अमेरिकी दख़ल की मुख़ालफत करते रहते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्व में अपेक्षाकृत उदारवादी नीति वाली पार्टी का रहा है। इसका झुकाव हमेशा पश्चिमी देशों, ख़ासतौर से अमेरिका की तरफ रहा है। बेनज़ीर के पार्टी की कमान संभालने वाले आसिफ़ अली ज़रदारी की यूं तो अभी कोई ठोस राजनीतिक छवि नहीं बन पायी है। वे बस बेनज़ीर की विरासत को आगे ले जाने की कोशिश में जुटे हैं और पार्टी को पुरानी नीति से अलग नहीं ले जा सकते। इसके लिए उनकी अपनी मज़बूरियां भी हैं।


यानि राजनीतिक पार्टी के तौर पर पीपीपी और पीएमएल क्यू की विचारधारा में जो अंतर है वो ख़त्म नहीं हो सकता। होना नहीं चाहिए। लेकिन अगर दोनों मुख्य पार्टियां एक साथ सत्ता में बैठी रहेंगी तो मज़बूत विपक्ष की भूमिका कौन निभाएगा? मुशर्रफ़ की वजह से वजूद में आयी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) मुशर्रफ़ के जाने के साथ ही ख़त्म नहीं तो बहुत कमज़ोर तो पड़ ही गई है। उसके सांसदों के जल्द ही टूट कर अपने पुराने नेता नवाज़ शरीफ के साथ आ जाने की उम्मीद जतायी जा रही है। तो जब कोई मज़बूत विपक्ष नहीं होगा तो मज़बूत जम्हूरियत की बात बेमानी होगी। अगर पीपीपी-पीएमएल (एन) गठबंधन पर नज़र डालें तो इन दोस्ती के दिनों में भी दोनों के बीच सोच और एप्रोट का अंतर साफ दिखाई देता रहा है। इस्लामाबाद से सटे हिल स्टेशन मरी में जारी घोषणापत्र एक तरह से इन दोनों पार्टियों के बीच का या न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) था। हालांकि इसमें सारा ज़ोर मुशर्रफ़ को हटाने और बरख़ास्त जजों की बहाली पर था जो सरकार को समर्थन देने की नवाज़ शरीफ़ की शर्त और नतीज़ा था। फरवरी में चुनाव नतीजे आने के बाद भी सरकार बनने में तक़रीबन एक महीना लग गया तो वो इसलिए कि ज़रदारी नवाज़ की शर्तों को मानने को तैयार नहीं हो पा रहे थे। लेकिन नवाज़ शरीफ की लगातार ज़िद, सरकार से अपने मंत्रियों के इस्तीफे जैसे क़दम और चुनावी वादा न निभाने के चलते जनता में पीपीपी की लगातार होती फज़ीहत से पैदा हुए दबाव का ही नतीज़ा रहा कि आख़िरकार ज़रदारी को मुशर्रफ़ के खिलाफ महाभियोग लाने का ऐलान करना पड़ा। चौतरफा दबाव की वजह से मुशर्रफ तो निकल लिए लेकिन अब गठबंधन सरकार के सामने पेंच जजों की बहाली को लेकर फंसा हुआ है। नवाज़ ने कई बार समय सीमा तय की है लेकिन बहाली को लेकर फैसला लेने में देरी हो रही है। ज़रदारी को डर है कि अगर बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया गया तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मुकद्दमें फिर से खुल सकते हैं। नवाज़ शरीफ बेशक उन्हें अपनी तरफ से ऐसा नहीं होने का भरोसा दे रहे हों लेकिन ज़रदारी का डर बेवजह नहीं है।


बेशक नवाज़ ने मुशर्रफ के पीछे हाथ धोकर नहीं पड़ने की बात फिलहाल मान ली हो। लेकिन मुशर्रफ़ का दिया जो दर्द नवाज़ ने झेला और अदालत और वकीलों ने जो परेशानी उठायी है उसको देखते हुए ये अचरज़ की बात नहीं कि मुशर्रफ़ के खिलाफ़ देर सबेर कानूनी कार्रवाई शुरु की जाए। पुरानी अदालत बहाल होने की स्थिति में इसमें तेज़ी आ सकती है। मुशर्रफ के जाने के पुराने फैसले असंवैधानिक करार दिए जा सकते हैं। ऐसे में मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच हुआ नेशनल रिकांसिलिएशन एलायंस की जद में आ सकता है। मुशर्रफ के जिस नेशनल रिकांसिलेएशन आर्डर के ज़रिए ज़रदारी पर से भ्रष्टाचार के मामले हटाए गए उसे रद्द किया जा सकता है। ऐसे में ज़रदारी फिर से राजनीतिक तौर पर हाशिए पर धकेले जा सकते हैं। मुशर्रफ क हटाने में हुई देरी के चलते वकीलों ने ज़रदारी के खिलाफ जो मोर्चा खोल दिया उससे भी ज़रदारी सहमे हुए हैं। एतेज़ाज़ एहसन जैसे वकील नेता का उभरना भी ज़रदारी को भारी पड़ सकता है। दूसरी तरफ, नए हालात में ज़रदारी को कमज़ोर करने वाली जितनी भी बातें होगीं वो सब नवाज़ शरीफ को सत्ता के क़रीब ले जाने वाली साबित हो सकती हैं। मुशर्रफ़ के हाथों बहाल हुए मौजूदा जजों ने नवाज़ शरीफ के चुनाव लड़ने की पात्रता पर रोक लगा रखी है। पुराने जज आएंगे तो नवाज़ से ये पाबंदी हटनी तय है। नवाज़ का चुन कर संसद में आने का मतलब है ज़रदारी की तरकश से उस तीर का निकल जाना जिसके बूते वो बाद की राजनीति में नवाज़ को दबा कर रखने की कोशिश कर सकते हैं। राजनीतिक में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता ये तो धुर विरोधी रही पार्टियां पीपीपी और पीएमएल (एन) का मिल कर बनाने के फैसले से ही साफ हो गया। लेकिन इसी राजनीति में कोई स्थायी दोस्त भी नहीं होता ये ज़ाहिर होना बाक़ी है। इन दोनों पार्टियों के लिए ये स्वभाविक भी है क्योंकि ये पहले से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे हैं। आगे भी लड़ेगें। बात सिर्फ समय की है।


नवाज़ शरीफ अभी तुरंत चुनाव नहीं चाहेंगे क्योंकि इससे उनपर अपने स्वार्थ के लिए सरकार गिराने का आरोप लग सकता है और पाकिस्तान की सियासत में अभी जो कुछ भी ठीक होता नज़र आ रहा है वो फिर से ग़लत रास्ता पकड़ सकता है। नवाज़ को ये भी पता है कि फरवरी के चुनाव में उनकी पार्टी ने सिर्फ पंजाब प्रांत में उम्दा प्रदर्शन किया जबकि पीपीपी की पकड़ बाक़ी के तीन राज्यों सिंध, बलचिस्तान और एनडब्ल्यूएफपी में भी है। इसलिए जब तक नवाज़ पूरे पाकिस्तान में अपने लिए आधार नहीं बना लेते तब तक वो चुनाव नहीं चाहेंगे। लेकिन आवाम के सामने वो ज़रदारी को कमतर साबित करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगे। बर्ख़ास्त जजों की बहाली की ज़िद के ज़रिए वो सिविल सोसायटी और वकीलों के चहेते तो बन ही गए हैं... आने वाले दिनों में गठबंधन सरकार के होने वाले फैसलों में भी अपनी चला कर वो वोटबैंक पुख़्ता करने की कोशिश में जुटे रहेंगे। यानि दोस्ती के दिनों में दुश्मनी के हथियार जुटाते और संभालते रहेंगे।

Monday, August 18, 2008

आख़िर गए मुशर्रफ़

मुशर्रफ को आख़िरकार इस्तीफ़ा देना पड़ा। मुख्य तौर पर तीन वजहें रहीं। नवाज़ शरीफ और ज़रदारी के नेतृत्व में राजनीतिक दलों की घेराबंदी, पाकिस्तानी सेना का चुप रहना और अमेरिका का मुशर्रफ़ से पीछे से हाथ खींच लेना। पाकिस्तान में जम्हूरियत की मज़बूती के लिए मुशर्रफ को हटाया जाना ज़रुरी माना जा रहा था। अब मुशर्रफ नहीं हैं लेकिन जम्हूरियत की चुनौतियां अब भी बरकरार है।

किसी जम्हूरियत की मज़बूती के लिए एक मज़बूत विपक्ष का होना ज़रुरी है। मुशर्रफ की विदाई के बाद उनकी बनाई पार्टी पीएमएल क्यू कमज़ोर पड़ चुकी है। ऐसे में मज़बूत विपक्ष की भूमिका में कोई बड़ी पार्टी नहीं बची है। दो धुरविरोधी पार्टियां पीपीपी और पीएमएल एन सत्ता में साझीदार हैं। अब जब उनका साझा दुश्मन नहीं रहा तो ऐसे में देखना होगा कि अलग अलग नीतियां लेकर चलने वाली ये दोनों पार्टिया कब तक साथ चलती हैं। इनके बीच हितों का टकराव तो होना ही है। लेकिन अभी मुल्क जिस आर्थिक बदहाली और विधि व्यवस्था की नाकामी का शिकार है उससे पार पाए बग़ैर अगर ये आपस में लड़े तो लोकतंत्र विरोधी ताक़तों को फिर मौक़ा मिल सकता है।

आतंकवाद पर क़ाबू पाते हुए और मुल्क को तरक्की की राह पर ले जाते हुए अगर दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के ख़िलाफ चुनाव लड़ा तो ये पाकिस्तान की नई नवेली जम्हूरियत के हित में होगा। स्वार्थ की वजह से लड़े तो जैसा था वैसे की स्थिति में पहुंचने में तनिक भी देर नहीं लगेगी।

Thursday, August 7, 2008

मुशर्रफ़ पर महाभियोग!

मुशर्रफ को हटाने के लिए नवाज़ शरीफ का दबाव आख़िर काम आता नज़र आ रहा है। पीपीपी से आगे बातचीत का रास्ता बंद करने की धमकी के बाद सत्तारुढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष आसिफ अली ज़रदारी को राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के खिलाफ महाभियोग लाने का ऐलान करना पड़ा है। हालांकि अभी ये साफ नहीं है कि महाभियोग कब लाया जाएगा। हो सकता है कि नवाज़ के दबाव के चलते अभी सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर इसका ऐलान किया गया हो और इस पर वास्तविक अमल में अभी वक्त लगे।

दरअसल 18 फरवरी के चुनाव नतीज़ों में मुशर्रफ की समर्थक पार्टी पीएमएल क्यू की करारी हार हुई थी। पीपीपी की सरकार नवाज़ शरीफ की पार्टी पीएमएल एन के समर्थन के बूते ही बन सकी। उसके बाद से ही नवाज़ शरीफ लगातार लोकतंत्र विरोधी मुशर्रफ को हटाने और इमरजेंसी के पहले के जजों की बहाली के लिए ज़ोर डालते रहे हैं। लेकिन चाहे वो अमेरिकी दबाव हो या सेना से दुश्मनी का डर, ज़रदारी मुशर्रफ से सीधा दो दो हाथ करने से बचते रहे। नतीजतन पीपीपी के खिलाफ पाकिस्तानी अवाम की नाराज़गी भी काफी बढ़ती गई।


अब ऐलान किया गया है कि सरकार संसद में मुशर्रफ के खिलाफ चार्जशीट पेश करेगी। आठ साल तक पाकिस्तान पर राज करने वाले राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के लिए इसे मुश्किल दिनों की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। एक रास्ता ये है कि वो खुद ही इस्तीफ़ा दे दें। वैसे संसद को भंग करने के लिए धारा 58 2बी का इस्तेमाल अभी भी मुशर्रफ के हाथ में है। अपने शासन काल में की गई ग़लतियों के चलते हाल ही में अमेरिकी आलोचना का शिकार हो चुके मुशर्रफ मौजूदा हालात में इसके इस्तेमाल की हिम्मत शायद ही कर पाएं। सरकार के सामने सवाल ये है कि वो महाभियोग के लिए ज़रुरी दो तिहाई बहुमत कैसे जुटाती है। क्या वो महाभियोग पर अवामी नेशनल पार्टी जैसे दलों का सहयोग हासिल कर पाती है, पीएमएल क्यू को तोड़ती है या फिर नवबंर में सीनेट चुनाव तक इंतज़ार करती है।

Friday, June 27, 2008

नवाज़ के सामने की मुश्किलें

"मुशर्रफ़ के शिकस्ते-फाश के लिए ज़रुरी हुआ तो पीपीपी के साथ मिल कर भी सरकार बनाएंगे”… बेनज़ीर की हत्या के बाद लाहौर के रायविंड स्थित अपने आवास पर नवाज़ शरीफ ने मुझसे यही कहा था। मिलीजुली सरकार की बात उन्होने पहली बार की थी लेकिन गठबंधन की राजनीति का आगाज़ करने के बाद भी मियां नवाज़ शरीफ अपने मक़सद में अब तक क़ामयाब नहीं हो पाए हैं। उल्टे लाहौर हाईकोर्ट ने उप-चुनाव में खड़े होने के अयोग्य ठहरा कर उनकी राजनीतिक मुश्कलें और बढ़ा दी हैं। हालांकि पीपीपी सरकार ने अपने नाराज़ सहयोगी को राहत पहुंचाने की कोशिश के तहत चुनाव आयोग को निर्देश दे दिए कि उप-चुनाव की तारीख़ टाल दी जाए। नवाज़ शरीफ संसदीय चुनाव लड़ पाएगें या नहीं अब ये फैसला सुप्रीम कोर्ट में है जहां पीसीओ के तहत बहाल जज बैठे हैं। यानि इमरजेंसी के दौरान राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने जिन जजों की नियुक्ति की वे जज। नवाज़ शरीफ लगातार मांग करते रहे हैं कि पीसीओ के पहले के जजों की बहाली की जाए जिनमें चीफ जस्टिस इफ्तिख़ार मोहम्मद चौधरी भी शामिल है। मुशर्रफ और उनके तानाशाही फैसलों की मुखालफत करने वाले इन जजों की बहाली का एक मतलब होता है पीसीओ के तहत बहाल जजों को हटाना। और इस तरह से देखें तो सुप्रीम कोर्ट से भी नवाज़ शरीफ को चुनाव लड़ने के मामले में ज़्यादा राहत की उम्मीद नहीं होगी।

मुशर्रफ ने जब नवाज़ शरीफ का तख़्ता पलट मुल्क की बागडोर अपने हाथ में ली तो उन्होने नवाज़ शरीफ को क़ैद की बजाय निर्वासित कर दिया। इन शर्तों के साथ कि वो दस साल तक देश वापस नहीं लौटेंगे और चुनाव में हिस्सा नहीं लेगें। अमेरिका के दबाव में बेनज़ीर की वापसी के बाद सऊदी अरब ने भी मुशर्रफ पर दबाव डाला और इस तरह से नवाज़ शरीफ की वापसी तक़रीबन आठ साल बाद संभव हो पायी। लेकिन चुनाव लड़ने का मामला कानूनी दांव पेंच में फंसा हुआ है। नई सरकार मुशर्रफ को हटाने का अपना वादा अभी तक पूरा नहीं कर पायी है और इस मुद्दे पर सरकार से अपने मंत्रियों के इस्तीफे दिला कर नवाज़ शरीफ ने दूरगामी राजनीतिक चाल चली है। इससे वो उन लोगों को अपने साथ कर पाने में क़ामयाब रहे हैं जो पहले इसी मुद्दे पर पीपीपी के साथ थे। कहने के मतलब कि उनका वोट बैंक दिनों दिन मज़बूत होता जा रहा है। हालांकि नवाज़ शरीफ को लगता है कि अभी दूबारा चुनाव का सही वक्त नहीं आया है। इसलिए वो पीपीपी सरकार को बाहर से समर्थन जारी रखे हुए हैं। जिस दिन उन्होने समर्थन खींचा सरकार की बुनियाद हिल जाएगी। ऐसी सूरत में नवाज़ शरीफ अपनी पार्टी पीएमएल एन को बड़ी क़ामयाबी की ओर ले तो जा सकते हैं लेकिन संसद के भीतर खुद उसका नेतृत्व नहीं कर सकते। कहते हैं कि दुश्मनी के हथियार दोस्ती के समय ही इकठ्ठे किए जाते हैं। आज के दोस्त नवाज़ कल को अगर चुनाव मैदान में पीपीपी को ललकारते हैं... और जो कि आज न कल होगा ही... तो ऐसे में पीपीपी के पास बेहतर विकल्प यही है कि वो नवाज़ शरीफ की चुनावी उम्मीदवारी की संभावना को लटकता छोड़ कर ही रखे। मुशर्रफ के साथ उनका बने उनके ‘वर्किंग रिलेशन’ को भी यही मुफ़ीद बैठता है।

इधर एक दिलचस्प बात ये हुई है कि पहली बार अमेरिका की तरफ से ये कहा गया है कि मुशर्रफ ने अपने आठ साल के शासनकाल में ‘कई ग़लतियां’ की हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री कॉडालिज़ा राइस ने एक इंटरव्यू में ये बात कहते हुए हालांकि ये जोड़ दिया कि आतंक के खिलाफ की लड़ाई में मुशर्रफ बेहतरीन सहयोगी रहे हैं। लिहाज़ा मुशर्रफ की ग़लतियों वाले रायस के बयान से मुशर्रफ की कमज़ोर पड़ती हालत से का अंदाज़ा न भी लगाएं तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि अमेरिकी भी पाकिस्तान में करवट लेती राजनीतिक व्यवस्था को देख और महसूस कर रहा है। वो झटके से मुशर्रफ का हाथ नहीं छोड़ सकता लेकिन अमेरिका की पाकिस्तान में दिलचस्पी मुशर्रफ के अस्तित्व से कहीं आगे तक जाती है। एक तरफ लोकतंत्र का हिमायती बन वो दूसरी तरफ पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को एक तानाशाह के साथ चलते रहने के लिए लंबे समय तक दबाव नहीं डाल सकता। हो सकता है कि वो मुशर्रफ का साथ तभी तक दे जब तक वे नई सरकार से पाकिस्तान में अपनी मनमाफिक सुविधाएं और पैठ हासिल न कर ले। घरेलु राजनीति का दबाव अगर ज़रदारी को बाध्य करता है कि वो मुशर्रफ को हटाएं... तो वो मुशर्रफ को समर्थन वाली अमेरिकी मंशा के खिलाफ खड़ा होने की बजाय अमेरिका के साथ मुशर्रफ के खिलाफ खड़ा होना पसंद करेंगे। लेकिन यहां भी पेंच नवाज़ शरीफ को लेकर है जो अमेरिका के कहे मुताबिक चलने को कभी तैयार नहीं होगें। कुल मिला कर पाकिस्तान की उलझी राजनीति का सिरा सुलझाने, मुश्किलों से पार पाने और असल जम्हूरियत लाने में नवाज़ शरीफ को अभी लंबा वक्त लगेगा.

Tuesday, June 10, 2008

ज़रदारी को दिखने लगी है ज़मीन

नवाज़ शरीफ के एक कदम ने आसिफ अली ज़रदारी को ज़मीन पर ला खड़ा किया है। अब वे राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के खिलाफ महाभियोग लाने की बात करने लगे हैं। इसके लिए उन्होने अपनी पार्टी के नेताओं को तैयार रहने को कहा है। महाभियोग के मसौदे को अंतिम रुप दिया जा रहा है। ये वही ज़रदारी हैं जो राष्ट्रपति के साथ वर्किंग रिलेशन को बुरा नहीं मानते थे। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष ज़रदारी का इशारा पा कर ही प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने मुशर्रफ के साथ कामकाज़ी रिश्ते का समझौता किया था। आखिर पार्टी के स्टैंड में इस बदलाव की वजह साफ है। नवाज़ शरीफ का सरकार से अलग होना और अवाम के बीच घूम घूम कर अपनी बात कहना।

पीपीपी अब तक मुशर्रफ के साथ नहीं तो उसके पीछे भी पड़ी नज़र नहीं आ रही थी। चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर चुनकर आने के बाद पार्टी नेताओं को अपनी सरकार बनाने और उसे बचाए रखने की चिंता थी। ऐसे में आठ साल से मज़बूती से टिके मुशर्रफ से वो झगड़ा मोल नहीं लेना चाहती थी। पीएमएल एन नेता नवाज़ शरीफ़ जब जब जनता से किए गए वायदे को निभाने और मुशर्रफ तो तत्काल हटाने की मांग करते है तो ज़रदारी उन्हें व्यवहारिक होने की सलाह देते रहे हैं। ज़रदारी के दिमाग में सरकार जाने का डर तो था ही... मुशर्रफ से साथ अमेरिका का खड़ा रहना भी मुशर्रफ को हटाने की राह में बाधा रहा है। यहां तक कि आपातकाल के समय बर्खास्त किए गए जजों की बहाली भी अब तक लटकी हुई है। इन हालातों के बीच जब नवाज़ शरीफ़ ने सरकार से अपने सभी नौ मंत्रियों के इस्तीफे दिलवा दिए तो पीपीपी को पहला झटका लगा। लेकिन वो उससे भी संभलने और वैकल्पिक रास्ते तलाशने में लगी रही है। लेकिन इस बीच नवाज़ शरीफ ने जिस तरह की राजनीति शुरु कर दी है उससे ज़रदारी के कान खड़े हो गए है।


सरकार से अलग होने के बाद से नवाज़ शरीफ अवाम को ये संदेश देने में क़ामयाब साबित हो रहे कि जिन मुद्दों को लेकर आपने इस सरकार को चुना उन मुद्दों को सरकार पीछे छोड़ चुकी है। आपातकाल के पहले की अदालत की बहाली और मुशर्रफ को राष्ट्रपति पद से हटाना... ये दो मुद्दे पाकिस्तान की अवाम के दिल से जुड़े हैं। मुशर्रफ की आठ साल की तानाशाही में पाकिस्तान की अवाम की जिंदगी से लेकर अर्थव्यवस्था तक... सब कुछ दांव पर लग गया और उसी का नतीज़ा रहा कि अवाम ने सत्ताधारी पार्टी पीएमएल क्यू को भारी शिकस्त दी। पाकिस्तान की मीडिया और वकीलों के आंदोलन ने लोकतांत्रिक सरकार लाने में अहम भूमिका निभाई। और ये भी अब छला हुआ महसूस कर रहे हैं। तो जो ज़मीन पीपीपी ने खाली छोड़ दी है नवाज़ शरीफ़ उसे तेज़ी से भर रहे हैं। जो पहले पीपीपी के साथ थे वो सब अब नवाज़ शरीफ़ के साथ हो लिए हैं या हो रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री और कद्दावर नेता बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर भी अब शांत हो चुकी है। लोग सरकार को उसके कामकाज़ के आधार पर तौलने की तैयारी में हैं। जो गुस्सा मुशर्रफ और उसकी स्टैब्लिशमेंट यानि व्यवस्था के खिलाफ था वो अब इस गठबंधन सरकार के खिलाफ होता जा रहा है। नवाज़ शरीफ ने सरकार अलग होकर गुस्से के केन्द्र में पीपीपी और ज़रदारी को ला खड़ा किया है। ये बात ज़रदारी को समझ आने लगी है इसलिए मुशर्रफ के खिलाफ वो अपनी ज़बान फिर से तल्ख करने लगे हैं। व्यापारी से राजनेता बने ज़रदारी को अवाम की ताक़त का एहसास है। तानाशाही के तमाम हथकंडो के बाद भी जो अवाम मुशर्रफ की पार्टी के खिलाफ वोट कर सकती है वो ज़रदारी के खिलाफ भी।


पाकिस्तान में पीपीपी और पीएमएल एन, ये दो ही ऐसी राष्ट्रीय पार्टी हैं जिनका आधार पूरे देश में है। दोनो एक दूसरे की घोर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। ये मुशर्रफ की तानाशाही से निकलने की मज़बूरी थी कि ये एक साथ आए। लेकिन देश की दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी लंबे समय तक साथ नहीं चल सकती। इससे एक का वजूद दूसरे में समाने का ख़तरा रहेगा और सैनिक तानाशाही से निकल मुल्क एक अलग राजनीतिक दलदल में फंस सकता है। लोकतंत्र के हित और उसकी मज़बूती के लिए ज़रुरी है कि दो ताकतवर राजनीतिक पार्टियों के बीच ‘लोकतांत्रिक लडाई’ होती रहे। कहने का मतलब ये कि इन दोनों दलों का आज न कल चुनाव में भिड़ना ही होगा। मुशर्रफ को न हटा पाने की मज़बूरी ने पीपीपी के जनाधार को कमज़ोर कर रही है इसमें कोई शक नहीं। नवाज़ शरीफ को पता है कि अभी चुनाव का सही वक्त नहीं आया है। इसलिए वो एक कदम चल कर अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। अब चुनाव के दो सूरते हाल नज़र आ रहे हैं। या तो ज़रदारी मुशर्रफ को हटाने का फैसला कर अपना चेहरा बचाने की कोशिश करें। ऐसे में यदि मुशर्रफ इस सरकार को बर्खास्त करने की हिमाकत भी करते हैं तो दूबारा चुनाव की हालत में पीपीपी अपनी शहादत वाली छवि पेश कर सकती है। या फिर ज़रदारी नवाज़ शरीफ़ के सरकार से पूरी तरह समर्थन वापस ले लेने तक का इंतज़ार करें। लेकिन उसके बाद के चुनाव में पीपीपी को अवाम की तरफ से कुछ नहीं मिलने वाला। हां, तब मुशर्रफ, अमेरिका और ज़रदारी की तिकड़ी कोई नया खेल रचा पाकिस्तान में काबिज़ रहने की कोशिश कर सकते हैं। अब फैसला ज़रदारी के हाथ में है।
(12 जून के अमर उजाला में प्रकाशित)

Thursday, May 15, 2008

लोकतंत्र के मुहाने से लौटता पाकिस्तान!

आख़िर वही हुआ जिसका डर था। नवाज़ शरीफ़ ने सरकार से अलग होने का फ़ैसला कर लिया। नवाज़ की पार्टी पीएमएल एन के सभी मंत्रियों ने प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा ग़िलानी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। (मंगलवार को सौंप रहे हैं) हालांकि सरकार गिरी नहीं है क्योंकि शरीफ ने मुद्दा आधारित समर्थन देते रहने की बात की है। लेकिन वो भी कब तक ये साफ नहीं है। अगर पीपीपी नवाज़ की मांगों को यूं ही दरकिनार करती रही तो बात आगे जा सकती है। फिलहाल मसला देश में इमरजेंसी के साथ बर्खास्त हुए जजों की बहाली का है। पिछले साल 3 नवबंर को राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने जब इमरजेंसी लगाई तो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मोहम्मद इफ्तिखार चौधरी समेत अपनी मुखालफ़त करने वाले तमाम जजों को बर्खास्त कर दिया। पीपीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने के समय से ही नवाज़ शरीफ उन जजों की बहाली को अपनी नाक का सवाल बनाए हुए हैं। वो मुशर्रफ को भी राष्ट्रपति भवन से बाहर का रास्ता दिखाना चाहते हैं। दरअसल नवाज़ शरीफ की पार्टी पीएमएल एन के साथ साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी मुशर्रफ विरोध को अपना चुनावी एजेंडा बनाया था। बेनज़ीर की मौत से उपजी सहानुभूति और मुशर्रफ़ के खिलाफ आवाम के गुस्से के बूते वो सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी।

बातचीत के लंबे दौर और मड़ी बैठक में हुए समझौते के नवाज़ शरीफ ने पीपीपी को समर्थन देने और सरकार में शामिल होने का ऐलान किया। इसी चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी के तहत बर्खास्त जजों की बहाली एक महीने के भीतर करने नवाज़ ने शर्त रखी थी। वो भी संसद में अध्यादेश के ज़रिए। लेकिन गठबंधन सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। पीपीपी इसी को आधार बना कर अध्यादेश लाने से इंकार करती रही है। हालांकि इसके पीछे असल वजह अमेरिका का दबाव है। अमेरिका वॉर ऑन टेरर के अपने सहयोगी और काबालयली इलाके में सैन्य कार्रवाई की इजाज़त देने वाले मुशर्रफ को नहीं खोना चाहती। इसलिए उसने पीपीपी पर पूरा दबाव बनाया हुआ है कि वो मुशर्रफ के साथ चले। उन्हें हटाने की कोशिश ना करे। ये दबाव इसलिए भी कारगर हो पा रहा है क्योंकि ये अमेरिका ही था जिसने बेनज़ीर और मुशर्रफ के बीच सुलह करा कर बेनज़ीर के पाकिस्तान वापिस लौटने का रास्ता साफ किया था। बेनज़ीर और मुशर्रफ के बीच का नेशनल रिकांसिलियेशन एलायंस इसलिए परवान नहीं चढ़ पाया क्योंकि मुशर्रफ 58-2बी को छोड़ने को तैयार नहीं हुए। फिर बेनज़ीर की हत्या हो गई। चुनावी परिदृश्य में ज़रदारी आए। मुशर्रफ के खिलाफ लड़ कर पीपीपी सत्ता तक तो पहुंच गई लेकिन वो उस हालात से बाहर नहीं निकल पायी है जो अमेरिका ने तय कर रखे हैं। लिहाज़ा प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को मुशर्रफ के साथ करार तक करना पड़ा है कि वे ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था’ की मज़बूती के हक़ में आपस में नहीं टकराएंगे।

नवाज़ शरीफ को ऐसी ही बातें नागवार लग रही हैं। वे उस मुशर्रफ को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे जिसने उन्हें न सिर्फ गद्दी से उतारा बल्कि दस साल तक पाकिस्तान से भी बाहर रखा। लेकिन मुशर्रफ को हटाने का उनका कोई भी दबाव अभी तक काम नहीं आया है। उल्टा ज़रदारी ने एक बयान में यहां तक कह दिया कि जिन जजों को बर्खास्त किया गया ‘वे निजी स्वार्थ साधने में लगे थे... राष्ट्रहित में नहीं’। पुराने जजों की बहाली को लेकर ज़रदारी को भी ये डर है कि उनके खिलाफ भ्रष्ट्राचार के मुकद्दमे फिर ना खुल जाएं। इमरजेंसी लगाने के बाद मुशर्रफ ने पीसीओ यानि प्रोविजिनल कॉस्टीट्यूशनल आर्डर के तहत जिन जजों को नियुक्त किया, उन्हीं जजों ने ज़रदारी के खिलाफ मुकद्दमे हटाने के आदेश दिए। ये नेशनल रिकांसिलियेशन एलायंस की उन शर्तों में से एक था जिससे पीपीपी नेता को फायदा पहुंचना था। वही हुआ भी। तो पीपीपी और मुशर्रफ के बीच इस तरह का जो ‘वर्किंग रिलेशन’ बना उससे नवाज़ शरीफ ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। कहां तो वो मुशर्रफ को बाहर देखना चाह रहे थे और कहां वो उनका बाल भी बांका नहीं कर पा रहे। साथ ही, वे पाकिस्तानी शासन-सत्ता को अमेरिकी सरपरस्ती से निकालना चाह रहे हैं। अमेरिका उन्हें पसंद नहीं और वे अमेरिका को। पाकिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के खिलाफ और अपनी दक्षिणपंथी कट्टर छवि के साथ खड़े नवाज़ शरीफ के सामने जो रास्ता बच गया है उन्होने उसी पर चलने का फैसला किया है। नवाज़ शरीफ के इस कदम के बाद पीपीपी ने हालांकि ये कहा है कि वह आने वाले दिनों में संवैधानिक प्रावधानों के तहत जजों की बहाली के लिए प्रस्ताव लाएगी। लेकिन ऐसा कह कर पीपीपी अपनी सरकार के लिए समय ख़रीदती नज़र आ रही है।

नवाज़ शरीफ ने कैबिनेट से अपने मंत्रियों को हटा तो लिया है लेकिन ये भी साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी विपक्ष में नहीं बैठेगी। मतलब उनके समर्थन से सरकार चलती रहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि शरीफ को अभी सरकार गिराने का फायदा नज़र नहीं आ रहा। सत्ता में पीपीपी और मुशर्रफ दोनो हैं और ऐसे में चुनाव में उन्हें जबर्दस्त धांधली की आशंका होगी। इसलिए उन्होने पहला कदम उठाया है। सरकार से बाहर निकल कर वो अपना वोटरों को तैयार कर रहे हैं। ऐसे संदेश के साथ कि देखो पीपीपी अपने वायदे से मुकर गई। तानाशाह मुशर्रफ से समझौता कर बैठी। इसलिए अब उन्हें मौक़ा दिया जाए। पाकिस्तान की मीडिया, वकील और बुद्धिजीवी वर्ग से समर्थन हासिल करने की शरीफ की कोशिश रंग ला सकती है। ये सभी पीपीपी के अभियान को समर्थन देते रहे हैं। लेकिन मुशर्रफ और बर्खास्त जजों को लेकर पीपीपी के रुख़ से इन सबों का काफी हद तक मोहभंग हुआ है।

हालांकि ज़रदारी इस सच्चाई को समझते हैं कि पाकिस्तान में सरकार अवाम के वोट से नहीं, ताकत की ओट से चलती है। पाकिस्तानी सेना और अमेरिका दोनों ही मुशर्रफ के साथ हैं। ऐसे में ज़रदारी अगर अवाम के जज़्बात को समझते भी हो तो उसके लिए अपनी सरकार की क़ीमत अदा नहीं करना चाहते। सवाल है कि अब आगे क्या होगा। नवाज़ शरीफ अगर सरकार से समर्थन भी वापस ले लेते हैं तो दो-तीन सूरतेहाल पैदा होती हैं। पहला कि पीपीपी मौजूदा गठबंधन के दूसरे दलों के साथ साथ पीएमएल क्यू यानि मुशर्रफ की काफ लीग के सांसदों के साथ सरकार बचाने की कोशिश करे। हालांकि ज़रदारी ने साफ किया है कि वे किसी भी हाल में काफ लीग के साथ नहीं जाएंगे। लेकिन जिस मुशर्रफ और अमेरिका के सामने वो इतने विवश हो गए हैं कि नवाज़ शरीफ और अवाम की इच्छा का गला घोंट दिया हो वो सरकार बचाने के लिए इस हद तक भी चले जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

दूसरी सूरतेहाल तब बनती है अगर मौजूदा सरकार गिर जाती है। सरकार बनाने की नवाज़ शरीफ की किसी कोशिश को राष्ट्रपति मुशर्रफ परवान चढ़ने नहीं देगें। दो प्रमुख राजनीतिक दलों के झगड़े का फायदा उठा कर मुशर्रफ चुनी हुई सरकार पर पूरी तरह हावी हो जाएंगे। पाकिस्तान उसी हालात में पहुंच जाएगा जहां से उसने लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अपनी लड़ाई शुरु की थी। इतनी जल्दी दुबारा चुनाव होने की गुंजाइश कम नज़र आती है। और अगर चुनाव होते भी है तो मुशर्रफ की व्यवस्था अवाम के तमाम सहयोग के बाद भी नवाज़ शरीफ को सत्ता तक पहुंचने देगी इस पर शक बना रहेगा। यानि एक सच्चे लोकतंत्र के लिए पाकिस्तान की जद्दोज़हद और लंबी खिंचने वाली है।

( अमर उजाला के 15मई 2008 के अंक में प्रकाशित)

Friday, April 11, 2008

मज़बूती से टिके मुशर्रफ़

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने नवनिर्वाचित संसद के संयुक्त अधिवेशन की जगह सिर्फ नेशनल एसेंबली का सत्र बुलाया और इस तरह खुद को संसद के सामने अभिभाषण से दूर रखा। कई हलकों में इसका मतलब मुशर्रफ की लगातार कमज़ोर होती स्थिति से लगाया जा रहा है। लेकिन पाकिस्तान में चुनाव के बाद से अब तक के कई तथ्य ऐसे हैं जो इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि मुशर्रफ अभी भी न सिर्फ मज़बूती के साथ अपने पद पर टिके हैं बल्कि अपनी कई शर्तें भी मनवाने में कामयाब रहे हैं। बीते फरवरी जैसे जैसे पाकिस्तान में चुनाव के ट्रेंड और नतीज़े सामने आ रहे थे तभी से मुशर्रफ़ की स्थिति को लेकर तरह तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। मैं उस समय रावलपिंडी और इस्लामाबाद के अलग अलग इलाक़ों में चुनाव से जुड़ी सूचनाएं जुटा रहा था। जब चुनाव के नतीज़े पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पीएमएल नवाज़ के हक़ में बढ़ रहे थे तभी दिल्ली से एक फोन आया। एक जानकार ने सूचना देने के अंदाज़ में पूछा कि सुना है मुशर्रफ देश छोड़ कर भागने वाले हैं। उसके लिए एक हवाई जहाज़ तैयार खड़ा है जो उन्हें टर्की ले जाएगा। मैंने छूटते ही कहा कि मुशर्रफ कहीं नहीं जा रहे। चुनाव के नतीजे जो भी हों, मुशर्रफ़ की संवैधानिक स्थिति देश के राष्ट्रपति की है। उस राष्ट्रपति की जिनके पास पाकिस्तान के संविधान की धारा 58 2बी के तहत किसी भी चुनी हुई संसद को कभी भी भंग कर देने का अधिकार है। वो राष्ट्रपति जो लंबे समय तक सेना प्रमुख की वर्दी में रहा और फिर देश में इमरजेंसी लगाने के बाद वर्दी उतारी और सिविलियन प्रेसीडेंट के तौर पर अपने को पेश कर दिया। सबसे बड़ी बात की मुशर्रफ अमेरिका के चहेते हैं और कई कारणों से अमेरिका मुशर्रफ के पीछे खड़ा है। ऐसे में मुशर्रफ की पार्टी बेशक बुरी तरह हार रही हो लेकिन इसका मुशर्रफ की व्यक्तिगत सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला। आखिरकार अब तक हो भी वही रहा है।

बेनज़ीर की हत्या के बाद और चुनाव के पहले जब मैंने नवाज़ शरीफ से पूछा था कि क्या वे पीपीपी के साथ मिल कर चुनाव बना सकते हैं तो उनका जवाब था कि मुशर्रफ को शिकस्ते फाश करने के लिए अगर ऐसा ज़रुरी हुआ तो वो ऐसा ज़रुर करेंगे। तमाम रस्सकशी के बाद पीएमएल एन ने पीपीपी के साथ मिल कर सरकार बनायी। अवामी नेशनल पार्टी जैसी कुछ पार्टियां भी साथ आयीं। नवाज़ की पार्टी से मंत्री बने सांसदों को उसी मुशर्रफ ने शपथ दिलायी जिसे नवाज़ शरीफ आज भी गैर संवैधानिक राष्ट्रपति करार देने से नहीं चूकते। ज़ाहिर है नवाज़ शरीफ जैसे मंजे राजनीतिज्ञ के पास भी फिलवक्त मुशर्रफ का कोई काट नहीं है। वे मजबूरी में ही सही उन्हें राष्ट्रपति की भूमिका में स्वीकारना पड़ा है। बयानबाज़ी वो कुछ भी करते रहें। इस मामले में स्व. बेनज़ीर भुट्टो के पति और पीपीपी के सह अध्यक्ष आसिफ अली ज़रदारी नवाज़ शरीफ से बीस साबित हो रहे हैं। मुशर्रफ ने चुनाव के आ रहे नतीजों के दौरान ही कहा कि वो नई सरकार के साथ कामकाज़ी रिश्ते बना कर चलने को तैयार हैं। हालांकि ये मुशर्रफ का भी मजबूरी भरा बयान था क्योंकि उनके पास कोई चारा नहीं बचा। लेकिन अव्वल तो मुशर्रफ की संवैधानिक स्थिति और फिर अमेरिका के दबाव ने ज़रदारी को भी समझौतावादी रुख अपनाने को बाध्य कर दिया। वो टकराव का रास्ता अपना बेनज़ीर के अमेरिकी दोस्तों का कोपभाजन नहीं बनना चाहते थे और ना ही मुशर्रफ के हाथों पीपीपी की अगुवाई वाली सरकार को गिराना। लिहाज़ा उन्होने उल्टा नवाज़ शरीफ को ही मना लिया कि वो मुशर्रफ के 'शिकस्ते फाश' यानि जड़ से ख़त्म करने की ज़िद फिलहाल छोड़ दें। वही हुआ। नवनिर्वाचित सरकार के मुखिया यूसुफ रज़ा गिलानी ने भी मुशर्रफ के साथ चलने की बात दोहराई। बेशक स्पीकर फहमीदा मिर्ज़ा महाभियोग लाने जैसे बात करती नज़र आती हों, लेकिन सरकार चलती रहे इसके लिए ज़रूरी है कि मुशर्रफ के साथ 'वर्किंग रिलेशनशिप' बनाए रखा जाए।


फिलहाल पाकिस्तान में कई चीज़ें एक साथ चल रही हैं। मुशर्रफ विरोधी जजों की रिहाई तो कर दी गई लेकिन उन्हें बहाल नहीं किया गया। एक ख़बर आयी कि पीपीपी चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को छोड़ कर बाक़ी सभी जजों की बहाली को तैयार है। इफ्तिखार को दरकिनार करने की ज़रदारी की कोशिश के पीछे एक वजह और है। मुशर्रफ ने 1973 के संविधान को ताक पर रख कर जिस प्रोविजिनल कांस्टीच्यूशनल आर्डर यानि पीसीओ के तहत जजों की बहाली की उन्ही के सौजन्य से ज़रदारी और बेनज़ीर को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति मिली। तो अगर इफ्तिखार चौधरी ने दुबारा चीफ जस्टिस की कुर्सी संभाला तो पीसीओ के तहत लिए गए तमाम फैसलों के साथ साथ ये फैसला भी सवालों के घेरे में आ सकता है। इसलिए 3 नवबंर की इमरजेंसी के पहले के चीफ जस्टिस न सिर्फ मुशर्रफ बल्कि ज़रदारी के लिए भी ख़तरे की घंटी साबित हो सकते हैं। लेकिन चौधरी इफ्तिखार को बहाल नहीं करने का मतलब होगा नवाज़ शरीफ ने ज़रदारी के साथ जो चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी साइन किया है उसका सीधा सीधा उल्लंघन। ऐसे में नवाज़ की पार्टी को अपना चेहरा बचाने के लिए सरकार से निकलना पड़ सकता है। ऐसे में पीपीपी एमक्यूएम के साथ रिश्ते मज़बूत कर और मुशर्रफ की काफ़ लीग के क़रीब चार दर्जन सांसदों को साथ लेकर वैकल्पिक रणनीति बनाने की तरफ जा सकती है। बेशक सिंध सूबे में एमक्यूएम के साथ पीपीपी को मिलकर सरकार बनानी पड़ी हो। लेकिन पीपीपी का एक खेमा एमक्यूएम को कराची में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का दोषी मानती है और वे एमक्यूएम को राष्ट्रीय सरकार में शामिल करने के बिल्कुल खिलाफ है। ऐसे में पार्टी की टूट की बात भी कही जा रही है। हालांकि ऐसा होने की संभावना काफी कम है। इसके पीछे वजह ये है कि प्रधानमंत्री पद के लिए मखदूम अमीन फहीम, शाह महमूद कुरैशी और चौधरी अहमद मुख्तार जैसे नामों को उछाल इनके आपस में खींचतान पैदा करने के बाद ज़रदारी ने बड़ी होशियारी से यूसुफ रज़ा गिलानी को प्रधानमंत्री बनवा दिया। इससे असंतुष्ट का कोई बड़ा गुट नहीं बचा बल्कि वो छोटे छोटे गुट में बंट गए। इस बीच ज़रदारी के हैदराबाद के भरोसेमंद सांसद ने ज़रदारी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा की बात फैला कर एक तरह पार्टी के भीतर और बाहर की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की। ज़रदारी के नेशनल एसेंबली में चुन कर आ जाने के बाद प्रधानमंत्री पद को लेकर एक बार फिर खींचतान की आशंका अभी ख़त्म नहीं हुई है।


इन सब बातों के बीच एक बात जो नहीं बदली प्रतीत होती है वो है पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की स्थिति। मुशर्रफ़ ने हाल के अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि अगर वे अपने पद से हटे तो अमेरिका पाकिस्तान के कबाईली इलाक़े पर हमला कर देगा। उनका कहना है कि अमेरिका उन्हीं की वजह से पाकिस्तान में सीधे उतरने से रुका हुआ है। नहीं तो तालिबान और अलक़ायदा जैसी ताक़तों से निपटने के लिए वो अपनी फौज़ पाकिस्तान में उतारने तनिक भी देर नहीं लगाएगा। मुशर्रफ का ये बयान अमेरिका के खिलाफ नहीं है। बल्कि नई नई आयी जम्हूरियत के उन नुमाइंदों के खिलाफ है जो मुशर्रफ का ताज़ छीनने की मंशा पाले हुए हैं। हो सकता है कि ये बयान अमेरिकी शह पर ही दिया गया हो ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

Friday, February 29, 2008

जब आईएसआई वाले पीछे पड़े

इस बार की पाकिस्तान यात्रा में एक बात जो सबसे ज़्यादा एविडेंट रही वो थी हमारा लगातार पीछा किया जाना। पहले दो दिन तो मैंने नोटिस नहीं किया लेकिन चुनाव के दिन यानि 18 फरवरी की शाम तक साफ नज़र आने लगा। एक कार लगातार हमारे पीछे थी। यहां तक कि शाम को जब हम शाम को पीपीपी के सीनेटर अनवर बेग का घर ढूंढ़ रहे थे तो वो कार पीछे आकर लगी। हमें जल्दी थी क्योंकि इंटरव्यू निपटा कर लाईव के लिए पहुंचना था। पीछे से आवाज़ आयी कहां जाना है। मैंने कहा अनवर बेग के घर। तो आवाज़ आयी हमसे पूछें ना। ख़ैर उन्होने ने बता ये कि ये घर है। हम वापस आए तो वो फिर पीछे थे। हमें ज़हूर प्लाज़ा पहुंचना था। मुझे पता था सो पहुंच गया। पीछे वही कार। मुझसे नहीं रहा गया। मैं उतर कर उनके पास गया। कहा बस आधे पौने घंटे की बात है। फिर हम भी फ्री आप भी फ्री। अचंभे से वे बोले। अच्छा। मैंने कहा। बिल्कुल। उन्होने ने पूछा उसके बाद आप कहां जाएंगे। मैंने कहा होटल। और आप भी जाकर आराम करें। ख़ैर। लाईव के बाद मैं वापस लौटा तो वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे। मैंने कहा चलें। तो वे बातचीत पर उतर आए। हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों को लेकर दोनों मुल्कों मे शक सुबहों को लेकर कई बातें हुईं। पांच मिनट में ही। फिर मैंने कहा कि आप कभी हिन्दुस्तान आएं तो ये मेरा कार्ड है और फोन नंबर। मेरे घर ठहरें। शर्त एक ही है कि साफ मंशा से आएं। जैसे मैं आया हूं। हमेशा आपके साथ रहूंगा। कोई आपको हाथ नहीं लगाएगा जैसे आप हमें नहीं लगा पा रहे।

वे वापस होटल तक आए। लेकिन उसके बाद कभी पीछे नहीं आए। हमारे ड्राईवर का नंबर ले लिया था उन्होने। हर घंटे उसे फोन किया करते थे। हमारे बारे में पूछने के लिए। लेकिन पीछे नहीं पड़े फिर। एक रात इस्लामाबाद में हम क़रीब सुबह तीन बजे लौटे। फुल दारू पी के। ड्राईवर को भी नहीं पता था कि कहां से लौट रहे हैं। अगले दिन होटल हॉली डे इन के रिसेप्शन पर वे बैठे मिले। मैंने कहा पीछे आने की ज़रूरत नहीं। साथ हमारी कार में ही चलें। उन्होने कहा ज़रुरत नहीं। खाली इतना बता दें रात कहां थे। मैंने कहा सरमत मंज़ूर साहब के यहां। उन्होने कहा ओके। आप जाएं। हमें पीछे आने की ज़रुरत नहीं। उन्होने जो नहीं कहा शायद वो ये कि आपके पीछे आकर भी हमें कुछ नया नहीं मिलने वाला क्योंकि आप जहां जाते हैं खुद ही बता देते हैं।

Saturday, February 23, 2008

एक तरफ जनादेश, दूसरी तरफ ज़रदारी

(अमर उजाला, सोमवार 25 फरवरी के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

चुनाव नतीजे आने के बाद पाकिस्तान में तुरंत सरकार बन जानी चाहिए थी। ख़ासतौर पर तब जब पीएमएल एन और पीपीपी चुनाव के पहले से ही साथ चलने की बात करते रहे हैं। अब जबकि 272 जेनरल सीटों वाली नेशनल एसेंबली में पीपीपी 87 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी और पीएमएल एन 67 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है तो फिर इन्हें मिल कर सरकार बनाने में देरी क्यों हो रही है। ज़ाहिर है कि पाकिस्तान में चुनाव के पहले और चुनाव के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में ज़मीन आसमान का अंतर आ गया है।

चुनाव के पहले मुशर्रफ को पानी पी पी कर कोसने में पीपीपी को फायदा था। हालांकि बेनज़ीर मुशर्रफ के साथ समझौते के तहत ही पाकिस्तान लौटीं थी और चुनाव में शिरकत कर रही थी। लेकिन चुनाव में धांधली और संविधान की धारा 58 2बी के सवाल पर मुशर्रफ से उनका समझौता अंतिम रुप नहीं ले पा रहा था। इसी बीच बेनज़ीर की हत्या हो गई। पीपीपी ने मुशर्रफ को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। मुशर्रफ समर्थक सत्तारुढ पार्टी पीएमएल क्यू के कई नेताओं पर इल्ज़ाम लगाया और हत्या के लिए सरकार में बैठे लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया। लेकिन पार्टी चुनाव से हटी नहीं। बेनज़ीर की हत्या से उपजी सहानूभुति का फायदा मिलने की उसे उम्मीद थी और कुछ हद तक वो हुआ भी।

इधर नवाज़ शरीफ जो 1993 तक जिनकी बेनज़ीर से बातचीत भी नहीं होती थी... बेनज़ीर की हत्या के बाद उसे अपनी बहन करार देने लगे। चुनाव से हटे लेकिन पीपीपी के मैदान में डटे रहने के कारण अपनी पार्टी को भी चुनाव में उतार दिया। नवाज़ और ज़रदारी कई मौकों पर मिले और जम्हूरियत की जंग में साथ लड़ने की बात की। इन्हें चुनाव में धांधली की आशंका भी सताती रही। लेकिन ख़तरों के बावजूद अवाम वोट डालने निकली और चुनाव ठीक-ठाक हो गए। किसी पार्टी को उम्मीद से कुछ कम तो किसी को कुछ ज़्यादा... लेकिन अपने-अपने हिस्से की सीटें मिल गईं। चुनाव नतीजों के बाद अब पहले की भावनात्मक ऐलानों का वास्ता अब ज़मीनी हक़ीकतों से हो रहा है। इसके केन्द्र में हैं पीपीपी और उनके सह-अध्यक्ष आसिफ अली ज़रदारी।

मुशर्रफ विरोध के सहारे सीटें बटोरने वाली पीपीपी को मुशर्रफ़ को नज़रअंदाज करना अब नामुमकिन लग रहा है। वजह कई है। नंबर एक। मुशर्रफ की संवैधानिक स्थिति राष्ट्रपति की है। सरकार बनाने का न्यौता उन्हीं के हाथ में है। नंबर दो। पाकिस्तान के राष्ट्रपति को ये अख्तियार है कि वो किसी चुनी हुई नेशनल एसेंबली को कभी भी भंग कर सकते हैं। संविधान की धारा 58 2बी के ज़रिए। ज़ाहिर है कि ऐसे में मुशर्रफ को नाराज़ करने वाले फैसले करना पीपीपी के लिए आसान नहीं है। मुशर्रफ कह रहे हैं कि वो नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है। लेकिन वो नवबंर तीन के पहले की अदालत की बहाली के ज़बर्दस्त खिलाफ हैं। इमरजेंसी लगाए जाने के पहले की अदालत और चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी की फिर से बहाली का मतलब होगा मुशर्रफ के खिलाफ उस मामले का फिर से खुलना जिसमें जेनरल की वर्दी पहन उनके राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की वैधता को चुनौती दी गई थी। अगर वो मामला दुबारा खुला तो मुशर्रफ को राष्ट्रपति पद से हाथ धोना पड़ सकता है। उनके खिलाफ महाभियोग लगाने की ज़रुरत भी नहीं पड़ेगी। अब ज़रदारी को डर ये है कि अगर पुरानी अदालत को बहाल करने की नवाज़ शरीफ की शर्त को उन्होंने माना तो उनकी सरकार चंद घंटों की मेहमान ना साबित हो।

महाभियोग लाने की नवाज़ की शर्त मानने पर डर ये है कि कोई भी सेना अपने पूर्व चीफ पर इस तरह का अभियोग बर्दाश्त नहीं करेगी। मुशर्रफ ने बेशक वर्दी उतार दी हो लेकिन सेना ने उन्हें सिर से उतारा नहीं है। पाकिस्तान में सरकार चलाने के लिए सेना से अच्छे संबंद ज़रुरी हैं और ज़रदारी पाकिस्तान की इस सच्चाई को समझते हुए सेना से अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेंगे। इसलिए नवाज़ शरीफ की महाभियोग जैसी शर्त मानने में वो हिचक रहे हैं।

इसके अलावा अमेरिका का दबाव भी ज़रदारी पर काम कर रहा है। अमेरिका ने मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच समझौता करा सत्ता में दोनों को भागीदारी देने का फार्मूला अपनाया था। ताकि दोनों के ज़रिए पाकिस्तान और इस इलाके में अमेरिकी हित सधते रहें। बेनज़ीर बेशक ना रही हो लेकिन अमेरिका अपने लिए स्थिति में बदलाव नहीं चाहता है। उसने ‘साफ-सुथरे’ चुनाव के लिए मुशर्रफ की तारीफ की है। ये भी जता दिया है उन्हें मुशर्रफ चाहिए। बेनज़ीर की जो भूमिका अमेरिकी ने तय की थी वो चाहता है कि अब ज़रदारी उस भूमिका को आगे बढ़ाएं। ऐसे में प्रधानमंत्री पद की पेशकश ज़रदारी की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को हवा दे दे तो हैरानी की बात नहीं। वैसे भी चुनाव के पहले प्रधानमंत्री पद के लिए मकदूम अमीन फहीम का नाम आगे करने वाले ज़रदारी अब कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री कौन होगा ये आगे तय होगा।

पीपीपी की नेतृत्व वाली नई सरकार को लेकर एक तरफ ये तमाम दबाव और आशंकाएं हैं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हैं तो दूसरी तरफ है जनादेश। जनादेश मुशर्रफ के खिलाफ है। ऐसे में ज़रदारी अमेरिका और राष्ट्रपति मुशर्रफ के दबाव में आकर पीएमल क्यू जैसी पार्टियों के साथ सरकार बनाने की कोशिश करते नज़र आते हैं तो अवाम भड़क सकती है। वकीलों का आंदोलन और ज़ोर पकड़ सकता है। नवाज़ शरीफ का कद इस हद तक बड़ा हो सकता है कि अगली किसी चुनाव की सूरत में पीपीपी हाशिए पर न चली जाए। या फिर सरकार बनाने के पहले ही पीपीपी ही ना टूट जाए क्योंकि पार्टी में प्रधानमंत्री के पद और बेनज़ीर की राजनीतिक विरासत समेत कई मुद्दों पर मतैक्य नहीं है। मौजूदा हालात की मजबूरी में एक रखे हुई है।

कुल मिला कर ज़रदारी एक ऐसी ज़मीन पर खड़े हैं जहां आगे कुंआ है तो पीछे खाई। इसलिए वो लगातार आम सहमति की सरकार बनाने का राग अलाप रहे हैं। दरअसल उन्हें पता है कि अगर वो पीएमएल क्यू या मुशर्रफ समर्थकों को किसी रुप में साथ लेकर चलने की कोशिश करते हैं तो नवाज़ शरीफ उनके साथ नहीं आएंगे। नवाज़ साथ आए तो उनकी साख को धक्का लगेगा। और वो सरकार से बाहर रहे तो पीपीपी इसका राजनीतिक फायदा उठा सकेगी।

पीपीपी मान चुकी है कि पार्टी लगातार मुशर्रफ से संपर्क में है। बेशक वो हवाला मुशर्रफ की संवैधानिक स्थिति का दे रही है। लेकिन उसकी नज़र पीएमल क्यू के सांसदों पर भी है। वो चाहती है कि पीएमएल क्यू एक पार्टी के तौर पर उसके साथ ना आए। लेकिन चौधरी शुजात और परवेज़ इलाही जैसे नेताओं को छोड़ उसके बाकी चुने हुए सदस्य साथ आ जाएं। इसके अलावा अवामी नेशनल पार्टी के साथ पीपीपी के अच्छे संबंध रहे हैं। एएनपी के पास 9 सीटों हैं। मोहाज़िरों की पार्टी मुत्ताहिद्दा कौमी मूवमेंट यानि एमक्यूएम के पास 19 सदस्य हैं। सिंध की प्रांतीय सरकार में भागीदारी देने के बदले पीपीपी एमक्यूएम को केन्द्र में साथ ला सकती है। एमक्यूएम भी इसके लिए तैयार दिखती है। इसके अलावा 26 आज़ाद उम्मीदवार भी जीते हैं जो सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कहने का मतलब कि पीएमएल एन के बिना जो सरकार बनती है वो मुशर्रफ को तुष्ट करने वाली भी होगी और अमेरिकी का खुश करने वाली भी। फिर भी अगर ज़रदारी को नवाज़ शरीफ के साथ मिल कर ही सरकार बनाना पड़ा तो ये ज़रदारी पर जनादेश की जीत ही होगी।

(इस लेख को पढ़ने के बाद बगल के सर्वे में अपनी राय ज़रूर ज़ाहिर करें...)

Tuesday, February 19, 2008

पाकिस्तान में नई सुबह

चार दिनों से इस्लामाबाद रावलपिंडी और लाहौर समेत पूरे पाकिस्तान में में अलग तरह की शंका आशंकाएं देखने को मिल रहीं थी. कई रातों से सोया नही. जानने समझने की कोशिश में. कल की वोटिंग के बाद रात झपकियाँ आ रही थीं. लेकिन यहाँ फ़ोन काल्स ने जगाये रखा.
पाकिस्तान में जम्हूरियत की जंग आख़िर रंग ला रही है. यहाँ की अवाम ने बदलाव के लिए वोट किया है. नतीजे से सामने आ रहे हैं. पीपीपी और पी ऍम एल नवाज़ की जीत पक्की है. मुशर्रफ के लिए मुश्किल दिनों की शुरुआत के तौर भी इसे देखा जा सकता है. नई सरकार के आने के बाद यहाँ की जनता नई हवा में साँस लेने को आतुर दिख रही है. बस कुछ ही घंटों की बात रह गयी है.

Friday, February 15, 2008

आइए देखते हैं पाकिस्तान में जम्हूरियत की जंग

अभी पाकिस्तान निकल रहा हूं। 18 को चुनाव होने हैं। कैसे होते हैं। कौन जीतता है। बुलेट या बैलेट। आप सबों को रुबरु कराने की कोशिश करुंगा। शायद पाकिस्तान से अब मैं अपना ब्लॉग अपडेट कर पाउंगा।

शुक्रिया

Thursday, January 24, 2008

पाकिस्तान का मंदिर और आडवाणी का झूठा वादा...

पाकिस्तान यात्रा के दौरान कटासराज, मलोट और नंदना के मंदिरों को देखने का मौक़ा मिला। मंदिर क्या बस अवशेष भर बचे हैं। कटासराज के शिव मंदिर का ढांचा तो बचा है पर अंदर कुछ नहीं। मूर्ति तक नहीं है। ये वही मंदिर है जिसे हिन्दू धर्म के स्वयंभू रक्षक लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान गोद लेने की बात की थी। जो जानकारी मुझे वहां मिली उसके मुताबिक़ वे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के लोगों को भेजने वाले थे इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए। पर वापस आए तो जिन्ना विवाद में फंस गए...फिर शायद भूल गए। आख़िर बड़े राजनेता हैं। ऐसी छोटी छोटी कितनी कही बातें याद रखें। और वहां कोई हिन्दू वोट बैंक की राजनीति भी तो नहीं करनी कि कहें...कसम राम की खाते हैं... इस मंदिर को बचाएंगे। यूपी बिहार का होता तो कुछ करते भी। पाकिस्तान में मंदिर की हालत खराब है तो पाकिस्तान सरकार जाने कि वो अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा नहीं कर रही। ऐसे तर्क आडवाणी जी के बचाव के हो सकते हैं।

खैर। इस मंदिर की हालत ठीक नहीं। वजह आसपास हिंदू आबादी का नहीं होना भी है। ये पाकिस्तान के चकवाल ज़िले में आता है। पवित्र ननकाना साहिब जैसे इसे भी विकसित किया जा सकता था। लेकिन इसमें अपने देश को ही बड़ा रोल निभाना होता। पर ऐसा नहीं किया गया। सबसे बड़ी बात ये है कि चाहे रख-रखाव ठीक ना हो... मंदिर की इमारतें बुलंद तो हैं... बाबरी मस्ज़िद की तरह गिरा तो नहीं दी गई हैं...। इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व ये है कि ये महाभारत काल की है। यहां के गाइड सलमान साहब ने हमें बताया कि पार्वती की मौत के समय जब शिव जी रोए तो जो आंसू बहे उससे पुष्कर और कटासराज दोनों जगहों पर कुंड का निर्माण हुआ। यानि भारत में जो महत्व पुष्कर का है... हिन्दू धार्मिक आस्था के लिहाज़ से वही महत्व कटासराज मंदिर का भी है। (तस्वीर में श्रीलंका की पत्रकार रुआंती परेरा और शशिका नज़र आ रही हैं...)

अगली बार.... मलोट के शिव मंदिर और नंदना के विष्णु मंदिर की बात और वहां तक पहुंच सकने की पूरी दास्तान।

Wednesday, January 16, 2008

पाकिस्तान और पीपुल्स पार्टी का भविष्य

(31 जनवरी को अमर उजाला में प्रकाशित)

पाकिस्तान में चुनाव की एक और तारीख नज़दीक आ रही है। 18 फरवरी। क़रीब महीने भर बचा है। बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद जो फोकस शिफ्ट हो गया था वो दुबारा फोकस में आने लगा है। हालांकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का चुनावी अभियान उस तरह से शुरु नहीं हुआ है जैसा बेनज़ीर ने आगाज़ किया था। पार्टी अभी भी सदमें में है... और शायद इस मनोभाव में भी कि अब वर्करों को ज़्यादा कुछ करने की ज़रुरत नहीं। मौत से उपजी सहानुभूति ही सब कुछ कर देगी। प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी के घोषित उम्मीदवार मकदूम अमीन फहीम पुराने और मंजे हुए नेता है। मुल्क की राजनीतिक नब्ज़ की उन्हें पकड़ है। लेकिन बेनज़ीर के नहीं रहने से पार्टी में संगठनात्मक कमज़ोरी आयी है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। बिलावल ज़रदारी के नाम में भुट्टो जोड़ कर चेयरमैन बना तो दिया गया है लेकिन हाल ही में लंदन उन्होने दुबारा साफ कर दिया है कि सक्रिय राजनीति में आने का उनका कोई इरादा नहीं है। पहले पढ़ाई है। ऐसे में पार्टी गतिविधियों की कमान आसिफ ज़रदारी के हाथों में है। बेशक बेनज़ीर की वसीयत के हवाले से उन्होने पार्टी की कमान संभाली हो। लेकिन उनके सांगठनिक क्षमता पर कई सवाल हैं। पार्टी को एकजुट दिखना अभी वक्त की जरुरत है। इसलिए बेनज़ीर की राजनीतिक विरासत और नए नेतृत्व को लेकर कोई अभी सवाल नहीं उठा रहा। न भुट्टो परिवार में और ना ही पार्टी में। लेकिन राजनीतिक विरोधियों को तो मौक़ा मिल ही गया है। तहरीक़े इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान के मुताबिक, ‘ये वो टाइम था जब पीपुल्स पार्टी को भुट्टो परिवार के साए से निकल जाना चाहिए था... ज़रदारी साहब पर खुद भ्रष्टाचार के इतने आरोप हैं कि वो तन कर चुनौती दे पाने की हालत में नहीं हैं।’

पार्टी में आसिफ ज़रदारी, मकदूम अमीन फहीम और मुल्तान के मोहम्मद युसुफ रज़ा गिलानी समेत तीन वरिष्ठ सलाहकारों के अलावा पांच और सलाहकार भी बनाए गए हैं। लेकिन मकसद संगठन को मज़बूत करने से उतना नहीं जितना इलाक़ाई संतुलन बनाने का। कहीं सिंध के नेताओं का दबदबा दिखने से बलुचिस्तान और पंजाब की ईकाईयां ना नाराज़ हो जाएं। फाटा समेत सीमांत इलाके में वैसे ही पीपीपी की पैठ कमज़ोर है। पार्टी में अब कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं है। और हालात भी ऐसे हैं कि बड़ी चुनावी रैलियों की गुंजाइश नहीं बची। बेनज़ीर के मारे जाने के बाद दहशत का जो माहौल बना है उसने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए करने को कुछ ज़्यादा नहीं छोड़ा है। चुनाव की तारीख आगे बढ़ जाने से हिंसा का दौर भी लंबा खिंचने की आशंका बढ़ गई है। वरिष्ठ पत्रकार मुस्तंसर जावेद का कहना है कि ‘इस वक्त स्नैप इलेक्शन हो जाना चाहिए था। कानून और व्यवस्था को बहाना बना कर चुनाव टालने से हिंसा का दौर भी ख़त्म नहीं होगा बल्कि और बढ़ेंगे।’ गुरुवार 10 जनवरी को लाहौर हाईकोर्ट के बाहर हुआ धमाका इसकी तस्दीक करता है। लाहौर पाकिस्तान की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण गढ़ है। पाकिस्तान नेशनल एसेंबली के 270 सीटों में से 148 पंजाब से हैं। और जब यहां इस तरह की हिंसा होगी तो चुनावों पर तो इसका असर पड़ेगा ही।

पिछले साल 20 नवंबर को प्रोविशियल एसेंबली भंग होने के पहले पंजाब में मुशर्रफ समर्थक पीएमएल क्यू की सत्ता थी। अभी भी उन्ही की केयर टेकर सरकार है। पीपीपी का लगातार आरोप लगाती रही है कि मुशर्रफ और उनकी पार्टी चुनाव में जम कर धांधली करने जा रही है। बेनज़ीर के बिना इसे रोकना पीपीपी के लिए बड़ी चुनौती होगी। चुनाव धांधली की मुखालफत को लेकर बेनज़ीर नवाज़ शरीफ के साथ कोई ख़ास रणनीति बनाने की तैयारी में थी। बकौल नवाज़ शरीफ, ‘वो इस मुतल्लिक मुझसे मिलना चाहती थीं। फोन पर चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी को लेकर बात हुई थी। लेकिन इससे पहले कि मुलाक़ात हो पाती... वो ख़ुद ही नहीं रहीं।’ बेनज़ीर और नवाज़ शरीफ के बीच जिस स्तर की बातचीत या समझ पैदा हुई थी, पीपीपी के नए नेत़त्व को उसे समझने में और उसी तरह की साझा रणनीति बनाने में वक्त लगेगा। बहुत संभावना इस बात कि है कि वैसी समझ पैदा करने की शायद पार्टी अब ज़रुरत ही ना समझे। ये चुनाव में प्रदर्शन और पार्टी के भविष्य के लिहाज़ से उतना मुफीद नहीं होगा क्योंकि पाकिस्तान का सियासी माहौल इस तरह का नहीं है कि जम्हूरियत चाहने वाली कोई भी पार्टी अकेले दम पर आगे बढ़ सके। बेनज़ीर की मौत के तुरंत बाद नवाज़ ने पीपीपी के कार्यकर्ताओं-समर्थकों से कहा था कि ‘वे (पीपीपी) उन्हें अपना समझें और वे (नवाज़) उनका साथ देने को तैयार हैं।‘ लेकिन उनके इन शब्दों को पीपीपी कार्यकर्ताओं पर असर बनाने की कोशिश के तौर पर लिया गया। नवाज़ शरीफ अपनी और वक्त की नज़ाकत को समझते हैं। लिहाज़ा कहते हैं कि ‘जम्हूरियत की बहाली और मुशर्रफ को जड़ से ख़त्म करने के लिए ज़रुरी हुआ तो वो पीपीपी के साथ मिल कर सरकार बनाने को भी तैयार हैं।’ सवाल है कि या ऐसी ही ज़रुरत पीपीपी भी समझती है या नहीं।

बेनज़ीर को लेकर पंजाब में भी ज़बर्दस्त सहानुभूति की लहर है। सिंध से पीपीपी के सीनेटर अनवर बेग को भरोसा है कि 'हम क्लीन स्विप करेंगे और मुशर्रफ का फ्यूचर स्टेक पर होगा।' लेकिन सिर्फ इसी के भरोसे रहना पीपीपी को मंहगा साबित हो सकता है। लरकाना में अपने पहले संबोधन में आसिफ ज़रदारी ने बेनज़ीर के साथ मारे गए अंगरक्षकों को ‘हमारे पंजाबी भाईयों की शहादत’ करार देकर कर पंजाब को भुट्टो परिवार से जोड़न की कोशिश की। लेकिन पार्टी की असल चुनौती यहां परवेज़ इलाही जैसे नेताओं की पैठ को उखाड़ने की होगी। वैसे भी, पीएमएल क्यू के पास प्रशासनिक ताक़त भी है जिसके बेजा इस्तेमाल का अंदेशा पीपीपी जैसी पार्टियों की तरफ़ से जताया जा रहा है। लेकिन पीएमएल क्यू के नेता और पाकिस्तान के पूर्व रेलमंत्री शेख रशीद ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन की गारंटी’ देते हैं। आसिफ ज़रदारी पर निशाने साधते हुए वे कहते हैं कि ‘आसिफ ज़रदारी पहले ये साबित करें कि जो ज़िम्मेदारी उनकी पार्टी की तरफ से उन्हें सौंपी गई है वो इसके क़ाबिल भी हैं या नहीं।‘ हालांकि शेख रशीद बेबाकी से ये स्वीकारते हैं कि ‘इसमें कोई शक नहीं कि अगर 8 जनवरी को इलेक्शन हो जाते तो पीपीपी को फ़ायदा मिलता।‘

दरअसल बेनज़ीर के बाद पार्टी की संगठनात्मक ‘इफ्स एंड बट्स’ और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ से जूझ पाने की उसमें बची रही कूवत पर ना जाएं तो पार्टी के लिए जो संभावनाएं नज़र आती हैं वो बस सहानुभूति से ही पैदा होती दिख रही हैं। बेनज़ीर हत्याकांड की जांच में कोताही और मौत की वजहों पर पर्दादारी करने की सरकारी कोशिश ने इसे एक और आयाम दे दिया है। लेकिन पीपीपी सिर्फ इसके भरोसे मैदान में उतरी तो नतीज़ा मनमाफ़िक नहीं भी हो सकता है। वैसे काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि चुनाव में वो ताक़त क्या भूमिका निभाती है जिसके सहारे बेनज़ीर और मुशर्रफ में पावर शेयरिंग जैसी डील की बात सामने आयी थी और बेनज़ीर की वतन वापसी हुई थी। क्या वो ताक़त अब भी मुशर्फर और पीपीपी को एक दूसरे से काउंटर बैलेंस करने की नीति पर चलते हुए पीपीपी को सत्ता में देखना चाहती है...या बेनज़ीर की मौत के बाद वो कोई वैकल्पिक नीति अपना लेती है। वैसे राष्ट्रीय सरकार बनाने की बात भी हवा में है। मुशर्रफ की तरफ से सर्वदलीय सरकार बनाने की पेशकश हुई है। नवाज़ शरीफ मुशर्रफ के बिना ऐसी सरकार बनाने की बात कर रहे हैं। ऐसी कोई सरकार बन पायी और चुनाव उसके तहत हुए तो सूरते हाल बदल सकती है। वैसे डर इस बात का भी है कि कहीं ऐसी कोई सरकार बनाने या न बनने के बहाने चुनाव को और ना टाल दिया जाए।

Friday, December 28, 2007

बेनज़ीर के नहीं रहने से किसे फ़ायदा?

(जनसत्ता के तीन जनवरी के अंक में प्रकाशित)

बेनज़ीर मारी गईं। बड़े दिनों तक सवाल उठेगा कि किसने मारा... या किसने मरवाया? पाकिस्तान की सियासत में भीतरी और बाहरी काफी पेंचदगियां हैं। फिर भी शक का सिरा पकड़ना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि आख़िर बेनज़ीर की मौत से किसे फ़ायदा होगा। एक, या तो उन्हें जो पाकिस्तान में तालिबानी शासन चाहते हैं। या फिर दूसरा, उन्हें जो बेनज़ीर से ख़तरा महसूस करते हों।

बेनज़ीर की पीठ पर अमेरिका का हाथ बताया जाता रहा है। ये अमेरिकी दबाव ही था जिसकी बदौलत उनकी वतन वापसी संभव हो पायी। पाकिस्तान के वे तत्व जो अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर वन मानते हैं... बेनज़ीर के भी खिलाफ रहे। उन्हें लगता रहा कि ये अमेरिकी इशारे पर चल कर पाकिस्तान को उस दिशा में ले जाएगी जो 'इस्लाम के हित' में नहीं होगा। लड़के लड़कियों के लिए अलग स्कूल जैसी ज़िद पाले बैठे ये तत्व दरअसल पाकिस्तान को उस रास्ते ले जाना चाहते हैं जिस पर तालिबानों के समय अफग़ानिस्तान चल पड़ा था। वहां से खदे़ड़ दिए गए तालिबानी भी नार्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ साथ पाकिस्तान के कई इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर चुके हैं। अमेरिकी दबाव में उन पर कार्रवाई हो रही हैं। बेनज़ीर का चुन कर आना उनके लिए और मुसीबत खड़ी कर सकता था। लिहाज़ा बेनज़ीर को रास्ते से हटाना ही उनका मक़सद बन गया था।

लेकिन कुछ और भी है जो क़ाबिले गौर है। बेनज़ीर की 18 अक्टूबर की वतन वापसी से ठीक पहले सूचना आयी कि एक तालिबानी कमांडर बैतुल्लाह मसूद ने आत्मघाती दस्ते तैयार किए हैं बेनज़ीर को मारने के लिए। बेनज़ीर के आते ही उन पर फिदायीन हमला होगा। इस सूचना पर प्रतिक्रिया देते हुए बेनज़ीर ने कहा था कि उन्हें तालिबान से उतना ख़तरा नहीं जितना मिलिटरी स्टैब्लिशमेंट में बैठे जिहादी ताक़तों से है। बेनज़ीर के शब्द थे, "मैं बैतुल्लाह मसूद से चिंतित नहीं हूं। मैं सरकार की तरफ जो ख़तरा है उससे चिंतित हूं। बैतुल्लाह जैसे लोग सिर्फ प्यादे हैं। उसके पीछे वो लोग हैं जिन्होने मेरे मुल्क़ में आतंकवाद को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है।" अब इसे आईएसआई की तरफ इशारा माने या फिर सेना में बैठे कुछ लोगों की तरफ। बेशक बेनज़ीर की हत्या की ज़िम्मेदारी के तौर पर अल-क़ायदा का नाम सामने आ रहा हो। लेकिन अगर अल-क़ायदा और तालिबान को अपनी चिंता है तो पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट में बैठे ऐसे तत्व भी कम नहीं जिनको लगता रहा कि अगर बेनज़ीर प्रधानमंत्री बन गईं तो उनकी कमाई का ज़रिए भी बंद हो जाएगा और शायद वो भी।

18 अक्टूबर की खूनी रैली के बाद बेनज़ीर ने उसकी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की थी क्योंकि उन्हें मुशर्रफ और मौजूदा सरकार पर भरोसा नहीं था। लेकिन उनकी इस मांग पर कान नहीं धरा गया। उल्टे सरकार की तरफ से हमेशा उन्हें एहतियात बरतने की सलाह दी जाती रही। कुछ इस तरह का एहतियात कि वे नेता की तरह कभी निकल ही ना पाए। कभी रैली ना कर पाए। यहां तक कि इमरजेंसी के खिलाफ जब बेनज़ीर ने लाहौर से इस्लामाबाद लॅाग मार्च का ऐलान किया तब भी वहां उनकी सुरक्षा को लेकर सचेत किया जाता रहा। लब्बोलुआब ये कि वे पाकिस्तान में रहें और चुनाव लड़े लेकिन अपने साथ लोगों को जोड़ने की कोशिश ना करें। अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाले काम न करें। उस समय मैं पाकिस्तान में ही था और हरेक फैसलों और बयानों को नज़दीक से देख पा रहा था।

मुशर्रफ पर भी आरोप है कि वे अमेरिका के कठपुतली के तौर पर काम करते हैं। यानि अमेरिकी हित को साध कर ही आगे बढ़ते हैं। दरअसल अमेरिका ने मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच समझौता करा कर ये तय करना चाहा कि मुशर्रफ सिवियन राष्ट्रपति बन कर रहें और बेनज़ीर चुनी हुई सरकार की मुखिया। ऐसे में दुनिया को पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली की तस्वीर भी मिल जाएगी और ‘वार आन टेरर’ का अमेरिकी कार्यक्रम भी चलता रहेगा। ख़ुद को और मज़ूबती देने के लिए अमेरिका ने मुशर्रफ को बेनज़ीर से और बेनज़ीर को मुशर्रफ से काउंटर बैलेंस करने की नीति अपनायी। अब बेनज़ीर के नहीं रहने से अमेरिका के काम आने का सारा दारोमदार अकेले मुशर्रफ़ के कंधे पर ही आ गया है। जब अमेरिका के सामने और कोई विकल्प नहीं तो मुशर्रफ की पीठ पर उसका हाथ तो मज़बूती से टिकेगा ही।

अब मुशर्रफ़ के दोनों हाथों में लड्डू हैं। वे चाहें तो बेनज़ीर की हत्या को बहाना बना कर 8 जनवरी को होने वाले चुनाव को टाल दें। नवंबर को नेशनल एसेंबली और प्रांतीय एसेंबलियों को भी भंग किया जा चुका है। केयर टेकर प्रधानमंत्री के तौर पर मोहम्मद मियां सूमरू को मुशर्रफ का पिछलग्गू बताया जाता है। चुनाव जितने दिन टलेंगे... सूमरू उतने दिन प्रधानमंत्री बने रहेगें। यानि उतने दिनों तक मुशर्रफ की पार्टी पीएमएल क्यू की चुनाव में संभावित हार टलती रहेगी। दूसरे शब्दों में, चुनाव टलने से मुशर्रफ की गद्दी पर पकड़ मज़बूत बनी रहेगी। क्योंकि आशंका इस बात की भी है कि अगर पीपीपी या पीएमएल नवाज़ जैसी पार्टी भारी बहुमत से जीत कर आती है तो मुशर्रफ़ को इमरजेंसी लगाने समेत कई पुराने फ़ैसलों की वजह से मुश्किल आ सकती है। हालांकि इमरजेंसी हटाने के ठीक पहले कई अध्यादेशों के ज़रिए मुशर्रफ ने अपनी स्थिति को बादशाह जैसी बना ली है। जैसे कि उनके लिए गए किसी फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती... और कई फैसलों को नई बनने वाली संसद की मंज़ूरी या तस्दीक करने की ज़रुरत नहीं होगी। लेकिन पाकिस्तान में जब सत्ता बदलती है तो कानून भी बदलते देर नहीं लगती।

दूसरी स्थिति भी मुशर्रफ के मुफ़ीद बैठती है। वे ये कि वे चुनाव न टालें। 8 जनवरी को चुनाव होने दें। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रखने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया है। मुशर्रफ इसे नज़रअंदाज कर अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहेगें। और फिर माहौल ऐसा बन गया है कि चुनाव अपने तौर तरीक़े से कराए जा सकें। इस हत्याकांड के बाद नेता रैलियां निकालने से हिचकेगें। कार्यकर्ता और अवाम भी उसमें शिरकत करने से डरेगीं। आल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेंट के बैनर तले नवाज़ शऱीफ ने नवंबर के अंत में ही चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाहरी दबाव और अपने सांसद-उम्मीदवरों की ज़िद के आगे उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। आपराधिक मुकद्दमों और साजिश के हवाले से नवाज़ और शाहवाज़ शरीफ पर का परचा पहले ही ख़ारिज़ किया जा चुका है। बेनज़ीर रही नहीं। तहरीक़े इंसाफ के नेता इमरान खान 13 और पार्टियों के साथ चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट, फजलुर्रहमान की जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम, असफंदयार वली खान की नेशनल अवामी पार्टी... ये सब लैंड स्लाइड जीत के साथ संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे में चुनाव को दिशा देने वाला कोई बचा नहीं। अब चुनाव हुए तो सत्ता में रही पार्टी पीएमएल क्यू की चलेगी। चुनाव में धाधली की आशंका पहले से ही जतायी जाती रही है।

एक ही दिक्कत है। नवाज़ शरीफ ने अब फिर से चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। ऐसे में इन चुनावों की विश्सनीयता पर और गहरे सवाल उठ खड़े होगें। जानकारी ऐसी भी मिल रही है कि नवाज़ और बेनज़ीर के बीच ये तय हो गया था कि चुनाव के दो-तीन दिन पहले हवा का रुख़ देख कर मैदान से हट लिया जाए। ये स्थिति मुशर्रफ के लिए और बुरी होती।

बेनज़ीर की हत्या की जब जांच होगी तब होगी। नतीज़ा जब आएगा तब आएगा। फिलहाल इसकी वजहों की तरफ इशारा करने के लिए तो कुछ ऐसे ही तथ्य हैं।

बेनज़ीर की हत्या से किसको फ़ायदा?

(जनसत्ता के 3 जनवरी के अंक में प्रकाशित)

बेनज़ीर मारी गईं। बड़े दिनों तक सवाल उठेगा कि किसने मारा... या किसने मरवाया? पाकिस्तान की सियासत में भीतरी और बाहरी काफी पेंचदगियां हैं। फिर भी शक का सिरा पकड़ना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि आख़िर बेनज़ीर की मौत से किसे फ़ायदा होगा। एक, या तो उन्हें जो पाकिस्तान में तालिबानी शासन चाहते हैं। या फिर दूसरा, उन्हें जो बेनज़ीर से ख़तरा महसूस करते हों।

बेनज़ीर की पीठ पर अमेरिका का हाथ बताया जाता रहा है। ये अमेरिकी दबाव ही था जिसकी बदौलत उनकी वतन वापसी संभव हो पायी। पाकिस्तान के वे तत्व जो अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर वन मानते हैं... बेनज़ीर के भी खिलाफ रहे। उन्हें लगता रहा कि ये अमेरिकी इशारे पर चल कर पाकिस्तान को उस दिशा में ले जाएगी जो 'इस्लाम के हित' में नहीं होगा। लड़के लड़कियों के लिए अलग स्कूल जैसी ज़िद पाले बैठे ये तत्व दरअसल पाकिस्तान को उस रास्ते ले जाना चाहते हैं जिस पर तालिबानों के समय अफग़ानिस्तान चल पड़ा था। वहां से खदे़ड़ दिए गए तालिबानी भी नार्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ साथ पाकिस्तान के कई इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर चुके हैं। अमेरिकी दबाव में उन पर कार्रवाई हो रही हैं। बेनज़ीर का चुन कर आना उनके लिए और मुसीबत खड़ी कर सकता था। लिहाज़ा बेनज़ीर को रास्ते से हटाना ही उनका मक़सद बन गया था।

लेकिन कुछ और भी है जो क़ाबिले गौर है। बेनज़ीर की 18 अक्टूबर की वतन वापसी से ठीक पहले सूचना आयी कि एक तालिबानी कमांडर बैतुल्लाह मसूद ने आत्मघाती दस्ते तैयार किए हैं बेनज़ीर को मारने के लिए। बेनज़ीर के आते ही उन पर फिदायीन हमला होगा। इस सूचना पर प्रतिक्रिया देते हुए बेनज़ीर ने कहा था कि उन्हें तालिबान से उतना ख़तरा नहीं जितना मिलिटरी स्टैब्लिशमेंट में बैठे जिहादी ताक़तों से है। बेनज़ीर के शब्द थे, "मैं बैतुल्लाह मसूद से चिंतित नहीं हूं। मैं सरकार की तरफ जो ख़तरा है उससे चिंतित हूं। बैतुल्लाह जैसे लोग सिर्फ प्यादे हैं। उसके पीछे वो लोग हैं जिन्होने मेरे मुल्क़ में आतंकवाद को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है।" अब इसे आईएसआई की तरफ इशारा माने या फिर सेना में बैठे कुछ लोगों की तरफ। बेशक बेनज़ीर की हत्या की ज़िम्मेदारी के तौर पर अल-क़ायदा का नाम सामने आ रहा हो। लेकिन अगर अल-क़ायदा और तालिबान को अपनी चिंता है तो पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट में बैठे ऐसे तत्व भी कम नहीं जिनको लगता रहा कि अगर बेनज़ीर प्रधानमंत्री बन गईं तो उनकी कमाई का ज़रिए भी बंद हो जाएगा और शायद वो भी।

18 अक्टूबर की खूनी रैली के बाद बेनज़ीर ने उसकी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की थी क्योंकि उन्हें मुशर्रफ और मौजूदा सरकार पर भरोसा नहीं था। लेकिन उनकी इस मांग पर कान नहीं धरा गया। उल्टे सरकार की तरफ से हमेशा उन्हें एहतियात बरतने की सलाह दी जाती रही। कुछ इस तरह का एहतियात कि वे नेता की तरह कभी निकल ही ना पाए। कभी रैली ना कर पाए। यहां तक कि इमरजेंसी के खिलाफ जब बेनज़ीर ने लाहौर से इस्लामाबाद लॅाग मार्च का ऐलान किया तब भी वहां उनकी सुरक्षा को लेकर सचेत किया जाता रहा। लब्बोलुआब ये कि वे पाकिस्तान में रहें और चुनाव लड़े लेकिन अपने साथ लोगों को जोड़ने की कोशिश ना करें। अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाले काम न करें। उस समय मैं पाकिस्तान में ही था और हरेक फैसलों और बयानों को नज़दीक से देख पा रहा था।


मुशर्रफ पर भी आरोप है कि वे अमेरिका के कठपुतली के तौर पर काम करते हैं। यानि अमेरिकी हित को साध कर ही आगे बढ़ते हैं। दरअसल अमेरिका ने मुशर्रफ और बेनज़ीर के बीच समझौता करा कर ये तय करना चाहा कि मुशर्रफ सिवियन राष्ट्रपति बन कर रहें और बेनज़ीर चुनी हुई सरकार की मुखिया। ऐसे में दुनिया को पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली की तस्वीर भी मिल जाएगी और ‘वार आन टेरर’ का अमेरिकी कार्यक्रम भी चलता रहेगा। ख़ुद को और मज़ूबती देने के लिए अमेरिका ने मुशर्रफ को बेनज़ीर से और बेनज़ीर को मुशर्रफ से काउंटर बैलेंस करने की नीति अपनायी। अब बेनज़ीर के नहीं रहने से अमेरिका के काम आने का सारा दारोमदार अकेले मुशर्रफ़ के कंधे पर ही आ गया है। जब अमेरिका के सामने और कोई विकल्प नहीं तो मुशर्रफ की पीठ पर उसका हाथ तो मज़बूती से टिकेगा ही।

अब मुशर्रफ़ के दोनों हाथों में लड्डू हैं। वे चाहें तो बेनज़ीर की हत्या को बहाना बना कर 8 जनवरी को होने वाले चुनाव को टाल दें। नवंबर को नेशनल एसेंबली और प्रांतीय एसेंबलियों को भी भंग किया जा चुका है। केयर टेकर प्रधानमंत्री के तौर पर मोहम्मद मियां सूमरू को मुशर्रफ का पिछलग्गू बताया जाता है। चुनाव जितने दिन टलेंगे... सूमरू उतने दिन प्रधानमंत्री बने रहेगें। यानि उतने दिनों तक मुशर्रफ की पार्टी पीएमएल क्यू की चुनाव में संभावित हार टलती रहेगी। दूसरे शब्दों में, चुनाव टलने से मुशर्रफ की गद्दी पर पकड़ मज़बूत बनी रहेगी। क्योंकि आशंका इस बात की भी है कि अगर पीपीपी या पीएमएल नवाज़ जैसी पार्टी भारी बहुमत से जीत कर आती है तो मुशर्रफ़ को इमरजेंसी लगाने समेत कई पुराने फ़ैसलों की वजह से मुश्किल आ सकती है। हालांकि इमरजेंसी हटाने के ठीक पहले कई अध्यादेशों के ज़रिए मुशर्रफ ने अपनी स्थिति को बादशाह जैसी बना ली है। जैसे कि उनके लिए गए किसी फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती... और कई फैसलों को नई बनने वाली संसद की मंज़ूरी या तस्दीक करने की ज़रुरत नहीं होगी। लेकिन पाकिस्तान में जब सत्ता बदलती है तो कानून भी बदलते देर नहीं लगती।

दूसरी स्थिति भी मुशर्रफ के मुफ़ीद बैठती है। वे ये कि वे चुनाव न टालें। 8 जनवरी को चुनाव होने दें। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रखने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया है। मुशर्रफ इसे नज़रअंदाज कर अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहेगें। और फिर माहौल ऐसा बन गया है कि चुनाव अपने तौर तरीक़े से कराए जा सकें। इस हत्याकांड के बाद नेता रैलियां निकालने से हिचकेगें। कार्यकर्ता और अवाम भी उसमें शिरकत करने से डरेगीं। आल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेंट के बैनर तले नवाज़ शऱीफ ने नवंबर के अंत में ही चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाहरी दबाव और अपने सांसद-उम्मीदवरों की ज़िद के आगे उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। आपराधिक मुकद्दमों और साजिश के हवाले से नवाज़ और शाहवाज़ शरीफ पर का परचा पहले ही ख़ारिज़ किया जा चुका है। बेनज़ीर रही नहीं। तहरीक़े इंसाफ के नेता इमरान खान 13 और पार्टियों के साथ चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट, फजलुर्रहमान की जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम, असफंदयार वली खान की नेशनल अवामी पार्टी... ये सब लैंड स्लाइड जीत के साथ संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे में चुनाव को दिशा देने वाला कोई बचा नहीं। अब चुनाव हुए तो सत्ता में रही पार्टी पीएमएल क्यू की चलेगी। चुनाव में धाधली की आशंका पहले से ही जतायी जाती रही है।

एक ही दिक्कत है। नवाज़ शरीफ ने अब फिर से चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। ऐसे में इन चुनावों की विश्सनीयता पर और गहरे सवाल उठ खड़े होगें। जानकारी ऐसी भी मिल रही है कि नवाज़ और बेनज़ीर के बीच ये तय हो गया था कि चुनाव के दो-तीन दिन पहले हवा का रुख़ देख कर मैदान से हट लिया जाए। ये स्थिति मुशर्रफ के लिए और बुरी होती।

बेनज़ीर की हत्या की जब जांच होगी तब होगी। नतीज़ा जब आएगा तब आएगा। फिलहाल इसकी वजहों की तरफ इशारा करने के लिए तो कुछ ऐसे ही तथ्य हैं।

Wednesday, December 26, 2007

बोल कि क्यूं लब आज़ाद नहीं हैं मेरे

पाकिस्तान में ब्लॅाग्स को पहले भी ब्लॅाक किया जाता रहा है। इसकी कुछ बानगी यहां क्लिक कर देखी जा सकती है। मेरे ब्लॅाग को रोकना इसी एक कड़ी लगती है। वजह चाहे जो भी रहीं हो... अभिव्यक्ति की आज़ादी तो यहां सवालों के घेरे में हमेशा से रही है। पैमरा और पीपीओ कानून के ज़रिए मीडिया को बांध दिया गया है। जिओ न्यूज़ पर अब तक पाबंदी है। जिओ और एआरवाई समेत कई चैनलों के कई एंकरों को शो नहीं करने दिया जा रहा। लाईव शो नहीं हो सकते। सरकारी फैसलों को लेकर असंवैधानिक जैसे शब्द नहीं लिखे जा सकते।
जिओ के पत्रकार जूझ रहे हैं। वो आंदोलन चला रहे हैं कि 'बोल कि लब आज़ाद हैं मेरे...' लेकिन असल आज़ादी अभी दूर नज़र आती है।

http://greensatya.blogspot.com/2006/03/blogger-blocked-in-pakistan.html

http://www.globalvoicesonline.org/2006/03/02/pakistan-blogspot-blogs-blocked-in-pakistan/

http://spiderisat.blogspot.com/2006/03/blogspot-and-other-sites-blocked.html

http://www.zackvision.com/weblog/2006/03/blogspot-pakistan.html

http://ovaiskhan.blogspot.com/2006/03/blogspot-blocked-in-pakistan-some.html

http://valleyoftruth.blogspot.com/2007/12/my-blog-is-blocked-in-pakistan.html