Saturday, November 10, 2007

खामोशी... तूफ़ान के पहले या बाद की?

(पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर मेरा ये आलेख कल यानी ९ नवम्बर के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. इसे मैं यहाँ अपने ब्लोगर साथियों के लिए पेश कर रहा हूँ)

ना तो पत्थर चल रहे हैं... ना ही टायर जलाए जा रहे हैं. ना ही पुलिस घेरे को तोड़ने की कोशिश में लाठी खाता... आंसूगैस में आँखें जलाता जनसैलाब ही. सड़कों पर लोग हैं... पर अपने अपने काम से. कुछ इलाके को छोड़ दें तो... सुबह ज़िंदगी की शुरुआत वैसी ही हो रही है जैसे पहले होती थी. शाम को लोग अपने घरों को वैसे ही लौट रहें हैं. लाहौर के फ़ूड स्ट्रीट में खाने के शौकीनों की भीड़ भी कम नही हुई है. मुल्क में इमरजेंसी लगने के बाद आम ज़िंदगी में सतही तौर पर कुछ भी बदलाव नज़र नही आता. लेकिन इस सच को पाकिस्तान का पूरा सच मन लेना यहाँ की समस्या के बहुआयामी चरित्र से मुंह चुराना होगा. ग्वालमनडी स्ट्रीट में अपनी पत्नी और ४ बच्चों के साथ खाना खाने आए ४५ साल के मोहम्मद शफीक साफ करते हैं कि हैं कि हालात कोई नए नहीं बने हैं. सियासी मुश्किलातें पहले भी आती रहीं हैं इसलिए आदत सी पड़ गई है. फिर अपने शौक-मौज को कब तक दफ़न करते रहें!

दुनिया भर के टीवी चैनलों पर आज कल पाकिस्तान की जो तस्वीरें दिखायी जा रही हैं... वो भी पाकिस्तान का सच है. लेकिन वो टुकडों में है. विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं...लेकिन छिटपुट तौर पर. वकीलों- जजों, एनजीओ-मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों पर कार्रवाई हो रही है. किसी की गिरफ्तारी होती है तो सीधी ख़बर आती है. यहाँ दिए जा रहे बयानों में इमरजेंसी से लड़ने की बात की जा रही है. लेकिन फिलहाल वो असर छोड़ पाती नज़र नही आ रहीं.

क्यों है ऐसा? वजह कई हैं. टीवी न्यूज़ चैनल बंद पड़े है. लोगों तक सीधी ख़बर नहीं पहुँच रही. अख़बार अगले दिन सुबह ही मिल पाता है. जानकारियाँ दूसरे देशों से होकर आ रहीं है. इसलिए छोटी-छोटी कोशिशें बड़े आन्दोलन का रूप नही ले पा रही. पंजाब यूनिवर्सिटी के एक छात्र की राय है कि जिया-उल-हक के वक्त से ही छात्र संघों को पनपने नही दिया गया. लिहाज़ा देश की सियासत तय करने में छात्र आन्दोलन की कभी कोई भूमिका बन ही नही पायी. मौजूदा वक्त में नौजवान भी खामोश हैं क्योकि उनका अपना कोई नेतृत्व नही है...और अगर छात्र-नौजवान उदासीन हों तो बड़े आन्दोलन की उम्मीद बेमानी है.

मुखालफत करने वाले वकीलों को बड़ी तादाद में अन्दर कर दिया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एनजीओ से जुडी कई हस्तियों को या तो जेल भेज दिया गया है या फिर उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया गया है. इनमें अस्मा जहाँगीर भी हैं और इस्लामाबाद बार असोसिएशन के प्रेसिडेंट एतेजाज़ अहसन भी. . किसी को लाहौर से अर्रेस्ट किया जाता है तो ३०० किलोमीटर दूर बहावलपुर जेल ले जाया जा रहा है. बहावलपुर से उठा कर फैसलाबाद. ऐसे में नेतृत्व और आक्रोश छितर से गए हैं. राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक शख्स... जो अपना नाम नही देना चाहते...कहते हैं कि जिस तरह से सारी बदोबस्ती की गयी है... तैयारी काफी पुरानी लगती है...हलक से आवाज़ निकालने का किसी को मौक़ा ही नही मिला.

दूसरी तरफ़, राजनीतिक दल अपनी साख खोये नही तो कम तो कर ही चुके हैं. नवाज़ शरीफ देश लौटने की लड़ाई में ही फँसे हैं. आवाम के सामने विकल्प ज़्यादा हैं नहीं. आठ साल बाद मुल्क लौटीं बेनजीर लोगों से लगातार अपील कर रहीं हैं कि सड़क पर उतारें. लेकिन उनकी बात असरदार साबित नही हो रही. उन पर ख़ुद जेन. मुशर्रफ से अंदरूनी तालमेल का आरोप लगा हुआ है. ओल्ड रावियन ऐसोसिअशन के नाविद बलोच का कहते हैं कि ऐसे में उनपर भरोसा करना मुश्किल है. १८ अक्टूबर की खूनी रैली से लोग अब तक उबर नहीं पाये है. नाविद आगे कहते हैं कि जेहन में सवाल है कि जान दे तो किसके लिए? उनके लिए जो सैनिक शासन ख़त्म करने के नाम पर उससे ही समझौता कर बैठे हैं?

हालांकि बेनजीर ने इमरजेंसी को मार्शल ला जैसा करार दिया है. वो मुशर्रफ के इस क़दम के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहीं हैं. लेकिन वो आवाम के कानों में गूँज नही पा रही. लाहौर के एक कारोबारी कहते हैं कि जिनको सत्ता चाहिए वो बैठ कर तक़रीरें करे तो आवाम सड़क पर जान क्यों लड़ाए! बेनजीर को अपनी सुरक्षा का भी खतरा है. इसलिए उन्हें सड़क पर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा. उन्होंने १३ नवम्बर को लाहौर से इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च और करने और रोके जाने पर धरना देने का फ़ैसला किया है. पीपीपी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी तो हो रही है. लेकिन बकौल एक राजनीतिक कार्यकर्ता... उनमें चिंगारी जैसी बात नज़र नहीं आ रही आ रही.

यहाँ के अखबारों में रूलिंग पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट शुजात हुसैन का उम्मीद से भरा बयान है कि इमरजेंसी ३ हफ्ते में हट जायेगी. जेन. मुशर्रफ भी साफ कर रहे हैं कि इमरजेंसी लंबे टाइम के लिए नही है...लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से पहले नहीं हट सकता जो उनके प्रेसिडेंट होने के वैधानिकता पर आनी है. इसमें ६ महीने से साल भर तक का समय लग सकता है. ज़ाहिर है... सभी अपने वक्त के हिसाब से चल रहे हैं.

वैसे ऊम्मीदें टूटी नहीं हैं. छोटी-छोटी मीटिंग्स हो रहीं हैं. बुधवार को लाहौर में एडिटर स्तर के पत्रकारों की मीटिंग हुई. मीडिया पर कई तरह की पाबंदी है. आवाज़ दबाने की कोशिश की कोशिश के खिलाफ वर्किंग जर्नलिस्ट कमर कस रहे है. चैनल बंद रहने की हालत में बड़े-बड़े स्पीकर के ज़रिये ख़बर बांचने की योजना बन रही है. लाहौर प्रेस क्लब पर टीवी स्क्रीन लगाने की भी बात हो रही है. अखबार मालिकों को अपने व्यापारिक हित से ऊपर उठ कर आन्दोलन में साथ देने के लिए मनाया जा रहा है. जेल और पुलिस की मार के लिए कुछ पत्रकार ख़ुद को मानसिक तौर पर तैयार कर रहें हैं. पाकिस्तान के वरिष्ट पत्रकार और साउथ एशिया फ्री मीडिया असोसिएशन के प्रेसिडेंट इम्तिआज़ आलम को इमरजेंसी के पहले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया था. लाहौर के चार थानों में 48 घंटे तक बंद रखने के बाद रिहा कर दिया गया.

इम्तिआज़ आलम, डेली टाइम्स के एडिटर नजम सेठी और कॉलम्युनिस्ट अब्दुल कादिर हसन समेत इस मीटिंग में शामिल सभी जर्नलिस्ट्स को दुनिया के दूसरे देशों की मीडिया से साथ मिलने की उम्मीद है. अलग अलग देशों के पत्रकारों को अपने देशों में जुलूस निकलने के लिए ख़त लिखे जा रहे है. इमरजेंसी की ख़बरों को फोकस कर अभी तक दुनिया की मीडिया ने जो साथ दिया है... उसकी सराहना की जा रही है. अपने मुल्क में अपनी बात नही पहुंचा पाने की इनकी मजबूरी को इससे राहत मिल रही है. पंजाब यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष आरिफ हमीद चौधरी को लगता है कि आखिरकार दुनिया का दबाव काम आयेगा. लेकिन वे यहाँ के पत्रकारों को भी सड़क पर उतरने की ज़रूरत पर ज़ोर डाल रहे हैं.

सबों को पता है कि ये लड़ाई एक या दो हफ्तों कि नहीं है. इमरजेंसी...मार्शल ला से पहले भी जूझना पडा है. इस बार भी लड़ाई लम्बी होने जा रही है. इसलिए आधी-अधूरी तैयारी जम्हूरियत लाने वाली साबित नही होगी.

Friday, November 9, 2007

इमरजेंसी में ब्लोगिंग : मेरी सौवीं पोस्ट

बेनज़ीर को हॉउस अरेस्ट करने की ख़बर है. रावलपिंडी जाने के सारे रास्ते ब्लाक किए जाने की भी ख़बर है जहाँ बेनज़ीर की सभा होने वाली थी. पीपीपी वर्करों को बड़े पैमाने पर पकड़े जाने की सूचना है. अखबारों में जेन मुशर्रफ का बयान प्रमुखता से छपा है कि १५ फरवरी के पहले चुनाव हो जायेंगे. अमेरिकी प्रेसिडेंट बुश का बयान भी है कि उन्होंने पाकिस्तान में चुनाव और वर्दी छोड़ने के मुत्तालिक मुशर्रफ से दो टूक बात की है. ये यहाँ के लिए उम्मीद जगाने वाला बयान है... अगर कुछ और बात सामने नही आई तो...!

यहाँ के पत्रकारों ने बाजू पर काली पट्टी बांधनी शुरू कर दी है. तब तक बंधते रहेंगे जब तक इमरजेंसी नही हटा ली जाती. नामी पेंटर और जर्नलिस्ट सलीमा हाश्मी बाजू पर भी ये नज़र आ रही है. अपने अपने हिसाब से लोग खड़े हो रहे है.

पाकिस्तान में ब्लोग्स अभी उतना लोकप्रिय नही हुआ है. लेकिन मेरे लिए ये यहाँ किसी वरदान से कम नही. जो कुछ भी यहाँ देखता हूँ, वक्त पर पोस्ट कर देता हूँ. और कोई जरिया अभी नही है. यहाँ हिन्दी सॉफ्ट-वेअर नही है. लेकिन उसका रास्ता मैंने कुछ इस तरह निकला. गूगल के ट्रांसलिट्रेशन पर जा कर रोमन में टाइप करता हूँ. वो उसे देवनागरी में बदल देता है. आप में से कई इससे परिचित होंगे. नेपाली, अफगानी, बंगलादेशी, श्रीलंकन... सारे दोस्त समझते हैं कि मैं बहुत टेक्नो-सेवी हूँ. जब बताता हूँ कि मैं कम्प्यूटर अज्ञानी हूँ टू इन्हे भरोसा नही होता.

आज दीवाली है. पाकिस्तान समेत यहाँ जितने भी मुल्क के लोग हैं सबों ने दिवाली विश. इतना सारे विश जितने दिल्ली में रहते हुए कभी नही मिले. दिल्ली में तो ज्यादातर एसऍमएस से ही लोग काम चलाते हैं.

दीवाली पर यहाँ हमें मन्दिर ले जाने का बंदोबस्त किया गया है. हालांकि मैं बहुत ज़्यादा धार्मिक प्रवृति का नही हूँ. लेकिन यहाँ मन्दिर जा रहा हूँ तो यहाँ के अल्पसंख्यकों से शायद मुलाक़ात हो जाए. देखू तो वो किस हाल में है. जैसा प्रपोगेट किया जाता रहा है वैसा या फिर बेहतर. दरअसल पाकिस्तान का ये दौरा कई मायनो में आँखें खोलने वाला साबित हो रहा है. कई सुनी-सुनायी बातें यहाँ बेतुकी साबित हो रहीं है. कई अनजान पहलू सामने आ रहें है. इनमें से ज्यादातर सुखद अनुभूति देने वाले है.

जिस गेस्ट हॉउस में ठहरें है... वहाँ शाम को दीवाली मनायी जायेगी. बंगलादेशी दोस्त फ़रहाना सुबह बहुत खुश थी कि आज दीवाली की छुट्टी होगी. लेकिन नही मिली तो दुखी है. उसे मन्दिर जाने को भी नही मिल रहा है. लिहाज़ा नेपाल के दो और इंडिया के दो, कुल चार जो हिंदू हैं लोग ही मन्दिर जा सकते हैं. खैर... सुरक्षा वजहों से ये यहाँ की स्थानीय व्यवस्था है. हम कुछ नही कह सकते.

Thursday, November 8, 2007

इमरजेंसी की पहली रात

3 नवम्बर 2007

... रात के १० बज चुके हैं. लोगों की आंखों से नींद गायब है. इम्तिआज़ उल हक टीवी सुन कर नोट्स बना रहें हैं. उर्दू के कई मुश्किल अल्फ़ाज़ों का मतलब मैं उनसे पूछते जा रहा हूँ. माहौल बोझिल हो रहा है. मैं बाहर निकलता हूँ. ताज़ा ठंढी हवा के लिए. साथ में अफगानिस्तान के पत्रकार अली अहमद शेरानी हैं.

गेस्ट हॉउस के बाहर कुछ चेहरे हमारे चेहरों को झांकते नज़र आते हैं. शायद इस उत्सुकता में कि हमारे दिमाग में क्या चल रहा है. हम जल्द ही ऊपर गेस्ट हॉउस चले आते है. ११ बजने वाले हैं. जेन. मुशर्रफ का संबोधन होने वाला है. हम रिसेप्शन की जगह एक कमरे में हैं. इस मुल्क के कई लोग हमारे साथ बैठे हैं. जेन. मुशर्रफ का संबोधन थोड़ी देर से शुरू होता है. उन्होंने जो कहा और जिस तरह से कहा उससे पूरी दुनिया ने सुना.

साथ बैठे पाकिस्तानी उदासीन हैं. इस सब से बाहा निकलना चाहते है. शेरो-शायरी का दौर शुरू होता है. सुबह ४ बजे तक चलता है. सुबह ६ बजे फिर निकलना है. आधे घंटे की झपकी के बाद सभी फिर टूथ-ब्रश कर रहे हैं. पाकिस्तान में इमरजेंसी की ये हमारी सिर्फ़ पहली रात है. कई और आनी बाकी है.

Tuesday, November 6, 2007

पाकिस्तान में इमरजेंसी की हमारी पहली रात

तारीख ३ नवम्बर 2007

....पाकिस्तानियों के लिए इमरजेंसी कोई नई बात नहीं है. इसका अनुभव इन्हे कई बार पहले भी हो चुका है. इसलिए जो भी टीवी के सामने बैठे है, उनके चेहरे को पढ़ना मुश्किल नहीं. पर जुबां खामोश हें. बीच से एक आवाज आती है...फिर १७ साल पीछे चला गया मुल्क! फिर लम्बी खामोशी. रायल टीवी अपडेट्स आ रहें हैं. गिरफ्तारियों की ख़बर है. सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन के प्रेसिडेंट ऐह्तेजाज़ हसन को गिरफ्तार किया जा चुका है. कई और न्यायाधीश कार्रवाई की ज़द में हैं.

सबों को इंतज़ार हैं मुशर्रफ के संबोधन का. ख़बर आती है वो रात ११ बजे बोलेंगे.

अब तक तनाव ने अपनी जगह बना ली है. वो चेहरों पर नज़र आने लगा है. एक माँ फ़ोन पर शायद अपने बच्चे के कह रही है..." मोबाइल में बैलेंस बढ़ा लो. आटा ले आना. मैं शायद आज पहुँच न पाऊं. इस्लामाबाद से डेढ़ सौ किलोमीटर पीछे हूँ. वहाँ पहुँचने के रास्ते बंद कर दिए गए है. पर चिंता मत करना. मैं ठीक हूँ. अब्बू भी ठीक हैं..." इन शब्दों का अंतर्विरोध आप भी समझ सकते हैं. माँ को बच्चे की चिंता है. ख़ुद के लिए चिंतित होने को नही कह रही. मतलब साफ है. या तो बच्चे के लिए भी चिंतित होने की ज़रूरत नहीं...या फिर ये माँ भी सुरक्षित नहीं. बेहतर ये ही समझ सकते है.

काफी देर से मेरा मोबाइल नही बजा है. लगा कहीं बंद तो नहीं हो गया. देखा तो चालू था. पाकिस्तानी समय के हिसाब से ६ बज कर ४८ मिनट पर मुनीर जी का मैसेज था. EMERGENCY IN THE COUNTRY. अब तक सभी साथियों के फ़ोन घनघनाने लगे थे. लाहौर से सदफ के घर से फ़ोन था. घर के लोग चाहते थे कि वो आज ही लौट आए. शहराम के घर भी चिंता थी. सभी बोल-भरोस दे रहे थे. लौटने का ये सही वक्त नहीं था.

जारी...

पाक इमरजेंसी के शुरुआती लम्हें

....ये फ़ोन हमारे राजनीतिक सम्पादक मनोरंजन भारती का है. कह रहें हैं की वहाँ इमरजेंसी के हालात हो गए है. साथ में हिदायत कि अपना ख्याल रखना और जो भी करना सोच समझ कर करना.
हम एक ऐसे इलाके मैं हैं मोबाइल सिग्नल भी ठीक से काम नही कर रहा. सूचना का और कोई जरिया नहीं. अमीन ने बताया कि तमाम प्राइवेट चैनल को ऑफ़ एयर कर दिया गया है. जानकारी ये भी आ रही है कि आधिकारिक ऐलान नही हुआ है. राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ़ मुल्क को कभी भी संबोधित कर सकते हैं.

तभी दिल्ली ऑफिस से फ़ोन आया. फोनो के लिए. कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. उनको मेरी चिंता है. जानकारी के लिए ऑफिस की मुझ पर कोई कोई निर्भरता नही. वैसे भी पाकिस्तान से निकलने वाली जानकारी सीधी और ज्यादा तेज़ी से दिल्ली पहुँच रही है. ऐसा होता रहा है.

बातें करते हुए मैं मलोड के मन्दिर की तस्वीरें भी लेता जा रहा हूँ. फीचर स्टोरी के लिए. हार्ड ब्रेकिंग न्यूज़ से अलग जो सामने हैं. ज़रूरत और मौक़ा अति-उत्साह दिखाने का नही है. खैर... शाम घनी हो आयी है. अँधेरा हो चुका है. रात लम्बी होने के आसार हैं. हम वापस कल्लर-कहार की तरफ़ चल पड़े हैं.

क़रीब घंटे भर के इस सफर में मुद्दा मुल्क के सियासी हालात का ही छाया हुआ है. थोड़ी देर पहले तक हालात अलग थे. सुबह क़रीब सात बजे जब से चले थे ततो कोई भी सियासी बात नही कर रहा था. बस में हिन्दी गाने बज रहे थे और सभी नाच रहे थे. लाहौर से इस्लामाबाद को जोड़ने वाले मोटर-वे पर बस १०० किलोमीटर/घंटे से भी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी. पाकिस्तान के मोटर-वे की तुलना भारत के एक्सप्रेस-वे से की जा सकती है. लेकिन उससे ज़्यादा तरतीब. नियम-कायदों की ज़्यादा सख्ती. लेकिन सड़क और सियासत में फर्क होता है.

शाम के सात बज चुके हैं. हम कल्लर-कहार के गेस्ट हॉउस पहुँच चुके हैं. सारी निगाहें टीवी सेट पर जमी हैं. तमाम प्राइवेट चैनल ऑफ़ एयर है. सिर्फ़ रायल चैनल दिख रहा है.

जारी...

Monday, November 5, 2007

पाकिस्तान में जिस शाम इमरजेंसी लगी

तारीख ३ नवम्बर 2007

पाकिस्तान के चकवाल जिले के कल्लर-कहार का इलाका. हम कुछ तारीखी जगहों की सैर पर है. कटास राज मन्दिर देखने के बाद मलोड के शिव मन्दिर की ओर बढ़ रहें हैं. गाडी छोड़ चुके हैऔर पैदल जा रहें है. पथरीला रास्ता है. काँटों वाले पेड़ रास्ता रोक रहे हैं. लेकिन हम इस प्राचीन मन्दिर की तरफ़ बढ़ रहे हैं. शाम का धुंधलका छाने वाला है. हम तेज़ कदमों से आगे जाने की कोशिश कर रहें है.

तभी साथ चल रहे जियो टीवी के पत्रकार अमीन हाफिज़ के पास इक कॉल आती है. वो पूछने के अंदाज़ बोलता है. लग गयी या लगने वाली है? कन्फर्म है? अच्छा मैं पता करता हूँ... अमीन के बात करने के तरीके से मुझे लग गया कि मुल्क में कुछ सियासी हलचल हुई है. मैंने पूछा क्या हुआ. अमीन ने बताया मुल्क मैं इमर्जेंसी लग गयी है.

इससे पहले की अमीन से इस मुताल्लिक़ आगे कुछ बात हो पाती, मेरा मोबाइल भी बज उठा.

जारी....

Wednesday, October 31, 2007

एक मुल्क की शंका-आशंका

लाहौर की चिकनी सड़कों पर गाडियाँ सरपट दौड़ती जा रही हैं. कोई पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाहता. सभी आगे कि राह ढूंढते लगते हैं. शहर की अपनी रौनक है. लेकिन अजीब खामोशी साथ है. कराची-रावलपिंडी से धमाकों की ख़बर आती है. खामोशी और गहरी हो जाती है. यहाँ के न्यूज़ चैनल्स बताते है. हालत ठीक नहीं हैं. मीडिया मुखर हो रही है. पर उनकी अपनी सीमा है. वकीलों के आन्दोलन से आवाम को जो उम्मीद बंधी वो कायम है. बेनजीर के आने ने भी जोश भर दिया है. नवाज़ शरीफ आ पाएंगे या नहीं इस पर अटकलें चल रहीं हैं. कुछ जानकारों का मानना है कि वो आयेंगे और फौज ही है जो उन्हें आने देगी. नहीं ततो चुनाव में बेनजीर इतनी मज़बूत हो जायेंगी कि अ-राजनैतिक दखल-अंदाजों को बाद में मुश्किल होगी. ऐसी ताकतों को ये मुफीद बैठता है कि वोट पार्टियों में बंटती रहे. कोई एक मुख्तार न हो.

नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में अल-कायेदा आतंकवादियों के साथ छापामार किस्म की लड़ाई चल रही है. WorldPublicOpinion. ओआरजी ने एक सर्वे किया है और उसके मुताबिक ४४ फीसदी पाकिस्तानी चाहते हैं कि वहाँ पाकिस्तानी आर्मी को भेजा जाना चाहिए. हालांकि इस सर्वे का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा मालुम पड़ता है. शहरी इलाकों के सिर्फ़ ९०७ लोगों को इस में शामिल किया गया. खैर, हमारा मकसद सर्वे को सही या ग़लत ठहराना नहीं है. यहाँ के मूड को जानना है. पिछले पांच दिनों में जितने भी लोगों से जिस भी तरह की बात हुई है...उन सभी के मुताबिक यहाँ की आवाम अब पक चुकी है. वो अपनी चुनी हुई सरकार चाहती है.


सुबह यहाँ के एक न्यूज़ चैनल पर तक़रीर चल रही थी. भारतीय लोक-तंत्र की दुहाई दी जा रही थी. वहाँ के मज़बूत इलेक्शन कमीशन जैसी संस्था की यहाँ ज़रूरत महसूस की जा रही है. लेकिन तमाम बहस के बाद भी कोई ये बता सकने की हालत में नही...कि मुल्क किस दिशा में बढ़ रहा है.

(फोटो सौजन्य AFP)

Monday, October 29, 2007

लाहौर की गोद में... सभी हैं यहाँ जोश में

प्रिय पाठकों.

लाहौर में आज मेरी तीसरी सुबह है. बंगलादेश से आयी पत्रकार असमा का कल जन्मदिन था सो कल देर रात तक पार्टी चली. सबसे ज़्यादा डांस अजीम ने किया. बेहतरीन नाचता है वो. अमिताभ स्टाइल में. आसिम अफगानिस्तान से है. तीन और पत्रकार अफगानिस्तान से लाहौर आए है. फरीदुल्लाह , अहमद शाह शेरानी और महिला पत्रकार फेरिबा. यहाँ श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के पत्रकारों से भी मिलने का मौक़ा मिल रहा है.

सभी एक गेस्ट हॉउस में ठहरें हैं. सो तकरीबन २४ घंटे साथ रहते हैं. गेस्ट हॉउस का आलम कुछ कुछ बिग बॉस के घर जैसा है. लेकिन यहाँ साजिश नहीं है. ना ही कोई जीतने या हारने का भाव. यहाँ प्यार है. अलग-अलग मुल्कों की आवाम के बीच का प्यार. और इसकी मेजबानी कर रहे है पाकिस्तान के लोग.

अभी ज़्यादा घूमना नही हुआ है. कल गद्दाफी स्टेडियम गया था. पाकिस्तानी टीम प्रैक्टिस कर रही थी. अफ्रीका से आख़िरी मैच के पहले की प्रैक्टिस. शाहिद अफरीदी से बात हुई. शाहिद ने कहा... आ रहा हूँ इंडिया. दरअसल पाकिस्तानी टीम भारत आने की तैयारी में जुटी है. लेकिन अभी कोई भी खिलाडी उसके बारे में आन रिकार्ड बोलना नही चाहता. मैंने क्रिकेट फैंस से भी बातें की. एक क्रिकेट फैन भविष्यवाणी के अंदाज़ में बोला... शोएब ने तेंदुलकर को पहली गेंद पर बोल्ड करना है... शाहिद ने श्रीसंत को छक्के उद्दाने हैं...हमारी टीम जीत कर आयेगी. मैंने उसके कंधे पर हाथ रख विश किया... भारत से क्या होगा पता नही...पर कामना करता हूँ कि पाक टीम साउथ अफ्रीका से मौजूदा सीरीज़ ज़रूर जीत जाए! सभी क्रिकेट प्रेमियों को भारत-पाक सीरीज़ का बेसब्री से इंतज़ार है. लेकिन वे वीजा की समस्या से भी वाकिफ है. सियासतदानों से शिकायत है. पर आवाम के लिए चाहत...

ये रेस्टोरेंट में भी दिखा. गुलबर्ग इलाके के लिबर्टी मार्केट में salt n' pepper में लंच करने गया. साथ में जियो टीवी के पत्रकार शाहबाज़ थे. हिन्दुस्तानी हूँ ये पता चलते ही वेटरों ने ख़ास ख़याल रखना शुरू कर दिया. सबों की निगाह मुझ पर थी...लेकिन इस तरह की मैं असहज ना महसूस करूँ. रेस्टोरेंट से निकलते हुए निगाहें आख़िरी सीधी तक साथ रहीं.

आगे भी लिखता रहूंगा. अभी के लिए खुदा हाफिज़

Saturday, October 27, 2007

अ लेटर फ्रॉम लाहौर

प्रिय ब्लागर बंधुओं,

दिल की तमन्ना थी कि मुल्क के उस आधे हिस्से को देखूं जो १४ अगस्त १९४७ की रात पाकिस्तान बन गया. तमन्ना पूरी हो रही है. कल ही दिल्ली से लाहौर पहुँचा हूँ. अगले एक महीने तक पाकिस्तान में ही रहने का प्रोग्राम है. यहाँ जो कुछ भी देखूंगा... महसूस करूँगा... आप सबों को बताते रहने की कोशिश करूँगा.

कल रात जब लाहौर एअरपोर्ट से बाहर निकला ततो एक शख्स ने बड़े प्यार और जोश से पूछा... आप इंडिया से आए हैं? मैंने कहा... जी. जवाब सुनते ही उनके साथ खड़े दूसरे लोगों की आँखों में चमक सी आ गयी. उनके चेहरे के भाव से लगा कि अपने इंडियन भाइयों को देख यहाँ की आवाम किस तरह खुश होती है...जैसे उनका कोई बिछड़ा भाई उनसे मिला हो!

फिर मिलता हूँ

Wednesday, October 24, 2007

गोवा में समंदर और आसमान के कुछ दिलकश नज़ारे




ये सभी तस्वीरें मोबाईल फोन कैमरे से ली गई हैं। उम्मीद है कि जिन्होने गोवा देखा है उनकी यादें ताज़ा हो गई होगीं और जिन्होने नहीं देखा है उनकी ललक और बढ़ गई होगी।

Tuesday, October 16, 2007

महानता की ओर बढ़ते कदम

नेताओं के महान बनने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। आधुनिक भारतीय नेतृत्व के इतिहास में ये सिर्फ दूसरा मौक़ा है जब कोई नेता अपने कार्मिक वजहों से महानता प्राप्त कर सकता है... और काफी हद तक कर भी रहा है।

ऐसा एक मौक़ा था देश की आज़ादी के पहले, जब देश को आज़ाद कराने का मक़सद हमारे उस समय के अगुवों के सामने था। उन्हें हिंसा-अहिंसा जैसे रास्तों पर चल कर हमारे देश को आज़ाद कराया। इस क्रम में उन्होंने लाठियां खायीं, कई-कई बार जेल गए, प्रताड़ना झेली, फांसी पर चढ़े... और तब जा कर महान कहलाए। कुछ ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महानता पायी।

आज के हालात अलग हैं। स्वतंत्रता आज हमारी चेरी है। हम सभी अपने अपने ढंग से स्वतंत्र हैं। हम उसमें उसी से खेल रहे हैं। सो और स्वतंत्रता प्राप्त करने की ज़रुरत हमारे नेताओं के सामने नहीं है। आने वाले कई सालों तक हमारी ग़ुलामी की कोई उम्मीद भी नहीं है कि हम अभी से किसी नए स्वतंत्रता आंदोलन की तैयारी करें। अगर हम ग़ुलाम हुए भी तो वो ग़ुलामी पिछली ग़ुलामी जैसी नहीं होगी। हमारे पास सुख सुविधा के तमाम साधन होंगे। बस सोच अपनी नहीं होगी। तंत्र भी संभवत: अपना ही होगा लेकिन उसे चलाने वाला तांत्रिक कोई और होगा। 'इह' लोकतंत्र से हम 'पर' लोकतंत्र में होंगे। स्वर्ग सा आनंद लूटेंगे। तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन की बात कैसी और नेताओं के महान बनने का मौक़ा कैसा।

रही सामाजिक कुरीतियों से लड़ कर महान बनने की बात तो उसमें भी अब सीमित स्कोप है। कुरीति समझी जाने वाली कई रीतियों को तो अब सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। ख़ासतौर पर लेनदेन संबंधी रीतियों को। समय-साल के हिसाब से नए-नए कंसेप्ट उभर कर सामने आ रहे हैं। इनमें चीज़ों को नए ढंग से व्याख्यित-परिभाषित किया जा रहा है। कल तक जो अनैतिक था, आज अलग-अलग तर्कों के सहारे नैतिक है। व्यक्तिगत लक्ष्यों के प्रति पूरा समर्पण ही आजकल नैतिकता बन गई है। ऐसे समय में नेता लोग किसे सुरीति माने और किसे कुरीति और किसे मिटा कर अपनी महानता दिखाएं? लेकिन महान तो बनना है चाहे इसके लिए महानता की नई परिभाषा ही क्यों ना गढ़नी पड़े। महानता की ओर ले जाने वाले कदमों को पुनर्निधारण ही क्यों न करना पड़े। सच है कि हर कोई अपने अपने ढंग से महान बनने की सोचता और जुगत भिड़ाता है। इसमें मीडिया उसकी सहायता के लिए बैठा है।

बिना पब्लिक के जे जाने गुप चुप तरीक़े से महान तो बना नहीं जा सकता। इसलिए परंपरागत छुटभैय्येपन से मुक्ति पानी होगी। लीक से हट कर कुछ नया करना होगा। या फिर मर जाना होगा क्योंकि बुरा से बुरा नेता भी मरने के बाद महान हो जाता है।

धोती कुरता पहन कर, किसी विचारधारा का चोगा ओढ़ कर, देश के लिए बिना मांगे जान देने की बात भर करने से अब नोटिस नहीं मिलती। अच्छी योजनाएं भी बनीं, शिलान्यास भी हुआ, काग़ज़ की नाव भी बनी, उसे प्लेन की तरह कुछ देर हवा में उड़ाया भी गया... लेकिन नाम न मिला। पिछले कई साल से बंधुआ मज़दूरी मिटाने, जनसंख्या क़ाबू करने और पर्यावरण बचाने की बात की... जनता ने ध्यान नहीं दिया। वर्षों प्राईम-मिनिस्टर रहे, मंत्रिमंडल में कई फेरबदल किए, देश चलाया, तनावों से जूझते दिखे और किंचित आध्यात्मिकता भी दिखाई... लेकिन इन सबसे महान बनने में कोई सहूलियत नहीं मिली।

अचानक कुछ घोटाले-कारगुज़ारियों के पन्ने फड़फड़ाए... हवाला, चारा, रिश्वत, जालसाज़ी...। श्रृंखला की एक से एक कड़ी। कैमरे की लाईटें चमकीं। कलम उठे। विरोध में ही सही, लिखा-बोला जाने लगा। अदालत आते-जाते समय टीवी पर दिखाए जाने लगे। जेल तक की नौबत आयी। पहले तो ख़राब लगा। फिर याद आया कि जेल यात्रा से ही तो महानता की जड़ को मज़बूती मिलती है।

फिर तो संकट का ये काल वरदान-सा लगने लगा। अपने प्रभाव को दिखा कर अपनी महत्ता बरक़रार रखने का... उसे बताने का सुअवसर है यह। कैसे करोड़पति लखपति बना जाता है इसका नज़ीर पेश कर जनता को प्रेरित किया जा सकता है। चोरी कर सीनाज़ोरी को महिमामंडित कर भी महान बना जा सकता है। नेताओं के वक्तव्यों में, इसकी झलक साफ देखी जा सकती है...अगर आंखे खोल कर देखें तो। सचमुच, भौतिक-उपभोक्तावादी आधुनिक भारत के महान व्यक्तित्व बनने जा रहे हैं वो!

(25दिसंबर1996 की मेरी डायरी का एक पन्ना)

Saturday, October 13, 2007

ईद पर सोनिया गांधी की बधाई सिर्फ मुसलमानों को!

ईद सिर्फ मुसलमानों की है। सभी देशवासियों की नहीं। कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को यही लगता है। तभी कांग्रेस मुख्यालय से उनके नाम से मोबाईल पर जो संदेश आया है वो सिर्फ मुसलमान भाईयों और बहनों के लिए ही है। पूरा टेक्स्ट इस तरह है:
"On the occasion of Eid-ul-Fitr I would like to greet all our muslim brothers and sisters. May this festival bring peace and harmony."
Sender: SoniaGandhi
sent:13-Oct-2007
19:56:57

अब ये सोनिया के ख़ुद के शब्द हैं या फिर उनके क़ाबिल सलाहकारों के, ये तो कांग्रेस ही जाने। लेकिन ये उंचे पदों पर बैठे व्यक्तित्वों की तरफ से जारी होने वाले शुभकामना संदेशों के एकदम अलग है। ईद मेरे घर में भी मनायी जा रही है। लेकिन मुझे शुभकामना क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं हिंदू हूं? तो फिर हिंदुओं के मोबाईल पर संदेश ही क्यों? वाह सोनिया जी! वाह कांग्रेस!
होता ये आया है कि त्यौहारों के मौक़े पर इन लोगों की तरफ से देशवासियों को बधाई दी जाती है। लेकिन लगता है ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोशिश में कांग्रेस ने पर्व त्यौहारों पर मुंह-देखी बात करनी शुरु कर दी है। चुनाव जो आने वाला है। लेकिन उससे पहले दशहरा और दीवाली आने वाले हैं। अब सोनिया से क्या उम्मीद करें कि इन मौक़ों पर उनके संदेश में सिर्फ हिन्दू भाईयों और बहनों को शुभकामनाएं होंगी? अगर नहीं तो क्यों? अगर हां तो क्यों?
कांग्रेस या तो भूल सुधारे या फिर दे कोई जवाब।

Friday, October 12, 2007

कोई बताए ये बच्चा हिंदू है या मुसलमान!

नाम- अज़ीज़ तहसीन, उम्र- 10 साल, कक्षा- 5वीं, दिलचस्पी- संस्कृत। हैरान ना हों। अज़ीज़ तहसीन एक ऐसी मिसाल पेश करता है जिसे देख कर हम और आप सीख सकते हैं। दिल्ली में साकेत के एमेटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले अज़ीज़ की संस्कृत में गहरी दिलचस्पी है। स्कूली क़िताब के साथ साथ गीता के भी कई श्लोक उसे कंठस्थ है। उसे श्लोक पढ़ता देख एक अलग तरह की अनुभूति होती है। शायद ये इसलिए भी क्योंकि अज़ीज़ की मां सैय्यद मुबीन ज़ेहरा और पिता तहसीन मुनव्वर का ख़ुद का भारतीय संस्कृति में भरोसा है... अकेले हिन्दू या मुसलमान जैसे पंथ में नहीं। ज़ाहिर है कि अज़ीज़ की परवरिश एक मुसलमान नहीं भारतीय परिवार में हो रही है। हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद पर अपनी रोटी सेंकने वाले भी अगर इसे देखें तो शायद उनमें भी क़ुरान और मुसलमान को जानने-समझने की इच्छा और ताक़त पैदा हो सके। उनके लिए इस ईद औऱ दीवाली का यही तोहफ़ा है मेरी तरफ से।

अज़ीज़ को सुनने-देखने के लिए नीचे क्लिक करें। ये ईटीवी पर प्रसारित एक स्टोरी है जो मैंने यूट्यूब के सौजन्य से लिया है।

http://www.youtube.com/watch?v=zBLCcyAmSkE

अज़ीज़ से सीधी बात भी की जा सकती है azeeztehseen@gmail.com पर।

शुक्रिया।

Friday, October 5, 2007

छक्कों पर करोड़ों लुटाने वालों, शहीदों को भी देखो!

मेजर दिनेश रघुरमण और मेजर के.पी. विनय ने कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहादत दे दी। शहीद होने के पहले इन्होंने कम से कम नौ आतंकवादियों को मार गिराया। तीन दिन हो गए लेकिन लगता नहीं कि किसी ने भी इनकी शहादत को अभी तक नोटिस किया है। सेना का विभागीय सम्मान और मदद अपनी जगह। लेकिन ना तो खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी बीजेपी, सेकुलर होने का राग अलापने वाली कांग्रेस, अमिताभ के सम्मान की ख़ातिर सोनिया से भिड़ने वाले अमर सिंह, आतंकवाद के खिलाफ भौंहे तान फोटो खिंचवाने वाले नरेन्द्र मोदी या खिलाड़ियों को जर और ज़मीन बांटने वाले हरियाणा या झारखंड जैसे किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री.... किसी की भी तरफ से सम्मान के दो बोल अब तक सामने नहीं आए हैं।

जम्मू औऱ कश्मीर में जवान से लेकर अफ़सर तक जान की बाज़ी लगाते रहते हैं। ये सच है कि कुर्बानी ईनाम के लिए नहीं दी जाती। लेकिन एक तरफ ये नायक अपनी गोलियों से देश के दुश्मनों को मारते हैं तो भी ख़ामोशी पसरी रहती। दूसरी तरफ बैट से निकलने वाले छक्कों पर करोड़ों बरसते हैं। सम्मान में मंच सजते हैं। कारवां निकलता है। पर सोचिए। देश का मान असल में कौन बढ़ा रहे हैं?

देश के इन वीर सपूतों को हमारी श्रद्धांजलि!!!

Wednesday, October 3, 2007

भारतीय शेरों के ढ़ेर होने पर इक शेर!

कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आप शब्दों के ज़रिए बयां ना कर सकें। बस लहज़ा ढ़ूंढने भर की ज़रुरत है। 20-20 जीत कर आए भारतीय शेर 50-50 में ढ़ेर हो गए। हालांकि आस्ट्रेलिया के साथ सीरीज़ का पहला मैच बारिश की भेंट चढ़ गया औऱ ड्रा हो गया। नहीं तो अभी तक 2-0 से पीछ होते। दूसरे मैच में भारतीय टीम के ख़राब प्रदर्शन के बाद तहसीन मुनव्वर ने लिखा है...

"दिन जो निकला हो तो फिर रात नहीं होती है
जो भी हो बात, वो बिन बात नहीं होती है।
टीम इंडिया को हमें खुल के बताना होगा
हर एक मैच में बरसात नहीं होती है!"

सुन रहे हो धोनी और युवराज!

"आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"

लोकसभा चुनाव के पुन: मंडराते सत्य को देखते हुए भारत की जनता ने एक मीटिंग का आयोजन किया। मक़सद ये रहा कि इस बार सरकार बनाने के लिए कैसे लोगों को सांसद चुना जाए। इस मीटिंग में देश के कोने कोने से और हर तबके के लोग शामिल हुए। तमाम प्रकार की मीटिंग्स की 'आम प्रकृति' के विपरीत यह एक अद्वितीय मीटिंग थी जिसमें लिए गए फ़ैसले बिल्कुल समयानुकूल रहे।

दिल्ली चलो के बैनर तले लोग ट्रेन भर भर के दिल्ली आए। फिर भी सबों ने रेल का पूरा-पूरा किराया दिया। ताकि लालू जी के मुनाफ़े में कोई कमी ना आए। वे आरक्षित डिब्बे में भी नहीं घुसे। अनुशासित व्यवहार किया। सभी शांतिपूर्वक सभा-स्थल तक पहुंचे। मीटिंग के दौरान और पश्चात भी जूतमपैज़ार की कोई नौबत नहीं आयी। बिना किसी विशेष बहस या गहन विचार-विमर्श के मीटिंगकर्ता एक नतीज़े पर पहुंच गए। किसी ने भी अलग राग नहीं अलापा। मतभिन्नता प्रकट नहीं की। इस प्रकार ये प्रयास सफल होता प्रतीत हुआ।

पहली बार देश की सम्पूर्ण जनता किसी मुद्दे पर एकमत हुई है। शायद इसलिए भी कि अब कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। देश की व्यवस्था के मूल को तो वो पहले से ही समझ रही थी। इस मीटिंग की उपलब्धि ये रही कि उसे स्वीकार भी लिया गया। तय हुआ कि अब औऱ मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए। समय आ गया है जब 'समय की मांग' को ध्यान में रख कर ही कदम उठाएं जाएं। अभी तक सांसद बनने वाले अधिकतर नेता नक़ाब ओढ़ते रहे हैं। इससे उन्हें समझने में भोली जनता को कठिनाई होती है। जनता को समझाने के लिए नेताओं को भी प्रपंचों का सहारा लेना पड़ता है। अत क्यों ना इस मजबूरी को मिटा दिया जाए। नेताओं को अपने असली रुप में सामने आने का मौक़ा दिया जाए।

तो सर्वसम्मति से यही फ़ैसला लिया गया कि उम्मीदवार चाहे जिस भी किसी पार्टी का हो, या उसे अघोषित अंतरंग संबंध रखता हो, सांसद चुने जाने के योग्य समझे जाएंगे बशर्ते आगे लिखे मापदंडों पर खरे उतरते हों।

इस बार आदर्श-मूल्यों आदि की बात करना ग़लत तरीक़े से सांसद चुने जाने का प्रयास माना जाएगा। इसलिए इस बार वही उम्मीदवार सफल होगें जो आपराधिक कार्यवृति या मनोवृति के हों। हर तरह के अपराध करने में सक्षम हों। उनका पढ़ा-लिखा होना तो अब तक ज़रुरी नहीं ही था... इस बार पुलिस रिकार्ड में फिंगर प्रिंट वाले को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, झूठे गवाह तैयार करने, प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने, पुलिस से मिलीभगत रखने जैसे कामों में दक्ष उम्मीदवार प्रिय पात्र होंगे।

इस विकासशील देश के भावी सांसदों को हर प्रकार के अपराध करने का अनुभव होना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में नई तकनीकी का इस्तेमाल करने, जैसे तंदूरी हत्या, करने वाले केन्द्र बिंदु में रहेंगे। सज़ायाफ्ता या हिस्ट्रीशीटर निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। प्रेरणा के लिए अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन, पप्पू यादव जैसे नेताओं की मोम की प्रतिमा संसद के गलियारे में लगायी जाएंगी। अमिताभ और शाहरुख़ से भी कोमल प्रतिमाएं... ताकि इनके सामने ग़लती से भी कोई आदर्श और मूल्यों की बात करे तो प्रतिमाएं शर्म से गल जाएं। और सच्चे आदर्शवादी नेता मौक़े पर ही पकड़े जाएं।

देश की जनता ने महसूस किया है कि मतदान के दौरान बूथ कैप्चरिंग आदि में सौ झमेले हैं। नाहक निर्दोषों की जान चली जाती है। उम्मीदवारों पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं और चुनाव आयोग का समय ख़राब होता है। इसलिए इस बार प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार की जगह लाउडिस्पीकर से ये बताना होगा कि मतदाताओं को वोट डालने बूथ तक जाना है या नहीं। अगर नहीं जाना तो और अच्छी बात है। वे आराम से घर पर बैठ एमटीवी देखें और लहर नमक़ीन खाकर मतदान तिथि को सेलिब्रेट करें। उधर प्रत्याशीगण यथाशक्ति वोटों का बंटवारा कर लें। इससे गोली बारूद के पैसे बचेंगे। इन पैसों से नेता और उनके प्यादों को दारू की और बोतलें मिल सकेंगी।

इन बातों के अलावा, जिन नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि संतोषप्रद नहीं रही है, लेकिन इस विषय में कुछ कर गुज़रने की जिनकी गहरी महत्वाकांक्षा है, उनके लिए भी जनता ने संसद के दरवाज़े खुले रखने का फ़ैसला किया है। शर्त सिर्फ यही कि चुनाव होने के ऐन पहले तक वे अपनी योग्यता साबित कर दें।

अंत में, भारतीय जनता की सिर्फ एक विनती है। संसद में पहुंचने के बाद एकाध करोड़ जैसी छोटी मोटी रकम के लिए भ्रष्टाचार की गरिमा को क्षति ना पहुंचाएं। सेज़, रिटेल सेक्टर में विदेशी कंपनियां, हवाई अड्डों के निजीकरण जैसे बड़े मौक़े हैं। हमेशा अरबों में खेलने की कोशिश करें। जनता का नारा है, "आम आदमी का हाथ, अपराधियों के साथ"।

आप भी लगाइए।

Monday, October 1, 2007

हम तो खड़े वहीं रहे, हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

तेज़ी से बदलती दुनिया में अगर आप अपनी ज़िंदगी में ठहराव महसूस करते हैं तो ये कविता... जो कि हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है?... आपके लिए है। जैसे कि आप बेशक अपना हैंडसेट ना बदल पाए हों पर हचुशन-एस्सार से जो हच बना, वो अब वोडाफ़ोन बन गया...कुछ इसी तरह के बदलावों और ठहरावों को दर्शाने की कोशिश की गई है यहां।

कौन छोटा बना रहा
बड़ा कौन हो गया
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

लाटों की फौज भी चाहते
काम के कुछ सिपाही
जिनके बूते दे सकें
वे अपने अस्तित्व की दुहाई
इतने लब बोले
कि मन मौन हो गया।
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

दुनिया ने देखे हैं
बड़े बड़े जलजले
कई हिटलर आए
और मुबारक़ भी पिट गए
लोकतंत्र आया तो
चौधरी कौन-कौन हो गया।
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।
हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!

हर तरफ आ रहा
कुछ ना कुछ बदलाव
पर हमें चिढ़ा रहा
अपने हिस्से का ठहराव
हैंडसेट भी वही रहा
नेटवर्क भी धोखा दे रहा
उधर, कुत्ते ने भी घर बदला
बदन झिड़क के चल दिया।

जहां पहले बेडरुम था
वहां लॉन हो गया
विस्तार की लड़ाई में
सवाल गौण हो गया।

हम तो खड़े वहीं रहे
हच भी वोडाफ़ोन हो गया!!


Wednesday, September 26, 2007

जो दिखता है वो बिकता है सरजी

अनिल जी ने जानकारी दी है कि अपमानित हॉकी टीम भूख हड़ताल करेगी। भूखों के इस देश में हड़तालें पहले भी कम नहीं हुईं हैं। अब हॅाकी वाले भी कर लें। क्या फ़र्क पड़ता है। ब्लॅाग पर जानकारी आ गई यही बहुत। कहीं ख़बर ही नहीं आएगी कि ऐसी भी कोई भूख हड़ताल हो रही है। देखा नहीं आपने! ख़बरों में क्या छाया है। खुली बस पर भज्जी का भांगड़ा... युवराज का ठुमका...श्रीसंत की फ्लाईंग किस...छी छी राम राम मत करिए! इतनी बढ़िया ख़बर कि कैसे कोई हट जाए। जश्न से सीधा भूख पर उतर जाए। ' विजुअल जर्क' भी कोई चीज़ है या नहीं।

खैर छोड़िए टांग-खिंचाई। ये बताईये कि ये हॅाकी वाले हैं कौन? कौन जानता है इन्हें? अगर ये शाहरुख़ के चक दे इंडिया वाली लड़कियां हैं तो ले आईए हमारे यहां। अपना पेट काट के भी चाय पिलाएंगे। पर अगर आप वाकई में हॅाकी वाली किसी टीम की बात कर रहे हैं तो संभल जाईए। स्टिक हमारे यहां भी है! चलते देर ना लगेगी। कर्नाटक पुलिस के पास भी होगी। नीचे से मुड़ी ना सही...सीधी ही। पर पड़ती है तो लगती ज़ोर की है। इसलिए चाहे भूख हड़ताल करें पर पुलिस की लाठी-ताल से बचके।

फिर भी उनको भूख-हड़ताल करना ही है तो थोड़ा ठहर के करें। एक एशिया कप जीत लिया तो दिमाग चढ़ गया क्या। इधर क्रिकेट टीम को देखिए। कैसे टुर्नामेंट जीतते जीतते हारे। आख़िरकार एक हारते हारते जीत गए तो आप गए अपनी डफली लेकर विघ्न डालने। एक मूवी देखकर इतना चौड़े ना हों। पहले क्रिकेटरों की तरह दिखना सीखें.... चाहे जीत में हों या हार में... फिर बिकना भी शुरु हो जाएगें। जाईए आराम कीजिए। बढ़िया खेलने की कोशिश कीजिए। फिर जो मिलता है उसमें खुश रहना सीखिए। पड़ोसी की हरी उछाल वाली पिच देख कर अपनी बॅाल चमकाना छोड़िए!

Thursday, September 20, 2007

छक्कों के 'युवराज' और 'छक्कों के बादशाह' में फ़र्क है!

जिस समय टीवी पर पूरा क्रिकेट जगत युवराज के छक्कों की बरसात देख रहा था, उसी बीच कुछ दूसरे तरह के 'छक्कों' की ख़बर भी कई चैनलों पर आ रही थी। एक का खेल नशा दे गया तो दूसरे के 'खेल' ने घिन पैदा की है।

पांच गेंद में 5 छक्के खाए तो छ: गेंद में 6 छक्के जड़ दिए! वाकई में युवराज सिंह 20-20 क्रिकेट में छक्कों के युवराज साबित हुए हैं। अपने बूते इंडिया को मैच जिता दिया। इंग्लैंड से लगान वसूल लिया।

दूसरी ख़बर दिल्ली पुलिस से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस में भर्ती होने आए जवानों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के आईपी कॅालेज की लड़कियों को जम कर छेड़ा। वे तो बहाली के लिए आए थे। वर्दी में नहीं थे। पर थे छक्के ही। और जो वर्दी में तैनात थे... वे छक्कों से कम नहीं मालूम पड़ते। रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्होंने लड़कियों की शिकायत सुनने से इंकार कर दिया। टका सा जवाब दिया.. क्या हो रहा है हमें क्या पता। नतीज़तन लड़कियों को अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ी। दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर को घेरना पड़ा। जूं फिर भी कान तक शायद ही रेंगी है। बताया जा रहा है कि तीन पुलिस वाले सस्पेंड किए गए हैं।

शायद किसी लड़की के साथ और बुरा हो जाता तब भी ये वर्दीधारी सस्पेंड ही होते। ड्यूटी पर कोताही मामले में कभी भी किसी को इससे कड़ी सज़ा की कोई फौरी व्यवस्था नहीं है। पब्लिक प्रेशर में बस सस्पेंड कर सकते हैं, सो कर दिया। जिसने भी अपनी कुर्सी पर दबाव महसूस कर सस्पेंसन को 'गो अहेड' कहा होगा... लगता है कि उसने युवराज से भी बड़ा छक्का जड़ मैदान मारने की कोशिश की है। वाकई में वो छक्कों का बादशाह ही होगा। जिनके नीचे काम करने वाले दिल्ली पुलिस के जवान अपनी जवानी ग़लत वजहों से तो दिखा जाते हैं और ज़िम्मेदारी के वक्त चूड़ियां पहने नज़र आते हैं। पर अगर 'छक्कों के इस बादशाह' को दिल्ली की जनता का, ख़ास तौर पर असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं का दिल जीतना है तो पीड़ित लड़कियों की पूरी बात सुननी होगी... इंसाफ करना होगा।

जल्दी ही दिखाउंगा कि किस तरह दिल्ली पुलिस अपने विज्ञापन में आम शहरी की मर्दानगी को ललकारती है... पर जब खुद की बारी आती है तो चूड़ी पहने नज़र आती है।

Wednesday, September 19, 2007

एक रुम-पार्टनर-दोस्त की तलाश में

कॅालेज के दिनों में राजौरी गार्डेन में रहा करते थे। पहले टू-रुम सेट में चार लोग थे। मतलब एक कमरे में दो-दो रहते थे। दो यूपीएससी एसपिरेंट थे, सो वो दोनों एक में। मैं और सौरभ एक कमरे में। एक गोरखा-भाई भी हमारे साथ था...हमारे खाने-कपड़े के लिए। हम से एकाध साल छोटा। रोटी बनाते हुए ब्रेक डांस करता था या ब्रेक डांस करते हुए रोटी बनाता था अंत तक पता नहीं चला। लेकिन दोनों सीनियर के निकल जाने के बाद मैं औऱ सौरभ एक सिंगल रुम सेट में आ गए। गोरखा-भाई को मां की याद आयी तो घर चला गया। जनपथ से हमने उसे जींस और टीशर्ट्स लेकर दिए। नेपाल से था और इसलिए बहुत ही फैशन परस्त। अच्छा लगता था ज़िंदगी के प्रति उसका जोश देखकर। उसके बारे में कभी अलग से बताउंगा।

सौरभ भी इतिहास आनर्स की कर रहा था। रामजस और फिर माईग्रेशन लेकर हिंदू कॅालेज से। मैंने अपनी पढ़ाई दयाल सिंह कॅालेज से ही जैसे तैसे पूरी की। कॅालेज की पढ़ाई के बाद मैंने जो लाईन चुनी वो आपके सामने है। सौरभ ने भी अपने करियर के लिए काफी मेहनत की। लेकिन समय के फेर में हम दूर हो गए। बीच में वो पटना लौट गया। फिर दिल्ली आया। मिला। फिर ग़ुम गया। उसकी याद आती रहती है। कॅामन जानकारों से पूछता रहता हूं। पर इधर बड़े लंबे समय से उसकी कोई खोज़-ख़बर नहीं है। अभी भी उसके पुराने दिए एक मोबाईल पर फोन किया। घंटी बजती रही कोई रिस्पांस नहीं। मन और जिज्ञासु हो गया उसके बारे में जानने को। ब्लाग के ज़रिए उस तक पहुंचने की सोचना नादानी होगी। व्यक्तिगत संबंधों के किसी और अंतरजाल (ये शब्द ब्लॅाग पर ही सीखा है...उम्मीद करता हूं कि सही इस्तेमाल कर रहा हूं) पर मैं हूं नहीं। बस उस रुम-पार्टनर-दोस्त की याद आपसे शेयर करना चाहता हूं। इसलिए लिख रहा हूं। उसके एक जन्मदिन पर मैं चार पंक्तियां लिख कर दी थी। शायद उसने संभाल के रखा हो। मैंने लिखा था...


मेरा अतीत,
एक उपवन।
कहीं उजड़ा हुआ सा
तो कुछ शेष है जीवन।

असंख्य कांटों के बीच
जैसे पुष्पित एक सुमन।

स्मृति का वो सुमन भी
कागज़ का होता,
उसमें यदि सौरभ
तुम समाया ना होता!

सौरभ पटना से है औऱ तिल-तिकड़म से हमेशा दूर ही रहा है। सपाट और बिना लाग-लपेट वाली ज़िंदगी जीने वाला। उससे भी मैंने बहुत कुछ सीखा। कभी भूले से हिंदी ब्लागिंग की दुनिया में झांक ली तो उसे पता चलेगा कि यहां भी उसका ज़िक्र है। इसी बहाने शायद फोन ही कर ले। मेरा मोबाईल नंबर वही है। दस साल पुराना।

Tuesday, September 18, 2007

कोहराम के बीच... एक मुसलमान का राम

राम और राम सेतु को लेकर कुछ कथित हिंदूवादी संगठनों ने हायतौबा मचा रखी है। कोर्ट में दाख़िल कर फिर वापस ले लिया गया हलफ़नामा अपनी जगह... और उसमें जाने-अनजाने की गई ग़लती अपनी जगह, लेकिन ऐसा नहीं कि भगवान राम सिर्फ हिंदुओं के राम हैं। वो बाक़ी धर्मों के लोगों के लिए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। इसलिए तहसीन मुनव्वर ने चंद पंक्तियों में अपनी बात रखी है।

"हम दिल से करते हुए एहतराम कहते हैं,
उन्हें हम हिन्द का अब भी ईमाम कहते हैं,
दिलों के बीच बना दे जो प्यार का सेतु...
उस आला ज़ात को भगवान राम कहते हैं।"


दरअसल मुनव्वर ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर इक़बाल की कही बात को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इक़बाल की पंक्तियां हैं...

"है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उनको ईमाम-ए-हिन्द"

एक तरफ मुसलमानों की ऐसी भावनाएं और दूसरी तरफ करुणानिधि जैसे हिंदुओं का बयान कि राम ने कहां से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की ताकि ऐसा पुल बना सकें... । भावना का महत्व है या अपना फ़ायदा... आप ही तय कीजिए।

राम राम।

Monday, September 17, 2007

मेरे अपराध-क्षेत्र अब बड़े हो रहे हैं...

कभी भी किताबी पढ़ाई में मन नहीं लगा। पर बचपन से ही कुछ ना कुछ लिखने का दुस्साहस करता रहा हूं। ख़ूब नहीं तो ए-फोर साईज़ के कई कागद कारे किए हैं। चाहे कोई पढ़े ना पढ़े। किसी को समझ में आए ना आए। सब ख़ुद की संतुष्टि के लिए। लेकिन मेरी पहली चंद पंक्तियां जो प्रकाशन योग्य मानी गईं, वो रहीं...

मेरे अपराध क्षेत्र अब बड़े हो रहे हैं
अगले चुनाव में हम भी खड़े हो रहे हैं!

नब्बे में लिखी गई इन पंक्तियों को 1991 में कॅालेज मैगज़ीन में जगह मिली। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कालेज में तब मैं प्रथम वर्ष में था। तब मंडल कमीशन लागू होने के बाद की आग फैल कर कुछ शांत हो चुकी थी। 'न्यू स्टार' नामक इस मैगज़ीन में मेरी कुछ औऱ पंक्तियां जिनको जगह मिली, वो हैं...

जो करते हैं साम्प्रदायिक एकता की बात
वही लगाते हैं जातीयता की आग!

ये दौर मंडल कमीशन के बाद अयोध्या में राममंदिर बनवाने के भाजपाईयों के जुनून और आम चुनाव का भी था। सो मैंने लिखा...

मंडल है गर्दिश में, मंदिर अभी रौशन है
मुद्दा तो ढूंढ़ना है, चुनावों का जो मौसम है!

द्वितीय वर्ष में मुझे कॅालेज मैगजीन का संपादक बना दिया गया। फिर मैंने क्या लिखा... अगली बार। अगर आपको जानने में दिलचस्पी हो तो!

Thursday, September 13, 2007

रिश्ते हैं रिश्तों का क्या...!

रिश्तों को लेकर हम सभी सचेत रहते हैं। गंभीर औऱ अगंभीर चेतना के साथ और कभी इन दोनों के बीच के मानसिक द्वंद्व में फंस कर भी। दूसरों के हालात पर कई बार हम अपना बड़प्पन वाला चोगा ओढ़ लेते हैं... और जब यही हमारी निजी ज़िंदगी में होता नज़र आता है तो उससे निकलने के रास्ते ढूंढ़ते हैं। ज़रुरत बारीक विश्लेषण की है। खैर... गपशप वाली शैली को आप भी जानते होंगे। क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये! पर शैली ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह भेजी है।

मुझे ये कहना है कि आज रिलेशन के मायने बदल गए/रहे हैं। शायद ये बात आपके और मेरे लिए अजीब लगे लेकिन दूसरों के लिए नहीं। इसलिए ये ग़लत है कि हम रिलेशन पर क्या सही है और क्या ग़लत है उसका फैसला करें। क्योंकि ये हर व्यक्ति का निजी मामला या सोच है। अगर कोई 'गे' है तो आप उसे कैसे गलत/सही ठहरा सकते है। जबकि 'गे' होना उसका निजी कारण है। आपने जो पिक्चर लगाई है उसी का एक्जामपल देके मै अपना प्वाइंट रखना चाहती हूं।

रिश्तों के बारे में मैं कोई ज्ञानी नहीं। लेकिन इतना तो जानती हूं कि रिश्ता शब्द ही बेहद निजी है।
इन तस्वीरों को देखकर आपको ज़रूर कुछ अलग लगा तभी आपने इन्हें यहां जगह दी। मुझे भी ये दोनों तस्वीरें चौंकाती हैं। क्योंकि ये दोनों ही भाव मेरे लिए सही नहीं। ये मेरे निजी ख्याल हैं ।
लेकिन क्या सही है और क्या गलत इसका फैसला हम और आप नहीं कर सकते क्योंकि ये रिश्तों की बात है।
रिश्ते यानी दृश्टिकोण, जो हर इंसान के लिए अलग अलग है। ये तस्वीरे आपको या मुझे तकलीफ दे सकती हैं। लेकिन क्या वाकयी ये तकलीफदेह हैं? मुझे आपत्ति तब लगी जब मैने तकलीफदेह शब्द पढ़ा। इससे लगता है कि आप लोगों से पूछ रहे हैं कि आपको कौन सा रिश्ता ज्यादा तकलीफदेह लगता है। पहला या दूसरा। क्योंकि ज़रूरी नहीं ये तस्वीरें सभी लोगों को तकलीफ देने वाली ही लगे।

मेरी प्रति-प्रतिक्रिया

शैली जी, यहां रिश्तों की निजता पर कोई शक या सवाल नहीं है। मुद्दा है कि निजी रिश्तों का एक आयाम दूसरे पहलू में तकलीफदेह साबित हो सकता है। ऐसे रिश्तों से जिनको तकलीफ़ पहुंचती या पहुंच सकती है वो भी निजी रिश्ते या रिश्तेदार ही होते हैं। प्वाईंट टू। जब निजी रिश्ता निजी ना रह कर सार्वजनिक तौर पर सामने आ जाए तो कई और सवाल उठ खड़े होते हैं। हम मोरल पुलिसिंग नहीं कर सकते। लेकिन आवाज़ें तो उठती हैं... 'धर्मयुद्ध छेड़ शुचिता' कायम करने के लिए नही तो कम से कम ऐसे रिश्तों को समझने की कोशिश में ही सही।

मेरे ख्याल से रिश्तों का सही और ग़लत होना कथित सिद्धांतों औरआदर्शों से नहीं... बल्कि इससे तय होनी चाहिए कि इसका व्यवहारिकता पर क्या असर पड़ता है। किसी को तकलीफ होती है या नहीं। जिनको तकलीफ नहीं होती वो चाहे बेशक जितने और जैसे भी रिश्ते जीएं किसी को एतराज़ नहीं होगा। लेकिन जिनको तकलीफ होती है वो तो भेद करेंगे ही। विचारेंगे ही। हम तो यहां बस नज़रियों का आदान प्रदान कर रहे हैं। वैसे आपने ठीक कहा कि संस्कार और पलाव-बढ़ाव के माहौल के हिसाब से रिश्तों के आयाम तय होते हैं। रिश्तों के बीच में हम टांग अड़ाने वाले कौन।

शुक्रिया
उमाशंकर सिंह

क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है... ये...या ये!

इंसानी रिश्तों की संभावनाएं अनंत हैं और उनमें छिपी आशंकाएं भी। ये कई तरह से और कई रुपों में हमारे आसपास मौजूद रहती हैं। कई बार जानकारी में तो कई बार अनजाने में ही सही। कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो उसे जीने वालों को तो खुशी देते हैं लेकिन उनसे जुड़े दूसरों को तकलीफ। बनते, बिगड़ते, टूटते और फिर बनते रिश्तों के बीच ज़िंदगी जारी रहती है।

इन दो तस्वीरों को मेरे एक दोस्त ने ईमेल के ज़रिए भेजा है। इस प्रतीकात्मक तस्वीरों को आप भी देखिए और बताईये कि इसमें ज़्यादा तकलीफ़देह कौन-सी होगी! या ये भी... कि दोनों ही तस्वीरें स्वाभाविक हैं...तकलीफदेह नहीं!

Wednesday, September 12, 2007

एक तस्वीर... और सब कुछ साफ साफ!

जितना 'इनडीसीप्लीन वे' में सोचोगे... उतनी ही क्रिएटीविटी आएगी। विज्ञापन के विशेषज्ञ अक्सर ऐसा सिद्धांत बताते हैं। उनका मतलब होता है लीक से हट कर... एक रास्ते पर सरपट भागते हुए नहीं... दिमाग के बंद कोनों का इस्तेमाल कर... लेकिन बेतरतीबी से नहीं...तरतीब से...एक संदेश के साथ! बेहतरीन माने जाने वाले इन विज्ञापनों को शायद इसी तरह बनाया गया है!


































यहां किसी ब्रांड का प्रचार नहीं किया गया है। बल्कि इस विधा को देखने-समझने की कोशिश की गई है। उम्मीद है आपको भी अच्छा लगा होगा। शुक्रिया

हल्की होती राजनीतिक रिपोर्टिंग...

अमर सिंह को कई लोग हल्के व्यक्तित्व का मालिक मानते हैं। मैं भी उसी इंप्रेशन में रहता रहा हूं। उनकी कई बातें ऐसा करने को पत्रकारों को बाध्य करती हैं। लेकिन कुछ दिनों पहले उनसे पार्लियामेंट में कुछ पत्रकारों ने उनसे एक सवाल किया। संदर्भ था न्यूक्लियर डील को लेकर लेफ्ट फ्रंट का बयान कि यूपीए सरकार के साथ उनका हनीमून खत्म हो गया है और किसी भी वक्त तलाक हो सकता है। पूछा गया कि 'ऐसी बातें कही जा रहीं हैं...क्या मतलब निकाला जाए।' अमर सिंह ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया... 'ये गंभीर राजनीतिक मामला है। इसे लेकर शादी...तलाक...हनीमून जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।' फिर उन्होने अपना जवाब दिया। बेशक अपनी राजनीतिक हित-साधना के हिसाब से ही दिया हो।

ऐसा नहीं है इस वाकये के बाद अमर सिंह मेरे लिए महापुरुष हो गए हों। पर कई बार आप अपने छोटे से भी सीखते हो। पर हज़ारों ऐसे होते हैं जो पूर्वजों से भी नहीं सीखते। रातों रात ना सही... अनुभवों से सीखना तो सीख ही लेनी चाहिए।

इतनी बड़ी भूमिका मैंने इसलिए बांधी क्योंकि 11 सितंबर 2007 को भी कुछ ऐसा ही हुआ। जवाब देने वालों की तरफ से नहीं। सवाल पूछने वालों की तरफ से। शेरों वाली कुर्सी पर बैठने वाले बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे कीचड़ में कमल तलाशते दिल्ली में थे। बीजेपी नेताओं को मनाने। क्यों? क्योंकि प्रतिभा पाटिल यानि एक मराठी के राष्ट्रपति बनाने को लेकर शिवसेना ने बीजेपी-एनडीए की उल्टी लाईन ले ली थी। पाटिल यूपीए की उम्मीदवार थीं... फिर भी शिवसेना ने उनको सपोर्ट किया। वो जीत गईं...बिना शिवसैनिकों के भी जीत जातीं। लेकिन प्रतिभा पाटिल की जीत ने लगता है शिवसैनिकों का गर्व से सिर उतना उंचा नहीं किया। इसलिए वो मराठा-प्रतिष्ठा का प्रश्न भुला कर फिर हिन्दी-भाषी-प्रमुख-हिन्दुओं की पार्टी बीजेपी की गोद में आ बैठे हैं। बिना लाज शरम के दिल्ली तक आए। जिस आडवाणी को अनसुना कर गए थे उनकी चौखट तक गए। सब कुछ गुडी-गुडी नोट पर हुआ।

फिर प्रेस कांफ्रेंस की बारी। पूरी दिल्ली की मीडिया। एक से एक धुरंधर पत्रकार। टीवी और प्रिंट के भी। सवाल जवाब का दौर। कई अच्छे सवाल भी। पर जिस एक तरह के सवाल ने डाॅमिनेट किया वो रहा... 'आपका और बीजेपी का तो तलाक होने वाला था, फिर अचानक आप लोग हनीमून पर कैसे जा रहे हैं?' जवाब गोपीनाथ मुंडे ने दिया... 'बच्चों ने मना किया इस उम्र में तलाक लेने को...शादी को बीस साल हो गए हैं सो साथ ही रहना है...।' ऐसे ही कई और सवाल पूछे गए। उद्धव औऱ गोपीनाथ हंस कर टालते-जवाब देते गए। कोई गहराई हो सवाल में तभी तो सोच कर बोलें। रटते रहे कि गिल-शिकवे दूर हो गए हैं। अब शिवसेना बीजेपी के साथ रहेगी। एनडीए के नेता को अपना नेता मानेगी।

बयान आधारित इस बात स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है। पर दिक्कत ये है कि राजनीतिक अवसरवाद का नमूना पेश करने वाली शिवसेना से ऐसा सवाल पूछने वाले कम ही थे...जिससे उद्धव या मुंडे को जवाब देने में परेशानी हो। पेशानी पर बल पड़े। हल्के सवालों को वे और भी हल्के में टालते गए। सामने बैठी पत्रकारों की टोली को लाफ्टर चैलेंज का आडियेंस मान हंसाते गए। जिनके भी सवाल पर वे हंसे और हंसाए वे अपने को धन्य समझते रहे। राजनीतिक रिपोर्टिंग तलाक और हनीमून जैसे शब्दों के सहारे ख़बर ढूंढती रही। कुछ सवाल और भी रहे। सीटों का बंटवारा क्या होगा। सीएम कौन बनेगा। अरे जैसा मुफीद लगेगा कर लेंगे। पूछना क्या। आख़िर साथ साथ रहना है।

पर कुछेक पत्रकारों ने जता दिया कि वे इन नेताओं के साथ मसखराबाज़ी करने नहीं आए हैं। एक ने पूछा... 'क्या आपलोग इस डर से साथ आए हैं क्योंकि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने श्रीकृष्ण कमीशन की रिपोर्ट पर अमल का संकेत दिया है?' जवाब गोलमोल रहा। एक औऱ सवाल... 'राष्ट्रपति चुनाव के समय आपने मराठी प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए बीजेपी से किनारा कर लिया...अब चुनावों की बारी आयी तो आपको लग रहा है बीजेपी के बिना आपकी कुर्सी नहीं बन सकती...तो आप फिर साथ आ गए हैं...क्या भविष्य में मराठी प्रतिष्ठा के किसी और सवाल पर आप बीजेपी से दुबारा तो नहीं कट लेंगे।' जवाब... 'जो हो गया हो गया... हम साथ साथ... 20 साल से...और अब और मज़बूती से रहेंगे।'

कहते हैं कि ख़बर मौन से निकाली जाती है। जो बोल कर बतायी जाए और जो सुनी-सुनाई जाए वो ज़्यादातर प्रपोगैंडा होती हैं। लेकिन मौजूदा माहौल में मौन को तोड़ ख़बर निकालने वाले सवाल कम ही सुनाई पड़ते हैं। पूछे भी जाते हैं तो जवाब मौन में दबा दिए जाते हैं। ज़्यादातर तो प्रपोगैंडा के आजू-बाजू ही घूमते दिखते हैं। वही संदेश जाता है जो राजनीतिक पार्टियां कहना और फैलाना चाहती हैं। न्यूज़ रूम और एडिटर की भूमिका अगर बहुत इंवोल्वमेंट वाला ना हो तो ज़्यादातर राजनीतिक ख़बरों में चकल्लस ही नज़र आता है। दरअसल हर तरफ हल्कापन आ रहा है। हम सभी शिकार हो रहे हैं। इसलिए कई बार अमर सिंह, अपने नाटकीय अंदाज़ में भी, कथनी में सही नज़र आने लगे हैं। सवाल पूछने वालों से ज़्यादा भारी नज़र आने लगे हैं।

(मैंने अपने इस अनुभव में उन राजनीतिक संवाददाताओं-संपादकों पर टिप्पणी नहीं की है जिन्होंने समय समय पर शासन-सत्ता को चुनौती दी है... और राजनीतिक अवसरवादिता को आईना दिखाया है और आज भी दिखा रहे हैं। शुक्रिया)

Tuesday, September 11, 2007

विज्ञापन की दुनिया के कुछ बेहतरीन नमूने!

विज्ञापन की दुनिया काफी दिलचस्प है। कम शब्दों में बहुत कुछ कहना होता या फिर सिर्फ एक तस्वीर के ज़रिए। पेश है विज्ञापन की दुनिया के कुछ ऐसे नमूने जो मेल के ज़रिए एक-दूसरे तक पहुंच रहे हैं।











हो सकता है कि आपमें से कईयों की निगाह इन पर पड़ी हो। लेकिन बाकी भी देखें कि किस तरह के विज्ञापनों को बेहतरीन माना जाता है। कुछ और ऐसे ही विज्ञापन अगली बार...


Wednesday, September 5, 2007

कृष्ण ने किया तो रासलीला, बाक़ी का कैरेक्टर ढ़ीला!

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समय में बेहतरीन काम किए। मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाई। कई और राक्षसों का खात्मा किया। प्रजा को संरक्षण दिया। हाई स्टैंडर सेट किए। इसलिए श्रीकृष्ण को भगवान मानने वालों को मेरा सलाम है। आख़िर उन्होने ने ही कर्ण की रथ के फंसे पहिए के वक्त मौक़ा निकलवाया। अर्जुन से तीर चलवाया। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घेर कर मारने की रणनीति समझायी। अश्वत्थामा के मरने की अफवाह फैला द्रोणाचार्य को निस्तेज किया। शिखंडी को आगे कर पितामह को ढ़ेर करवाया। पांडवों को जिताया। कौरवों को हराया। अगर वो अपना पाॅलिटिकली करेक्ट रोल न निभाते तो हो सकता है कि युद्ध की शक्ल कुछ और होती और महाभारत के बाद का भारत कुछ और। ये अलग बात है कि हज़ारों साल पहले पांडवों की जीत के बाद भी आज कौरवों का ही राज है। नुक्कड़ों...मोहल्लों में द्रौपदी का चीरहरण आज भी बदस्तूर जारी है। पर आज पांडव कहीं नज़र नहीं आते। या अगर वो हैं तो उनको आज के हालात नज़र नहीं आते।

हज़ारों साल पहले पांडव पांच थे। आबादी तेज़ी से बढ़ी है...ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में। पांडवों बाद की उनकी पुश्तों ने एहतियात बरती हो तो भी चलिए... कम से कम उनके पुश्तों की संख्या 50 हज़ार तो होती...पांच करोड़ ना सही। पर आज तो 50 पांडव भी नज़र नहीं आते। फिर कृष्ण जी ने कैसे लोगों को शिक्षा दी? किन लोगों को घर्म के लिए लड़ना सिखाया? किनको जिताया? कहां गए धर्म की हानि के समय उसकी रक्षा के लिए पैदा होने का वादा करने वाले धर्मराज? ऐसा नहीं है कि मैं श्रीकृष्ण के अस्तित्व और उनके किए पर सवाल उठा रहा हूं। ऐसा करुं तो उनको मानने वाले मुझे पूतना के पास भेज देंगे। मैं तो सिर्फ आज की तारीख में उनको देखने की कोशिश कर रहा हूं। भगवान को याद कर रहा हूं। अपने आसपास उनको ढूंढ रहा हूं।

निराश होने की ज़रुरत नहीं। अधर्म पर धर्म की विजय के कर्ताधर्ता के रुप में ना सही, पर व्यक्तित्व के कई पहलुओं में वो आज भी नज़र आते हैं। जैसे कि चुरा कर मलाई खाने वाले आज भी हैं। औऱ वे अकेले नहीं हैं। करोड़ों की तादाद में हैं। प्राईवेट फार्म से लेकर सरकारी दफ्तर तक में हैं। टेबल के नीचे से मलाई खाते हैं। जब मिल जाता है तो अपने बाल-गोपाल में बांटना नहीं भूलते। ऊपर से नीचे तक 'कट' देते हैं। क्या मजाल कि आप उन पर सवाल उठा दें। अशोक मल्होत्रा जैसे जो पकड़े जाने के बाद कहते हैं...मैं नहीं माखन खायो... । कृष्ण दफ्तरों में भी होते हैं। किसको कैसे लंगड़ी लगानी है...किसको कैसे आगे बढ़ाना है...किसको प्रमोशन देना है किसको डिमोट करना है इस रोल को निभाने वाले कृष्ण। अपने अपने धर्मयुद्ध में लिप्त।

आज की चीरहरित होती स्त्रियों की साड़ी में बेशक श्रीकृष्ण ना समाएं। ना ही उसकी साड़ी को हज़ारों मीटर लंबी कर दें। पर गोपियों के साथ रासलीला की उनकी तरह मंशा पालने वालों की तादाद आज लाखों में है। करोड़ों में हैं। आज के कृष्ण नदी किनारे नहीं... स्वीमिंग पूल के आसपास होने की कोशिश करते हैं। या कॅालेज गेट और गर्ल्स स्कूल के आसपास की चाय की दुकानों पर होते हैं। या फिर बड़े बड़े मॅाल में खरीददारी में जुटी लड़कियों के पास मंडराते। बसों में महिलाओं की मज़बूरी की भीड़ के बीच भी उन्हें रासलीला करने की कोशिश करते हैं। ओछी हरकत करना नहीं भूलते। जिनको वे गोपियां मान लेते हैं वे अगर सचेत ना रहें तो उनके कपड़े उतार वो वृक्ष की डाल पर नहीं... अपने घर ही ले जाएं।

ग़रीब दोस्त सुदामा की झेंप मिटाने वाला कृष्ण भी आज कहीं नज़र नहीं आता। सुदामा कांख में चावल दबाए खड़ा रह जाता हो... कृष्ण को आॅफर नहीं कर पाता हो... पर उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। वैसे आज के कई सुदामा स्मार्ट हो गए हैं। कृष्ण बेशक मक्खन के दीवाने रहें हों... पर उन्होंने खुद कभी भैंस को दूहा हो ऐसी जानकारी नहीं मिलती। पर आज तो कृष्ण वही बनते हैं तो देश को दूह सकें। व्यवस्था को निचोड़ सकें।

आज पुराने कृष्ण की पूजा होती है। होनी चाहिए। मलाई खाने और गोपियों के साथ उनकी क्रीड़ा रासलीला है। लेकिन बाकी वही करते हैं तो कहते हैं कि कैरेक्टर ढीला है। ये क्या बात हुई! ज़माना बदल गया है। और बदले हुए ज़माने के ये भी तो पूजनीय हैं।

Tuesday, September 4, 2007

जब सलमान की बहन से नज़रें मिलीं

खचाखच भरी अदालत। सलमान का मुकद्दमा। जोधपुर हाईकोर्ट में जस्टिस पवार की अदालत में तिल रखने की जगह नहीं। सलमान के स्थानीय दोस्त शिशुपाल और उसके कुछ लोगों के साथ किसी तरह अंदर पहुंची अलवीरा। हर किसी के लिए कौतुहल की पात्र। हर कोई उसे देख रहा था। अलग अलग तरह की नज़रें। सम्मान से देखने वाली भी और असम्मानजनक भी।

न चाहते हुए भी मेरी नज़रें उसकी तरफ उठ जाती थीं। मैं बार बार उसके भाव पढ़ने की कोशिश करता था। इसका ख्‍याल रखते हुए कि मेरी नज़रों से उसे कष्ट ना हो। वो हर सुनवाई पर अदालत आ रही थी। पहली बेंच ने जब मामला सुनने से इंकार किया तब भी और जब दूसरी बेंच में मामला अगले दिन के लिए लिस्ट हुआ तब भी। जेल में हरेक रात सलमान पर भारी पड़ रहा था। उससे ज़्यादा परिवारवालों के लिए भारी वक्त था। ये अलवीरा के चेहरे से साफ झलकता था। जैसे ही सलमान के वकीलों और अदालत के बीच बात शुरु होती थी, अलवीरा खड़ी हो जाती थी। हरेक बात सुनने की कोशिश करती थी। जब कोर्ट को दलील पसंद आती थी तो अलवीरा के चेहरे पर उम्मीद झलक आती थी। जब सुनवाई आगे के लिए टलती थी तो फिर वो भारी कदमों से अदालत के बाहर निकल आती थी। बाहर की भीड़ से बचाने के लिए सलमान का बॅाडी गार्ड शेरा इंतज़ार कर रहा होता था।

सलमान ने जो कुछ किया यहां उस पर नहीं विचारा जा रहा। जेल में बंद स्टार भाई के लिए बहन की भावनाओं को पढ़ने की कोशिश भर है ये। अदालत में मामला कई दिनों तक खिंचा। कई मौक़ों पर वो बिल्कुल मेरी कुर्सी की बगल वाली कुर्सी पर होती थी। तब उसके भावों को पढ़ना मुश्किल होता था। इसलिए मैं दूर दूर ही रहने की कोशिश करता था। उसकी हरेक गतिविधि को देखने की कोशिश करता था। कई बार उसके चेहरे पर बिल्कुल कोई भाव ही नहीं होता था। लेकिन आंखे नम सी होती थी। बीच बीच में अपने वकीलों से बात कर लिया करती थी। या मुंबई से साथ आए लोगों से। कभी उत्तेजना में नहीं देखा मैंने उसे। बिल्कुल शांत रहती थी। लेकिन मन में ज़रुर कई लहरें चलती होगीं। ख़ासतौर पर इसलिए भी कि इसी मामले के चार और अभियुक्तों को निचली अदालत ने बरी कर दिया। पांचवे को सेशन कोर्ट ने छोड़ दिया। जबकि उन सबके के खिलाफ भी वही परिस्थिजन्य साक्ष्य थे जिनके आधार पर सलमान को सज़ा सुनाई गई है। अभियोजन पक्ष ने उन पांचो को सज़ा दिलाने के लिए ऊपरी अदालत का दरवाज़ा भी नहीं खटखटाया। परिवारवालों को ये लगना स्वाभाविक है कि सिर्फ सलमान को जानबूझ कर निशाना बनाया गया है।

अलवीरा को पढ़ पाने की इसी कोशिश में एक बार मेरी नज़र उसकी नज़र से मिल गई। हुआ ये था कि अदालत ने मामले की सुनवाई अगले दिन के लिए तय कर दी थी। परिवार वाले जल्द से जल्द ज़मानत चाहते थे। तो जैसे ही मामला एक दिन के लिए औऱ आगे बढ़ा, मैंने अलवीरा की प्रतिक्रिया नोट करनी चाही। उसकी तरफ देखा तो इत्तेफाकन वो उसकी निगाह मुझसे टकरा गई। मैंने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं की थी। ना तो कैमरे पर और ना ही अदालत में। वो कुछ बोल पाने की हालत में नज़र नहीं आती थी। इसलिए। लेकिन जब नज़रें टकरा गईं तो मेरे मुंह से निकला सॅारी...। ये सॅारी मामला एक दिन और बढ़ जाने के लिए था। उसने मेरे सॅारी को समझा। पलकें झुका उसे एक्सेप्ट करने सा भाव दिया। फिर कुर्सी पर बैठ गई। लेकिन उसने नज़रें नहीं हटाई। उसकी नज़र में एक सवाल था। सवाल सलमान मामले मे हो रहे मीडिया ट्रायल का। उसने बोला कुछ नहीं। फिर मुझे ही संदेश देना पड़ा। 'वी आर विद यू।'

ये एक अदालत से दोषी करार सलमान का साथ देने जैसा संदेश नहीं था। बल्कि एक ऐसी बहन के लिए था जो अपने भाई की रिहाई के लिए अदालत के चक्कर काट रही थी। चाहती तो वो होटल के एसी कमरे में बैठी रह सकती थी। मुकद्दमा तो वकीलों को लड़ना था। पर उसकी नज़रें हमेशा जता रही थी कि वो सलमान के बाहर आने का रास्ता देख रही है। और वो उसे रिहा करा कर ही लौटी।

Monday, September 3, 2007

रवीश जी, मुझे भी जाना है स्वर्ग की सीढ़ी तक

(इन बेतुकी पंक्तियों को पढ़ने के पहले कस्बा पर रवीश का लिखा पत्रकारिता का स्वर्ग काल पढ़ें। तभी आप इसे पूरे कंटेक्स्ट में इसे समझ पाएंगे। शुक्रिया)

आदरणीय रवीश जी,

मुझे जलन हो रही है। आखिर मैं क्यों नहीं पहुंचा स्वर्ग की सीढ़ी तक। मुझे क्यों नहीं एसाईन किया जाता इस तरह के काम के लिए। क्यों बार बार नरक दिखाने के लिए ही कहा जाता है। वो भी वो नरक जो इसी धरती पर है...अपने इसी महान भारत देश में। अभी अभी बाॅडी बिल्डर सलमान खान जोधपुर जेल में नरक की ज़िंदगी बिता रहे थे। बिना एसी कूलर के। न बढ़िया खाना और ना छरहरी-भरीपूरी लड़कियों के साथ नाचना गाना... एक चिंकारा को गोली क्या मारी, रह रह कर ज़िंदगी नरक हो जाती है। उनकी नरक की ज़िंदगी को कवर करने मैं वहां था। सलमान में और मेरे में अंतर सिर्फ इतना था कि वो जेल में क़ैद थे और मैं जोधपुर शहर में। वो सात दिन रहे और मैं दस दिन। वो मुंबई लौटे तो हज़ारों समर्थकों की हौसलाअफ़ज़ाई ने उनके मिजाज़ को स्वर्ग सी अनुभूति दी होगी। पर मुझे स्वर्ग की सीढियां नसीब नहीं।

बात सिर्फ इसी नरक की नहीं है। पिछले दिनों बुंदेलखंड में था। पानी के बिना यहां लोगों की ज़िंदगी नरक है। कुंए और गढ्ढों में जमा कचरा पानी पीते हैं। पानी के लिए महिलाएं कई-कई किलोमीटर तक चलती हैं। हमें भी चलना पड़ा। उनकी नरक की ज़िंदगी जानने और दिखाना के लिए हमें नरक के दरवाज़े तक जाना पड़ा। पर क्या मुझ में इतनी क़ाबिलियत नहीं कि कोई मुझे भी स्वर्ग के मुहाने तक जाने दिया जाए।

यहां कब तक गोहाना के दलितों, विदर्भ के किसानों, झारखंड के आदिवासियों, सरकारी अस्पताल में दाखिल मरीज़ो ब्ला... ब्ला... ब्ला... की नरक सी ज़िंदगी दिखाते रहेंगे। क्या फायदा उसका। वो तो नरक में ही हैं और रहेंगे... सोच के बेतुकेपन से हमारी भी ज़िंदगी रह-रह कर नरक हो जाती है। एक नारकीय रिपोर्ट खत्म नहीं होती कि दूसरी आ जाती है। आखिर क्या हमने ठेका ले रखा है नारकीय चीज़ें दिखाने का। क्या सिर्फ यही पत्रकारिता है। नहीं। पत्रकारिता का स्वर्ग काल कुछ और है।

जिसके पास जो होता है उसका उसमें इंटरेस्ट कम हो जाता है। जिनकी नारकीय ज़िंदगी हम दिखाते रहते हैं, उनका खुद का उसे देखने में दिलचस्पी नहीं। वे ऊब चुके हैं उससे। वो ये देखना चाहते हैं कि किस तरह संजय दत्त भगवान की भक्ति कर जेल से बाहर आए और नरक में दुबारा नहीं जाने के लिए मंदिर मंदिर घूम रहे हैं। शायद वो सोचते हैं कि न्यूज़ चैनल पर ही सही, आस्था का प्रोग्राम देख कर उनकी ज़िंदगी भी नरक से निकल आएगी। स्वर्ग की सीढ़ी तो उनके लिए रामबाण है। पाॅजिटिव स्टोरी है। दिखाना चाहिए। उस सीढ़ी तक आने-जाने का खर्चा भी बताना चाहिए। कांवर लेकर तपती सड़क पर चलने वाले कई भक्त हैं जो कंबल ओढ़ कर वहां पहुंच जाएगें। हमारी स्टोरीज़ उनको नरक से नहीं निकाल पाती लेकिन इस एक कोशिश से वो स्वर्ग के सोपान तक पहुंच जाएंगे।

आपने बताया कि द़ौपदी ने डर के आपको फोन कर आॅफ द रिकार्ड बात की। मतलब कोई बाईट नहीं मिली। तो क्या हुआ। पैकेज तब भी बना सकते हैं। द़ौपदी से मिली जानकारी के आधार पर स्वर्ग का रीक्रिएशन कर तो दिखा ही सकते हैं। स्टिंग ठीक नहीं होगा, पर एक फीचर तो बना ही सकते हैं। एंकर आप ही करेंगे। वैसे भी अब तक आपने ज़िंदगी की इतनी तरह के नारकीय आस्पेक्ट को कवर कर लोगों तक पहुंचाया है कि आप भी थोड़ा चेंज चाहते होगें। मुझे जब तक मौक़ा मिले तब तक हो सकता है कि बहुत देर हो जाए। पर आपके पास अपना बजट है।

आप चाहें तो अपनी स्पेशल रिपोर्ट भी बना सकते हैं। स्वर्ग में मध्यम वर्ग है या नहीं। है तो किस हाल में है। लोन लेकर कार खरीद रहा है कि नहीं। यहां का सतपाल कहीं वहां जा कर सत्या पाॅल तो नहीं बन गया। वहां 'हैव और हैव नॅाट' के बीच का फर्क कितना है। क्या दलितों की सोसाईटी स्वर्ग में है या नहीं। बड़ा सवाल तो ये कि क्या किसी दलित को स्वर्ग में जगह मिली भी या नहीं। या धरती पर नरक काट काट कर गए को वहां भी नरक में धकेल दिया गया है। वहां रिजर्वेशन का क्या हाल है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है या सरकार के पास। सवाल बहुतेरे हैं। पर ठहरिए... इन सवालों पर रिपोर्ट करेंगे तो टाईप्ड लगेंगे। कुछ अलग तरह से करना होगा। स्वर्ग के उस प्रभामंडल को बनाए रखना होगा जिसकी वजह हर कोई स्वर्ग जाना चाहता है। ये जानते हुए की भी शरीर छोड़ने के बाद ही जा सकता है...लालच कम नहीं होती। 'धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है...यहीं है...यहीं है' को तो हम सबने कच्ची पक्की स्टोरीज़ कर कर के झुठला ही दिया है। तो, अब तो जो 'स्वर्ग है वो वहीं है...वहीं है...वहीं है...' और इसे बना रहने देने में ही भलाई है। स्वर्ग जाने की लालच रखने वालों की भी और उसकी सीढ़ियां ढुंढ़वाने वालों की भी।

एक बार सीढ़ी का पता चल गया है तो इंवेस्टिगेशन का आधा काम तो हो ही गया है ना। दूसरे की ख़बर टीप कर दिखाने में कोई हर्ज थोड़े ही है। शूट ना करना चाहें तो ट्रांसफर ले लेंगे। वैसे भी स्वर्ग की स्टोरी में रिसर्च की ज़रुरत नज़र नहीं आती। कुछ भी कह देंगे...दिखा देंगे, यहां लोग हाथों हाथ लेंगे। अभी तक के कामों की वजह से शायद ही किसी ने आपका आॅटोग्राफ मांगा हो। पर एक बार अगर आपने अपने अंदाज़ में स्वर्ग पर स्पेशल रिपोर्ट कर दी तो फिर आप रब और ईश के दूत के तौर पर देखे जाने लगेंगे। आपके नाम रवीश की नई व्याख्या होगी। ट्रैकिंग का शौक भी पूरा हो जाएगा। इनविजीबल इंडिया दिखाने के लिए हो सकता है कि पत्रकारिता का एक और पुरस्कार ही मिल जाए।

पर एक बात मत भूलिएगा। मुझे भी जाना है स्वर्ग की सीढ़ी तक!

(ये रचना रवीश के व्यंग्य का विस्तार मात्र है। समानता संयोग से हो सकती है। इसके लिए लेखक ज़िम्मेदार नहीं है। किसी भी विवाद का हल स्वर्ग की अदालत में होगा।)

Wednesday, August 22, 2007

बोनलेस के बाद अब मज़ा लीजिए हेडलेस चिकन का!

(शाकाहारी ब्लागर बंधु इस पोस्ट के लिए कृपया माफ करेगें)

प्रिय ब्लॅाग पाठकों,

यूं तो चिकन कई प्रकार के होते हैं। देसी चिकन और फार्म वाले चिकन। इन्हें कई तरह से तैयार किया जाता है। तंदूर भी और ग्रेवी वाला भी। कईयों को बोनलेस में मज़ा आता है। पर अब चिकन प्रेमियों के लिए हाज़िर है हेडलेस चिकन।

ये व्यंजन बनाया अमेरिका में बैठे भारत के राजदूत रोनेन सेन ने। कह दिया कि परमाणु करार का विरोध करने वाले हेडलेस चिकन की तरह हैं। गर्मागरम व्यंजन भारत पहुंचा। हिन्दी में अनुवाद हुआ बिना सिर वाली मुर्गी। पर जब संसद में हंगामा हुआ तो पता चला कि उनके कहने का मतलब था बिना भेजे वाली मुर्गी। मतलब कि करार का विरोध करने वाले बेवकूफ हैं। थोड़ा और नीचे उतरते तो शायद करार विरोधियों को बर्डफ्लू से पीड़ित चिकन कह देते। पर गनीमत है कि सिर्फ हेडलेस ही कहा। हालांकि अब सेन ने अपने कहे पर माफी मांग ली है। इसलिए वो मामला ख़त्म मान लिया गया है। पर जाने अनजाने हमारे हाथ हेडलेस चिकन बनाने की विधि हाथ लग गई।

ये व्यंजन खाने के लिए नहीं है। सिर्फ बनाने के लिए है। अगर आपका किसी से किसी मुद्दे पर विरोध हो तो आप उसे हेडलेस चिकन बना दें। बिना भेजे वाला करार दे दें। ना भेजा होगा ना वो आपका भेजा फ्राई करेगा। आख़िर उंची शिक्षा का इतना तो फायदा होना चाहिए कि ग़ाली भी दें तो व्यंजन की तरह लगे।

आपका
हेडलेस ब्लागर

मेरा पहला प्यार...जो अब तक मेरी बीवी से भी छिपा है!

प्यार प्यार होता है। पहले प्यार की तो बात ही क्या। छिपाए नहीं छिपता। बशर्ते आप चाहें। पर कई बार आप जब खोलना भी चाहें तो छिपा रहता है। क्योंकि वो प्यार ही ऐसा होता है। फिर भी दुनिया उस प्यार को मानने को तैयार ही नहीं होती। और जब आपकी दुनिया आपके घर में सिमट आए...मतलब आप शादीशुदा हो जाएं तो आपकी बीवी को तो हरगिज़ ये क़बूल नहीं होगा कि आपका प्यार ऐसा होगा। वो भी पहला प्यार। ख़ासतौर पर जब आपने खुद को एक प्यारे इंसान के तौर पर पोर्टे कर रखा हो। दुनियादारी से मिली इसी सीख की वजह से मैंने अपनी बीवी को अब तक अपने पहले प्यार के बारें में नहीं बताया। सच बता भी दूं तो खामख़्वाह शक करेगी। कहेगी मैं ही मिली हूं बेवकूफ बनाने को। बरगलाना किसी और को। नस नस पहचानती हूं तुम्हें।

तो इसी डर से मैंने अबतक अपनी धर्मपत्नी पत्नी को अपने पहले प्यार के बारे में नहीं बताया। ये सोच कर कि अगर वो शक नहीं करेगी तो शायद भरोसा भी ना करे। पर लगा कि आप सबों को बता सकता हूं। क्योंकि मन में कुछ भी छिपाने की आदत नहीं रही। कल को मौक़ा लगे तो आप बता देना मेरी बीवी को। मेरे निर्दोष होने का सर्टिफिकेट देते हुए। वो भरोसा कर लेगी। बहुत निर्दोष है। अपने पति के अलावा उसे किसी की बात पर शक नहीं होता। इतनी निर्दोष कि आपकी सौ झूठी बातों पर भरोसा कर ले पर मेरी एक सच्ची बात पर सौ सवाल। इसलिए आपको वकील बना रहा हूं। जज तो वही रहेगी।

तो मीलार्ड.... मेरा तर्क है कि प्यार की कम से कम 72 परिभाषाएं हैं। एक वाक्य में हम भगवान से प्यार करते हैं। दूसरे वाक्य में हम अपने कुत्ते से भी प्यार करते हैं। तो किस प्यार में क्या आकर्षण तलाशा जाए कि वो वाकई में प्यार ही लगे। लालच या मौक़ापरस्ती नहीं। पर ये तय करना मुश्किल हो जाता है। बेशक मेरे केस में ना हो। क्योंकि... हां मैंने कई कई बार प्यार किया है। शादी हो गई तो क्या। आज भी कईंयों से प्यार करता हूं। आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ना तो मेरे प्यार को ना तो गुनाह ठहरा सकते हैं और ना ही क़ैद कर सकते हैं।... और मेरे पहले प्यार की याद तो आप कभी मिटा ही नहीं सकते। फिर तो ये मुकद्दमा ही बेकार है। आपकी ये अदालत अर्थहीन।

आप वैसे ही प्यार से पूछ लो। क्या रहा मेरा पहला प्यार। जो लाया मेरे जीवन में बहार। इकलौता बेटा होने की वजह से हमेशा मां को लगता रहा कि कहीं मेरे साथ बुरा ना हो जाए। इसलिए वो मेरे कई प्यार को ठुकराती रही। पतंग उड़ाने के प्यार को कि कहीं छत से ना गिर जाए। क्रिकेट में कार्केट की गेंद के इस्तेमाल के प्यार को...कि कहीं गेंद से चोट ना लग जाए। फुटबाल में फारवर्ड खेलने के प्यार को कि धक्का मुक्की ना हो जाए। लकड़ी के डंडे को हाॅकी स्टिक के तौर पर इस्तेमाल के प्यार को कि कहीं किसी से लड़ाई ना हो जाए। बस की छत पर बैठ खुली हवा खाते सफ़र के प्यार को कि कहीं चलती बस से गिर ना पडूं।। पोखर में चचेरे भाईयों को नहाते देख खुद तैरना सीखने की इच्छा के प्यार को कि कहीं डूब ना जाऊं। यहां तक कि दूर जाकर... नेतरहाट में पढ़ने के प्यार को और छात्रावास में अकेले रहने के प्यार को भी...कि बीमार पड़ जाउं तो देखभाल कौन करेगा।

...पर इतनी प्यारी मां होते हुए भी वो मेरे पहले प्यार को रोक नहीं पायी। वो था हीरो की 24 इंच की साईकिल कसा कर उसकी सवारी का प्यार। उसे लगता रहा कि अगर साईकिल पर निकला तो ट्रक के नीचे आ जाउंगा। कोई टक्कर नहीं भी मारा तो भी मैं मारा जाउंगा। इसलिए गाड़ी या रिक्शे में ही ठीक हूं। साईकिल खरीद कर देना ठीक नहीं। फिर भी खरीद दिया। क़रीब साढ़े पांच सौ की।

आज सपने कहीं बड़े हो गए हैं। पर उस साईकिल की नाचती रिम की वो चमक आज भी आंखों में है... जब अपनी साईकिल अपना पहला प्यार था..! उसकी गद्दे वाली सीट... उसका बैक करियर जिस पर किसी को भी बिठा सकता था। कुछ और पैसे दे हैंडिल कैरियर भी लगवाया... ताकि किताब कांपी लगा सकें। आईना और झालड़ के बिना... ताकि बेसिक लुक दे। जंक लगने से बचाने के लिए मिट्टी तेल की मालिश.... पर आज की बीवी को ये कौन समझाए कि एक लड़के का पहला प्यार ऐसा भी हो सकता है। कह दूं कि दीप्ती नवल... अनीता राज... किमी काटकर या फिर हेलेन ही सही... तो शायद एकबारगी वो मान ले। कि ऐसा हो सकता है। हा हा हा। आप भी ठहाके लगाईए।

Sunday, August 19, 2007

हाथों का इस्तेमाल कुछ ऐसा भी!

हाथ कई काम आते हैं। अच्छे काम में... कम अच्छे काम में और बुरे काम में भी। किसी को कुछ देने या किसी से कुछ छीनने के काम... हाथ जोड़ने या फिर तोड़ने के काम। हाथ लगाने या खींचने में। सहारा देने या छुड़ाने में। कई बार हमें किसी काम में दूसरों का हाथ नज़र आता है। जैसे भारत में होने वाली हर आतंकी घटना में आईएसआई का हाथ। कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं फिर दाऊद है जो हमारे हाथ ही नहीं आता। कांग्रेस कहती है कि उसका हाथ ग़रीबों के साथ। परमाणु डील पर अमेरिका से हाथ मिलाने पर लेफ्ट सरकार से हाथ खींचने की बात कर रही है। कोई किसी के हाथ में आकर खिलौना हो जाता है। कहते हैं कि हर सफल मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है। हाथ हिला पास बुलाया जाता है और दूर रहने का इशारा भी। सहलाया भी जाता है और पीटा भी। सिर पर हाथ रख आगे बढाया जाता है और हटा कर गिराया भी। हाथों के इन परंपरागत इस्तेमाल से अलग कुछ अलग हाथ देखिए।











हाथों को रंग कर बनाए गए अनोखे चित्र




Friday, August 17, 2007

जहां हैंडपंप देख कर शादी होती है

हमीरपुर ज़िले के सिसोलर गांव में एक हैंडपंप से पानी भरने की ख़ातिर एक व्यक्ति ने चार लोगों को गोली से उड़ा दिया। इसी सिलसिले में वहां गया। पानी की समस्या कई कई रुप यहां देखने को मिले।

लेकिन सबसे दिलचस्प कहें या दुर्भाग्यपूर्ण कि कई गांवों में लड़कों की शादी एक समस्या बन जाती है। लड़की वाले आते हैं तो पहले गांव में पानी की व्यवस्था देखते हैं। चालू हालत में हैंडपंप घर के आसपास हो तो बात बनते देर नहीं लगती। लेकिन अगर पानी दूर कुंए से लाना हो तो कई मांबाप अपनी बेटी देने को तैयार नहीं होते। हालांकि हर बार ऐसा नहीं होता लेकिन सोचिए जिन कुछ मामलों में ही ऐसा होता होगा कितनी परेशानी वाला होगा। लड़की के लिए अगर थोड़ा क़ाबिल लड़का मिल भी रहा हो तो पानी की कमी रिश्ता नहीं होने देती। और लड़कों की सोचिए। क्या बीतती होगी दिल पर।

ऐसा भी नहीं है कि हर कोई वहां अपना हैंडपंप लगा ले। ज़मीन के नीचे पानी बहुत कम है। चट्टान ज़्यादा हैं। चाह कर भी बोरिंग नहीं होती। होती भी है तो हैंडपंप जल्द सूख जाते हैं। इसलिए कई इलाक़े में तो लोग हैंडपंप पर ताला लगाने से भी नहीं चूकते। तीन साल से सूखा पड़ा है। इसलिए ग्राउंड वाटर रिचार्ज भी नहीं हो पा रहा। सरकार कुछ नहीं कर रही। किसान परेशान हैं। ऊपज नहीं हो रही और लोग दाने दाने को मोहताज।

Tuesday, August 14, 2007

कैमरा भी कर सकता है रिपोर्टर

नीरज गुप्ता को आप में से कई जानते होगें। अरे वही 'वारदात' आजतक वाले... जो बाद में आईबीएन सेवेन में 'क्राईम द किलर' करने लगे। वे जब कैमरे के सामने होते हैं तो सुंदर दिखते हैं। पर जब कैमरे के पीछे होते हैं तो ज़्यादा सुंदर दिखाते हैं। अगर हम और आप दुनिया की कई चीज़ों को उतनी खूबसूरती के साथ नहीं देख पा रहे जितनी कि देखनी चाहिए... तो इसके पीछे एक बड़ी वजह ये है कि नीरज रिपोर्टर बन गए। अगर वे पेशे के तौर फोटोग्राफी कर रहे होते तो शायद बात कुछ और होती। लेकिन अपने व्यस्त क्षणों में भी लंबी छुट्टी लेकर वे कभी एशिया तो कभी मलेशिया घूम आते हैं। यादों के लम्हों की कुछ तस्वीरें ले आते हैं। कभी मोबाईल कैमरे से खींची तो कभी दूसरे कैमरे से। उनकी खींची कुछेक तस्वीर हाथ लगी है। आपकी नज़र कर रहा हूं। दिलचस्प बात ये है कि ये तस्वीरें किराए के कैमरे से खींची गईं हैं।

लद्दाख में इसी तरह की खूबसूरती है। एकबार जाने पर लौट कर आने की इच्छा नहीं होती।

लेह से क़रीब डेढ़ सौ किमी दूर पैगॅाग त्सो। 14,500 फीट की उंचाई पर खारे पानी का झील

सिंधु नदी जिसके किनारे आर्य सभ्यता का जन्म हुआ।

Sunday, August 12, 2007

एक पत्रकार की दुखद मौत, हमारी श्रद्धांजलि


ज़ी न्यूज़ संवाददाता शोभना सिंह की दर्दनाक मौत से हमें भी सदमा लगा है। हम उन्हें काम करते हुए पत्रकार के तौर पर देखते रहे हैं इसलिए जानते हैं। जिस तरह काम करते हुए हिमाचल के छतरु में एवलांच में फंस कर उनकी जान गई....ये ज़िम्मेदारी के प्रति उनकी निष्ठा और काम के प्रति उनके समर्पण को ही दिखाता है। ऐसे पत्रकार को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।

सांसद को पकड़वाएं, ढाई हज़ार रुपये पाएं

फूलपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद अतीक अहमद अब ईनामी बदमाशों की श्रेणी में आ गए हैं। उत्तर प्रदेस शासन ने उन पर पच्चीस सौ रुपये का ईनाम रखा है। सांसद महोदय पर अपने भाई के साथ मिल कर बीएसपी विधायक राजूपाल की हत्या का आरोप है। फिलहाल फरार चल रहे हैं इसलिए ईनाम रखा गया है। इन पर कई दूसरे आपराधिक मामले भी हैं। राज्य में अब बीएसपी की सरकार है। ऐसे में सिर पर ढाई हज़ार का ईनाम उनके लिए तौहीनी की बात हो सकती है। इनका डीलडौल देखें तो ये वाकई में ज़्यादती लगती है। फिर भी आपको कहीं दिखें तो उत्तर प्रदेश पुलिस को बताने का कष्ट करें। अगर ये छोटे मोटे चोर होते तो शायद ढूंढने में ज़्यादा मेहनत लगता और तब शायद ईनाम की रकम भी बड़ी होती। फिर भी ढाई हज़ार भी कोई छोटी रकम नहीं होती। आप भी ढूंढें मैं भी ढूंढता हूं। देखें किस्मत किसका साथ देती है।

Monday, August 6, 2007

सॅारी, आपके ब्लॅाग्स के लिंक डिलीट हो गए हैं

प्रिय ब्लॅागर बंधुओं,

आपमें से जिन साथियों के चिठ्ठों के लिंक मैंने अपने चिठ्ठे पर दिए थे वे मेरी तकनीकी जानकारी की कमज़ोरी के चलते डिलीट हो गए हैं। इसके लिए मुझे खेद है। पहली फुर्सत में मैं उसे दुबारा लगाने की कोशिश करुंगा। अविनाश ने इस काम में तकनीकी मदद का भरोसा दिया है। आप में से कोई चाहें तो इसकी विधि मुझे मेल कर सकते हैं।

आप इसे अन्यथा ना लें।

आपका
उमाशंकर सिंह

Sunday, August 5, 2007

बिहार में बाढ़ और मॅारीशस में मुख्यमंत्री

जब बिहार में बाढ़ का पानी तबाही मचा था, मुख्यमंत्री नीतिश कुमार डाक्टरेट की उपाधि लेने मॅारीशस की यात्रा पर निकल पड़े। 30 अधिकारियों की फौज भी उनके साथ गई। मॅारीशस में उन्होने 'बिहार वीक' का उद्घाटन किया। लेकिन क्या वे अपने साथ बिहार की इन तस्वीरों को ले गए...?... उनको इन तस्वीरों को दुनिया भर में दिखाना चाहिए कि ये बिहार की असली तस्वीर है। लेकिन शायद वो अपने मुख्यमंत्री निवास के आसपास की कुछ चमचमाती तस्वीर दिखा कर दुनिया भर के निवेशकों को लुभाने की कोशिश करते हों।
आपत्ति उनके मॅारीशस यात्रा पर नहीं... यात्रा कि टाईमिंग पर है। और लौट कर आने के बाद भी उनकी आंखें नहीं खुली हैं। वे बस अपने 'भरोसेमंद' ज़िला कलेक्टरों की बात सुन कर ये तय कर रहे हैं कि कौन से ज़िले बाढ़ग्रस्त हैं कौन से नहीं।
जागिए नीतिश जी, इन तस्वीरों को देखिए... एक बार ठीक से देख लेंगे तो शायद नींद नहीं आएगी...आंखे खुल जाएंगी!